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तकरार और इकरार

व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर भारत-अमेरिका संबंधों में कुछ मुश्किलें उभरीं लेकिन दोनों ही पक्ष मुद्दों को बातचीत से सुलझाने को तैयार हुए तो शीर्ष राजनयिक दे रहे लेनदेन के एक नए चरण के आगाज के संकेत

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aajtak.in
राज चेंगप्पा नई दिल्ली,वाशिंगटन, 04 July 2019
तकरार और इकरार इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास

अमूमन आपस में झगड़ रहे पति-पत्नी जब यह संकेत देना चाहें कि उनका रिश्ता अब किस ओर बढ़ रहा है, तो क्या करते हैं? या तो वे एक-दूसरे को चॉकलेट भेजते हैं और एक-दूसरे को व्हाट्सऐप इमोजी भेजकर संकेत देते हैं कि वे एक दूसरे का चुंबन करके समझौते की ओर बढऩा चाहते हैं. या फिर उनके मतभेद समय के साथ और गहराते जाते हैं और वे औपचारिक रूप से एक-दूसरे से अलग होने के लिए अदालत का रुख कर लेते हैं.

एक हफ्ते पहले तक, भारत और अमेरिका के संबंधों में वैसी ही गड़बडिय़ां दिख रही थीं, जैसी तलाक की ओर बढ़ रहे विवाहित जोड़ों में दिखती हैं. नरेंद्र मोदी ने दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली ही थी कि अगले ही दिन 31 मई को, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उनका मजा खराब कर दिया. ट्रंप ने घोषणा की कि वे अमेरिका के जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रीफरेंस (जीएसपी) के तहत भारत को प्राप्त तरजीही दरों को वापस लेने के अपने आदेश के साथ आगे बढ़ रहे हैं. वजह?  मोदी सरकार ने ''अमेरिका को आश्वासन नहीं दिया कि भारत अपने बाजारों तक उसकी न्यायसंगत और उचित पहुंच प्रदान करेगा.''

भारत 1976 से ही अमेरिका के जीएसपी के तहत तरजीह पाता रहा है. 2018 में, भारत को निर्यात किए गए सामान का 12 फीसद यानी 6.3 अरब डॉलर का लाभ मिला था. हालांकि इसके तहत मिलने वाली ड्यूटी की रियायतें पिछले साल केवल 24 करोड़ डॉलर की थीं, लेकिन 5 जून से प्रभावी हुए जीएसपी विशेषाधिकारों की वापसी से भारत के करीब 1,900 उत्पादों के निर्यात को मार झेलनी पड़ेगी.

ट्रंप की इस कार्रवाई के एक पखवाड़े बाद 15 जून को, भारत ने जवाब में अमेरिका से आयात होने वाले 29 सामान पर उच्च शुल्क जड़ दिया जिसमें सेब, बादाम, अखरोट, छोले, मसूर और बोरिक एसिड शामिल थे. मसलन, बादाम पर सीमा शुल्क में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई. पिछले साल, भारत ने 54.3 करोड़ डॉलर मूल्य के बादाम खरीदे. यह अमेरिका के कुल बादाम निर्यात का आधा है. मतलब यह कि इस शुल्क वृद्धि से अमेरिकी बादाम उत्पादकों को नुक्सान होगा.

वास्तव में, भारत ने जून 2018 में इन उत्पादों पर उच्च करों की घोषणा की क्योंकि अमेरिका ने भारत के स्टील पर शुल्क में 25 प्रतिशत और एल्यूमीनियम आयात के लिए 10 प्रतिशत शुल्क बढ़ा दिया था. लेकिन भारत ने शुल्क वृद्धि की कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उसे बातचीत के जरिए मतभेदों के सुलझने की उम्मीद थी. इस बीच, भारत टैरिफ मानदंडों का उल्लंघन करने के लिए अमेरिका को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के विवाद निपटान निकाय में लेकर गया.

दोनों देश के बीच सिर्फ व्यापारिक मोर्चे पर ही तनातनी नहीं थी. पिछले दो वर्षों में, ईरान से भारत के तेल आयात, रूस से रक्षा खरीद, भारतीयों के लिए अमेरिकी वर्क वीजा जारी करने और मोदी सरकार की प्रस्तावित नई ई-कॉमर्स नीति जैसी कई मुद्दों पर दोनों के बीच विवाद पैदा हुए हैं. ई-कॉमर्स नीति के बारे में तो अमेरिका का तर्क है कि ऐसा अमेजन, वॉलमार्ट और गूगल जैसे अमेरिकी दिग्गज कंपनियों को नुक्सान में डालने के लिए किया गया है (देखें, गतिरोध के मुद्दे).

