एडवांस्ड सर्च

प्रधान संपादक की कलम से

प्रधानमंत्री पर कोविड-19 से पंगु अर्थव्यवस्था में जान डालने की बड़ी जिम्मेदारी है. भारतीय अर्थव्यवस्था अपने विशाल आकार के अलावा बेहद पेचीदा है

Advertisement
aajtak.in
अरुण पुरीनई दिल्ली, 20 May 2020
प्रधान संपादक की कलम से प्रोत्साहन पैकेज

प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन के 48 दिनों बाद 12 मई को तीसरे लॉकडाउन के आखिरी दिनों में बहुप्रतिक्षित प्रोत्साहन पैकेज का ऐलान किया. उन्होंने 20 लाख करोड़ रुपए (266 अरब डॉलर) के आर्थिक प्रोत्साहन की घोषणा की जो भारत की जीडीपी का 10 फीसद और दुनिया में सबसे बड़े पैकेजों में एक है. यह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बड़े आर्थिक बहाली पैकेजों के मद्देनजर है. मसलन, अमेरिका ने 22 खरब डॉलर यानी अपनी अर्थव्यवस्था का 13 फीसद और जापान ने 10 खरब डॉलर यानी अपनी अर्थव्यवस्था का 21 फीसद का ऐलान किया है. हालांकि भारत के पैकेज में 26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से घोषित 1.7 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन पैकेज और फरवरी से अप्रैल के बीच भारतीय रिजर्व बैंक के 7.9 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन को भी जोड़ लिया गया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने 'आत्मनिर्भर भारत' के नजरिए का भी ऐलान किया. यह नजरिया पांच स्तंभों पर टिका है—अर्थव्यवस्था में क्रमिक नहीं बड़ा उछाल लाना, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना, टेक्नोलॉजी आधारित शासन-व्यवस्था स्थापित करना, अपनी युवा आबादी का लाभ लेना और देश की विशाल घरेलू मांग में जान डालना. यकीनन प्रधानमंत्री को अपनी कई योजनाओं का नजरिया पेश करने में लाजवाब महारत है लेकिन उन पर अमल मिश्रित कामयाबी वाली ही रही है. खुले में शौच पर काफी हद तक कमी लाने वाला स्वच्छ भारत अभियान, बैंकिंग व्यवस्था से दूर लोगों के लिए बैंक खाते खुलवाने, रसोई गैस सिलेंडर के वितरण, किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और किफायती घर मुहैया कराने की योजनाएं काफी हद तक सफल रही हैं लेकिन मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, बैंक सुधार, कारोबार से सरकार के अलग रहने जैसी कई योजनाओं के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. अब सवाल उठता है कि आत्मनिर्भर भारत का नया नजरिया अमल में कैसे आएगा.

क्या इसका मतलब यह है कि हम 1991 के पहले के दौर में आयात पर प्रतिबंधों के नेहरूवादी विचारों की ओर लौट रहे हैं? प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में लोकल के बारे में वोकल होने का आह्वान किया और यह भी कहा कि न सिर्फ स्थानीय उत्पाद खरीदें, बल्कि उन्हें बढ़ावा भी दें. क्या इसका मतलब अक्षम भारतीय उद्योग की रक्षा के लिए व्यापार प्रतिबंधों से है और फिर कई मुक्त व्यपार समझौतों का क्या होगा, जिन पर हमने दस्तखत किए हैं? भारत कैसे व्यापार योग्य सामान के मामले में प्रतिस्पर्धी बनेगा? क्या हम वाकई यह मानते हैं कि हम वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा हो सकते हैं, खासकर जब दुनिया अपने भीतर सिकुड़ रही है और हम अब भी कारोबारी सहूलत के मामले में दुनिया में 63वें स्थान पर हैं? अतीत में ऐसी कोशिशें एसईजेड के साथ नाकाम हो चुकी हैं. मेरा मानना है कि सरकार को हमारी घरेलू खपत की पूर्ति के लिए एफडीआइ को आकर्षित करना चाहिए और अगर निर्यात होता है तो वह बोनस होगा. इसी तरह हम अत्याधुनिक तकनीक और दुनिया से बेहतर प्रणालियां हासिल कर सकते हैं. जब प्रधानमंत्री विचार कर रहे हैं तो देश को सबसे बुरे वित्तीय संकट से उबारने के लिए इन कुछ सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है.

