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जनादेश-2019- मुस्लिम वोटों का मिथक

यह धारणा गलत है कि मुसलमान एकतरफा मतदान करते हैं. अन्य भारतीयों की तरह मुस्लिम समुदाय के वोट के निर्णय पर भी स्थानीय मुद्दों और इलाके के उम्मीदवारों का असर रहता है

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कौशिक डेकानई दिल्ली, 08 May 2019
जनादेश-2019- मुस्लिम वोटों का मिथक बंदीप सिंह

अब देखिए, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की एक कार्यकारी सदस्य ममदुहा माजिद की छवि लंबे समय से अपने समुदाय की एक विद्रोही महिला की रही है. 20 साल तक इराक में भारतीय दूतावास में काम करने वाले अधिकारी की इस बेटी ने कभी बुर्का नहीं पहना, अन्य मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से खुद को सशक्त बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, दिल्ली में उनके लिए एक एनजीओ और अपने गृहराज्य ओडिशा में एक स्कूल चलाया. उलेमा अक्सर उनके विचारों और कार्यों से चिढ़ते रहे. सुन्नी होने के कारण वे शिया मस्जिदों में कदम नहीं रख सकती थीं.

इस साल की शुरुआत में जब उन्होंने हैदराबाद की यात्रा की तो उन्हें एक शिया मस्जिद में प्रवेश की इजाजत दी गई. उलेमा अब उनकी बातों को संजीदगी से सुनते हैं. अब उन्हें पहले एक-दूसरे के खिलाफ सिर्फ और सिर्फ कड़वाहट रखने वाले विविध मुस्लिम समूहों के बीच आपसी संवाद और इस्लाम से जुड़े मुद्दों पर एकराय बनाने की पहल दिखती है. ममदुहा को अब लगता है कि अपना वजूद बचाए रखने की गरज से ही सही, इस देश के मुसलमानों में एकजुटता की भावना पनप रही है. वे कहती हैं, ''नरेंद्र मोदी की हुकूमत के पिछले पांच साल, मुसलमानों के लिए मुश्किलों भरे रहे हैं. इसीलिए मैं मजाक में अक्सर कहती हूं कि मोदी देश को एकजुट करने वाले सबसे बड़े नेता हैं. वे न केवल मुलायम और मायावती को एक छतरी के नीचे लेकर आए हैं बल्कि उनकी वजह से अलग-अलग समूहों में बंटा मुस्लिम समाज भी अब एकजुट हो रहा है."

छतरी से ममदुहा का इशारा 'मुस्लिम वोट बैंक' की ओर है. यह इस धारणा पर आधारित है कि खास एजेंडे के तहत मुसलमानों का वोट देशभर में एकतरफा पड़ता है. हाल के दिनों में, वह एजेंडा भाजपा को हराने का रहा है. यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती उनसे उस गठबंधन को वोट देने की अपील कर रही हैं जो उन्होंने यूपी में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ मिलकर बनाया है. हालांकि अन्य दलों ने ऐसा खुलकर तो नहीं कहा है, लेकिन भाजपा विरोधी सभी ताकतों की अपने-अपने हिस्से के मुस्लिम वोट पर नजर है. लेकिन क्या मुसलमान वास्तव में एकतरफा मतदान करते हैं?

मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोडऩे के लिए राजनैतिक विद्वान प्रायोगिक आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं. वे कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय, भौगोलिक रूप से पूरे देश में फैला हुआ है और एक अखंड समूह नहीं है. उन्होंने कभी एक खास राष्ट्रीय मुस्लिम आकांक्षा के साथ मतदान नहीं किया है. देश के 543 लोकसभा क्षेत्रों में से 80 में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत है. 2014 में इन 80 सीटों में से 59 पर हिंदू जीते थे. मुस्लिम विरोधी पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने इनमें से 38 सीटें जीतीं. देश में चुनाव लडऩे वाले 882 मुस्लिम उम्मीदवारों में से केवल 23 जीते. अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर मोहम्मद खान कहते हैं, ''मुसलमानों ने हमेशा स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों के आधार पर वोट दिया है न कि एक समूह के रूप में. कोई आंकड़ा ऐसा नहीं है जो मुस्लिम वोट बैंक के मिथक या ऐतिहासिक पैटर्न का समर्थन करता हो."