मुंबई में लिंकन हाउस की बिक्री जैसे कुछ अन्य मुद्दे भी हैं जिनको सुलझाए जाने की जरूरत है. लिंकन हाउस को दशकों पहले अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को लीज पर दिया गया था. जब 2015 में दूतावास ने इसे 750 करोड़ रुपए में एक प्रमुख भारतीय उद्योगपति को बेचना चाहा, तो केंद्र सरकार ने आपत्ति जताई और अब तक बिक्री को मंजूरी नहीं दी है. विडंबना यह है कि यह सब तब हो रहा है जबकि दोनों देश रक्षा, आतंकवाद, समुद्री नियमों और दक्षिण एशियाई क्षेत्र के साथ अमेरिकी जुड़ाव जैसे रणनीतिक मुद्दों पर एक दूसरे के ज्यादा करीब आए हैं.

लेकिन दोनों देश अपने रिश्ते में खटास के बदले मिठास घोलने को तैयार हैं, यह अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर से और फिर, 26 जून को मोदी के साथ मुलाकात से ही जाहिर है. जैसा कि इंडिया टुडे  के साथ खास बातचीत में पॉम्पियो ने बताया, ''हमने इस बारे में बात की कि हम इस दौर, इस समय को कैसे अलग बना सकते हैं. हम अपने रिश्ते में अधिक महत्वाकांक्षी हो सकते हैं. हम व्यापार, सैन्य, रक्षा सहयोग के मुद्दों के सकारात्मक पहलुओं पर गौर कर सकते हैं.

इस बारे में प्रतिबद्घता वास्तविक है. यह गहरी समझ है कि कैसे हमारे देश साथ काम कर सकते हैं. आज मेरी यहां के नेतृत्व से बातचीत का लब्बोलुबाब यही है कि हमारे दोनों देशों के लोगों, इस क्षेत्र और समूची दुनिया के भले के लिए, अमेरिका और भारत को अच्छे साझीदार बने रहना जरूरी है. हम भारत से लाभान्वित होंगे और भारत हमसे.'' (देखें बातचीत, 'किसी देश को अपना चाहा सब कुछ नहीं मिल पाता')

जयशंकर ने भी बातचीत में सकारात्मक माहौल की पुष्टि की. उन्होंने कहा, ''कुछ पुराने मुद्दों, खासकर व्यापार से जुड़े मुद्दों पर, मेरा आग्रह था कि हम रचनात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएं. यह स्वाभाविक है कि जब आप व्यापार कर रहे होते हैं तो उसमें कुछ विवाद भी होंगे ही और मुझे लगता है कि हमारी मंशा की वास्तविक परीक्षा उन विवादों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने की हमारी क्षमता से होती है.'' उसी रात, मोदी जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए जापान के ओसाका रवाना हुए, जहां ट्रंप के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक होनी है जिसमें गतिरोधों को दूर करने के विषय में बातचीत होगी. लेकिन, दोनों देशों के बीच आपसी विवाद के जितने विषय हैं, उन्हें देखते हुए दोनों नेताओं का आपस में गले मिल लेना पर्याप्त न होगा, उससे कहीं अधिक खुले दिल की आवश्यकता होगी.

तो शुरुआती वादों के बावजूद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के बीच के आपसी संबंधों में खटास के ऐसे दौर क्यों आते हैं? और रिश्तों को वापस सहज करने के लिए क्या करना होगा?

गायब होती गर्मजोशी

आइए सबसे पहले यह समझें कि आखिर गड़बड़ हुई कैसे. जब ट्रंप ने जनवरी 2017 में राष्ट्रपति का पदभार संभाला, तो भारत-अमेरिका संबंध एक दशक से अधिक लंबे समय से बहुत मधुर चले आ रहे थे और दोनों देश एक दूसरे के 'रणनीतिक साझेदार' बन गए थे. दोनों देशों के बीच ऊंच-नीच वाले संबंधों में नया मोड़ तब आया था जब अक्तूबर 2008 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार पर हस्ताक्षर किए. उससे भारत को परमाणु ऊर्जा और टेक्नोलॉजी की आपूर्ति पर लगे प्रतिबंधों के हटने की राह खुली, जो बड़ी पश्चिमी महाशक्तियों ने भारत के 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद लगा रखी थी. इससे भारत और अमेरिका के रिश्तों की राह में खड़ी भारी अड़चन भी दूर हुई.

