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आवरण कथा-दूसरी पारी?

स्थायी छाप छोडऩे की महत्वाकांक्षा से प्रेरित नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री एक के बाद एक कई योजनाएं शुरू कीं, कुछ कारगर हुईं तो कुछ लडख़ड़ाकर औंधे मुंह गिरीं. अब उन्हें अपनी दूरदृष्टि का तोहफा मिलेगा या गलतियों की सजा मिलेगी?

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aajtak.in
राज चेंगप्पा/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 17 April 2019
आवरण कथा-दूसरी पारी? बंदीप सिंह

नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में प्रधानमंत्री प्रकोष्ठ के सुथरे कोने के दफ्तर में जवाहरलाल नेहरू के बाद काबिज होने वाला हर नेता उनकी नकल करता दिखता रहा है. यहां तक कि नरेंद्र मोदी भी, हालांकि वे खुलेआम इसे शायद ही स्वीकार करें. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में अपनी शिक्षा-दीक्षा के चलते मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते और उनकी उपलब्धियों को खारिज करते देखे गए.

हालांकि इंदिरा गांधी से ज्यादा, नेहरू को ही आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है और उनके बाद आया हर प्रधानमंत्री, मोदी सहित, उन्हीं जैसा सम्मान हासिल करने की हसरत रखता आया है. मसलन, गूगल पर 'नेहरू' और 'बुक्स' शब्द डालकर ही सर्च करें. उनकी लिखी करीब 50 किताबों  और उनके भाषणों के संकलन के अलावा ऐसी करीब हजार किताबों की फेहरिस्त निकल आएगी, जो उनके और उनकी विरासत के बारे में लिखी गई हैं. भारतीय जनमानस में नेहरू की अहमियत की यह मोटी तस्वीर है.

मोदी अगले महीने बतौर प्रधानमंत्री अपने पांच साल पूरे कर रहे हैं और दूसरे कार्यकाल के लिए जनादेश मांग रहे हैं, उनकी नजरें साफ तौर पर नेहरू जैसी बुलंद विरासत स्थापित करने यानी दूसरे गणतंत्र का निर्माता कहलाने पर टिकी हैं. 2019 के आम चुनाव के लिए भाजपा का संकल्प पत्र जारी करते वक्त मोदी ने खुद को यहीं तक सीमित नहीं रखा कि उनकी सरकार और पार्टी साल 2024 तक क्या करेगी, बल्कि उन्होंने 2047 तक का लक्ष्य तय करके चौंका दिया, जब हिंदुस्तान अपनी आजादी के सौ साल पूरे करेगा. उन्होंने ऐसे भारत का विजन पेश किया, जो विकसित देश होने के साथ दुनिया की एक महाशक्ति बनेगा.

यह कहने के बाद मोदी ने अपनी सरकार के अब तक किए कामों का हवाला दिया और कहा कि वे अगले पांच साल के लिए फिर चुने जाते हैं तो वह महा लक्ष्य को साधने का साधन बनेगा (वैसे, अगर मोदी 75 साल की उम्र में रिटायर होने के अपनी पार्टी के उसूल पर कायम रहते हैं, तो उन्हें 2025 में रुखसत होना होगा और तब वे सबसे लंबे वक्त तक प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करने के नेहरू और इंदिरा गांधी के रिकॉर्ड को तोड़ सकने वाले संभावित प्रधानमंत्रियों की गिनती से बाहर हो जाएंगे).

इतिहासकारों के उलट, आम लोग सियासी नेताओं को उनके कार्यकाल की समीक्षा के आधार पर नहीं, बल्कि उनके निर्णायक लम्हों के हिसाब से तौलते हैं. उनका तरीका दुधारी होता है और अगर प्रधानमंत्री से उनका भरोसा उठ जाए तो वे बेहद बेरहम और कठोर हो जाते हैं. यही वजह है कि नए भारत की नींव रखने के लिए नेहरू की जय-जयकार की जाती है, तो 1962 की जंग में चीन के हाथों अपमानजनक पराजय के लिए उन्हें कोसा भी जाता है. इंदिरा गांधी की वाहवाही 1974 में हिंदुस्तान को परमाणु ताकत बनाने और 1971 की जंग में पाकिस्तान के दो टुकड़े करने के लिए की जाती है, लेकिन 1975 से 1977 के बीच इमरजेंसी थोपने के लिए भी उतना ही याद किया जाता है.

राजीव गांधी को ऐसा प्रधानमंत्री माना जाता है, जिन्होंने हिंदुस्तान में कंप्यूटर क्रांति का सूत्रपात किया और विकास का मिशन तैयार किया, मगर बोफोर्स घोटाले और हिंदुस्तान को श्रीलंका की जंग में उलझाने की वजह से वे कड़वी यादें भी जगाते हैं.

