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आवरण कथा: एक थी बंबई

बंबई में रहने का मतलब था इसका जश्न मनाना, इससे प्यार करना. देश में यह एक जगह थी जहां छोटी-छोटी आजादियों के लिए आवाज नहीं उठानी पड़ती थी. आज मुंबई बदली-बदली क्यों है. बंबई विविध संस्कृतियों के संगम से अब एक सार्वभौम शहरी आबादी का शहर बनती जा रही है, जिसके अपने पूर्वाग्रह, असहिष्णुता और बेचैनियां हैंजिनसे बाकी देश परेशान है.

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कुणाल प्रधान 02 November 2015
आवरण कथा: एक थी बंबई

किसी जमाने में एक बंबई हुआ करती थी. परीकथाओं का शहर. यह जमीन का वह फलक था जहां मिथक और यथार्थ का, कुव्वत और कल्पना का, उम्मीद और तफरीह का संगम हुआ था. यह हमारा सबसे अव्वल शहर था. यह देश का आर्थिक हृदय और सभ्यता की जान था. बाकी मुल्क के लिए यह चमकीली पन्नियों से मढ़ा कल्पना का संसार था, जहां कुछ भी मुमकिन था. यहां के बाशिंदों के लिए यह धंधे से हांके जाते सपनों का शिखर था, जहां बस पीठ घुमाते ही अगली छलांग तकदीर बदल देती.
दिल्ली शरणार्थियों की बस्ती थी, जिसका तानाबाना मुगलों के पतन के बाद कारस्तानी से बुना गया था. देश की पहली सुदूर शहरी बस्ती कोलकाता हुकूमत के लिहाज से नामुफीद जगह पर होने और नक्सलवाद के उभार से तहस-नहस हो गई. लेकिन बंबई विदेशी प्रभावों का पहला पड़ाव और ठिकाना बनी रही, एक किस्म का अव्वल सदर दरवाजा, जो कारोबारी राजधानी और विविध संस्कृतियों का संगम था.

यहां के स्थानीय लोगों के लिए बंबई या मुंबई हमेशा बाहर से आकर बसने वालों का शहर था. 'अगर आप इसे बनाएंगे, तो वे आएंगे' और बंबई में वे चारों दिशाओं से दौड़े चले आए. लेकिन वे हिंदुस्तान की दूसरी जगहों पर बाहर से जाकर बसने वालों से अलहदा थे. जो यहां की सरजमीं पर उतरे, उन्होंने यहां के तौर-तरीके अपनाए. बंबई को बदलने की जगह उन्होंने बंबई को उन्हें बदलने दिया. बंबई ने ऐसे नजारे, शोर और तजुर्बे पेश किए, जो किसी भी दूसरे हिंदुस्तानी शहर में मौजूद नहीं थे. लोग बस स्टैंड पर और एलीवेटरों के बाहर तहजीब से खड़े रहते. वे नियम-कायदे से लेन में गाडिय़ां चलाते, कभी हॉर्न नहीं बजाते. उनकी हेडलाइट हमेशा लो बीम पर होतीं. टैक्सी ड्राइवरों और ऑटोचालकों ने कभी सवारी लेने से इनकार नहीं किया. उनमें से ज्यादातर हिंदुस्तान के इस आखिरी अभयारण्य में आश्रय की खोज में आकर बसे थे. अगला मोड़ हो या दूरदराज का उपनगर, इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आपको कहां जाना है. पहला जवाब वे हमेशा मीटर की सुमधुर और आज्ञाकारी 'खचिंग' से ही देते.
इसमें निजी कुछ नहीं था, बल्कि आजादी दिलाने वाला था. खरा, मगर दोनों बांहें फैलाकर स्वागत करने वाला. विविधता से भरा, मगर सहनशील. कड़ी मेहनत की संस्कृति इसके वजूद में इतने गहरे गुंथी थी कि सांप्रदायिकता भी उसे दरकिनार नहीं कर पाई. यहां आपको कुछ होना नहीं पड़ता था, आप कुछ बन सकते थे. बंबई धड़कता हुआ, फलता-फूलता वैश्विक महानगर था. बंबई एक अजीब संगम था जिसने अपनी भाषा गढ़ी, अपने सांस्कृतिक समुदायों की रचना की. यहां वर्ग, जाति, लिंग या बैंक खाते में रकम चाहे जो हो, हर कोई हर वक्त अपने एकांत दड़बे में गुम होने की बजाए शहर में ही लगा रहता था. ग्रेगरी डेविड रॉबट्र्स ने शांताराम में लिखा था, बंबई में हिंदुस्तान की दूसरी जगह से ज्यादा सपने देखे जाएंगे, टूटेंगे और सच होंगे.

