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नई शिक्षा नीति-2019-शिक्षा क्रांति का वादा!

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में आमूलचूल सुधारों पर जोर लेकिन इसकी सफलता के लिए साफ-साफ दो-टूक कार्यक्रमों और कदमों की दरकार

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aajtak.in
कौशिक डेका/ मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 26 June 2019
नई शिक्षा नीति-2019-शिक्षा क्रांति का वादा! इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास और फोटो इमेंजिग अमरजीत सिंह नागी

अगर नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2019 का मसौदा उसकी परिकल्पना के मुताबिक 2035 तक अमल में आ जाता है तो क्या होगा? इसे 31 मई को नौ सदस्यों की के. कस्तूरीरंगन समिति ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को सौंपा है.

आइए, अब कल्पना करें कि 2032 में पैदा हुए रोहन की जिंदगी कैसे आगे बढ़ेगी. जब वह तीन साल का होगा तो उसे 5+3+3+4 के ढांचे के तहत औपचारिक शिक्षा में दाखिल किया जाएगा. पहले तीन साल उसे स्कूल पूर्व तालीम मिलेगी—कम से कम तीन भाषाओं में—और वह भी उसे प्रशिक्षित शिक्षक देंगे. इस दौरान वह ककहरा, अंक, रंग और आकृतियां सीखेगा, पहेलियां हल करेगा और नाटक, कठपुतली के खेल, संगीत और हरकत से रूबरू होगा.

कोई पाठ्यपुस्तक नहीं होगी, सारी पढ़ाई-लिखाई खेल-खेल में और प्रयोगात्मक होगी, और ऐसे स्कूल परिसर में होगी जहां साफ-सुथरे शौचालय, लंबे-चौड़े कमरे, आइटी सक्षम गजट, खेलने की काफी चीजें और हंसी-खुशी का माहौल होगा. कक्षा 1 से 5 में उसे निश्चित घंटों में पढऩे और गणित सीखने का वक्त मिलेगा क्योंकि पांचवीं कक्षा तक उसे अक्षरों और अंकों का बुनियादी ज्ञान हासिल कर लेना होगा. अगर रोहन की कोई 'खास रुचि' और/या 'प्रतिभा' है—वह गणित, खेल, पेंटिंग या ऐक्टिंग में हो सकती है—तो शिक्षक उसे पहचानेंगे और विकसित करने के लिए मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देंगे.

कक्षा 6 से आगे रोहन को पाठ्यक्रम से जुड़ी और पाठ्यक्रम से अलहदा गतिविधियों को लेकर फिक्र नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि गणित से लेकर खेल और संगीत और पेंटिंग तक तमाम विषय पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे. वह अपनी दिलचस्पी के विषय चुन सकता है. बेशक, कुछ साझा अनिवार्य विषय तो होंगे ही. इस पायदान पर उसे कुछ व्यावसायिक प्रशिक्षण देने की शुरुआत भी होगी ताकि वह तय कर सके कि कक्षा 9 में पहुंचने पर कौन-सा व्यावसायिक विषय लेगा. इस दौरान इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के जरिए उसका नियमित मूल्यांकन किया जाएगा और उसके सीखने के ग्राफ को रिकॉर्ड किया जाता रहेगा ताकि उसके लिए माकूल योजना बनाई जा सके. कक्षा 3, 5 और 8 के आखिर में इम्तिहान होंगे ताकि उसकी आलोचनात्मक सोच की क्षमता और उसकी भाषा तथा गणित के हुनर को मापा जा सके.

कक्षा 9 से रोहन छह-छह महीने के सेमेस्टर में तीन विषयों की ऑनलाइन बोर्ड परीक्षा देगा. इस परीक्षा का खाका इस तरह तैयार किया जाएगा जिससे मूल विषयों की उसकी समझ की परख हो, न कि उसके याद रखने या रटने के हुनर की. वह बोर्ड की परीक्षा साल में दो बार या शायद ज्यादा बार भी दे सकता है.

