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'नया कश्मीर' की नई इबारत

मोदी सरकार ने कश्मीर की राजनैतिक यथास्थिति को पूरी तरह से बदल दिया, लेकिन क्या इसे अंजाम तक पहुंचा पाएगी?  

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aajtak.in
राज चेंगप्पा नई दिल्ली, 04 September 2019
'नया कश्मीर' की नई इबारत शांति या सन्नाटा? श्रीनगर की ऐतिहासिक डल झील पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का सशस्त्र पहरा

चमचमाते हरे-भरे पहाड़ों के बीच शान से पसरी डल झील कश्मीर का दिल भी है और रूह भी. हरेक अगस्त में यह नए जोश और जिंदगी से भर उठती है; इसके किनारों पर सेल्फी लेते सैलानियों का मेला लग जाता है; दिलकश नजारों से मोहित तमाशबीनों से लदे दर्जनों शिकारे पानी पर तैरने लगते हैं; भुने हुए भुट्टे और मटन टिक्का बेचने वालों की चोखे कारोबार से बांछें खिल जाती हैं. इस अगस्त में अलबत्ता ऐसा कुछ नहीं हुआ.

यह शनिवार की खिली हुई सुबह है. मोदी सरकार के संविधान के अनुच्छेद 370 को बेमानी करने के दूरगामी फैसले को 19 दिन हो चुके हैं, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को 70 साल से विशेष दर्जा हासिल था. डल झील और उसके आसपास की वादियां वीरान पड़ी हैं. किनारों के नजदीक खाली शिकारे एक-दूसरे से रस्सियों से बंधे हैं और शिकारे वाले नदारद हैं. दो-एक लोग झील के किनारे अपना कांटा डाले बैठे हैं, इस उम्मीद में कि शायद कोई मछली फंस जाए. एक शिकारे पर बैठा एक कश्मीरी युगल भी यही कर रहा है, औरत पैडल चला रही है और आदमी जाल बिछाने के लिए पानी में झुका हुआ है. झील के चारों तरफ पक्के फुटपाथ पर छिटपुट जॉगर्स धीमे कदमों से दौड़ रहे हैं, जबकि बंदूकधारी पहरेदार रेत के बोरों से बने बंकरों के पीछे से चौकसी कर रहे हैं.

यह शांति धोखादेह है. दूरसंचार सुविधाएं पूरी तरह बंद हैं (हालात को संभालने में जुटे सरकारी अफसरों को छोड़कर). आम लोगों की आवाजाही पर पाबंदियां हैं. ऐसे में कही-सुनी बातों के आधार पर घाटी के 69 लाख लोगों के मिजाज को भांप पाना मुश्किल है. दुकानों के शटर गिरे हैं, पर उनके मालिक चोरी-छिपे सामान बेच रहे हैं. मसलन, एक बेकरी बगल के दरवाजे से चोखा कारोबार कर रही है, यहां ताजा ब्रेड और केक के लिए ग्राहकों की कतार लगी है. बाशिंदे निजी कारों में आते हैं और छिटपुट सब्जी बेचने वालों के नजदीक आकर रुक जाते हैं. इन दुकानदारों ने कामचलाऊ दुकानें लगा ली हैं और उनमें किराने का सामान भी रख लिया है.

शाम होते-होते प्रमुख सचिव तथा जम्मू-कश्मीर सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल राहत की सांस लेते दिखाई देते हैं कि पूरे दिन हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई. वे एक और अहम बात कहते हैं, हकीकत में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले की वजह से गंभीर घायलों या मौतों की एक भी रिपोर्ट नहीं है. वे स्वीकार करते हैं कि सड़कों पर विरोध प्रदर्शन की अलग-अलग किस्म की 131 घटनाएं हुई हैं, पर वे यह भी साफ कर देते हैं कि इनमें से सौ घटनाएं श्रीनगर में हुईं—जहां घाटी की महज 17 फीसद यानी 11.8 लाख आबादी रहती है—और ग्रामीण कश्मीर का ज्यादातर हिस्सा घटनाओं से मुक्त रहा है.

इस बीच, घाटी के आधे से ज्यादा पुलिस थानों ने दिन के वक्त आवाजाही पर लगी पाबंदियों में ढील दे दी है. पिछले एक पखवाड़े में लोगों ने एटीएम से 800 करोड़ रुपए निकाले हैं. बकौल कंसल, यह इशारा है कि आम आदमी के लिए ''अर्थव्यवस्था के पहिए लगातार घूम रहे हैं.'' उनके साथ राज्य के दूसरे अहम अफसर भी मानते हैं कि ये सारे कारक साफ-साफ संकेत हैं कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने का मोदी सरकार का फैसला योजना के मुताबिक आगे बढ़ रहा है.

