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आवरण कथा-खट्टा-मीठा अनुभव

इस क्षेत्र में प्रदर्शन मिला-जुला रहा है. जहां सड़क और बिजली के क्षेत्र में बड़े दावे हैं तो रेलवे और हवाई सेवा के क्षेत्र में अपेक्षित सफलता नहीं

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aajtak.in
एम.जी. अरुण/ श्वेता पुंज/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 17 April 2019
आवरण कथा-खट्टा-मीठा अनुभव हार्दिक छावड़ा

एक के बाद दूसरी सरकारों के सामने देश की आधारभूत संरचना के विकास को गति देना एक बड़ी चुनौती रहा है. धन और कुशल कार्यान्वयन, दोनों के अभाव में परियोजनाएं लगातार पिछड़ती चली गई हैं. हालांकि मोदी सरकार इस क्षेत्र में अपनी पीठ थोड़ी थपथपा सकती है खासकर सड़कों और बिजली के क्षेत्र में किए कार्यों के लिए लेकिन सरकार रेलवे और टेलीकॉम क्षेत्र में उक्वमीद से पीछे रह गई. सरकार का दावा है कि उसने पिछले दो वर्षों में रोजाना 34 किमी सड़क निर्माण के स्तर को छुआ है जबकि पिछली यूपीए सरकार में यह औसत 11.3 किमी का ही था.

बिजली के क्षेत्र में, महत्वाकांक्षी उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (उदय) ने बिजली वितरण कंपनियों के कुल संचित 3.2 लाख करोड़ रु. के कर्ज के बड़े हिस्से को संचालन में सुधार और बिजली क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के विकास के बदले में संबंधित राज्य सरकारों के खातों में डालने में मदद की जिससे इस क्षेत्र का संकट दूर हुआ और विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ. इसी बीच पिछले साल, सरकार ने दावा किया कि सभी ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुंचा दी गई है. हालांकि विश्व बैंक की 2017 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय आबादी का लगभग छठा हिस्सा अब भी बिजली से महरूम है. सरकार के इस तरह के दावे पर सवाल उठाने वाले कई अन्य भी हैं.

हालांकि रेलवे के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए 2015 में 8.56 लाख करोड़ रुपए की एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन अब तक उसका केवल आधा लक्ष्य ही हासिल हुआ है.

दूरसंचार क्षेत्र में 2017-18 में 120 करोड़ ग्राहकों के साथ भारत ग्राहकों की संख्या के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर पर आता है लेकिन यह क्षेत्र बहुत मुश्किलों में घिरा है. 2016 में रिलायंस जियो के प्रवेश के साथ दूरसंचार क्षेत्र में में बहुत उथल-पुथल मच गई.

दूसरी ओर कई कंपनियों के वित्तीय संकटों में घिरे होने के कारण इस उद्योग को समेकन की ओर जाना पड़ा. यही नहीं, इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियों की कटौती की खबरें भी हैं और मतदाताओं पर जो इस महीने मतदान केंद्रों पर लाइन में खड़े होंगे, यह बात नकारात्मक असर भी डाल सकती है.

विमानन में भारत ने 2016 में उड़ान भरने वालों की संख्या के लिहाज से करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया और 2025 तक इसके दुनिया के तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाजार बन जाने की उम्मीद जताई जा रही है.

उड़ान योजना ने उन लोगों को भी हवाई यात्रा का आनंद दिया जो अब से पहले कभी भी जहाज में नहीं बैठे थे लेकिन यहां भी सस्ती उड़ान सेवा देने वाली कंपनियां संकट में घिरी दिखती हैं.

सुधार कार्य का अधूरा सफर

अगस्त 2015 में, तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने सार्वजनिक परिवहन के इस महत्वपूर्ण साधन के लिए अगले पांच वर्षों में 8.56 लाख करोड़ रु. खर्च करने की एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी. प्रभु के ब्लूप्रिंट में परिचालन में सुधार, नकदी प्रवाह को बेहतर समझने के लिए मौजूदा लेखांकन सिद्धांतों में परिवर्तन और मानव संसाधनों तथा प्रबंधन प्रथाओं में आमूल-चूल परिवर्तन के तरीके शामिल थे. इसमें नई मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं, नए गंतव्यों के लिए पटरियों, माल ढुलाई को समर्पित रेलवे गलियारों को पुनर्जीवित करने जैसे बुनियादी ढांचे में सुधार के प्रयास के साथ-साथ स्टेशनों तथा ट्रेनों में प्रदान की जाने वाली सुविधाओं में सुधार का प्रस्ताव शामिल था.