इस बीच वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एमएसएमई क्षेत्र के लिए कई उपाय लेकर आई हैं, जिसकी हिस्सेदारी हमारी जीडीपी में 29 फीसद है और 48 फीसद लोगों को गैर-कृषि रोजगार देता है. वित्त मंत्री ने मुख्य रूप से बिना जमानत के आसान कर्ज, अतिरिक्त कर्ज और कुछ इक्विटी निवेश के जरिए नकदी का प्रवाह बढ़ाया है. ये उद्योग करीब 6.33 करोड़ हैं लेकिन वास्तविक लाभ सिर्फ 45 लाख को ही मिल पाएगा.

कोई वेतन या पारिश्रमिक सुरक्षा का कार्यक्रम नहीं है, जैसा कि अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में है. यह प्रधानमंत्री के कारोबार के लिए कुछ खैरात न देने के दर्शन के अनुरूप है. उम्मीद है कि कर्ज से कारोबार में जान लौट आएगी लेकिन कई कारोबारी देनदारी नहीं बढ़ाना चाहते या कर्ज नहीं ले सकते, वे कंगाल हो जाएंगे, जिससे नौकरियां जाएंगी, आय और अंतत: मांग घटेगी. अगर मांग नहीं बढ़ी तो भविष्य में और समस्या खड़ी होगी. किसानों को उपज बेचने की छूट स्वागतयोग्य कृषि सुधार है. ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने की प्रतिबद्घता और मनरेगा का विस्तार भी स्वागतयोग्य है.

शहरों से लाखों प्रवासी मजदूर गर्मी, भूख-प्यास, यहां तक कि मौत से जूझते हुए पैदल ही हजारों किमी दूर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश में अपने घर की ओर जा रहे हैं. ये नजारे हमें वर्षों तक परेशान करते रहेंगे. सरकार ने दो महीने तक मुफ्त भोजन की व्यवस्था की. लेकिन यह बड़ी नाकामी है कि शहरों में प्रवासी गरीबों पर लॉकडाउन के असर का अंदाजा नहीं लगाया गया, जिनके भीड़ भरे ठिकानों में सोशल डिस्टेंसिंग की गुंजाइश नहीं है. गृह प्रदेश जाने की इजाजत की ढुलमुल नीतियों से उनकी त्रासदी कई गुना बढ़ गई.

हमारी आवरण कथा 'स्वदेशी इलाज' अर्थव्यवस्था पर इस प्रोत्साहन पैकेज के असर का आकलन करती है और इसके अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभावों की पड़ताल करती है.

प्रधानमंत्री पर कोविड-19 से पंगु अर्थव्यवस्था में जान डालने की बड़ी जिम्मेदारी है. भारतीय अर्थव्यवस्था अपने विशाल आकार के अलावा बेहद पेचीदा है यह कई स्तरों से संचालित होती है. यह प्राचीन सदियों से लेकर अति आधुनिकता के बीच फैली रही है. केंद्रीकृत, और बेहद सुस्त, अफसरशाही के जरिए इसके प्रबंधन से हम कभी वांछित नतीजे नहीं पा सकेंगे. सरकार को बाजार के अदृश्य हाथ पर भरोसा करना होगा. बाजार फैसला करे कि कौन क्या उत्पादन करे, कहां बेचे और कौन खरीदे. यही वक्त है कि सरकार अर्थव्यवस्था पर अफसरशाही का नियंत्रण कम करे और मानव संसाधन के साथ विश्वस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर ध्यान लगाए, जैसा प्रधानमंत्री का वादा है. वे मंत्रालयों और विभागों की संख्या घटाकर सरकार को अधिक कुशल बना सकते हैं और उनका फोकस बेहतर गवर्नेंस की ओर कर सकते हैं.

भारत में हर कोई उद्यमी है, यहां तक कि सरकारी बाबुओं और अधिकारियों में सबसे भ्रष्ट शख्स भी कारोबारी ही है. प्रधानमंत्री को मौजूदा संकट से देश को उबारने के लिए उद्यमी भावना को प्रेरित करना होगा और उन लोगों की ताकत सीमित करनी होगी जिनका कारोबार से कोई मतलब नहीं है. इसी महा परिवर्तन का मुझे इंतजार है.

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay