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मौत की घाटी

कश्मीर घाटी में नौजवानों में घर कर गई पुख्ता अलगाव की भावना और जैश-ए-मोहम्मद के उभार से बेहद खतरनाक हालात

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असित जॉली और मुअज्जम मोहम्मद, श्रीनगर मेंश्रीनगर,दिल्ली, 27 February 2019
मौत की घाटी गेट्टी इमेजेज

जब तक 14 फरवरी की दोपहर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 40 जवानों को मृत्यु के घाट उतार देने का श्रेय लेने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल नहीं हुआ, आदिल अहमद डार के परिवार वाले उसे सी-कैटेगरी का उग्रवादी ही मान रहे थे. वे यही उम्मीद लगाए बैठे थे कि उनका लड़का समर्पण कर देगा और अपने चचेरे भाई तौसीफ अहमद की तरह जेल काटेगा. लेकिन, यह खबर आई तो इस परिवार के दक्षिण पुलवामा जिले में गंधीबाग गांव के लोग हैरान और सदमे में थे. 19 वर्ष के उस लड़के को जानने वाला हर कोई उसे ''शर्मिला और शांत" स्वभाव का बता रहा था.

साल भर पहले ही वह 12वीं की पढ़ाई छोड़कर जैश-ए-मोहम्मद के अफजल गुरु दस्ते (स्थानीय कश्मीरियों का दस्ता) में शामिल हो गया था. उसके दोस्त कहते हैं कि वह कभी-कभार ही खुलता था और ज्यादातर क्रिकेट की बातें ही करता था. घाटी में ऐसे अशांत माहौल में यह सुनकर कुछ हैरानी होती है कि आदिल भारतीय क्रिकेट टीम का फैन था और महेंद्र सिंह धोनी उसके हीरो थे.

लेकिन 2016 की गर्मियों में हिज्बुल मुजाहिदीन के 'करिश्माई' कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद आदिल कुछ बदल-सा गया था (जैसा कि पूरी घाटी में हुआ). इसका कुछ लेनादेना इससे हो सकता है कि वानी की मौत के बाद करीब महीने भर चले प्रदर्शनों के दौरान उसके पैर में गोली लगी थी और एसओजी (विशेष अभियान दस्ता) सुरक्षा बलों के हाथों बेहद अपमानित हुआ था. उसके चचा अब्दुल राशिद डार कहते हैं, ''2016 में आदिल स्कूल में ही पढ़ता था तभी एसओजी ने उससे नाक रगड़वाया था, जिसका खौफ उसके दिमाग में हमेशा बना रहा." अब्दुल राशिद के दो बेटे भी उग्रवादी बन गए थे. एक तो मारा गया और दूसरे ने हथियार से तौबा कर ली है. हकीकत चाहे जो हो, जैश में शामिल होने के 11 महीने बाद ही आदिल कट्टर उग्रवादी में बदल गया. जो लड़का परिवार की आमदनी बढ़ाने में हरसंभव मदद कर रहा था, वह ऐसा खूंखार फिदायीन बन गया, जैसा देश ने पहले कभी नहीं देखा था.

उस दिन आदिल (जैश के अपने साथियों के बीच 'वकास कमांडो') विस्फोटकों से भरी मारुति ईको वैन को लेकर जम्मू-श्रीनगर हाइवे पर लेठपोरा में सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही बस से जा भिड़ा. उसका निशाना कुछ ज्यादा ही बड़ा था. सीआरपीएफ के 78 गाडिय़ों के काफिले में 2,547 जवान थे. उनमें कई छुट्टियों से लौटे थे. आदिल ने जरूर एनएच-44 के इस खास हिस्से की एक-एक जानकारी बटोरी होगी और शायद कई बार अभ्यास भी किया हो सकता है. यह जगह कुछ सुनसान है और सड़क ऐसा तीखा मोड़ लेती है कि बड़ी गाडिय़ों को रफ्तार धीमी करनी पड़ती है. ऐसी जगह का चुनाव बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए ही किया गया था. अंजाम हुआ भी भीषण. 45 सीटों वाली सीआरपीएफ की बस थोड़े-से मलबे में बदल गई. उसमें बैठे जवानों के अवशेष करीब 200 मीटर में बिखरे पड़े थे. उस बस के आगे और पीछे की गाडिय़ों में बैठे पांच जवान श्रीनगर के सैनिक अस्पताल में मौत से जूझ रहे हैं.

जनवरी की शुरुआत से ही आतंकी गुटों ने श्रीनगर और दक्षिण कश्मीर के सुरक्षा बलों के ठिकानों और चेक पॉइंटों पर ग्रेनेड से कई हमले किए. लिहाजा, हाइवे के जवाहर सुरंग-श्रीनगर वाले हिस्से में चौकसी बढ़ा दी गई थी. लेकिन वरिष्ठ अधिकारी कबूल करते हैं कि वानी की मौत के बाद 2017 की शुरुआत में ही शुरू किए गए 'ऑपरेशन ऑल आउट्य में कुछ ''कामयाबियों" के बाद सुस्ती आ गई थी. उनका कहना है कि इस ऑपरेशन में 600 से अधिक उग्रवादियों का सफाया हो गया.

आदिल ने 10 मिनट के वीडियो में यह बात कबूली भी, जिसे जैश-ए-मोहम्मद ने वारदात के कुछ मिनटों बाद ही वायरल कर दिया. उसमें जैश-ए-मोहम्मद के झंडे के सामने एम4 कार्बाइन लेकर खड़ा आदिल कहता है, 'इस धोखे में न रहो कि हमारे कुछ कमांडरों को मारकर हमें खत्म कर दोगे. हम तुम्हारा चैन उड़ा देंगे."

आदिल का फिदायीन दस्ते में शामिल होना एक बेहद संगीन हालात की ओर इशारा करता है. हालांकि जैश-ए-मोहम्मद विस्फोटक भरे वाहनों (वीबीआइईडी) से घाटी में करीब सात हमले कर चुका है, लेकिन यह दूसरी बार ही है कि कोई स्थानीय नौजवान फिदायीन बना है. इसके पहले, अप्रैल 2000 में श्रीनगर के बादामीबाग में सेना के 15 कोर मुख्यालय के फाटक पर विस्फोटकों भरी मारुति कार के हमले में पुराने श्रीनगर के 17 साल के छात्र अशफाक शाह को फिदायीन बनाया गया था. अपने 'फिदायीन' वीडियो में आदिल ने शाह की सराहना की है.

उसी साल मसूद अजहर ने जैश-ए-मोहम्मद बनाया था. उसने फिर 25 दिसंबर, 2000 को दूसरी बार श्रीनगर के कैंटोनमेंट पर हमला किया. उस हमले में विस्फोटकों से भरी मारुति कार में ब्रिटेन के बरमिंघम के रहने वाला 24 साल के मोहम्मद बिलाल ने खुद को उड़ा लिया था. उस विस्फोट में सेना के पांच जवानों सहित 11 लोग मारे गए थे. लेकिन अजहर के बढ़ते दुस्साहस की मिसाल तो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 1 अक्तूबर, 2001 को कार बम से हमला था, जिसमें 38 लोग मारे गए थे. फिर उसी साल 13 दिसंबर को दिल्ली में संसद भवन पर हमला हुआ. इससे उस समय परवेज मुशरफ के नेतृत्व में पाकिस्तानी सत्ता-तंत्र ने उससे दूरी बना ली थी. दरअसल विधानसभा हमले पर घाटी में नाराजगी से पाकिस्तानी विदेश विभाग भी उसे 'दहशतगर्द वारदात' बताने को मजबूर हुआ था.

हालात 2003 से कुछ सुधरने शुरू हुए. उस समय जैश-ए-मोहम्मद को पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने दूर कर दिया था. जैश ने मुशर्रफ पर दो जानलेवा हमले किए थे. पाकिस्तान में लगाम लगने के बाद उसी साल इस गुट को दूसरा झटका घाटी में लगा जब बीएसएफ ने घाटी में इसके मुखिया शाहबाज खान उर्फ गाजी बाबा को श्रीनगर के वनीयार इलाके में मार गिराया. फिर, तो आइएसआइ की मदद के बिना जैश का घाटी से सफाया-सा हो गया. खुफिया सूचनाओं के जरिए सुरक्षा बलों ने गाजी के मारे जाने के दो साल के भीतर उसके पूरे कैडरों का सफाया कर दिया.

खुफिया अधिकारी कश्मीर में जैश के दोबारा पैर फैलाने की वड़ी वजह अगस्त 2016 में वानी के मारे जाने के महीने भर बाद दो बार आई घुसपैठियों की खेप को मानते हैं. उसके बाद उसने पटानकोट हवाई ठिकाने और उरी में सेना के ब्रिगेड मुख्यालय पर दुस्साहसिक हमला किया. खुफिया अधिकारी जैश के बढ़ते हमलों को आइएसआइ के हिज्बुल मुजाहिदीन और लश्कर को थोड़ा विराम देने की कोशिश की तरह देखते हैं. ऑपरेशन ऑल आउट में इन दोनों गुटों को काफी नुक्सान झेलना पड़ा है.

घाटी में जैश-ए-मोहम्मद 2017 में फिर आतंकी हमलों की मुख्य भूमिका में सक्रिय हो गया. नया स्थानीय कमांडर नूर मोहम्मद तांत्रे उर्फ नूर त्राली कई स्थानीय रंगरूटों की भर्ती करने में कामयाब हो गया. इन्हीं रंगरूटों में 16 साल का फरदीन मोहिउद्दीन और 21 साल का मंजूर बाबा भी था, जिसने 31 दिसंबर, 2017 को सीआरपीएफ शिविर पर फिदायीन हमला किया था. यह शिविर 14 फरवरी के घटनास्थल के करीब ही है.