तब से दोनों देशों के बीच व्यापार का ग्राफ चढऩे लगा, जो पहले भारत में एक पूर्व अमेरिकी राजदूत के मुताबिक ''चपाती जैसा सपाट'' हुआ करता था. पिछले साल व्यापार 142 अरब डॉलर को छू गया. इस साल अमेरिका ने फिर भारत के व्यापार साझीदार के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया. परमाणु करार के बाद भारत को उच्च अमेरिकी रक्षा उपकरणों की बिक्री की राह भी खुली. 2008 से अमेरिका से कुल खरीद अब 20 अरब डॉलर पर पहुंच गई है. 2014 में जब मोदी सत्ता में आए तो उन्होंने जल्दी ही बराक ओबामा से दोस्ताना रिश्ता बना लिया और दोनों देशों के रिश्तों को आगे ले जाने की दिशा में कदम बढ़ाए. 8 जून, 2016 को अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते समय उन्होंने कहा था कि दोनों देश आखिरकार ''इतिहास की झिझक तोडऩे में कामयाब'' हो गए.

अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने भारत के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया और कहा कि वे उस देश के ''बड़े मुरीद'' हैं और ''हम अच्छे दोस्त बनने जा रहे हैं.'' ट्रंप ने उसके बाद मोदी को ''भारत का महान प्रधानमंत्री और विकास-समर्थक नेता बताया.'' भारत हालांकि ट्रंप को लेकर बहुत सतर्क रहा है क्योंकि उन्होंने अमेरिकी हितों को सर्वोपरि रखने और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मौजूदा विश्व व्यवस्था को पलट देने का वादा किया था. एक भारतीय विशेषज्ञ ट्रंप सिद्धांत को तीन 'डी' के रूप में अभिव्यक्त करते हैं: डिसइंगेज (रिश्ते तोड़ो), डिग्लोब्लाइज (वैश्वीकरण बदलो) और डिसरप्ट (तोडफ़ोड़ करो). ट्रंप से पींगे बढ़ाने के साथ, भारत शुरू में देखो और इंतजार करो नीति पर चला और फैसला किया कि जब तक ट्रंप प्रशासन आगे नहीं बढ़ता, खामोश रहो.

सत्ता संभालने के दिन से ही ट्रंप ने संकेत दे दिए थे कि वे अपने अभियान को आगे लेकर जाएंगे. उन्होंने 12 देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते, ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप को ''बुरा सौदा'' बताकर अमेरिका को उससे अलग कर लिया. फिर उन्होंने ईरान से परमाणु करार को रद्द कर दिया, जिसे ओबामा ने संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) के तहत ईरान और पी-5+1 (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों—अमेरिका, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और ब्रिटेन के अलावा जर्मनी) देशों के साथ अंजाम दिया था.

उन्होंने पेरिस जलवायु परिवर्तन संधि को बेमानी बता दिया और घोषणा की कि अमेरिका इसके तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान नहीं करेगा. उसके बाद उन्होंने चीन के साथ खुलेआम व्यापार युद्ध छेड़ दिया. चीन का 2018 में अमेरिका के साथ 419 अरब डॉलर का अनुकूल व्यापार संतुलन था. ट्रंप ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के साझीदारों को भी झटका दिया और कहा कि नाटो के खर्च सभी बराबरी से उठाएं.

जून 2017 में जब ट्रंप पहली बार मोदी से व्हाइट हाउस में मिले थे, तो लग रहा था कि दोनों के बीच मिठास हो गई है और अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि वे भारत को ''सच्चा दोस्त'' मानते हैं और मोदी उनके गले लग गए थे. दोनों के बीच सभी प्रमुख मुद्दों—रक्षा, व्यापार, सुरक्षा और बहुपक्षीय संबंधों को विस्तार देने की बात हुई लेकिन ट्रंप ने कहा, ''आपके बाजार में अमेरिकी वस्तुओं के निर्यात के रास्ते में खड़े अवरोधों को हटाया जाना जरूरी है ताकि हम आपके देश के साथ व्यापार घाटे को कम करें.'' यह बात हल्के में नहीं कही गई थी. लेकिन नई दिल्ली ने गलतफहमी में यह मान लिया था कि ट्रंप चीन के साथ अपने 400 अरब डॉलर के व्यापार घाटे के मुकाबले भारत के साथ महज 24 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को ज्यादा तरजीह नहीं देंगे.

भारत-अमेरिका संबंधों के एक विशेषज्ञ कहते हैं, ''ट्रंप के लिए, व्यापार उनकी प्राथमिकता सूची में पहले से पांचवें स्थान तक है और वे इस पर जरा-सा भी झुकने को तैयार नहीं हैं. भारतीय अधिकारी इस वास्तविकता से तालमेल नहीं बिठा पाए और उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि वे ट्रंप के पहले के राष्ट्रपतियों की बातों को जिस तरह बहुत गंभीरता से नहीं लेते रहे हैं, वह रणनीति ट्रंप के साथ नहीं चलने वाली.''