देश में आर्थिक सुधार लागू करने के लिए नरसिंह राव सराहे जाते हैं, तो अपनी ऐन नाक के नीचे बाबरी मस्जिद को ढहने देने के लिए उनकी कटु आलोचना भी होती है. करगिल की जीत और परमाणु परीक्षणों के लिए वाजपेयी की वाहवाही होती है, तो 2002 के गुजरात दंगों के बाद मोदी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देने को मजबूर नहीं कर पाने के लिए उनकी निंदा भी की जाती है. आखिर में मनमोहन सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में जहां आर्थिक खुशहाली के रिकॉर्ड और अमेरिका से परमाणु करार के लिए सराहना हासिल की, वहीं अपने दूसरे कार्यकाल में वे घोटालों के आरोपों और नीतिगत पंगुता की वजह से काफी कुछ सद्भावना गंवा बैठे. पद छोड़ते वक्त मनमोहन सिंह ने उम्मीद की थी कि इतिहास उन्हें कुछ ज्यादा उदारता के साथ आंकेगा. हो सकता है, वह ऐसा करे.

वाहवाही करें या लानत-मलामत

तो, मोदी के पांच साल के रिकॉर्ड को हमें कैसे आंकना चाहिए? क्या हमें स्वच्छ भारत की क्रांति लाने का श्रेय उन्हें देना चाहिए मगर कृषि संकट को थामने की नाकामी के लिए लानत-मलामत करनी चाहिए? क्या हमें माल और सेवा कर (जीएसटी) के रूप में आजादी के बाद सबसे बड़े कर सुधार का सूत्रपात करने के लिए उनकी तारीफ  करनी चाहिए मगर काले धन पर लगाम कसने की गरज से एक ऐसी नोटबंदी थोपने के लिए उनकी आलोचना भी करनी चाहिए, जिसका हश्र देश की आर्थिक वृद्धि को मटियामेट करने में हुआ? यही नहीं, क्या हमें सर्जिकल स्ट्राइकों के जरिए पाकिस्तान के साथ रिश्तों में एक नई लाल लकीर खींचने के लिए उनकी वाहवाही करनी चाहिए मगर कश्मीर में बदतर होते हालात के लिए उनकी धज्जियां भी उड़ानी चाहिए? क्या हमें बनिस्बतन भ्रष्टाचारमुक्त सरकार चलाने के लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए मगर भारतीय रिजर्व बैंक सरीखी संस्थाओं को कमजोर करने के लिए उन्हें बुरा-भला भी कहना चाहिए? क्या हमें ताबड़तोड़ रफ्तार से राजमार्गों का निर्माण करने के लिए उनकी पीठ थपथपानी चाहिए मगर स्वयंभू गोरक्षकों की हत्यारी ज्यादतियों पर कानफोड़ू खामोशी अख्तियार कर लेने के लिए उन्हें फटकार भी लगानी चाहिए? (गौर करेः भाजपा के 2019 के चुनाव घोषणा पत्र में और ज्यादा गोरक्षा का जिक्र नहीं है). क्या हमें देश के सबसे मेहनती और ऊर्जावान प्रधानमंत्रियों में शुमार होने के लिए उन्हें शाबाशी देनी चाहिए और उनके विरोधियों के सुर में सुर मिलाते हुए उनकी मगरूरियत, उनकी तानाशाही फितरत और सत्ता को ज्यादा से ज्यादा पीएमओ में केंद्रित करने के लिए उनकी भत्र्सना करनी चाहिए?

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता होने के नाते हर प्रधानमंत्री को अपने कामकाज के लिए वाहवाही से कहीं ज्यादा निंदा के लिए तैयार रहना ही चाहिए. ऐसा इसलिए, क्योंकि फैसले आप लेते हैं और नतीजों की जिम्मेदारी भी आपकी है, आप किसी और को दोष नहीं दे सकते. माना जाता है कि मोदी आलोचना को लेकर संवेदनशील हैं और वे अक्सर यह शिकायत करते हैं कि उनके काम पूरे करने के बाद एकाएक गोल पोस्ट बदल दिए जाते हैं, खासकर उन लोगों के जरिए, जिन्हें उनके मंत्रिमंडल के साथी अरुण जेटली 'कंपल्सिव कंट्रेरियन' (अनिवार्य विरोधी) कहकर मजाक उड़ाते हैं. मगर मोदी को उस सलाह पर गौर करना चाहिए, जो ओननडांगा जनजाति के धर्मरक्षक और कन्फेडरेशन ऑफ नैटिव अमेरिकंस के प्रमुख ओरेन आर. ल्योंस ने 1992 के ऐतिहासिक रियो पृथ्वी सम्मेलन में जुटे दुनिया भर के नेताओं को दी थी. चीफ  ओरेन ने कहा था, ''हमें सिखाया गया है कि हरेक मुखिया की खाल सात बालिश्त मोटी होनी ही चाहिए, ताकि वह लोगों के और ज्यादातर अपने ही लोगों के कांटों और तीरों को सह सके और सीख को खुद अपने, अपने परिवार और अपनी पीढ़ी तक ही सीमित न रखे. हर फैसले में सातवीं पीढ़ी के कल्याण की झलक मिलनी चाहिए."