कई लोगों का तर्क है कि मुस्लिम मतदाताओं का वोटिंग पैटर्न उस खास निर्वाचन क्षेत्र की राजनीति से प्रेरित होता है न कि मुस्लिम विरोधी बयानबाजी और घटनाओं से दिखाए गए भय से. हिंदुओं की तरह जमीन पर मुस्लिम पहचान का मुद्दा भी अत्यधिक खंडित है जो धार्मिक, भाषाई, जाति और वर्ग के साथ बदलता रहता है. जहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों की बढ़ती संख्या देखी गई है. मुस्लिम वोट कांग्रेस और अन्य मजबूत क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के बीच विभाजित हो गए हैं. जिन राज्यों में कांग्रेस, भाजपा के साथ सीधे मुकाबले में है, वहां उसे भारी संख्या में मुस्लिम मत मिलते हैं. अन्य प्रदेशों में जहां मजबूत क्षेत्रीय दल हैं—यूपी, बिहार, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और दिल्ली- वहां कांग्रेस के लिए मुसलमानों के समर्थन में काफी कमी आई है और मुस्लिम मत उस क्षेत्र के सबसे मजबूत क्षेत्रीय दल की ओर खिसक गया है.

कई राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 2019 मुस्लिम मतदाताओं के लिए एक अहम वर्ष होगा. गोहत्या पर लिंचिंग की कई घटनाएं, गोमांस के व्यापार और उपभोग पर प्रतिबंध, घर वापसी और लव जिहाद जैसी बातें और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे राजनैतिक नेताओं के कड़वे बयान, जिन्होंने चुनावी लड़ाई के कथ्य को अली और बजरंग बली की ओर मोडऩे की कोशिश की, इन सबसे मुसलमान खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे हैं और ऐसा पहली बार देखा जा रहा है. अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर जिल्स वर्नियर्स कहते हैं, ''मैं इस बार तालमेल भरे मतदान पैटर्न की उम्मीद करता हूं. वे शायद उस पार्टी या उम्मीदवार को वोट करेंगे जो उस क्षेत्र में भाजपा को हरा सकता हो."

लेकिन मुसलमानों के सामने बड़ी दुविधा यह रहती है कि उन्हें ऐसी कोई पार्टी नहीं दिखती जो उनकी चिंताओं का प्रतिनिधित्व कर सके. बड़े राजनैतिक दलों के बीच हिंदू वोटों को लुभाने के लिए एक प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है. अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद को जनेऊधारी शिवभक्त घोषित किया है और 2015 में सार्वजनिक रूप से एक मंदिर से दूसरे मंदिर के चक्कर काटते रहे हैं, तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा के राम मंदिर की बयानबाजी पर प्रतिक्रिया देते हुए वादा किया है कि वे अपने क्षेत्र इटावा में एक विशाल विष्णु मंदिर बनवाकर विष्णु नगर बसाएंगे. इटावा में भगवान कृष्ण की 60 फुट ऊंची प्रतिमा पहले ही लगाई जा चुकी है.

जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सैयद अरशद मदनी कहते हैं, ''पार्टी और नेता मुसलमानों को अधिकार देने की बात भी नहीं करते. नेहरू-गांधियों ने कभी धर्म की बात नहीं की थी लेकिन आज वे अपनी हिंदू पहचान की नुमाइश कर रहे हैं."

इसे 'धर्मनिरपेक्ष दलों' की 'मुस्लिम तुष्टीकरण' की राजनीति करने के आरएसएस-भाजपा के आरोपों की सीधी प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है. इससे भाजपा को हिंदू वोट को मजबूत करने में मदद मिली है और अन्य दलों के लिए बहुसंख्यक हिंदुओं के वोटों को खतरे में डाल दिया है. वर्नियर्स कहते हैं, ''भाजपा ध्रुवीकरण में माहिर है और अन्य दल उसके फंदे में फंस गए हैं.

यही कारण है कि कांग्रेस ने खुले तौर पर कहा कि उसे उस धारणा को दूर करने की जरूरत है कि वह मुस्लिम समर्थक है." लेकिन मुस्लिम नेता इस स्थिति को पैदा करने के लिए कांग्रेस को समान रूप से जिम्मेदार मानते हैं. मदनी कहते हैं, ''यूपीए शासन के दौरान जब शिवराज पाटील गृह मंत्री थे, तब कई विस्फोट हुए और सरकार ने हूजी और सिमी को दोषी ठहराया.

बहुत से मुसलमानों को हिरासत में लिया गया, कड़ी पूछताछ की गई और ऐसी धारणा बनी कि मुसलमान आतंकवादी हैं. कांग्रेस ने पिछले 60 साल में मुसलमानों के खिलाफ यह सबसे ज्यादा नुक्सानदेह काम किया है."

अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि मुसलमानों की मौजूदा दयनीय सामाजिक-आर्थिक स्थिति उनके मुद्दों के प्रति राजनैतिक वर्ग की निरंतर उदासीनता का परिणाम है. दिल्ली में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद कहते हैं, ''तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों और समुदाय की नुमाइंदगी का दावा करने वाले मुस्लिम राजनैतिक अभिजात्य वर्ग ने पहचान आधारित उत्पीडऩ की बात को जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और मुसलमानों की असल परेशानियों को गायब कर दिया. किसी भी अन्य समुदाय की तरह मुसलमान भी गरीबी, रोजगार और शिक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित हैं. धार्मिक पहचान से जुड़ा खतरा उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से तो प्रभावित करता है, लेकिन यह एक नागरिक के रूप में पूरी तरह से उनकी आकांक्षाओं को निर्धारित नहीं करता है."

मुस्लिम नेता कहां हैं?

2012 में, मुस्लिम युवाओं के एक समूह के साथ बातचीत में राहुल गांधी ने पूछा कि मुस्लिम समुदाय से भारत के पहले शिक्षा मंत्री, मौलाना अबुल कलाम आजाद के कद का नेतृत्व दूसरा क्यों नहीं उभर सका? राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस सवाल का जवाब तलाशा जाए तो इस नाकामी की बड़ी जिम्मेदारी उनकी पार्टी के खाते में भी आएगी.

वर्नियर्स कहते हैं, ''विभाजन के बाद से मुसलमानों में कुलीन वर्ग की कमी हो गई है क्योंकि उनमें से अधिकांश पाकिस्तान चले गए. दो अन्य कारकों ने इस समस्या को और बढ़ाया. आजादी के बाद के चुनावी परिदृश्य पर हावी रही कांग्रेस को मुस्लिम वोट तो चाहिए थे लेकिन वह उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए तैयार नहीं थी. यह प्रवृत्ति कई दशकों तक चली."

ऑल इंडिया-मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी इस बात से सहमत हैः ''कोई नेता अचानक न तो आसमान से टपक सकता है, न जमीन फाड़कर निकल सकता है, उसे उभरना होता है. राजनैतिक दल मुसलमानों को जगह और टिकट देने को तैयार नहीं हैं. ऐसे में पूरे भारत में असर रखने वाले मुस्लिम नेता कैसे उभर सकते हैं?"

आजादी के बाद से भारतीय मुसलमानों ने कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल और राजद जैसे धर्मनिरपेक्ष दलों का समर्थन किया है. ये पार्टियां खुद को मुसलमानों की हितैषी तो बताती हैं लेकिन जब बात उन्हें आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने की आती है, तो वे पीछे रह जाती हैं. 1952-1977 के कांग्रेस-वर्चस्व वाले वर्षों में संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व 2-7 प्रतिशत था. 1980 में यह बढ़कर 10 प्रतिशत हुआ जो अब तक का इसका सबसे ऊंचा स्तर है. फिर भी यह मुसलमानों की कुल प्रतिशत आबादी के अनुपात में कम था. यूपी में विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व सपा की अगुवाई में 2012 में सर्वोच्च स्तरकृ17.1 प्रतिशत पर रहा, लेकिन यह भी उनकी आबादी के कुल हिस्से से कम था. बिहार में जहां ज्यादातर कांग्रेस, जनता दल (यूनाइटेड) और राजद का शासन रहा, 1985 में सबसे ज्यादा मुस्लिम प्रतिनिधित्व 10.46 फीसदी रहा.

कांग्रेस पर से भरोसा डगमगाने और क्षेत्रीय धर्मनिरपेक्ष दलों की विफलता के परिणामस्वरूप एआइएमआइएम, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और अखिल भारतीय यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसे कई मुस्लिम-केंद्रित दलों का उभार हुआ. लेकिन ये पार्टियां एक खास क्षेत्र तक ही सिमटी हुई हैं. एआइएमआइएम मुस्लिम मुद्दों के बारे में सबसे मुखर दिखने की कोशिश करती है और महाराष्ट्र, यूपी और बिहार में अपनी जड़ें जमाने की की कोशिशें भी करती रही है, लेकिन अब भी यह मात्र हैदराबाद आधारित पार्टी बनी हुई है.