एक विचित्र द्वंद्व

इसमें पूरी तरह से भारत की ही गलती नहीं थी. ट्रंप प्रशासन ने भारत के साथ अपने संबंधों को एक अजीब द्वंद्व के साथ चलाया है, जिसने भारतीय नीति-निर्माताओं को यह विश्वास दिलाया कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उसी तरह से आगे बढ़ सकते हैं जैसा कि ओबामा के दौर में चलता रहा. ट्रंप भारत के साथ व्यापार के मोर्चे पर तीखे तेवर दिखाते रहे लेकिन जब रक्षा खरीद की बात आई, तो उन्होंने भारत को स्ट्रेटेजिक ट्रेड ऑथराइजेशन टियर वन या एसटीए-1 का दर्जा दिया. इसने अमेरिकी हथियार निर्माताओं को भारत को उस तकनीक को बेचने की अनुमति दी जो अमेरिका ने अब तक अपने कुछ निकटतम सहयोगियों को भी नहीं दी थी.

कार्नेगी एंडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ सहयोगी एशले टेलिस कहते हैं, ''डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का भारत के साथ संबंधों को लेकर एक सनकीपन वाला दृष्टिकोण रहा है. यह भारत के साथ रणनीतिक आयाम पर काम करना चाहता है जैसा कि बुश और ओबामा ने किया था लेकिन दूसरी ओर, यह भारत को एक व्यापार प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है. पिछली सरकारों ने भारत के साथ अपने आर्थिक हितों के लिए अपने रणनीतिक हितों को संतुलित करने के तरीके खोजे थे. ट्रंप प्रशासन भारत को अमेरिका के लिए एक आर्थिक समस्या के रूप में मानते हुए उसके साथ रणनीतिक संबंधों का लाभ लेना चाहता है.''

ट्रंप जो रियायतें मांग रहे थे, उन्हें प्रदान करने के फैसले पर भारत तेजी से आगे बढऩे के लिए तैयार नहीं था और अमेरिकी राष्ट्रपति ने फरवरी 2018 में अपने गुस्से का सार्वजनिक रूप से इजहार कर दिया. उन्होंने कहा, ''आप भारत को देखें, प्रधानमंत्री मोदी मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं लेकिन आप एक नजर डालें तो पता चलेगा कि उन्होंने अमेरिकी मोटरसाइकिल (आयात) पर 100 प्रतिशत कर लगाया है. हम उन पर कोई शुल्क नहीं लगाते हैं. और जब हार्ले (डेविडसन) अपनी मोटरबाइक वहां भेजता है, तो वे उस पर 100 प्रतिशत कर लगा देते हैं. वे भी भारी संख्या में मोटरसाइकिलें बनाते हैं और उन्हें हमारे यहां भेजते हैं, लेकिन हम उनसे कोई कर नहीं लेते. मैंने उन्हें (मोदी) फोन किया.

मैंने कहा, यह नहीं चलेगा. उन्होंने एक फोन कॉल पर कर को 50 प्रतिशत तक कम कर दिया. मैंने कहा, यह भी अस्वीकार्य है क्योंकि हम आपसे कोई कर नहीं लेते तो आप 50 प्रतिशत क्यों लेंगे.'' बाद में, व्हाइट हाउस की एक आंतरिक रिपोर्ट में सामने आया कि शुल्क लगाने वाले देशों में भारत सबसे ऊपर है तो ट्रंप ने भारत को ''एक टैरिफ किंग'' बताया.  

भारत ने अमेरिका को तब और अधिक नाराज किया जब मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका से आयातित चिकित्सा उपकरणों, विशेष रूप से स्टेंट की कीमतों को नियंत्रित करने का निर्णय लिया. भारत में तो इस पर खुशी जाहिर की गई लेकिन अमेरिकी निर्माता इससे सबसे अधिक नाखुश थे.

उन्होंने इस मूल्य नियंत्रण तंत्र को अनुचित बताया और व्यापार करने में असमर्थता जाहिर की. कहा गया कि इससे भारत में अमेरिका के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में गिरावट आएगी क्योंकि सरकार अप्रत्याशित नियम लागू कर रही है. लेकिन मूल्य नियंत्रण हटाने पर लंबी बातचीत के बाद भी भारत पीछे हटने को राजी नहीं हुआ. उनकी नाराजगी तब और बढ़ गई जब भारत ने आइवीडी (इन-विट्रो डायग्नोस्टिक्स) रिएजेंट्स पर 30 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाने का फैसला किया. भारत सालाना 6,000 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के इन रिएजेंट्स का आयात करता है, जिसमें अमेरिकी कंपनियों का हिस्सा 36 प्रतिशत है.

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