प्रधानमंत्री को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने विरासत में मिली मुश्किलों से मुकाबला करते हुए भी अपनी नजर और विजन को हमेशा बहुत आगे के लक्ष्यों पर टिकाए रखा. 2014 में जब उन्होंने बागडोर संभाली थी, उन्हें संसद में शानदार बहुमत मिला था, ताकि वे यूपीए-2 के विपरीत निर्णायक सरकार दें, आर्थिक वृद्धि में नई जान फूंकें, महंगाई कम करें, लाखों लोगों के लिए रोजगार (उन्होंने सालाना एक करोड़ नौकरियों का वादा किया था) पक्का करें, भ्रष्टाचार और काले धन पर लगाम कसें और ग्रामीण विकास की रक्रतार तेज करें. उस वक्त उन्हें उतावले और जल्दबाज प्रधानमंत्री के तौर पर देखा गया जब उन्होंने अपने वादों पर अमल के लिए आकर्षक नारों और समय सीमा के साथ एक के बाद एक ताबड़तोड़ सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों (आखिरी गिनती में 96) का ऐलान किया था. इन समय सीमा का ऐतिहासिक महत्व था.

स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले भाषण में उन्होंने जिस स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की थी, उसके तहत उन्होंने भारत को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए अक्तूबर 2019 की तारीख तय की थी, जो संयोग से महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर पड़ती थी. अपने कार्यकाल के तीसरे साल में ही उनकी नजरें दूसरे कार्यकाल पर जमी थीं जब उन्होंने 2022 तक, यानी आजादी के 75 साल पूरे होने पर, एक नए भारत का सूत्रपात करने की बात कही थी. इससे भी आगे 2047 के बारे में सोचने को लेकर उनके सबसे हालिया भाषण की बात तो ही छोड़ दें. इसमें कोई शक नहीं कि मोदी लंबी दूरी की दौड़ के धावक हैं, मगर वे खुद को इस रोशनी में देखना पसंद नहीं करते. इस लेखक के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने इस किस्म की तुलनाओं को परे झटक दिया था और कहा था, ''मेरा जोर सतत विकास पर है और मेरी सरकार जिन भी कार्यक्रमों की पहल करती है, उनमें से हरेक यह पक्का करने के लिए है कि वह स्थायी और सर्वांगीण विकास में योगदान दे. मेरा मकसद लोगों को ताकतवर बनाना है, ताकि वे खुद इन कामों को अंजाम दे सकें."

पक्के इरादे वाले शख्स

मोदी जो भी करते हैं, उसमें से कुछ भी औचक नहीं होता. यह एक ज्यादा बड़े मंसूबे से जुड़ा होता है जो उनके मन में होता है. वे छोटा नहीं सोचते, वे बड़े फलक पर जाते हैं. वे नए विचारों के प्रति खुले हैं और बारीकियों को ध्यान में रखते हैं. मगर वे योजना के कई हिस्सों का एक ही बार में खुलासा करने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें फिक्र होती है कि कहीं अमल करने वाले लोग भारी-भरकम काम देखकर भयभीत न हो जाएं. ग्रामीण विकास इस बात की बानगी बन गया है कि वे काम कैसे करवाते हैं. उन्होंने बैंकों के दायरे से बाहर छूट गए लाखों लोगों के बैंक खाते खोलने के लिए जन धन योजना शुरू की और भ्रष्टाचार को कम करने की गरज से सब्सिडी और राहत की रकमों को उनमें सीधे जमा करने की खातिर जल्दी ही उसे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) योजना से जोड़ दिया. लिहाजा, उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस कनेक्शन और सिलिंडरों की सब्सिडी लाभार्थी के जन धन खाते में सीधे जमा कर दी जाती है.

यह सब एक ज्यादा बड़ी योजना का हिस्सा होना था, जिसमें सरकार गरीबों को मकान बनाने के लिए रकम देगी (सरकार का दावा है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के नए नाम से चलाई गई इस योजना में 2014 से अब तक 1.59 करोड़ घर बनाए जा चुके हैं), उस घर में स्वच्छ भारत के फंड से शौचालय बनाने के लिए भी रकम देगी, उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलिंडर देगी और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत कनेक्टिविटी मुहैया करने के लिए ग्रामीण सड़कें बनवाएगी. इसके अलावा घरों और गांवों में बिजली पहुंचाने का एक अलग कार्यक्रम तो था ही. उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा और खासकर सौर ऊर्जा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई. डिजिटल टेक्नोलॉजी के जरिए योजनाओं की निगरानी की उनकी कोशिशों की बदौलत पहले की बनिस्बत कहीं बेहतर अमल पक्का हो सका.

