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करगिल की नई कहानी

करगिल जंग में दुश्मन के सैनिकों के शवों से बरामद दस्तावेज दो दशक पहले पाकिस्तानी फौज के दुर्भाग्य की कहानी के साथ भारत की खुफिया चूक भी बयान करते हैं

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संदीप उन्नीथननई दिल्ली, 08 July 2019
करगिल की नई कहानी इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास

पंद्रह मई, 1999 को लिखे एक पत्र में जलते हुए सूरज के नीचे दो आड़ी-तिरक्षी तलवारों (क्रॉस सोर्ड) के निशान अंकित थे. तलवारों के चारों ओर लिखे शब्द फारसी शायर सादी शिराज़ी के एक शेर से लिए गए थे: पीर शो बियामूज़ (सीखते हुए बुजुर्ग हो जाओ).

क्वेटा में पाकिस्तानी सेना की कमान और स्टाफ कॉलेज के कमांडेंट मेजर जनरल जावेद अफजल खान ने 60 बलूच रेजिमेंट के युवा मेजर को लिखे पत्र में कुछ यूं संबोधित किया था, ''मेरे प्यारे सईद अहमद, मैं 2000 स्टाफ कोर्स के लिए आपके चयन पर अपनी बधाई भेजता हूं. यह सेना में सेवा के प्रति आपके समर्पण और सेना के प्रति उच्चतम सक्वमान का प्रतिबिंब है. हम आपकी शीघ्र वापसी पर स्वागत करने को उत्सुक हैं और आशा करते हैं कि आपका प्रवास आपके लिए पेशेवर रूप से फायदेमंद और सामाजिक रूप से सुखद रहा होगा.'' मेजर सईद अहमद नागरा, नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री की 12वीं बटालियन (12 एनएलआइ) का हिस्सा थे जो कि जम्मू-कश्मीर के करगिल जिले में लगभग 10 किलोमीटर भीतर तक भेजी गई पाकिस्तान की सेना की पांच बटालियनों में से एक थी.

पंजाब प्रांत के खारियां में नागरा की रेजिमेंट को भेजे गए ये पत्र, 26 जुलाई, 1999 को लड़ाई बंद हो जाने के बाद भारतीय सेना की तरफ से बरामद दस्तावेजी साक्ष्यों में से थे. मेजर नागरा उन लोगों में थे, जो जंग के बीच जान बचाकर भाग गए थे. उन्हें आगे तरक्की भी मिली और वर्तमान में वे दक्षिण बलूचिस्तान क्षेत्र में फ्रंटियर कोर के इंस्पेक्टर जनरल हैं. लेकिन उनके साथी उतने भाग्यशाली नहीं रहे.

सेना को बंकरों और छोटी खाइयों में 200 से अधिक उन पाकिस्तानी सैनिकों के शव मिले जो शायद भारतीय सेना की होवित्जर तोपों की भारी गोलाबारी में मारे गए थे. भारतीय सैनिकों को मारे गए दुश्मन के सैनिकों की जेबों और बैग की तलाशी में ऐसे दस्तावेज मिले जिनसे राष्ट्रीय राजमार्ग 1ए पर नजर गड़ाकर संगरों में छिपकर बैठे दुश्मनों की ठीक शिनाख्त की जा सकी. यह राजमार्ग कश्मीर घाटी को जम्मू और शेष भारत से जोड़ता है.

इतने वर्षों तक, ये सबूत भारत सरकार के कार्यालयों की आलमारियों में बंद थे. उनमें से कई सरकारी विभाग के 'नॉट टू गो आउट' या एनजीओ सेक्शन में थे. ये दस्तावेज़ उस करगिल समीक्षा समिति के गोपनीय खंड का हिस्सा हैं जिसे इस जंग से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भविष्य में काम आने वाले सबक खोजने की जिम्मेदारी दी गई थी.

इंडिया टुडे इनमें से कुछ दस्तावेज़ों की प्रतियां हासिल करने में सफल रहा जिन्हें सेना ने 20 साल पहले इकट्ठा किया था. उनमें पाकिस्तानी सेना की पे-बुक, सैनिकों के अपने परिजनों को लिखे खत जो पोस्ट नहीं किए जा सके, पत्नियों और बच्चों की तस्वीरें, व्यक्तिगत बटुए, मेस बिल, मेस की संपत्ति का हैंडओवर-टेकओवर दस्तावेज और कम्युनिकेशन में इस्तेमाल होने वाले गुप्त शब्दों की सूची, पासवर्ड, इंच मैप, मोर्टार और आर्टिलरी यूनिट्स की टास्क टेबल, मनीऑर्डर फॉर्म और व्यक्तिगत डायरी आदि शामिल थे.