हालांकि, पांच साल बाद केवल आधा काम पूरा हुआ नजर आता है. एलआइसी की 1.5 लाख करोड़ रु. की ऋण प्रतिबद्धता के साथ पूंजीगत परिव्यय 1.59 लाख करोड़ रु. तक पहुंच गया है. लेकिन बात सिर्फ पैसे की नहीं है. निजी निवेश को आकर्षित करने, टैरिफ के लिए नियामक की स्थापना के साथ-साथ यात्री किराए, लॉजिस्टिक्स के लिए रणनीतिक व्यापार इकाइयों का निर्माण, लेखांकन प्रथा में बदलाव जैसे सभी प्रमुख सुधार प्राथमिकता सूची में नीचे चले गए हैं. प्रभु और उनके उत्तराधिकारी पीयूष गोयल, दोनों ही माल भाड़े को बढ़ाकर जुटाए पैसे से यात्री किराए में सब्सिडी देने की प्रथा को बदलने में असमर्थ रहे.

एनडीए शासन जो कर सका है उनमें से एक है बोर्ड का पुनर्गठन (1951 में गठित होने के बाद से इस दिशा में प्रयास नहीं किए गए थे). महत्वाकांक्षी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) भी वापस पटरी पर आ गए हैं और दिल्ली-मुंबई के बीच डीएफसी के इस वित्तीय वर्ष के अंत तक शुरू हो जाने की उम्मीद है.

बाधित रहे कॉल

2017-18 में 120 करोड़ (2013-14 में 93 करोड़ से अधिक) से अधिक के ग्राहक आधार के साथ, भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार बाजार है. हालांकि इस उद्योग में एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि सितंबर 2016 में रिलायंस जियो के प्रवेश के बाद भारी उथल-पुथल के दौर से गुजरने के बावजूद भारत का दूरसंचार क्षेत्र वॉयस फोन कॉल-केंद्रित बाजार से डेटा-केंद्रित बाजार में परिवर्तित हुआ है.

शेयरखान का एक शोध बताता है कि मोबाइल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बढऩे के साथ-साथ झुकाव (दूरसंचार, मीडिया और प्रौद्योगिकी) बढ़ेगा और इसको देखते हुए दूरसंचार कंपनियों ने अब अपना ध्यान व्यापक डिजिटल उपभोक्ता क्षेत्र और मोबाइल बैंकिंग समाधान पर केंद्रित करना शुरू कर दिया है.

दूरसंचार क्षेत्र के संकट के कारण उद्योगपति अनिल अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस कम्युनिकेशंस को इस क्षेत्र से अपना कारोबार समेटना पड़ा है, जबकि बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) के घाटे के 90,000 करोड़ रु. (दिसंबर 2018 तक) को पार कर जाने की आशंका जताई गई है. दिसंबर 2018 को समाप्त तिमाही के दौरान एमटीएनएल (महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड) का घाटा 832.26 करोड़ रु. हो गया. एक रिपोर्ट में कहा गया कि सार्वजनिक क्षेत्र के दोनों ही दूरसंचार सेवा प्रदाताओं ने अपने कर्मचारियों को फरवरी माह का वेतन नहीं दिया है.

जगमगाता देश

अब तक के हर चुनाव में बिजली एक भावनात्मक मुद्दा रही है. लेकिन अब, सरकार का दावा है कि छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित कुछ हिस्सों को छोड़कर, देश के सभी गांव ग्रिड से जुड़े हैं. लेकिन बिजली की उपलब्धता को चौबीस घंटे सुलभ कराने के साथ-साथ उपभोक्ताओं से कुशल राजस्व संग्रह और उपलब्ध बिजली की गुणवत्ता में सुधार के लिए भारत को बेहतर ट्रांसमिशन नेटवर्क और मजबूत वितरण कंपनियों की आवश्यकता है.

लेकिन इस क्षेत्र में समस्याएं बेहिसाब हैं. उदाहरण के लिए, आज भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में 15 प्रतिशत से अधिक उपभोक्ता बिजली उपयोग के लिए भुगतान नहीं करते हैं. इससे डिस्कॉम का नकदी प्रवाह प्रभावित होता है. बिजली निर्माण क्षमता में विविधता लाने के अलावा जिस सबसे बड़े सुधार की जरूरत है वह है डिस्कॉम की बैलेंस-शीट को दुरुस्त करना. महत्वाकांक्षी उदय योजना की ही तरह राज्यों और डिस्कॉम के बीच किसी योजना की जरूरत है.

पिछले पांच वर्षों में सौर और पवन बिजली उत्पादन क्षमता ने लंबी छलांग ली है. सौर-आधारित बिजली निर्माण 2.1 गीगावाट से बढ़कर 26.1 गीगावाट हो गया. अगले तीन वर्षों में इसे बढ़ाकर 100 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. इन प्रयासों से बिजली निर्माण की लागत में भी कमी आई है. यह 2014 के 6.9 रुपए के बेंचमार्क से घटकर 2.5 रुपए तक पहुंच गई है. ऐसा बड़े पैमाने पर सौर पैनलों जैसे घटकों की कीमतों में तेजी से गिरावट के कारण तो हुआ ही है, साथ ही 'रिवर्स बोलियों' जैसे  शुरू किए गए प्रयासों ने भी लागत घटाने में योगदान दिया है.