2008 के बाद कई मुस्लिम पार्टियों का जन्म (बॉक्स देखें) हुआ जिससे मुस्लिम वोटों में और बिखराव हुआ. मुस्लिम नेताओं को लेकर भी असंतोष है क्योंकि वे समुदाय के लिए परेशानी का सबब बने वास्तविक मुद्दों को उजागर करने में विफल रहे. 16 मुस्लिम संगठनों की संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के अध्यक्ष नवेद हामिद कहते हैं, ''विभिन्न दलों में मुस्लिम नेता मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं हैं क्योंकि वे अक्सर मुसलमानों की चिंता को सामने रखने की बजाए पार्टी लाइन के आगे घुटने टेक देते हैं."

हालांकि वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे मुस्लिम नेता नहीं हैं लेकिन ओवैसी आज मुस्लिम राजनीति में सबसे बड़े सितारे के रूप में उभरे हैं. वे और उनकी पार्टी अब पांव पसारने की जद्दोजहद में हैं. उनकी पार्टी के दो उम्मीदवार महाराष्ट्र चुनाव में जीते थे और दर्जनों नगरपालिका चुनावों में जीते थे. अपने जनाधार का दायरा व्यापक करने के लिए उन्हें मुसलमानों से परे देखना था. इसके लिए उन्होंने बी.आर. आंबेडकर के पौत्र और भारिपा बहुजन महासंघ के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर के साथ एक गठबंधन वंचित बहुजन आघाड़ी बनाया है. ओवैसी, जो धीरे-धीरे युवाओं और प्रगतिशील मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं, कहते हैं, ''मैं प्रकाश आंबेडकर के साथ काम कर रहा हूं क्योंकि मुसलमानों के सामने वैसे ही मुद्दे हैं, जिनका सामना दलितों को करना पड़ता है. लोकतंत्र में यह अच्छा है कि हाशिए पर खड़े पक्ष साथ आ जाएं और धुर दक्षिणपंथी राजनीति करने वाले और हमारे साथ भेदभाव करने वालों के खिलाफ एकजुट हो जाएं."

मुसलमान और भाजपा

2014 में, भाजपा सत्ता में आई लेकिन उसके पास एक भी निर्वाचित मुस्लिम सांसद नहीं था. पार्टी ने यूपी की—ऐसा राज्य जहां की 20 फीसदी आबादी मुस्लिम है—की 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटें जीतीं वह भी किसी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारे बिना; अन्य पार्टियों के 55 मुस्लिम प्रत्याशियों में से कोई नहीं जीता. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा, फिर भी 403 सीटों में से 325 सीटें जीत गई.

दिलचस्प बात यह है कि मुसलमानों की गोलबंदी या मुसलमानों के एकजुट होने जैसी बातें भाजपा को ही अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचाती हैं. कांग्रेस डेटा सेल के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती के एक अध्ययन से पता चलता है कि भाजपा का वोट शेयर वास्तव में उन जिलों में ज्यादा रहता है, जहां मुसलमानों की आबादी उस राज्य में मुसलमानों की आबादी के औसत से अधिक (औसत से डेढ़ गुना या अधिक) हैं. वोट शेयर में अंतर चुनावों को स्विंग करने के लिए काफी महत्वपूर्ण है. देवबंद, जहां करीब 34 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, इसका एक बेहतर उदाहरण है. भाजपा के हिंदू उम्मीदवार बृजेश सिंह ने 2017 में 46 फीसदी वोट शेयर के साथ जीत हासिल की, जबकि सपा और बसपा के मुस्लिम उम्मीदवारों को क्रमशः 31 फीसदी और 24 फीसदी वोट मिले.

भाजपा नेताओं को लगता है कि मुस्लिम समर्थन के लिए बसपा का आक्रामक अभियान अंततः उनकी पार्टी की मदद कर सकता है. भाजपा नेता शाजिया इल्मी कहती हैं, ''मुसलमानों से सीधे अपनी पार्टियों को वोट देने की अपील करके, बड़े विपक्षी नेता समुदाय का नुक्सान कर रहे हैं. इससे बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को यह लगता है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण जारी रहेगा. इसलिए वे निश्चित रूप से भाजपा को ही वोट देंगे."

हालांकि ज्यादातर मुसलमानों के लिए भाजपा पसंद की पार्टी नहीं हो सकती फिर भी 2014 में प्रत्येक 10 वोटों में से एक वोट मुस्लिम समुदाय से था. पार्टी को उम्मीद है कि उसकी कल्याणकारी योजनाओं और तीन तलाक जैसे सामाजिक मुद्दों के कारण पहले से अधिक मुस्लिम महिलाओं का समर्थन मिलेगा. इल्मी पूछती हैं, ''क्या कोई ऐसा कह सकता है कि मोदी सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मुसलमानों तक नहीं पहुंच रहा है?"

भारतीय मुसलमानों के मतदान व्यवहार को लेकर कई मिथक हैं. जैस, उनकी पसंद पर मौलवियों का बहुत ज्यादा प्रभाव रहता है और वे मतदान के दौरान धार्मिक मुद्दों के बारे में अधिक चिंतित होते हैं. इस साल भी विभिन्न संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करते हुए लगभग 700 उलेमा ने मुस्लिम मतदाताओं से भाजपा को हराने के लिए ''धर्मनिरपेक्ष दलों" को वोट देने को कहा है. हालांकि, गठबंधन की राजनीति के युग में इस तरह की राजनीति ने अपना महत्व खो दिया क्योंकि मुस्लिम नेताओं के लिए क्षेत्र आधारित मुस्लिम चुनावी राय को समझना मुश्किल हो गया है. विभिन्न अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि हालांकि मुसलमान धर्म के मामलों में उलेमा की राय को मानते हैं लेकिन जब बात राजनैतिक फैसलों की बात आती है तो वे उसमें उलेमा का दखल अनुचित मानते हैं.

2015 के सीएसडीएस अध्ययन में कहा गया है कि 43 प्रतिशत मुसलमानों को लगता है कि धार्मिक नेताओं को राजनीति में दखल देने से बचना चाहिए और उन्हें किसी खास राजनैतिक दल का समर्थन करने की बात नहीं करनी चाहिए. इस बदलाव को भांपते हुए दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी, जो अपने चुनावी फतवों के लिए जाने जाते हैं, ने 2019 के लोकसभा चुनाव में किसी भी राजनैतिक दल को समर्थन नहीं देने का फैसला किया है.

संसद में तीन तलाक मुद्दे पर हुई बहस ने यह भी दिखाया कि कैसे 'धर्मनिरपेक्ष्य राजनैतिक दलों ने राजनैतिक रूप से अपनी-अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए खुद को इससे दूर करना शुरू कर दिया. ओवैसी कहते हैं कि कांग्रेस ने अपने मुस्लिम सदस्य को संसद में इस विषय पर बोलने ही नहीं दिया. वे कहते हैं, ''दिसंबर 2017 में पहली बहस के दौरान, 23 मुस्लिम सांसदों में से केवल चार ने इस पर बात की. दिवंगत मौलाना मोहम्मद असरारुल हक़ क़ासमी, जो कि देवबंद से फारिग विद्वान और अखिल भारतीय मिल्ली परिषद के अध्यक्ष थे, कांग्रेस के सांसद थे. जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने बहस में हिस्सा क्यों नहीं लिया, तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने उन्हें इसकी इजाजत ही नहीं दी."

समुदाय के भीतर से भी आत्ममंथन के सुझाव आए हैं. पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सांस्कृतिक रूप से रक्षात्मक मानसिकता रखने वाली मान्यताएं जो आत्म-उन्नति में बाधा डालने वाली हैं, के लिए भारतीय मुसलमानों की आलोचना की है. दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद इस बात से सहमत हैः ''एक समुदाय के रूप में, अगर हमें समृद्ध होने की जरूरत है, तो हमें धार्मिक कट्टरता से आगे बढऩा होगा. सशक्तिकरण का सबसे अच्छा साधन शिक्षा है. जहां यह उपलब्ध है वहां इसके पहुंचने के रास्ते बनाएं और जहां नहीं है, वहां इसकी मांग करें."

हालांकि, यह उत्साहजनक है कि संसद और विधानसभाओं में कम प्रतिनिधित्व होने से मुस्लिम मतदाता जो कि चुनावी प्रक्रिया में हिंदुओं से ज्यादा सक्रियता दिखाते हैं, वे विचलित नहीं हैं. वॢनयर्स कहते हैं, '''90 के दशक की सांप्रदायिक हिंसा और तनाव ने भारतीय मुसलमानों में कट्टरता को जन्म नहीं दिया, मतदाताओं और उम्मीदवारों के रूप में चुनावी प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ गई." 2019 में, भारतीय मुस्लिम भी अपनी चिंताओं और पीड़ा को अपने वोट के रूप में व्यक्त करने के लिए कमर कस रहे हैं. यह राजनैतिक जुड़ाव भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व और मजबूती के लिए महत्वपूर्ण है.  

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