भारतीय सेना के एक अधिकारी, जो चोटियों पर कब्जा करने वाली एक गुप्त इकाई से जुड़े थे, कहते हैं कि वे 'बिल्कुल हमारे जैसे' थे. अभिशप्त पाकिस्तानी सेना ने इसे ऑपरेशन कोह पैमा (पर्वतारोही) या ऑप केपी का कोड नाम दिया था.

8 एनएलआइ के नायक गुलाम अब्बास के शव से जब्त उसके रिश्तेदार हाफिज अब्दुल कादिर आदिल की चिट्ठी से पता चलता है कि वह कई महीनों से लापता था. आदिल स्कूल टीचर है और गुलाम कश्मीर में नीलम घाटी के दूदनियाल शहर का रहने वाला है. आदिल ने 400 से कम शब्दों की चिट्ठी में सात बार उसके खैरियत की कामना व्यक्त की है. अब्बास के घरवालों को जनवरी 1999 के बाद से उसका कोई खत नहीं मिला. ''हमें आपके पांच खत एक साथ मिले...सभी जनवरी से पहले के लिखे हुए थे''. एक जगह आदिल ने अब्बास के ठिकाने का उसी के हवाले से जिक्र किया है, इस साल ''मैं सबसे ऊंची चोटी पर हूं'', शायद यह करगिल में 4,660 मीटर ऊंची टाइगर हिल पर अब्बास की मौजूदगी की सूचना थी.

करगिल जंग में मारे गए पाकिस्तानियों की सूची में अब्बास की मौत, गुलाम कश्मीर में गिलगित जिले के हमजीगुंड सब सेक्टर में 'दुश्मन की कार्रवाई' के दौरान होना बताया गया है. लेकिन उसकी मौत की तारीख—3 जुलाई—संकेत करती है कि वह टाइगर हिल की भीषण लड़ाई में मारा गया था. इस लड़ाई में भारतीय फौज ने इस चोटी को दुबारा अपने कब्जे में ले लिया था. शायद अब्बास के भागते साथी उसके शव को वहीं छोड़ गए थे.  

'मुजाहिदीन' का झांसा 

करगिल जंग में 3 मई को दो चरवाहों ने देश की सीमाओं के अंदर घुसपैठियों के होने की सूचना दी थी. भारतीय सेना के पैदल निगरानी दल को इसकी जांच के लिए भेजा गया.

इससे ठीक एक साल पहले भारत और पाकिस्तान दोनों ने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ से मिलने के लिए लाहौर की ऐतिहासिक बस यात्रा की थी और यह सब उस के ठीक तीन महीने बाद हो रहा था. 1945 में पहले परमाणु बम के परीक्षण और उपयोग के बाद से अब तक कोई भी दो परमाणु-शक्ति संपन्न देशों ने युद्ध नहीं किया था.

अक्तूबर 1998 में पदभार संभालने के बाद पाकिस्तानी सेना के तेजतर्रार और महत्वाकांक्षी प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने संभवत: इसी बात को ध्यान में रखकर ऑपरेशन का विचार किया होगा. स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (एसएसजी) के कमांडर मुशर्रफ को जब 16 दिसंबर, 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना के अपमानजनक समर्पण की जानकारी मिली थी तो वे रो पड़े थे.

उन्होंने पाकिस्तान के जनरल हेडक्वार्टर में कई वर्षों से धूल फांक रहे उस प्लान को बाहर निकाला जिसके बारे में मुशर्रफ को पहले से काफी कुछ जानकारी इसलिए थी क्योंकि वे एक बार डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) रह चुके थे.

पाकिस्तानी सेना की योजना थी कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास स्थित उन भारतीय चौकियों पर कब्जा जमा लिया जाए जिन्हें भारतीय सेना सर्दियों में खाली करके चली जाती है. उस क्षेत्र को नियंत्रण रेखा के रूप में स्वीकार किया गया है, जहां तक दोनों देशों की सेनाओं का 17 दिसंबर, 1971 को संघर्ष विराम घोषित करते वक्त कब्जा था. नियंत्रण रेखा दक्षिण से उत्तर की ओर 740 किलोमीटर लंबी है और यह बहुत टेढ़ी-मेढ़ी है. गुरेज के उत्तर में यह अचानक तेजी से दाईं ओर लद्दाख की ओर मुड़ जाती है. श्रीनगर को लद्दाख जिले के लेह से जोडऩे वाला राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) 1ए एलओसी के साथ-साथ चलता है.