लेकिन घाटी में पैर फैला लेने के बावजूद जैश को कई बड़े आतंकियों से हाथ धोना पड़ा. तांत्रे दिसंबर 2017 में मारा गया, उसकी जगह आया मुफ्ती वकास भी मारा गया. वकास पाकिस्तानी आतंकी था और उसने फरवरी 2018 में सुंजवान में सैन्य शिविर पर हमला किया था. वकास मार्च 2018 में मारा गया. विशेष सुरक्षा बल से मुठभेड़ में मारे गए दूसरे आतंकियों में अजहर के अपने भतीजे तल्हा राशिद और उस्मान इब्राहिम थे. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अजहर ने अपने भतीजों को 'कुर्बान' होने के लिए भेजकर संकेत दिया कि वह पीछे हटने वाला नहीं है.

अधिकारियों का मानना है कि ऐसी मिसाल आदिल डार जैसे कश्मीरी युवाओं में भावनात्मक उबाल पैदा करने के काम भी आई हो सकती है. दरअसल, जैश-ए-मोहम्मद का ऑनलाइन साप्ताहिक अलकलाम लगातार घाटी के नौजवानों को अफजल गुरु के 'मिशन' की याद दिलाता रहता है.

जैश की मौजूदा सक्रियता में तेजी पिछले साल के अंत में गाजी अब्दुल राशिद अफगानी के घाटी में पहुंचने से आई. अजहर का खासमखास गाजी अफगानिस्तान में तालिबान युद्ध का लड़ाका है. खुफिया सूचनाओं के मुताबिक तीसेक साल का गाजी जम्मू में पीरपंजाल की पहाडिय़ों के रास्ते दो दूसरे लड़ाकों के साथ घुसा था. पुलिस के मुताबिक, बाद में उससे नौ और भी बेहद प्रशिक्षित और कट्टर लड़ाके आ जुड़े.

इसी गुट से पुलवामा हमले के तीन दिन बाद घटनास्थल से 12 किमी दूर पिंगलिना में मुठभेड़ हुई थी. इस गोलीबारी में एक मेजर सहित चार सैनिकों और जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सिपाही की मौत हो गई थी. ब्रिगेडियर हरवीर सिंह और दक्षिण कश्मीर के पुलिस डीआइजी अमित कुमार सहित नौ लोग घायल हुए. सेना के सूत्र इसे 2017 में शुरू किए गए ऑपरेशन ऑल आउट के बाद यह सबसे 'मुश्किल मुठभेड़' थी. इसमें तीन आतंकी मारे गए जिसमें जैश का कमांडर राशिद और उबैद के अलावा एक स्थानीय आतंकी हिलाल अहमद नाइक मारा गया. शुरू में मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि गाजी मारा गया लेकिन सूत्रों ने बताया कि यह खबर सही नहीं थी.

परेशानी यह भी है कि गाजी के बारे में बहुत कम जानकारी है और जैश की रणनीति में भी बदलाव के संकेत हैं. कथित तौर पर बम बनाने में माहिर गाजी एकदम जरूरी न होने पर विशेष पुलिस बल से टकराना नहीं चाहता. उसने यहां पहुंचने के बाद सोशल मीडिया पर नए रंगरूटों की तस्वीर डालने का तरीका भी बंद कर दिया है. फिर भी, अपना 'दुस्साहस' दिखाने के लिए जैश ने गाजी की तस्वीरें डालीं. इसके साथ कैप्शन में चेताया गया है कि 2019 भारत के लिए 'सबसे मारक' साल होने वाला है.

फिदायीन हमलों की शुरुआत 1980 के दशक में लेबनान में हिज्बुल्लाह ने की थी. बाद में मिस्र के धर्म-गुरु युसूफ अल-करदावी ने इज्राएल के खिलाफ जंग में इस तरीके को जायज ठहराया तो फिलस्तीन में हमास ने इसे फौरन अपना लिया. हालांकि 1980 के दशक के आखिर में यह मुद्दा अल कायदा में विवाद का विषय भी बना. अल कायदा के संस्थापक सदस्य अब्दुल्लाह अज्जाम जेहाद के तरीके के तौर पर फिदायीन बम धमाके को अपनाने के मामले में ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी से असहमत थे. ऐन इसी वजह से 1987 में अफगानिस्तान में अज्जाम, हाफिज सईद और जफर इकबाल द्वारा बनाया गया लश्कर फिदायीन हमले को खारिज करता रहा है. उसके बावजूद लश्कर फिदायीन लड़ाकों को रवाना करता रहता है.

रॉ के पूर्व प्रमुख ए.एस. दुलत कहते हैं कि मौजूदा संकट का हल यही है कि कश्मीर और पाकिस्तान से बातचीत शुरू की जाए.

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