बिजली मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2018 के अंत तक 12 शीर्ष बिजली उत्पादक कंपनियों—जिनमें जीएमआर, अदानी समूह और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनटीपीसी शामिल हैंकृका लगभग 41,730 करोड़ रु. का बकाया है. हैरानी की बात है, अक्षय ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि और ताप-आधारित क्षमताओं के अति-संचयन के कारण, अब प्रचुरता समस्या बन गई है. यह परेशानी इतनी बढ़ गई है कि ताप विद्युत संयंत्रों में उनकी क्षमता का 60 फीसदी उत्पादन ही कराया जा रहा है.

सड़कों का जाल

2014-15 में 98,000 किमी के मुकाबले आज, देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की मौजूदा लंबाई 1,30,000 किमी है. उस दौरान, कई कारकों की वजह से 73 प्रमुख सड़क परियोजनाएं अटक गईं थीं. बैंक धन देने में आनाकानी कर रहे थे और परियोजनाएं पटरी से उतर गईं. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने अधर में लटकी परियोजना को शुरू कराने के लिए बैंकरों के साथ प्रमोटरों को कुछ कड़वी गोली निगलने के लिए मनाया (39 परियोजनाओं को रद्द भी किया गया).

2016 के बाद ज्यादा तेजी आई जब बनाओ-चलाओ और हस्तांतरित करो (बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर) मॉडल या बीओटी की जगह संकर वार्षिकी मॉडल (हाइब्रिड-एन्युटी मॉडल या एचएएम) की शुरुआत की गई. इसमें एनएचएआइ ने 40 प्रतिशत वार्षिक रिटर्न सुनिश्चित किया और शेष 60 प्रतिशत के लिए पूंजी प्रबंध की आवश्यकता थी. तब से, 100 से अधिक परियोजनाओं का आवंटन हुआ है. 2013-14 में देश भर में सड़कों के निर्माण का औसत प्रति दिन 10 किमी से भी कम था जो 2017-18 में और खासतौर से 2018-19 के उत्तरार्ध में 26-29 किमी प्रति दिन के औसत निर्माण पर पहुंच गया.

गडकरी के सामने सबसे बड़ी परेशानी बैंक ही रहे जो एचएएम परियोजनाओं में से कई के लिए, विशेष रूप से 2018-19 की दूसरी छमाही में, धन मुहैया कराने को अनिच्छुक थे. वजह? भूमि अधिग्रहण अभी भी एक चुनौती है और उच्च जोखिम तथा कम रिटर्न की वजह से वित्तीय रूप से मजबूत बड़े कॉर्पोरेट घराने आगे नहीं आ रहे थे. सड़क निर्माण में उतरे कुछ नए खिलाडिय़ों का इस क्षेत्र का अनुभव बहुत कम है और इसलिए बैंकों को संदेह है कि कई परियोजनाएं पूरी नहीं हो सकेंगी. लेकिन गडकरी के सीधे हस्तक्षेप से चीजें आगे बढ़ रही हैं.

हवाई सफर

चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत 2025 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा विमानन बाजार बनने वाला है. वित्त वर्ष 2016-17 में इस क्षेत्र में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसने 10 करोड़ हवाई यात्रियों की संख्या को छू लिया. यह महत्वाकांक्षी योजना उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) की मदद से संभव हुआ जो देश के आंतरिक वायुमार्गों पर 2,500 रु. जैसी मामूली कीमत पर भी हवाई सफर करा रही है.

एयरोस्पेस ऐंड डिफेंस प्रैक्टिसेज, पीडब्ल्यूसी के पूर्व-साझेदार और अगुआ धीरज माथुर बताते हैं, ''उड़ान को एक विशिष्ट क्षेत्र और एक विशेष सामाजिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तैयार किया गया है लेकिन एक ऐसा क्षेत्र जो नाममात्र के मुनाफे पर कारोबार करता है और जिसके सामने उच्च कर दरों और खराब बुनियादी ढांचे से जूझने की चुनौती है, उसे एक सामाजिक लक्ष्य का अंग बनाना अच्छा विचार नहीं हो सकता."

एक अन्य महत्वपूर्ण कदम राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति को अपनाना भी रहा जिसका लक्ष्य हवाई सफर को अधिक किफायती बनाना और कारोबार के विस्तार के लिए एयरलाइनों के लिए आर्थिक तंत्र खड़ा करना है. हालांकि, इसका कार्यान्वयन बहुत खराब रहा है. जहाज के ईंधन को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने से एयरलाइन क्षेत्र की लागत में भी इजाफा हुआ है. इसके अलावा, सरकार घाटे में चल रही राष्ट्रीय विमानन कंपनी, एयर इंडिया के विनिवेश में असमर्थ रही है.

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