फिर भी बड़ा सवाल जस का तस खड़ा है. कश्मीर के भविष्य के लिए मोदी सरकार का गेमप्लान क्या है? इस फैसले पर अमल के लिए उसने यही मौका क्यों चुना? पाबंदियां हटा लेने के बाद घाटी पर क्या असर होगा? आगे बड़ी चुनौतियां क्या हैं? इंडिया टुडे ने घाटी और दिल्ली में फैसला लेने वाले लोगों और स्वतंत्र विशेषज्ञों से भी बातचीत की. उनका आकलन आंखें खोलने वाला है.

कश्मीर का गेमप्लान

अनुच्छेद 370 को बेमानी करने का मोदी सरकार का दुस्साहसी फैसला यथास्थिति को आमूलचूल बदल देता है और उस मुद्दे से निबटने का एक बिल्कुल नया अफसाना गढ़ता है, जो बंटवारे के बाद से ही पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में गले की हड्डी बना हुआ था. इसमें कोई शक नहीं कि यह जम्मू-कश्मीर के बारे में किसी भी केंद्र सरकार का सबसे अहम फैसला है, तभी से जब जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने 1949 में राष्ट्रपति के आदेश के जरिए राज्य को विशेष दर्जा दिया था. सीधे कहें, तो अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को अपने संविधान, अपने झंडे और आंतरिक प्रशासन में पूर्ण स्वायत्तता की इजाजत दी थी, केवल रक्षा, विदेश नीति और संचार को छोड़कर, जो केंद्र सरकार के नियंत्रण में छोड़ दिए गए थे.

अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही अनुच्छेद 370 को पलटकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके वैचारिक ध्वजवाहक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ''एक राष्ट्र, एक संविधान'' की अहम मांग पूरी कर दी है. उन्होंने अपने इस फैसले पर संसद की मोहर भी लगवा ली. यहां तक कि राज्यसभा से भी यह विधेयक पारित करवा लिया, जहां भाजपा के पास बहुमत नहीं है. ऐसे में मोदी यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने एक किस्म की राजनैतिक सर्वानुमति हासिल कर ली है और उन सबके लिए, खासकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के एक हिस्से के लिए, दरवाजे बंद कर दिए हैं जो घाटी को पाकिस्तान के साथ मिलाने या आजादी की मांग कर रहे थे.

नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) सरीखी मुख्यधारा की पार्टियां जहां उम्मीद कर रही थीं कि वे भारतीय राज्य से और ज्यादा स्वायतत्ता हथिया लेंगी, वहीं मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर का दर्जा घटाकर उसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया है और उसे सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में ले आई है. ये नेता जब गिरफ्तारी और उससे उपजी खामोशी से बाहर आएंगे, तब उनकी हालत यह हो चुकी होगी कि वे जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा जल्दी से जल्दी बहाल करने की गुहार लगाएंगे, जिस पर विचार करने की बात केंद्र सरकार कह चुकी है.

इस बीच केंद्र सरकार इस मौके का इस्तेमाल परिसीमन को अंजाम देने के लिए करेगी और इस तरह उस असंतुलन को दूर कर देगी जिसकी बदौलत घाटी के नुमाइंदों को विधानसभा में वर्चस्व और दबदबा हासिल था. यही नहीं, इसे केंद्रशासित प्रदेश बनाकर सरकार ने इस संभावना को भी जड़ से खत्म कर दिया है कि राज्य विधायिका उसके खिलाफ कोई कदम उठा सके. मोदी ने यह संकेत भी दिया है कि वे राज्य के मौजूदा सियासी नेताओं को अप्रासंगिक बना देंगे और ऐसा वे नए केंद्र शासित प्रदेश की बागडोर जमीन से जुड़े नेताओं की नई पीढ़ी को सौंप कर करेंगे. ये नए नेता ही 'नया कश्मीर' के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे. मोदी सरकार ने राज्य का आकार भी छोटा कर दिया है और लद्दाख को अलग करके उसे पृथक केंद्रशासित प्रदेश बना दिया है—लेह के लोगों ने इसका स्वागत किया है, भले करगिल ने ऐसा न किया हो.

कश्मीर को लेकर भारत के साथ तीन जंग लड़ चुके पाकिस्तान के लिए मोदी ने साफ कर दिया है कि बंटवारे का कोई बचा हुआ अधूरा काम है, तो वह जम्मू-कश्मीर नहीं, बल्कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में यह बात जोर देकर कही भी. भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर (जिसे इस्लामाबाद लगातार मूल मुद्दा बताता रहा है) की स्थिति पर भारत के साथ बातचीत की पाकिस्तान की किसी भी कोशिश को भविष्य में नामंजूर कर दिया जाएगा, क्योंकि भारतीय संघ के साथ राज्य का एकीकरण अंतिम और अटल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहित अंतरराष्ट्रीय नेताओं को मोदी ने दोटूक कह दिया है कि कश्मीर की स्थिति भारत का आंतरिक मामला है, इस विषय में पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते द्विपक्षीय हैं और वह किसी भी किस्म की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेगा.

तो, क्या मोदी ने इतनी पक्की तैयारियां की हैं कि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी छानबीन का सामना करने के अलावा राज्य की आंतरिक अशांति और सीमा पार से किए गए आतंकी हमलों सहित तमाम मुमकिन अड़चनों को कामयाबी से पार करते हुए कश्मीर के अपने गेमप्लान को अंजाम तक पहुंचा पाएगी? इस सवाल का जवाब बहुत कुछ इस बात में छिपा है कि यह गेमप्लान कैसे तैयार किया गया और इसके लिए क्या-क्या जमीनी तैयारियां की गईं और आने वाले दिनों और महीनों में मोदी सरकार क्या करेगी.

इस तरह बनी योजना

भाजपा और आरएसएस ने अनुच्छेद 370 और 35ए (जो कहता है कि जम्मू-कश्मीर के अस्थायी बाशिंदे राज्य में जमीन नहीं खरीद सकते और न ही जमीन मालिक हो सकते हैं) को लेकर अपनी मंशा दशकों पहले साफ कर दी थी. मगर इसके गेमप्लान को मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के आखिरी साल में ही अंजाम देना शुरू हुआ.

मोदी ने शुरुआत में जम्मू-कश्मीर की राजनैतिक पार्टियों के साथ मिलकर काम करके और पाकिस्तान के साथ बातचीत करके अटल बिहारी वाजपेयी के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश की. दिसंबर 2014 के विधानसभा चुनाव से जब खंडित जनादेश आया, तब उन्होंने भाजपा को नरम अलगाववादी पार्टी मानी जाने वाली पीडीपी के साथ हाथ मिलाने और राज्य में गठबंधन सरकार बनाने की इजाजत दी. दोनों पार्टियों ने गठबंधन का एजेंडा तैयार किया और पीडीपी के नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मार्च 2015 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उसी साल श्रीनगर की यात्रा में मोदी ने राज्य के विकास के लिए 80,000 करोड़ रुपए के विशेष पैकेज का ऐलान किया.

एक जनसभा में प्रधानमंत्री ने कहा कि वे राज्य के लिए 'कश्मीरियत, जम्हूरियत और इनसानियत' के वाजपेयी के रास्ते पर चल रहे हैं और यह भी कि ''कश्मीरियत के बिना हिंदुस्तान अधूरा है.'' मोदी ने तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की तरफ भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया. इसी की खातिर उन्होंने पहले मई 2014 में शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया और फिर उनकी नातिन की शादी में शामिल होने के लिए दिसंबर 2015 में अचानक लाहौर पहुंच गए.

उनकी ये दोनों ही पहल निष्फल साबित हुईं. मोदी के लिए यह मायूसी और नाखुशी की बात थी. राज्य सरकार के कार्यकाल के ऐन बीचोबीच पीडीपी और भाजपा के बीच मतभेदों पर सुलह की गुंजाइश खत्म हो गई. ये मतभेद कई मुद्दों पर थे, जिनमें पंचायत चुनाव करवाना और उग्रवादियों तथा अलगाववादियों से पीडीपी का नरमी और ढिलाई से निबटना भी शामिल था. पीडीपी ने पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थियों की समस्या के समाधान से भी हाथ खींच लिए.

बंटवारे के बाद राज्य में बसाए गए करीब 55,000 परिवारों को, जिनमें ज्यादातर हिंदू हैं, नागरिकता नहीं दी गई थी, जिसकी वजह से वे न तो जमीन खरीद पा रहे थे और न सरकारी नौकरियों के लिए अर्जी दे पा रहे थे. इससे भी बदतर यह कि जब जुलाई 2016 में उग्रवाद का पोस्टर बॉय बुरहान वानी सुरक्षा बलों के हाथों मारा गया और विरोध प्रदर्शन फूट पड़े, तब सरकार उन्हें काबू करने में नाकाम रही. इसके नतीजतन होने वाली हिंसा में 96 से ज्यादा लोग मारे गए, हजारों घायल हुए और राज्य में महीनों कामकाज ठप रहा. भाजपा ने तभी समर्थन वापस लेने का इरादा कर लिया था, पर वह महबूबा को शहीद बनने का मौका नहीं देना चाहती थी.