लद्दाख एक उजाड़, निर्जन, रेगिस्तानी बंजर भूमि का किनारा है, जिसकी नुकीली चोटियां आसमान को चीरती हुई प्रतीत होती हैं. एलओसी की ऊंचाई 12,000 और 18,000 फुट के बीच है. एलओसी पर भारी बर्फबारी होती है और 10-40 फुट तक मोटी बर्फ की परत जम जाती है जिसके कारण भारतीय सेना के लिए पोस्ट पर रहना मुश्किल हो जाता है.

इसलिए सेना अक्तूबर में इन पोस्ट को खाली कर देती थी और बर्फ पिघलने के बाद मई में यहां वापस आती थी. ऑप केपी में योजना बनाई गई कि एलओसी की उन खाली पोस्टों पर पाकिस्तानी सेना के अर्धसैनिक बल एनएलआइ का उपयोग करके कब्जा जमा लिया जाए. एनएलआइ में सैनिकों के रूप में मुख्यत: उत्तरी प्रांत (जिसे अब गिलगित-बल्तिस्तान कहा जाता है) के लोगों को भर्ती किया जाता है और अधिकारी पाकिस्तानी सेना से आते हैं.

एनएलआइ की बटालियन नियमित पैदल सेना की बटालियन की सभी क्षमताओं से युक्त होती है. लेकिन उसे कमांडो ऑपरेशन और बर्फ पर युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया गया था और इसके जवानों को पाकिस्तान की सबसे उन्नत मानी जाने वाली एसएसजी में भेजा जाता था.

पाकिस्तानी सेना में सशक्त रक्षकों के रूप में उनकी भूमिका तय की गई थी. जैसा केआरसी ने रिपोर्ट में लिखा है कि एनएलआइ घुसपैठियों को मुजाहिदीन के चोले में भेजा गया था.

उन्होंने मुजाहिदीन की तरह सलवार-कमीज पहनी थी. पाकिस्तान में सैन्य संगठनों के आकाओं और अन्य लोगों ने 'कश्मीरी स्वतंत्रता सेनानियों' की 'सफलताओं' की प्रशंसा करते हुए बयान जारी किए. सेना के तत्कालीन उप-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल चंद्रशेखर बताते हैं, ''मई के शुरुआती हफ्तों में, हमें लगा कि हम मुजाहिदीन से लड़ रहे हैं. हमने जो रेडियो संदेश पकड़े वे पश्तो, बल्ती और अन्य स्थानीय भाषाओं में थे.''

भारतीय सेना कश्मीर में एक दशक से चल रहे आतंकवाद के कारण एकदम ढली हुई थी जबकि पाकिस्तानी षड्यंत्रकारी 1980 से 1988 के बीच अफगानिस्तान के साथ युद्ध के दौरान हासिल कौशल और दक्षता के साथ तैनात थे. हमारी सेना को इस बात की पक्की जानकारी भी नहीं थी कि घुसपैठ करने वाले लोग कौन हैं, कितनी तादाद में हैं. 19 मई, 1999 को एक प्रेस वार्ता में, 15 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल वी.एस. बधवार ने कहा, ''घुसपैठिए भारी हथियारों से लैस हैं और लगभग आत्मघाती मिशन पर चल पड़े नजर आते हैं.'' उन्हें तब तक यह पता नहीं था कि वे ''तालिबान हैं और उनके बीच पाकिस्तानी सेना के नियमित फौजी भी हैं.'' जून के शुरू में यह स्पष्ट हो गया था कि यह एक बड़ी घुसपैठ है और घुसपैठियों ने अस्थाई मोर्चे तैयार कर लिए हैं. 6 जून को सेना ने करगिल में अपना बड़ा हमला किया और बटालिक में दो प्रमुख पोस्ट पर फिर से कब्जा कर लिया.