रोहन जब कक्षा 12 पूरी कर लेता है, तब वह अपने घर के पास के किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में जा सकता है, क्योंकि अच्छे उच्च शिक्षा संस्थान देश के हरेक जिले में खोले जाएंगे. वे तीन साल के या चार साल के नियमित कोर्स या व्यावसायिक कोर्स की पेशकश करेंगे. विकल्प के तौर पर यह भी हो सकता है कि व्यावसायिक प्रशिक्षण उसके डिग्री कोर्स में ही समाहित कर दिया जाए. यह 2020 के दशक की तरह नहीं होगा जब आपको एक धारा चुननी पड़ती है—सभी डिग्रियां बहुविषयक होंगी, जो उसे मिसाल के लिए इतिहास के साथ भौतिकशास्त्र पढऩे की इजाजत देंगी. अगर रोहन पेशेवर कोर्स से जुडऩा चाहता है, तो वह किसी भी यूनिवर्सिटी में जा सकेगा क्योंकि वे सभी बहुविषयक होंगी. तो इस तरह इंजीनियरिंग या मेडिकल डिग्री की पढ़ाई करते हुए वह समाज विज्ञान का विषय भी ले सकता है और यह पता लगा सकता है कि उसकी डिग्री उसके स्थानीय और वैश्विक पर्यावरण पर अच्छा असर कैसे डाल सकती है.

डिग्री कोर्स के आखिरी साल में रोहन रिसर्च का विकल्प चुन सकता है या तीन साल का डिग्री कोर्स पूरा करने के बाद एक साल रिसर्च कर सकता है. इस तरह वह पहले मास्टर डिग्री की पढ़ाई किए बगैर पीएचडी में दखिला ले सकेगा, हालांकि वह मास्टर डिग्री के बाद डॉक्टरेट का विकल्प भी चुन सकता है.

उसे, या उसके संस्थान को, उसकी रिसर्च के लिए धन की फिक्र नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि अगर उसका प्रोजेक्ट स्थानीय, राष्ट्रीय या वैश्विक मुद्दों से जुड़ा हो तो प्रोजेक्ट का खर्च नेशनल रिसर्च फाउंडेशन उठाएगा. अगर रोहन इतने लंबे वक्त तक अकादमिक जगत में रहना न चाहे, तो उसके पास कई विकल्प होंगे, उस चार साल लंबी उदार डिग्री के दौरान, जो उसे 21वीं सदी की ज्ञान अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करेगी.

यह एक शुरुआती झलक भर है कि एनईपी 2035 तक देश की शिक्षा प्रणाली को किस तरह आमूलचूल बदलना चाहती है.

484 पन्नों का यह दस्तावेज विस्तृत योजना का खाका पेश करता है जिसमें स्कूल पूर्व, स्कूल और उच्च शिक्षा के साथ-साथ व्यावसायिक, वयस्क और शिक्षक प्रशिक्षण और नियम-कायदे शामिल हैं. यह नए रास्ते बनाने वाले कुछ सुधारों का भी सुझाव देता है, मसलन स्कूलों में शुरुआती बचपन की शिक्षा कार्यक्रमों को मजबूत करना, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर ध्यान देना, स्कूल पाठ्यक्रमों में व्यावसायिक कोर्स जोडऩा, उच्च शिक्षा में रिसर्च के लिए धन जुटाने को बढ़ावा देना और उच्च शिक्षा में गुणात्मक बदलावों की खातिर शीर्ष नियामकीय निकायों का पुनर्गठन करना और नए निकाय बनाना.

स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे गैर-मुनाफा संगठन सेंट्रल स्कवायर फाउंडेशन के संस्थापक तथा चेयरमैन आशीष धवन कहते हैं, ''एनईपी में छात्र के शैक्षिक परिणामों में सुधार की खातिर फोकस बदलने के लिए कुछ साहसी और स्वागतयोग्य सिफारिशें की गई हैं. लेकिन हम अगर सभी बच्चों को अक्षर और अंकों के बुनियादी हुनर से लैस करना पक्का कर लेते हैं—तो इस अकेले प्रयास का शिक्षा प्रणाली पर जबरदस्त असर होगा.''