यह नायकों और खलनायकों, किरदार और संवादों, संगीत और गीतों, छंद और धुनों की धरती थी. बंबई में रहने का मतलब था इसका जश्न मनाना, इसे जानना, इससे मोहब्बत करना.

मगर बंबई, या जो अब बाहर वालों के लिए भी मुंबई हो गई है, पुरतकलीफ तब्दीली से गुजर रही है. ऐसा शहर जिसमें जगह का टोटा पड़ गया है, जो अपने जोड़ों से दरक रहा है, और जो लंबे समय से आकाश की ओर फैलता गया है. इसने अपने पुराने और नए—दोनों बाशिंदों की बड़ी तादाद को बाहर हाशियों पर धकेल दिया है. निजी और सार्वजिनक जगहों की इस पुनर्कल्पना के नतीजतन सुविधा और नजदीकी की होड़ छिड़ गई है, जिसमें समुदाय धीरे-धीरे एक दूसरे के खिलाफ लामबंद होते गए हैं. सांप्रदायिक सियासत का उभार, मराठी गौरव का पुनरुत्थान और शिवसेना तथा उसी से निकली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना सरीखी पार्टियों के हाथों मुसलमानों और बहिरागतों के खिलाफ गोलबंदी इसी भौगोलिक बदलाव की खतरनाक पैदाइशों में से एक है. इसने रचनात्मक होड़ की जगह दूसरे को छोटा साबित करने के झगड़ों को जन्म दिया है और स्थानीय बाशिंदों को बहिरागतों के, हिंदुओं को मुसलमानों के और अमीरों को मध्यम वर्गीयों के मुकाबले खड़ा कर दिया है. यह कई घटनाओं से जाहिर हो रहा है. मसलन, सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतने वाला हमला, पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने को लेकर बीसीसीआइ के दफ्तर में हंगामा.
शहर से बाहर धकिया दिए जाने की वजह से लोगों के लिए बंबई के साथ उस तरह मेलजोल रखना भी मुश्किल हो गया है, जिस तरह वह पहले रखा करते थे. बसों और लोकल ट्रेनों में चलना जरूरी है, लेकिन अब यह उतना श्कूल्य नहीं रह गया है. वे अब पुराने जमाने की और नापसंद मालूम देती हैं. असल में कामयाबी का एक सीधा-सादा पैमाना इस हैसियत में होना है कि आपको अब इनमें सफर न करना पड़े. खुली जगहों के सिकुडऩे के नतीजतन लोगों का शहर से मिलना-जुलना और भी कम हो गया. समंदर के किनारे विशाल खुले मरीन ड्राइव पर आप अब भी उद्योगपतियों, बुद्धिजीवियों, अदाकारों और खिलाडिय़ों को शाम को टहलते हुए और गुमनाम तौर पर भीड़ के बीच घुलते-मिलते हुए देखते हैं. मगर ऐसे दृश्य भी अब आम नहीं रह गए हैं.

कुछ मायनों में बंबई को उसके अपने बाशिंदों ने ही छला है. पिछले दशक के दौरान आम तौर पर हर चीज का दर्जा गिरा है. बुनियादी ढांचे का, खुली जगहों का, समुदायों के बीच मेलजोल और बातचीत का, उद्यमशीलता का, आने-जाने के साधनों का, स्वास्थ्य सेवाओं का, रात की रंगीनियों का, क्या खाएं तथा कहां रहें सरीखी बुनियादी आजादियों का. इस गिरावट को लोगों ने मंजूर कर लिया है. शहर की जो जीवनशैली और मूल्य हुआ करते थे, उनमें गिरावट आई है.