हालांकि भारत में खुफिया विफलता का एहसास होने लगा था. करगिल अभियान में शामिल एक अनुभवी अधिकारी आश्चर्य और अविश्वास के भाव से बताते हैं, ''वे सब एक झील के पार बैठे थे...एक पूरी पाकिस्तानी ब्रिगेड झील के उस पार खड़ी थी और हमें वे कैसे नजर नहीं आए?'' 11 जून को तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने मुशर्रफ की रावलपिंडी में अपने डिप्टी लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज से सैटेलाइट फोन पर हुई बातचीत से जुड़े रिकॉर्ड जारी किए. खुफिया एजेंसियों ने 26 मई और 29 मई को इंटरसेप्ट बातचीत में, मुशर्रफ को यह कहते हुए सुना कि नए सिरे से एलओसी निर्धारित करके इसे खत्म किया जाएगा.

भारत ने जून में आक्रामक जवाबी हमला किया जिससे मुशर्रफ और उनके कमांडर सकते में आ गए. 30,000 से अधिक सैनिकों की दो डिविजनों को चोटियों पर फिर से कब्जा जमाने के लिए भेजा गया. वायु सेना के फाइटर जेट ने पहाड़ी की चोटी पर लेजर-गाइडेड बम गिराए, घाटी में तैनात भारतीय तोपों ने हजारों राउंड गोले बरसाए जिससे चोटियों पर 'मुजाहिदीनों' के बनाए संगरों की छतें उड़ गईं और सैनिक लगभग खड़ी चढ़ाई चढ़कर दुश्मनों के सामने जा पहुंचे और आमने-सामने की खूनी लड़ाई लड़ी गई.

इस लड़ाई में सबसे पहले उस झूठ का पर्दाफाश हुआ कि सेना कश्मीरी आतंकवादियों से लड़ रही थी. हमारे सैनिक जब मुश्किल चढ़ाई कर रहे थे तब उन्हें जिस प्रकार के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा उससे स्पष्ट था कि ऊंचाइयों पर बैठे लोग मुजाहिदीन नहीं हो सकते. मुजाहिदीन ने कभी ऐसी रक्षात्मक लड़ाई नहीं लड़ी थी. उन्होंने जवाबी हमले नहीं किए, न ही उन्होंने कभी बारूदी सुरंगें बिछाईं. वे तोपखानों, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, भारी मशीनगनों और हेलिकॉप्टरों का उपयोग नहीं करते थे.

तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक कहते हैं, ''पाकिस्तानी सेना का मुजाहिदीन मुखौटा 1999 के जून मध्य तक सफल रहा क्योंकि जंग से पहले तक सेना के शामिल होने की कोई खुफिया रिपोर्ट नहीं आई थी. सभी खुफिया एजेंसियां अपनी शुरुआती रिपोर्ट में मुजाहिदीन आतंकी कैंपों और गुलाम कश्मीर में उनके जमावड़े पर ध्यान दे रही थीं. गलत सूचना देने की पाकिस्तान की ये योजना (इलेक्ट्रॉनिक डिसेप्शन प्लान) सफल रही.'' उन्होंने कहा, ''हमारी खुफिया एजेंसियां, यहां तक कि मोर्चे पर सैनिक भी यही मान रहे थे. मेरा तर्क था कि मुजहिदीन इतनी देर टिक नहीं सकते या तोप का प्रयोग नहीं करते पर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) को इससे सहमत नहीं करा सका. शायद यही कारण था कि सीसीएस ने करगिल को 'युद्ध' घोषित नहीं किया और एलओसी पार करने की अनुमति नहीं दी.'' सरकार तब मानी जब तोलोलिंग पर कब्जे (13 जून) के बाद पाकिस्तानी सेना का हाथ होने के ठोस सबूत मिले. वहां से पाकिस्तानीसेना के नियमित हथियार और उपकरण ही नहीं मिले बल्कि सैनिकों की पे बुक, मूवमेंट ऑर्डर और सिग्नल कोड बुक भी हाथ लगे.