पढऩे और गिनने की तालीम

एनईपी 2019 का आमूलचूल बदलाव लाने वाला सुझाव स्कूल पूर्व शिक्षा को औपचारिक शिक्षा के ढांचे में शामिल करना है. एनईपी वैज्ञानिक स्कूल पूर्व शिक्षा की वकालत करती है और इसके लिए न्यूरोसाइंस की रिसर्च का हवाला देती है कि बच्चे के मस्तिष्क का 85 फीसदी विकास 6 साल की उम्र से पहले हो जाता है. यह राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के 1992 में 30,000 बच्चों पर किए गए अध्ययन का भी हवाला देती है कि स्कूल पूर्व शिक्षा मिलने और स्कूल न छोडऩे तथा उपस्थिति की दरों और, सबसे अहम, प्राथमिक स्कूल तथा उससे ऊपर की शिक्षा के परिणामों के बीच परस्पर सीधा रिश्ता है.

स्कूल पूर्व शिक्षा का असर व्यक्तियों और देशों के आर्थिक विकास पर भी पड़ता है. जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा एक शोध का हवाला देते हैं कि बचपन में शिक्षा हासिल करने वाले लोगों की जिंदगी भर की कमाई उन लोगों से कहीं ज्यादा होती है जो बचपन में तालीम से वंचित रह गए थे. एनईपी का अनुमान है कि स्कूल पूर्व शिक्षा में किए गए 1 रुपए के निवेश के बदले देश को 10 रुपए का प्रतिफल मिलेगा. इसी के साथ अनुसंधान यह भी बताते हैं कि 8 साल से कम उम्र के बच्चे पाठ्यपुस्तक-उन्मुख शिक्षा के लिए तैयार नहीं होते. इसका अर्थ है कि हमारे बच्चों के बहुत बड़े हिस्से को वह शिक्षा नहीं मिल रही है जिसकी उन्हें जरूरत है.

मौजूदा वक्त में बचपन की ज्यादातर शुरुआती शिक्षा आंगनवाडिय़ां और निजी प्री-स्कूल दे रहे हैं. एकीकृत बाल विकास सेवाओं (आइसीडीएस) के तहत चलाई जा रही आंगनवाडिय़ों ने माताओं और शिशुओं की स्वास्थ्य देखभाल के लिहाज से अच्छे नतीजे दिए हैं, मगर शिक्षा के मामले में गच्चा दिया है. निजी प्री-स्कूल बेहतर बुनियादी ढांचा जरूर मुहैया करते हैं, पर उनके पाठ्यक्रम और पढ़ाने के तरीके ऐसे नहीं हैं जिसकी बचपन की शुरुआती शिक्षा के लिए जरूरत है.

इसमें ताज्जुब नहीं कि आंबेडकर यूनिवर्सिटी के 2017 के एक अध्ययन में पता चला कि सरकारी या निजी किसी भी संस्था से पूर्व प्राथमिक शिक्षा पूरी करने वाले हिंदुस्तान के बच्चों की बड़ी तादाद प्राथमिक स्कूल में दाखिले के काबिल नहीं थी. 2018 के एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) सर्वे ने पाया कि कक्षा 5 के 50 फीसदी छात्र ही कक्षा 2 की पाठ्यपुस्तक पढ़ पाते थे. सो, सकल नामांकन अनुपात कक्षा 1-5 के 95 फीसदी से घटकर कक्षा 9-10 में 79 फीसदी पर आ गया.