इस बीच, सितंबर 2016 में उड़ी के आंतकी हमले और उसमें 19 सैनिकों के मारे जाने के बाद पाकिस्तान से रिश्ते टूट गए. मोदी ने सेना को नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान की सरजमीन पर मौजूद आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक की इजाजत देकर पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को भौचक कर दिया.

प्रधानमंत्री ने 2019 के आम चुनाव से महीने भर पहले इशारा किया कि कश्मीर में उनकी कोशिशें बंद गली में पहुंच गई हैं और वे इसे लेकर आमूलचूल बदलाव का मंसूबा बना रहे हैं, जिसे अगर वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर दोबारा चुनकर आए तो अंजाम तक पहुंचाएंगे. एक टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा था, ''पीडीपी के साथ गठबंधन एक प्रयोग था. मुफ्ती साहब के वक्त यह ठीक से काम कर रहा था. जब महबूबा जी आईं (जनवरी 2016 में मुफ्ती की मौत के बाद) हमने उन्हें भी वही समर्थन दिया.

मगर जब पंचायत चुनाव करवाने की बात आई, तो वे इसे टालती रहीं, यह कहकर कि इससे इलाके में हिंसा भड़क उठेगी. उन्होंने दो-तीन महीनों तक कदम आगे नहीं बढ़ाया, जिसकी वजह से राज्य में राज्यपाल शासन लगाना पड़ा.'' मोदी ने उस वक्त यह भी कहा था, ''कश्मीर में समस्या मोटे तौर पर 50 राजनैतिक परिवारों की वजह से है. वे इस मुद्दे का फायदा उठा रहे हैं. वे नहीं चाहते कि आम कश्मीरियों को कोई फायदा दिया जाए. लोग ऐसे राजनैतिक परिवारों से आजादी चाहते हैं जो 50 साल से उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. कश्मीर में स्थिति ऐसी है कि लोग बदलाव चाहते हैं, चाहे वह अनुच्छेद 35ए हो या 370.''

इस दिशा में पहला कदम बहुत पहले जून 2018 में ही उठा लिया गया था, जब भाजपा ने पीडीपी के साथ अपनी गठबंधन सरकार से पिंड छुड़ाने और राज्यपाल शासन लगाने का फैसला किया था. उसी से वह बुनियाद बनी, जो 5 अगस्त, 2019 को सामने आया.

बुनियाद का काम

एन.एन. वोहरा के दूसरा कार्यकाल पूरा करने के बाद अगस्त 2018 में उत्तर प्रदेश के मिलनसार राजनीतिक सत्यपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया. उनकी सहायता के लिए मुख्य सचिव के पद पर बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम को लाया गया, जो छत्तीसगढ़ में इसी पद पर काम कर रहे थे और सख्त तथा खरे कामकाजी अफसर के तौर पर जाने जाते हैं.

वीरप्पन का सफाया करने के लिए मशहूर और उग्रवाद से निबटने के लंबे तजुर्बे से लैस सेवानिवृत्त आइपीएस अफसर के. विजय कुमार को सुरक्षा मुद्दों पर राज्यपाल का सलाहकार बनाया गया. मलिक और उनकी टीम को अच्छा राजकाज पक्का करने, उग्रवादियों पर कड़ी कार्रवाई करने और कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने का काम सौंपा गया. चार और सलाहकार—के.के. शर्मा, खुर्शीद गनई, स्कंदन कृष्णन और फारूक खान—नियुक्त किए गए और अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गईं.

नया प्रशासन राज्य की गिरती हालत देखकर चौंक गया था. पहचान जाहिर न करने की शर्त पर एक विशेषज्ञ ने कहा, ''यह सरपरस्तियों पर खड़ा भ्रष्ट ढांचा था—सरकारी नौकरियों की भर्ती में घोटाले होते थे, पहले सरकार चलाने वाले कई नेता अलगाववादियों की जेबें भरते थे और केवल कुछ ही संस्थाएं थीं जहां कानून की हुकूमत चलती थी. लोकतंत्र के नाम पर यह ढकोसला था और राज्य ढहने के कगार पर था.'' कश्मीरी युवाओं को लगातार कट्टर बनाए जाने को लेकर भी गहरी चिंता थी. खासकर ज्यादा उग्र तबकों की वित्तीय मदद से चलने वाली मस्जिदें और मदरसे पिछले 15 साल में बढ़कर दोगुने हो गए थे.

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