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चिकित्साः अब भी बेड पर

स्वास्थ्य सेवाओं को हरेक दहलीज पर पहुंचाने की गरज से शुरू हुए सुधारों की रफ्तार इतनी धीमी कि जमीन पर ठोस नतीजे दिख नहीं रहे.

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aajtak.in
अमरनाथ के. मेनन/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर बिहार, 16 April 2019
चिकित्साः अब भी बेड पर शेखर घोष

स्वास्थ्य क्षेत्र में मोदी सरकार का कामकाज उसके वादों से मेल नहीं खाता. बावजूद इसके कि उसने ऐसे सुधारों को लागू करने की कोशिश की है जिनसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रमों को पूरा कर सके, मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन जुटाने की व्यवस्था का कायाकल्प किया जा सके और एक ऐसा मॉडल खड़ा कर सके जो देश के आम जन के लिए सस्ता, सुलभ हो. सरकार की अहम पहलों का एक आकलनः

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017

उद्देश्यः 2015 तक स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी के मौजूदा 1.5 फीसदी से बढ़ाकर जीडीपी के 2.5 फीसदी तक ले जाना.

नतीजाः अगर यह हासिल कर लिया जाता है तो भी डब्ल्यूएचओ स्वास्थ्य पर जितने खर्च की सिफारिश करता है, उसका आधा ही होगा.

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाइ)

उद्देश्यः कोई 10 करोड़ परिवारों को सालाना 5 लाख रु. का बीमा

नतीजाः राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के मुताबिक, सितंबर 2018 में पीएमजेएवाइ की लॉन्चिंग के बाद 2.74 करोड़ लाभार्थियों के नाम दर्ज किए जा चुके हैं और कोई 17 लाख ने इसका फायदा उठाया है. पर यह आकलन करना फिलहाल जल्दबाजी होगी कि इससे आम लोगों की जेब पर पडऩे वाले खर्च में कमी आई है या नहीं.

विशेषज्ञ बताते हैं कि बीमा आधारित स्वास्थ्य मॉडल पर जोर देने से रोगों की रोकथाम करने वाले जन स्वास्थ्य से ध्यान हट गया है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में केंद्र का योगदान 2014-15 के 60 फीसदी से घटकर 2019-20 के अंतरिम बजट में तकरीबन 50 फीसदी पर आ गया.

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक 2017

उद्देश्यः मेडिकल शिक्षा और प्रैक्टिस पर नियम-कायदे लागू करना और एक सक्षम स्वास्थ्य प्राधिकरण संस्था की स्थापना करना.

नतीजाः यह विधेयक भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1956 की जगह लेने के लिए लाया गया है, जिसे अभी संसद से पारित होना है.

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा प्रदायगी

उद्देश्यः स्वास्थ्य उपकेंद्रों को उन्नत बना 1,50,000 आरोग्य केंद्र बनाना.

नतीजाः रकम की कमी की वजह से लक्ष्य पूरा होने की संभावना नहीं है. इस साल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का बजट 2017-18 के खर्च (31,510 करोड़ रु.) से बमुश्किल ही कुछ ज्यादा है.

राज्यों में एम्स सरीखे सोलह संस्थान

उद्देश्यः मेट्रो शहरों से बाहर भी अच्छी, क्वालिटी स्वास्थ्य सेवाएं देना.

नतीजाः ज्यादातर केंद्र जमीन/संसाधनों के अभाव में अटके पड़े हैं.

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