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आखिर विक्रम के कदम कहां लडख़ड़ाए

यह दुर्घटना लैंडर के उस परिवर्तन चरण के दौरान हुई जिसे चंद्रमा पर उसे उतारने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए प्रोग्राम किया गया था. यह ऐसा प्रोग्राम था जिसका परीक्षण इसरो ने पहले कभी नहीं किया और उसमें अनगिनत आशंकाएं थीं.

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aajtak.in
राज चेंगप्पा नई दिल्ली, 16 September 2019
 आखिर विक्रम के कदम कहां लडख़ड़ाए चंद्रमा पर उतरने के पल

विक्रम पर बहुत कुछ दांव पर लगा था लेकिन 7 सितंबर को देश का चंद्रमा लैंडर चंद्रमा की सतह पर जाकर उकड़ू बैठ गया तो मानो किसी रहस्यमय तरीके से सब धुल गया. उस पर कॉम्पैक्ट रोवर प्रज्ञान था, जिसके पहियों पर देश का राष्ट्रीय प्रतीक अंकित था, जिसे चंद्रमा पर भारत की उपस्थिति की एक स्थायी पहचान दर्ज करानी थी. अगर लैंडर, जिसका नाम देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया था, सफल हो गया होता तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की 50वीं वर्षगांठ समारोह का बेहतर समापन होता. इससे दुनिया में यह संदेश भी गया होता कि भारत अब अंतरिक्ष अनुसंधान के युग में है और अमेरिका, तत्कालीन सोवियत संघ और चीन के बाद चंद्रमा पर आसान लैंडिंग करने वाला चौथा देश बन गया है. संयोग से नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के सौ दिन भी पूरे हो रहे थे.

किसी और से अधिक, इसरो के चेयरमैन कैलासावादिवू सिवन यह बखूबी समझते थे कि राष्ट्रीय आकांक्षाओं के साथ इस विशेष अंतरिक्ष कार्यक्रम को जोडऩे में किस स्तर का जोखिम छुपा हुआ है. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''रॉकेट साइंस में, हमेशा बहुत कुछ अनजाना होता है.'' (देखें बातचीत). 1958 के बाद से 109 चंद्र अभियानों में से, केवल 61 यानी आधे से थोड़े अधिक ही सफल रहे हैं. चंद्रयान-2 की तरह 46 मिशनों की सॉफ्ट लैंडिंग की योजना बनाई गई थी लेकिन उनमें से केवल 21, यानी आधे से थोड़े कम, सफल रहे थे.

इसरो ने 2008 में चंद्रमा का चक्कर लगाने के लिए एक ऑर्बिटर, चंद्रयान-1 को भेजने के अपने पहले प्रयास में कामयाबी हासिल की थी और चंद्र की सतह पर उपकरणों के दुर्घटनाग्रस्त होने के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां भी जुटाई थीं. इससे पहले कि वह टूटकर गिरता, उसने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की मौजूदगी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां भेज दीं. इसके बाद इसरो ने 2014 में अपने पहले ही प्रयास में मंगल की परिक्रमा के लिए मंगलयान भेजकर दुनिया को चौंका दिया.

मंगलयान 24 सितंबर को इस लाल ग्रह की कक्षा में पांच साल पूरा करेगा और डेटा वापस भेजना जारी रखेगा. लेकिन इन सभी सफलताओं के बावजूद, चंद्रमा की सतह से जुड़ी अहम जानकारियां जुटाने के लिए चंद्रमा पर एक रोवर की सॉफ्ट-लैंडिंग कराने के साथ बहुत-सी नई चुनौतियों से मुकाबले के लिए जटिल प्रौद्योगिकी की जरूरत होती है जिसमें इसरो को महारत हासिल करनी थी. इसलिए देशभर में चंद्रमा पर लैंडिंग को लेकर बनी उत्तेजना को देखते हुए अंतरिक्ष कार्यक्रमों के अनुभवी सिवन ने भविष्यवाणी कर दी थी कि अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए विक्रम का चंद्रमा की कक्षा से उसके सतह पर उतरने का चरण '15 मिनट का आतंक' भी हो सकता है.