सेना ने पाकिस्तानी अफसरों की कई व्यक्तिगत डायरियां बरामद की थीं. इनमें से एक 5 एनएलआइ के लेक्रिटनेंट मोहम्मद माज उल्लाह खान सुंबल की डायरी भी थी. यह पॉकेट डायरी पूर्व सैनिकों के फौजी फाउंडेशन के स्वामित्व वाली ऊर्जा कंपनी मारी गैस की ओर से भेंट की गई सम्मानार्थ प्रति थी. लाहौर छावनी की रक्षा आवास सोसाइटी के निवासी लेफ्टिनेंट ने डायरी में लिखा है कि 31 जनवरी को उनकी करगिल में तैनाती की सूचना मिली थी. उन्हें जिस दिन यह डायरी मिली उसकी तारीख लिखी थी और घर से आई चिट्ठियों और ईद कार्ड भी इसके बीच रखे थे. इस अभियान में 'लामा' हल्के हेलिकॉप्टर और एक एमआइ-17 मीडियम-लिफ्ट हेलिकॉप्टर की मदद की जानकारी भी थी. सुंबल जून के मध्य तक नियमित रूप से डायरी लिखते रहे. भारतीय तोपखाने से हुई गोलाबारी में उनके बाएं हाथ की हड्डी टूट गई तो उन्हें वहां से निकालकर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ले जाया गया.

जो डायरी पीछे छूट गई उसमें युवा अधिकारी ने करगिल के तजुर्बे लिखे हैं. उसने 19,000 फुट पर माइनस 22 डिग्री में नहाने के भयावह अनुभव और हमजीगुंड में अपना 27वां जन्मदिन मनाने के अनुभवों का उल्लेख किया है. सुंबल ने लिखा है कि 15 जून को उनकी एक साथी एनएलआइ अधिकारी से मुलाकात हुई जिसने भारतीय वायु सेना के पाइलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को पकड़ लिया था. नचिकेता जिस मिग-27 को उड़ा रहे थे उसके एक इंजन में आग लग गई और वह दुर्घटनाग्रस्त होकर बटालिक में गिर गया था. सुंबल ने लिखा है कि सेक्टर में अपनी तैनाती के 18वें दिन 30 जून को भारतीय गोलाबारी ने बहुत कहर बरपाया था और भारतीय सेना के गोले के छर्रों ने उस तंबू को चीर दिया जिसमें वे थे.

ऑप केपी पाकिस्तान का गुपचुप तरीके से करगिल की पहाडिय़ों को अपने कब्जे में लेने का अभियान था पर इसने अपने पीछे दस्तावेजों का ऐसा अंबार छोड़ा जिसने उसकी कलई खोल दी. उसमें भारी मात्रा में ऐसी सामग्री भी थी जिससे एक आम औपनिवेशिक मूल वाली दोनों ओर की सेनाएं परिचित थीं. उनकी गौर से छानबीन की जाए, तो उनमें से कई ऐसे सुराग मिलते हैं जो नजर से छूट गए.

उदाहरण के लिए, बटालिक सेक्टर से बरामद ऑफिसर्स मेस प्रॉपर्टी के हैंडिंग/टेकिंग ओवर पेपर को ही लें, जहां 5एनएलआइ लड़ रही थी. बटालियन ने पाकिस्तान की तरफ के एलओसी का एक बेस खाली कर दिया और बटालिक में भारतीय सीमा की तरफ बढ़ी. भारतीय खुफिया तंत्र इस हरकत को भांपने में पूरी तरह विफल रहा.

बरामद किए गए अन्य दस्तावेजों में से कुछ में ऑप केपी की परिचालन संबंधी गोपनीयता की विस्तृत योजना का जिक्र है. मई, 1999 में पाकिस्तानी सेना के इस्तेमाल किए कोड शब्दों की गुप्त सूची भी भारतीय सैनिकों ने काकसर क्षेत्र से बरामद की थी. उन्होंने 'दुश्मन पोजिशन' के नाम के लिए संख्याएं निर्धारित की थीं जैसे—करगिल 713; मशकोह 812 और ज़ोजिला 101 था.

31 मई को 80 इन्फैंट्री ब्रिगेड से भेजे गए एक इंटर ऑफिस नोट (आइओएन) में संचार सुरक्षा संबंधी प्रोटोकॉल बताए गए थे. एलएलआइ की यूनिट्स को केवल फील्ड टेलीफोन का इस्तेमाल करने को कहा गया था, हाइ फ्रीक्वेंसी के रेडियो सेट नहीं. सैन्य विश्लेषक बताते हैं कि रेडियो सेट के उपयोग से परहेज किया जाता है क्योंकि इससे उनकी पोजिशन की जानकारी मिल जाती है.