इसमें कोई शक नहीं कि बंबई की फिजाओं में बगावत का एक तेवर है. बीजेपी के नेतृत्ववाली सरकार ने सात महीने पहले राज्य में गोमांस पर आम पाबंदी लगा दी थी, लेकिन भैंस का मांस शहर भर में गुपचुप तरीके से बिक रहा है. डांस बारों पर पाबंदी तो अभी 15 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने हटाई है, मगर पाबंदी के इन पूरे 10 साल के दौरान वे शहर के छिपे हुए कोनों में चलते रहते थे. यह भी बदकिस्मत तब्दीली है, क्योंकि बंबई हिंदुस्तान का ऐसा शहर था, जहां आपको छोटी-छोटी आजादियों के लिए बगावत नहीं करनी पड़ती थीः जहां आप जो भी करते थे, खुल्लमखुल्ला करते थे, दब-छिपकर नहीं.

बंबई की सबसे बड़ी अड़चन शायद यह है कि बाकी हिंदुस्तान ने खासी तरक्की की है और ऊंचा उठा है. पहले जो लोग बाहर से यहां आते थे, वे ऐसी जगहों से आते थे जो आर्थिक और सामाजिक तौर पर बनिस्बतन पिछड़ी हुई थीं. वहां न तो उन्हें वे नजारे और धूमधाम दिखती थी और न ही मौकों का वह अथाह संसार. आज भारत भर के शहर आगे जा रहे हैं. मल्टीप्लेक्स, मॉल, पब, कांच की दीवारों वाली ऊंची इमारतें, नए कारोबार और किस्म-किस्म की नौकरियां अब हर जगह हैं. मुंबई अपने को आगे धकेलने में नाकाम रही है और इसलिए अब वह अपने को उतना खास महसूस नहीं करती. अपने उसूलों की लकीर पर चलने की इच्छा तेजी से गायब हो रही है. मुंबई का दिमाग जैसे-जैसे बंद हो रहा है, वैसे-वैसे हिंदुस्तान का दिमाग इस हद तक खुल रहा है कि दोनों एक दूसरे के बराबर होने की तरफ बढ़ रहे हैं. बंबई विविधता से हटकर  अब धीरे-धीरे सार्वभौम शहरी आबादी के कब्जे में जा रही है, जिसके पूर्वाग्रह, असहिष्णुता और बेचैनियां वहीं हैं जिनसे बाकी भारत परेशान है.

दुनियाभर के खास महानगरों के बारे में जहां कई दलीलें दी जाती रही हैं, वहीं जर्मन समाजशास्त्री जॉर्ग सिमेल ने एक आंख खोलने वाली बात कही है कि आखिर वह क्या चीज है जो महानगरों को महान बनाती है? उन्होंने लिखा है, ''महानगर खुद को उन महान ऐतिहासिक बुनावटों में से एक के तौर पर उद्घाटित करते हैं, जिनमें जिंदगी को एक जगह इकट्ठा करने वाली परस्पर विरोधी धाराएं खुलती और साथ ही बराबर हक से एक दूसरे के साथ जुड़ती हैं.'' भारत में बंबई ऐसा ही एक सहकारी शहर थारू एक ही वक्त पर उदासीन भी और अंतरंग भी.

अनुराग कश्यप की 2015 की फिल्म बॉम्बे वेलवेट का एक डायलॉग बखूबी बयान करता है कि बंबई के क्या मानी हैरू ''बंबई के बाहर पता है क्या है? इंडिया!'' अगले कुछ पन्नों में अलग-अलग क्षेत्रों की खास हस्तियाः जिनमें से हरेक का बंबई से गहरा जुड़ाव हैः आज की बंबई की पड़ताल करेंगी, बताएंगी कि यह किधर जा रही है, इसने क्या गंवा दिया है और कैसे वह उसे वापस पा सकती है. क्योंकि कभी एक बंबई हुआ करती थी. वैसी ही दूसरी बंबई कब होगी?

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