दुर्भाग्य से सिवन और इसरो के लिए, उनकी आशंकाएं सही साबित हुईं. बेंगलूरू स्थित मिशन ऑपरेशंस कॉम्प्लेक्स में इसे देखने के लिए प्रधानमंत्री के उपस्थित होने के साथ, वे 15 मिनट निराशा और विषाद में समाप्त हो गए. अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का 12वें मिनट में विक्रम के साथ संपर्क तब टूट गया, जब यह चंद्रमा की सतह से मात्र 2.1 किमी ऊपर महत्वपूर्ण युक्तिपूर्ण टास्क पूरा कर रहा था और इसके बाद क्या हुआ, इसका कुछ पता नहीं है. हालांकि इसरो ने 10 सितंबर को घोषणा की कि चंद्रयान-2 ऑर्बिटर ने चंद्रमा की सतह पर विक्रम को खोज लिया है और उसकी तस्वीर खींची है, लेकिन इसको लेकर वह बहुत उत्साहित नहीं है.

चंद्रमा की सतह पर विक्रम का पता लगा लिए जाने के बारे में पूछे जाने पर, सिवन ने इंडिया टुडे से कहा, ''इसका कोई खास मतलब नहीं है. हम इसके साथ किसी भी प्रकार का संचार स्थापित नहीं कर पाए हैं और जब तक हम ऐसा नहीं कर पाते, इसका कोई अर्थ नहीं है.'' इससे भी महत्वपूर्ण, सिवन ने यह कहा कि वैज्ञानिक अभी भी विवरणों का विश्लेषण कर रहे हैं और अभी तक कोई जवाब नहीं है कि लैंडर के साथ आखिर क्या गड़बड़ी हुई.

तो, जो विक्रम ने लैंडिंग के आखिरी चरणों के अंतिम तीन मिनटों में ऐसा विचित्र व्यवहार क्यों किया, जिसने इस मिशन को खत्म कर दिया? एक आधिकारिक विफलता-विश्लेषण समिति कारणों की जांच में जुटी है, इंडिया टुडे ने कई अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से बात की और यह समझने की कोशिश की कि भारत के इस प्रतिष्ठित लैंडर में क्या गड़बड़ी हुई हो सकती है.

उतार-चढ़ाव वाली शुरुआत

यहां विक्रम के इतिहास के बारे में थोड़ी जानकारी से यह समझने में मदद मिल सकती है कि क्यों चंद्रमा पर किसी लैंडर को उतारना जटिल कार्य है और क्यों इस तरह के हर दो मिशन में से एक असफलता के साथ समाप्त होता है. भारत ने शुरुआत में अपने दम पर चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के प्रयास की योजना नहीं बनाई थी. स्वदेश निर्मित चंद्रयान-1 ऑर्बिटर के लॉन्च होने से पहले ही, इसरो ने फैसला किया था कि वह चंद्रयान-2 मिशन को सफल बनाने के लिए रूस की फेडरल स्पेस एजेंसी (रोस्कोस्मोस) की मदद और अनुभव का उपयोग कर सकता है और नवंबर 2007 में इसके लिए एक करार पर हस्ताक्षर भी किए गए. भारत-रूस के इस साझा चंद्र मिशन समझौते के तहत इसरो की मुख्य जिम्मेदारी ऑर्बिटर बनाने की थी जबकि लैंडर और रोवर रूस को बनाना था. 2012 में प्रक्षेपण की योजना बनाई गई थी. हालांकि इसरो तय समय पर ऑर्बिटर के साथ तैयार था, रोस्कोसमोस ने दिसंबर 2011 में समझौते से हाथ खींच लिया.