इस बीच, लैंडलाइन कनेक्शन ध्वस्त हो गया और कैप्टन अली उल हसनैन द्वारा हस्ताक्षरित इंटर ऑफिस नोट (आइओएन) बरामद हुआ है जिसमें उन्होंने यूनिट्स को हाइ फ्रीक्वेंसी रेडियो वायरलेस सेट पीके-786 पर बटालियन मुख्यालय से संपर्क करने की सलाह दी है.

और अंत में, बरामद की गई चीजों के बीच पाकिस्तान के नक्शे की प्रतियां भी थीं जिसमें 29 अगस्त, 1972 को नई दिल्ली में पारस्परिक रूप से मंजूर रेखाचित्रों के अनुसार एलओसी को पाकिस्तान के हिस्से के रूप में दर्शाया गया था. प्रत्येक पक्ष की तरफ से तैयार नक्शे के दो सेटों में एलओसी को फिर से परिभाषित करके पेश किया गया था. इसने पाकिस्तानी सेना के शुरुआती दावों की पोल खोल दी कि वे केवल एलओसी के अपनी तरफ वाले हिस्से में ही वे अपनी सैन्य गतिविधियां चलाते थे.

वे जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं. और जब 5 जुलाई तक, प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ बैठक के बाद अपनी सेना को करगिल की चोटियों से हटाने की घोषणा की तो पाकिस्तान सेना ने एनएलआइ सैनिकों के शव लेने तक से इनकार कर दिया. पाकिस्तान फौज ने अपवादस्वरूप केवल पांच शवों को स्वीकारा जिसमें 12एनएलआइ के कैप्टन करनाल शेर भी थे, जो कगिल के गूल्टरी में मारे गए और उन्हें मरणोपरांत पाकिस्तान का सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार निशान-ए-हैदर दिया गया.

दस्तावेज क्या कहते हैं

विजय दिवस से दो दिन पहले 24 जुलाई को सरकार ने के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में करगिल समीक्षा समिति (केआरसी) का गठन किया और जिसके सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल के.के. हजारी, बी.जी. वर्गीज और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के सचिव सतीश चंद्रा (साक्षात्कार देखें) थे. दिसंबर, 1999 में सरकार को सौंपी रिपोर्ट में समिति ने निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल रहे सैकड़ों प्रमुख लोगों से हुई बातचीत को रखा था. पाकिस्तान अभी भी इनकार करता रहा है पर दुश्मनों के पास से मिले अहम दस्तावेजों की कडिय़ों को जोड़कर उन घटनाओं का खाका तैयार किया गया जो इस अभियान के दौरान पाकिस्तान की ओर से हुई थीं. जो दस्तावेज बरामद हुए, वे समिति के सदस्यों को यह मानने के लिए पर्याप्त आधार देते थे कि पाकिस्तान के इस अभियान के शुरुआत से ही उसे विफल होना था. पहली बात, जिन युवा पाकिस्तानी अधिकारियों और सैनिकों को भेजा गया, उन्हें इस क्षेत्र की कोई विशेष सूचना नहीं थी.

घुसपैठ में केवल 100 किमी की सीमा में महज पांच से 9 किलोमीटर भीतर तक सीमित संख्या में जवानों (करीब 1,700) को लगाया गया था. यह संख्या क्षेत्र पर पकड़ बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं कही जा सकती. भू-भाग और मौसम को देखते हुए बड़ी सैन्य कार्रवाई को ज्यादा दिनों तक नहीं चलाया जा सकता.

मश्कोह सेक्टर में 12 एनएलआइ के कैप्टन हुसैन अहमद की डायरी से मिली जानकारी बहुत अहम है. 12 एनएलआइ ने फरवरी, 1999 में एलओसी को पार किया और इस बीच उनके कैंप को 25 फरवरी और 25 मार्च को दो हिमस्खलनों का सामना करना पड़ा जिसमें उन्होंने अपने 11 जवान और एक सिपाही गंवा दिया. इगलू (हिम तंबू) में रहने के दौरान 'भयानक प्यास' का भी एक संदर्भ डायरी में मिलता है. मश्कोह घाटी में भारत की ओर से कम से कम आठ हवाई टोही मिशन की बात भी लिखी है, जो उनका पता लगाने में विफल रहे. 12 अप्रैल को दर्ज एक नोट कहता है, ''मौसम सबसे क्रूरतम, सबसे कठोर और सबसे बुरा है. हम निराशा के चरम बिंदु पर हैं और हिम्मत जवाब दे रही है.'' और फिर पुख्ता सबूत का जिक्र आता है. ऑप केपी के षड्यंत्रकारी जनरल मुशर्रफ 28 मार्च को सेक्टर का दौरा करते हैं. वे इस रणनीति को ''1984 के भारत के सियाचिन आक्रमण का जबाव'' बताते हैं और 12 एनएलआइ के मुजाहिदों के बीच मिठाई बांटने के लिए 8,000 रुपए देते हैं.