यही वजह है कि एनईपी की सबसे ऊंची प्राथमिकता 2025 तक प्राथमिक स्कूलों और उससे आगे की कक्षाओं में सार्वभौमिक बुनियादी साक्षरता और अंकज्ञान हासिल करना है. एनईपी का मसौदा कहता है, ''अगर यह सबसे बुनियादी शिक्षा—आधारभूत स्तर पर पढऩा, लिखना और अंकगणित—पहले हासिल नहीं की जाती, तो हमारे छात्रों के इतने बड़े हिस्से के लिए बाकी की नीति मोटे तौर पर अप्रासंगिक होगी.'' यह भी पक्का करना होगा कि 3 से 18 साल के बीच की उम्र के सभी छात्रों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा बाल अधिकार (संशोधन) 2019 के दायरे में लाया जाए. एनईपी यह भी सिफारिश करती है कि मौजूदा 10+2 के मॉडल की जगह एक 5+3+3+4 का पाठ्यक्रम और शिक्षा का वैज्ञानिक ढांचा लाया जाए जो बच्चे के संज्ञानात्मक और सामाजिक-भावनात्मक विकास की अवस्थाओं पर आधारित हो. यह सिफारिश करती है कि स्कूल पूर्व (3-6 वर्ष की उम्र) के तीन साल को कक्षा 1 और 2 (8 साल की उम्र तक) में मिलाकर इसे एक वैज्ञानिक शिक्षा इकाई बना दिया जाए जिसे 'बुनियादी चरण' कहा जाएगा. कक्षा 3-5 (उम्र 8-11 वर्ष) को तैयार चरण कहा जाएगा, जिसके बाद कक्षा 6-8 (उम्र 11-14 वर्ष) का माध्यमिक चरण होगा और आखिर में कक्षा 9-12 (उम्र 14-18 वर्ष) का उच्चतर माध्यमिक चरण होगा.

एनईपी का मसौदा कहता है कि 8 साल से कम उम्र के बच्चे भाषाएं ज्यादा तेजी से सीखते हैं और भाषा सीखना बच्चे के संज्ञानात्मक विकास का बेहद अहम पहलू है, इसलिए वह सिफारिश करता है कि इस अवस्था में बहुत-सी भाषाएं—कम से कम तीन—सिखाई जाएं. शिक्षाशास्त्री अलबत्ता इससे इत्तेफाक नहीं रखते. बेंगलुरू स्थित द टीचर फाउंडेशन की संस्थापक माया मेनन कहती हैं, ''यह सही नहीं है. बच्चों को अपनी गृह भाषा/मातृ भाषा में निपुणता हासिल करना जरूरी है, खासकर पढऩे और लिखने के भाषाई हुनर के मामले में, और तब कहीं जाकर वे दूसरी भाषा की औपचारिक पढ़ाई के लिए तैयार हो सकते हैं.''

1993 की ऐतिहासिक यशपाल समिति की रिपोर्ट 'लर्निंग विदाउट बर्डन' (बोझ के बगैर सीखना) को आगे ले जाते हुए एनईपी छात्रों पर विषय सामग्री और पाठ्यपुस्तकों के बोझ को कम करने का जतन करती है और तोतारटंत पढ़ाई को हतोत्साहित करती है. लिहाजा, पाठ्यक्रम की रूपरेखा में जोर पाठ्यपुस्तकों से सीखने पर नहीं बल्कि इसके बजाए अपने हाथों से करने, अनुभव और विश्लेषण से सीखने पर होगा. कला, संगीत, दस्तकारी, खेल, योग और सामुदायिक सेवा सहित तमाम विषय पाठ्यक्रम के हिस्से होंगे. पाठ्यक्रम बहुभाषा, प्राचीन भारतीय ज्ञान पद्धतियों, वैज्ञानिक मिजाज, नैतिक विवेक, सामाजिक जिम्मेदारी, डिजिटल साक्षरता और स्थानीय समुदायों के सामने मौजूद बेहद अहम मुद्दों की जानकारी को बढ़ावा देगा.

बोर्ड के इम्तिहान अब जिंदगी तय करने वाली और बेहद तनाव से भरी कवायद नहीं होंगे. कक्षा 8 और 12 के बीच छात्र साल में दो बार बोर्ड की परीक्षाएं दे पाएंगे. बाद में, जब कंप्यूटरीकृत अनुकूल परीक्षा प्रणाली व्यापक रूप से मौजूद होगी, तब उन्हें बहुत-सी परीक्षाएं देने की इजाजत होगी, कम से कम 24 विषयों में, या औसतन एक सेमेस्टर में तीन. परीक्षा में केवल मूल क्षमताओं, बुनियादी शिक्षा, हुनर और विश्लेषण की परख की जाएगी. एनईपी कहती है, 'छात्रों को कोचिंग और रट्टा मारे बगैर आसानी से पास होना चाहिए.'

एक और अवधारणा, जो 1964 की कोठारी आयोग की रिपोर्ट से ली गई है, स्कूल परिसरों का निर्माण करने की है. सरकारी स्कूलों को नए सिरे से बनाकर संगठनात्मक और प्रशासनिक इकाइयों में बदला जाएगा, जिन्हें स्कूल परिसर कहा जाएगा. इनमें एक सेकंडरी स्कूल (कक्षा 9-12 तक) होगा और उसके आसपास कई दूसरे स्कूल होंगे जो पूर्व प्राथमिक से कक्षा 8 तक की तालीम देंगे. स्कूल परिसर को अपने मातहत आने वाले सभी स्कूलों के अकादमिक और प्रशासनिक मामलों को संभालने की स्वायत्तता होगी और वे राज्य में स्कूल शिक्षा व्यवस्था के सबसे निचले पायदान के तौर पर काम करेंगे. परिसर के तमाम स्कूल शिक्षकों के एक साझा समूह की सेवाएं ले सकेंगे, जिससे कम शिक्षण संसाधनों वाले स्कूलों की भरपाई हो सकेगी.

हालांकि प्रथम की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी को लगता है कि एनईपी में प्राथमिक चरण के बाद स्कूली शिक्षा को लेकर साफ-साफ दिशानिर्देश नहीं हैं. वे कहती हैं, ''प्राथमिक चरण से ऊपर आगे की प्रमुख बातें तो लिख दी गई हैं मगर इन बातों का तानाबाना बुनकर एक सुसंगत और व्यापक रूपरेखा बनाने के लिए और ज्यादा काम करने की जरूरत है.'' सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो किरण भट्टी एक बात और कहती हैं: ''एनईपी ने कई उदात्त लक्ष्य तय किए हैं मगर यह स्कूल परिसर से शुरू होकर ठेठ जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण के बारे में कुछ नहीं कहती.''

शिक्षक निर्माण

ढांचागत और पाठ्यक्रम से जुड़े इन बदलावों के बावजूद एनईपी स्वीकार करती है कि शिक्षक वह धुरी होंगे जिनके चारों तरफ शिक्षा की इस क्रांति को अंजाम दिया जा सकता है. एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर जे.एस. राजपूत को पूरा भरोसा है कि शिक्षकों को अधिकार संपन्न बना दिया जाए, तो यह नीति जरूर कामयाब होगी. वे कहते हैं, ''शिक्षा और शिक्षकों को उनका हक दो. शिक्षकों पर भरोसा करो, उन्हें पेशेवर तौर-तरीकों के साथ तैयार करो और उन्हें अपने कामों को अंजाम देने में सहायता दो. यह इस नीति के अमल की दिशा में पहला कदम होगा.''

एनईपी के मुताबिक, भविष्य में सभी शिक्षक चार साल की अनिवार्य उदार एकीकृत बैचलर डिग्री हासिल करेंगे और उसके बाद ही शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) सरीखी भर्ती परीक्षा में बैठ सकेंगे. देश भर में शिक्षकों को शिक्षा देने वाली हजारों की तादाद में चल रही संस्थाएं बंद कर दी जाएंगी और केवल बहुविषयक उच्च शैक्षणिक संस्थाएं ही बीएड की डिग्री देंगी.

अलबत्ता माया मेनन को यह नाकाफी जान पड़ता है और इसके बजाए वे योग्यता प्राप्त शिक्षक का दर्जा हासिल करने के लिए लचीले तरीकों और वैकल्पिक रास्तों की पड़ताल करने पर जोर देती हैं, खासकर ऐसे पेशेवरों के लिए जो अपने करियर के बीच में शिक्षक बल से जुडऩा चाहते हैं. वे कहती हैं, ''नए सिरे से तैयार शिक्षक प्रशिक्षण नीति को गुणवत्ता के हल्का किए बगैर ज्यादा उदार होने की जरूरत है, जहां शिक्षक प्रशिक्षण के विश्वविद्यालय-आधारित बहु-विषयक कॉलेज एक रास्ता हो सकते हैं, वहीं जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थानों (डीआइईटी) का क्या होगा?''

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