रोस्कोस्मोस ने ऐसा चीनी अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से मंगल ग्रह के एक चंद्रमा पर अपना लैंडर और रोवर उतारने के फोबोस-ग्रंट मिशन के विफल हो जाने के कारण किया था. इसरो ने तब फैसला किया कि वह खुद लैंडर और रोवर का निर्माण करेगा और उसे 2016 तक चंद्रमा पर उतारेगा. इस बीच, संगठन ने मंगलयान के लिए ऑर्बिटर को फिर तैयार किया, इसे रिकॉर्ड समय में पूरा किया.

लॉन्चर और उपग्रहों के निर्माण में इसरो के भारी अनुभव के बावजूद, इसरो को जल्द ही समझ आ गया कि लैंडर और रोवर को डिजाइन करना और विकसित करना बहुत ही जटिल कार्य है. इसरो के यू.आर. राव सैटेलाइट सेंटर के पूर्व निदेशक और पिछले साल तक ग्रहों के मिशन के प्रभारी एम. अन्नादुरै के अनुसार, ''चंद्रमा पर ऑर्बिटर भेजना एक बात है, जैसा कि हमने चंद्रमा पर एक महत्वपूर्ण अनुसंधान के लिए चंद्रयान-1 भेजा या फिर मंगल पर ऑर्बिटर भेजा.

लेकिन परिक्रमा करने वाले अंतरिक्ष यान को नीचे लाना और उसे धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित उतार देना कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण है.'' इसरो को लैंडर के उतरने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले लचीले प्रणोदन तंत्र बनाने और अंतरिक्ष यान को चंद्रमा के सतह पर पूर्व-निर्धारित स्थान पर उतरने के लिए मार्गदर्शन करने वाली नियंत्रण प्रणाली, इन दोनों प्रौद्योगिकियों में महारत हासिल करने की जरूरत है. ये दोनों प्रौद्योगिकियां पिछले पांच वर्षों में विकसित की गई हैं और विक्रम मिशन के समयपूर्व समाप्ति के बाद इन दोनों प्रौद्योगिकियों की ही सफलता पर सबसे ज्यादा संदेह है.

लैंडिंग की योजना

4 सितंबर को ऑर्बिटर चंद्रयान-2 से अलग होने के बाद, विक्रम चंद्रमा की सतह से 30 किमी की ऊंचाई पर 1,680 मीटर प्रति सेकंड (या 6,048 किमी प्रति घंटे, किसी कमर्शियल जेट की गति से छह गुना) की गति से परिक्रमा कर रहा था. 13 मिनट के भीतर उस वेग को, नियंत्रित चरण में कम करते हुए नीचे लाया जाना था, जो सतह पर पहुंचते समय लगभग शून्य हो जाता. लैंडर ऐसा पांच रॉकेट इंजनों और आठ छोटे कंट्रोल थ्रस्टर्स की मदद से करता, जो उसके तल में फिट किए गए थे और जिसे इसरो ने खास तौर से इस मिशन के लिए विकसित किया था. इंजनों को थ्रॉटल-सक्षम इंजन के रूप में डिजाइन किया गया था, जिसके दबाव को उसमें प्रवाहित होने वाले ईंधन के प्रवाह को रोककर नियंत्रित किया जाता है, बिल्कुल वैसे ही जैसा कार में लगे एक्सीलरेटर से गति को नियंत्रित किया जाता है.

चंद्रमा पर लैंडिंग की जटिलताओं को देखते हुए नियंत्रण और मार्गदर्शन प्रणाली भी विकसित की गई थी. पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी 3.84 लाख किमी होने के कारण मिशन के पृथ्वी पर स्थित नियंत्रण कक्ष से कोई भी निर्देश भेजने में एक सेकंड से थोड़ा अधिक समय लगता है, और यान के कमांड से उसके बारे में डेटा वापस भेजने में भी एक सेकंड और लग जाता है. विक्रम के चंद्रमा की सतह पर तेजी से उतरने के दौरान निर्णय मिलिसेकंड्स के अंतराल में लेने पड़ते, इसलिए इसरो ने ऑटोनोमस मार्गदर्शन और नियंत्रण प्रणाली विकसित की थी, जो 15 मिनट की उड़ान के दौरान सभी संभावित स्थितियों और विसंगतियों का ध्यान रखे.

चंद्रमा की सतह के परिप्रेक्ष्य में यान को अपने वेग, ऊंचाई, मुद्रा, दिशा और स्थिति की निगरानी के लिए अत्यधिक सटीक माप उपकरणों से सुसज्जित किया गया था, जिससे विक्रम में लगा ऑनबोर्ड कंप्यूटर वास्तविक समय में निर्णय लेने में सक्षम हो. यान के नियंत्रण और प्रणोदन प्रणाली की डिजाइन में भी यह ध्यान रखा गया था कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का छठा भाग है. चंद्रमा के अनियमित गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप परिस्थितियां तैयार करके इन दोनों प्रणालियों का परीक्षण किया गया था.

बड़ा परिवर्तन

दो साल पहले ही तैयार सतह पर उतारने की इसरो की नई योजना पर भी निगाहें जमी थीं. लैंडर को डिजाइन करते समय, इसरो के वैज्ञानिकों ने शुरू में पांच के बजाए केवल चार इंजनों के साथ काम करने का फैसला किया था. इस कन्फिग्रेशन में, इंजन और गाइडेंस कंट्रोल सिस्टम (नियंत्रण प्रणाली) को धीरे-धीरे गति और ऊंचाई को घटाते हुए चंद्रमा की सतह से लगभग 10 मीटर ऊपर लेकर आना था. लेकिन तब यह चिंता पैदा हुई कि चंद्रमा की सतह से इतनी कम दूरी पर होने से इंजन थ्रस्टर्स, चंद्रमा पर धूल का भारी गुबार उड़ा सकता है जिसमें यान ढक जाएगा और उसके महत्वपूर्ण उपकरणों को नुक्सान पहुंचाएगा. इसके बाद इसरो ने सभी चार इंजनों को बंद करने की योजना बनाई और इसके बजाए यान के चार पैरों को मजबूत करने पर जोर दिया ताकि उस ऊंचाई से वह खुद गिरे और लैंडर या रोवर को कोई नुक्सान भी न हो. जनवरी 2018 में इस लॉन्च का समय निर्धारित किया गया था.

इस बीच, एक लैंडर को चार इंजनों से नियंत्रित करते हुए चंद्रमा की सतह पर उतारने के संभावित खतरों पर अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के बीच जोरदार बहस छिड़ गई. इसरो ने लैंडर के आधार के केंद्र में पांचवां इंजन लगाकर इसके फ्री फॉल को रोकने का फैसला किया. इससे दो फायदे होते. पांचवां इंजन केवल तभी शुरू होता जब अन्य सभी चार इंजन 10 मीटर की दूरी पर बंद कर दिए जाएं और लैंडर के बहुत सीमित गति से सतह को छूना सुनिश्चित किया गया था. और यह इंजन यान के केंद्र में स्थित था, इसलिए इस इंजन के कारण जो धूल उड़ती, उसे वह दूर धकेल देता. जाहिर है, एक और इंजन लगाने के निर्णय के साथ अंतरिक्ष यान में और अधिक वजन जुड़ता.

उसके विन्यास में अन्य परिवर्तनों के साथ, ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर के साथ चंद्रयान-2 का कुल वजन अब 3.8 टन होता. इसका मतलब यह था कि जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल, या जीएसएलवी मार्क II अब लॉन्च वाहन के रूप में उपयुक्त नहीं था, क्योंकि यह केवल 2-3 टन का पेलोड ले जाने में सक्षम था. तो चंद्रयान-2 परियोजना टीम को इसरो के सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क III, जिसका कार्य प्रगति पर था, उसके लॉन्च के लिए पूरी तरह तैयार होने और अनुमति हासिल करने तक का इंतजार करना पड़ता. परीक्षण उड़ानों की पूरी शृंखला के लिए प्रतीक्षा करने के बजाए, इसरो ने जीएसएलवी मार्क IIII की पहली परिचालन उड़ान में ही चंद्रयान-2 को भेजने का जोखिम लेने का फैसला किया. और शुरुआती डर के बाद, जीएसएलवी मार्क IIII ने 22 जुलाई, 2019 को अपनी चंद्र यात्रा पर चंद्रयान-2 को लॉन्च करने का काम बहुत खूबसूरती से अंजाम दिया.

ऐसे लडख़ड़ाया

विक्रम को चंद्रमा पर उतारने के लिए इसरो ने एक पैराबोलिक संचालित ट्रैजेक्टरी तैयार की, जिसे चार अलग-अलग चरणों में विभाजित किया गया. यह प्रक्रिया तब शुरू होती जब अंतरिक्ष यान चंद्र सतह से लगभग 30 किमी की ऊंचाई पर और लैंडिंग स्थल से 650 किमी दूर पहुंच जाए. पहले चरण में, जिसे रफ ब्रेकिंग चरण के रूप में जाना जाता है और यह 10 मिनट 20 सेकंड तक चलता है, विक्रम अपने इंजनों की जबरदस्त शक्ति का उपयोग करके अपनी क्षैतिज गति को 1,648 मीटर प्रति सेकंड से घटाकर लगभग 150 मीटर प्रति सेकंड तक करेगा. इस चरण में, चंद्रमा के सतह से इसकी दूरी 30 किमी से घटकर 7.4 किमी रह जाएगी.

कक्षा से अलग होकर और स्वतंत्र रूप से चंद्रमा के चारों ओर घूमते हुए, विक्रम अपने पांच इंजनों के एग्जॉस्ट फनल के साथ निकाल दिया गया, जहां इंजनों का मुख इसकी परिक्रमा दिशा की ओर था, न कि उसके विपरीत दिशा की ओर. उतरने के चरण की शुरुआत में, इसमें लगे कंप्यूटरों ने इसकी गति को तेजी से घटाने के लिए अपने पांच में से चार इंजनों को स्टार्ट कर दिया. यह सुनिश्चित करने के लिए कि यान का हॉरिजंटल (क्षैतिज) और वर्टिकल (लंबवत) दोनों वेग तय मापदंडों के भीतर था, सभी चार इंजनों को सही और समक्रमिक तरीके से शुरू करना था. अगर इंजनों में से एक भी अपने निर्धारित समय से थोड़ा सा भी विचलित हो जाता, तो कंप्यूटर को इस तरह तैयार किया गया था कि वह अन्य इंजनों का उपयोग करके आवश्यक थ्रस्ट प्रदान कर सके.

दूरदर्शन पर हो रहे लाइव टेलीकास्ट में वैज्ञानिकों को रफ ब्रेकिंग चरण के सफलतापूर्वक पूरा होने पर तालियां बजाते दिखाया गया था. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संकेत हैं कि इसी चरण में परेशानियां पैदा होनी शुरू हो गई थीं. हॉरिजंटल वेग को चरण के अंत में लगभग 150 मीटर प्रति सेकंड होना था, लेकिन मिशन संचालन परिसर में बड़े कंसोल पर रीडिंग से पता चला कि यह लगभग 200 मीटर प्रति सेकंड था, यानी जितना होना चाहिए था, उससे कहीं तेज. दूसरी ओर, वर्टिकल वेग या जिस गति के साथ लैंडर नीचे उतर रहा था, वह कई सेकंड तक 70 मीटर और 68 मीटर प्रति सेकंड के बीच रहा.

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