2006 में जब मुशर्रफ ने अपना संस्मरण इन द लाइन ऑफ फायर जारी किया तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी सेना की भूमिका स्वीकार की और करगिल में जीत का दावा किया. जुलाई 2004 में इंडिया टुडे से खास बातचीत में नवाज शरीफ ने कहा था, ''करगिल में मारे गए सैनिकों की तादाद 1965 और 1971 की जंग में मारे गए सैनिकों की कुल संख्या से भी ज्यादा थी.'' इसका कोई आधिकारिक बयान नहीं है, कुछ लोग 2,700 कहते हैं तो कुछ इससे भी ज्यादा. सऊदी अरब में तब अपने निर्वासन के दौरान शरीफ ने सत्ता में वापस आने पर इसकी जांच का वादा किया था. लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं. नवंबर 2010 में मुशर्रफ के लंदन जाने के बाद फौज ने ऑप केपी में मरे 453 फौजियों की सूची अपलोड की. 

इस वर्ष 26 जुलाई को भारत करगिल जंग की 20वीं वर्षगांठ को विजय दिवस के रूप में मनाएगा, जिसमें 474 जवान शहीद हुए. 1947 में जम्मू-कश्मीर की लड़ाई और उसके बाद करगिल तक तीन युद्ध से लेकर मुंबई में 26/11, उड़ी और पुलवामा तक, पाकिस्तान के साथ अघोषित और घोषित युद्ध का एक लंबा सिलसिला चला आ रहा है. इसकी मानक संचालन प्रक्रिया या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) वैसा ही है है जैसा निक्सन-युग में राजनैतिक सलाहकार राजनेताओं को अपने परामर्श में कहते थे, ''कुछ भी स्वीकारें नहीं. हर चीज को झुठला दें. पलटकर खुद ही आरोप लगाने शुरू कर दें.''

यही एसओपी इस साल 26 फरवरी को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी प्रशिक्षण शिविर पर भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों के हमले के बाद उस इलाके में करीब दो महीने तक पाकिस्तानी सेना के डाले गए घेरे में भी दिखता है. बालाकोट की जुबा पहाड़ी पर बने शिविर को 10 अप्रैल को पाकिस्तानी सेना की सख्त निगरानी के बीच दौरे के लिए खोला गया. इसमें एक मदरसे के आसपास पत्रकारों और विदेशी मिलिटरी अताशे को लेकर जाया गया था. लेकिन उन्हें शिविर के अन्य हिस्सों में नहीं जाने दिया गया जहां जैश के आतंकी और उनके प्रशिक्षक रहते थे (भारतीय खुफिया विभाग को इस बात की जानकारी थी कि कैंप से सटा हुआ एक मदरसा भी है और भारतीय वायु सेना के विमानों को मदरसे पर बमबारी से बचने के निर्देश दिए गए थे).

'हर बात से इनकार करना' यह भी दर्शाता है कि 'भारतीय वायु सेना के दूसरे पायलट' को लेकर पाकिस्तान की ओर से किए गए प्रचार के बाद अचानक उस पर चुप्पी क्यों साध ली गई, जिसके बारे में पाकिस्तान प्रधानमंत्री इमरान खान तक ने दावा किया कि 27 फरवरी को भारत के दो पायलटों को पकड़ा गया था. (भारत का मानना है कि जिस दूसरे पायलट की बात पाकिस्तान कर रहा वह पाकिस्तानी वायु सेना के एफ-16 विमान का ही था जिसे मार गिराया गया). करगिल युद्ध में मारे गए अपने सैनिकों को स्वीकार करने में पाकिस्तान को 11 साल लग गए. बालाकोट में भारत की कार्रवाई को स्वीकार करने में वह पता नहीं कितना वक्त लेगा. पाकिस्तानी फौज सादी के उस शेर से सबक लेने के बजाए बिना कुछ सीखे ही बुढ़ा जाएगी.

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