एक और मोर्चे पर देखें तो मोदी ने जब कमान संभाली, उन्होंने अर्थव्यवस्था को उस दलदल से निकालने का जतन किया जिसमें वह यूपीए-2 के आखिरी वर्षों में धंस गई थी. खेती को नुक्सान पहुंचाने वाले लगातार सूखे के बावजूद सरकार बुनियादी ढांचे की भारी-भरकम परियोजनाओं, खासकर नेशनल हाइवे बनाने (जो बहुत तेज रफ्तार से बने) और रेलवे का कायाकल्प करने के अलावा ग्रामीण विकास के कामों में पैसा लगा सकी. अलबत्ता तेल की कीमतों के रिकॉर्ड निचले स्तर ने इसमें उसकी मदद की. उसके बाद अति-आत्मविश्वास और घमंड हावी हो गया. काले धन का खात्मा करने के अपने चुनावी वादे को पूरा करने के लिए उन्होंने 8 नवंबर, 2016 को रातोरात बड़े नोटों को बंद करने का फरमान सुना दिया. अपने बुनियादी लक्ष्यों को हासिल करना तो दूर, इस कदम ने नकद लेनदेन पर चलने वाले विशाल असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र को गहरा धक्का पहुंचाया और लाखों लोगों का काम-धंधा छीन लिया, जिनमें ज्यादातर गरीब थे.

इसका असली असर तब समझ में आया जब नोटबंदी के बाद जीडीपी की वृद्धि दर गिर गई. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत के घोड़े पर सवार मोदी ने जीएसटी लागू करने पर पूरा जोर लगा दिया. नोटबंदी और जीएसटी का मिला-जुला असर नौकरियों के सृजन पर पड़ा और आर्थिक वृद्धि का रथ रुक गया. हालात तब और बदतर हो गए जब डूबत खाते के कर्जों (एनपीए) के बोझ से बुरी तरह दबे बैंकिंग क्षेत्र ने कर्ज देना बिल्कुल बंद कर दिया, जिससे मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि और मुरझा गई. अर्थव्यवस्था को उबरने में और जीडीपी की वृद्धि को सालाना 7 फीसदी के स्तर पर लौटने में एक साल से ज्यादा वक्त लगा.

इस बीच मोदी सरकार उस ग्रामीण संकट की थाह पाने में नाकाम रही, जो अब तक विकराल हो चुका था. कृषि के मामले में किसानों की आमदनी बढ़ाने के बजाए सरकार पैदावार बढ़ाने की नीति पर चली. पैदावार की भरमार के चलते महंगाई भले ही काबू में रही हो, पर इसने किसानों को घुटनों के बल खड़ा कर दिया. फसलों में विविधता लाने और कृषि उपजों के भंडारण तथा प्रसंस्करण के लिए बुनियादी ढांचा खड़ा करने सरीखे जिन आर्थिक सुधारों का मतलब होता, वे जड़ें ही नहीं पकड़ पाए. देश कुल नौकरियों के सृजन में नाटकीय गिरावट का गवाह बना. हालांकि सरकार रोजगार के आंकड़ों पर अब भी विवाद खड़ा कर रही है.

विदेशी नीति और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों को संभालने में मोदी का ट्रैक रिकॉर्ड कहीं बेहतर था, पर कश्मीर के मुद्दे से उनकी सरकार जिस तरह निपटी, वह एक धब्बा है. हालांकि, आतंकी हमलों के जवाब में पाकिस्तान के खिलाफ कठोर कदम उठाने की प्रधानमंत्री की तत्परता ने देश के भीतर और बाहर उनकी छवि में चार चांद लगा दिए. इससे भाजपा का हौसला इतना बढ़ गया कि उसने आतंक पर शून्य सहनशीलता और आंतरिक सुरक्षा को 2019 के चुनाव के अपने घोषणा पत्र में शीर्ष प्राथमिकता बना दिया. यहां तक कि उसे कृषि सुधारों और नौकरियों के सृजन से ऊपर तरजीह दी गई है. यह इंडिया टुडे के पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज जनमत सर्वेक्षण के नतीजों के खिलाफ  नजर आता है, जिससे खुलासा हुआ कि देश भर के मतदाता रोजगार को नंबर एक चिंता मानते हैं और उसके बाद ग्रामीण तथा कृषि संकट का और उसके भी बाद आंतरिक सुरक्षा का नंबर आता है.

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