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कैसे लूटा बैंक का खजाना

पीएनबी को भारी-भरकम 11,400 करोड़ रु. की चपत लगाने के लिए नीरव मोदी का धूर्त दिमाग ही काफी नहीं था, बैंक अधिकारियों की सांठगांठ और बैंकिंग प्रणाली को गहरे भेदना जरूरी था. ऐसी धुआंधार लूट-खसोट करके चंपत हो जाने की रोकथाम का क्या कोई तरीका है?

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aajtak.in
एम.जी. अरुण मुबंई,दिल्ली, 27 February 2018
कैसे लूटा बैंक का खजाना साभार फॉर्च्यून इंडिया

इस साल जनवरी केशुरू में पंजाब नेशनल बैक (पीएनबी) के अफसरों को जब उस धोखाधड़ी का अंदाज हुआ, जिसे वे शुरुआत में 280 करोड़ रु. का मामला ही मान रहे थे तो भगोड़े हीरा कारोबारी 47 वर्षीय नीरव मोदी के भाई नीशल को मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित अपनी ब्रैडी हाउस शाखा में बुलाया.

नीरव को मोटे तौर पर मृदुभाषी और तहजीबयाफ्ता शख्स के तौर पर जाना जाता है, लिहाजा, बैंक के अफसरों ने उसके छोटे भाई के भी उतने ही विनम्र और सौम्य होने की उम्मीद की थी. मगर शुरुआती दुआ-सलाम के बाद जब अफसरों ने जोर देकर कहा कि नीरव ने धोखा देकर रकम वाकई हड़प ली है जिसे लौटाना जरूरी है, तो नीशल आक्रामक हो उठा.

बताया जाता है कि उसने अधिकारियों से कहा, ''तुम्हें जो करना हो कर लो." कई साल में यह पहला मौका था जब बैंक के अफसर उस कारोबार के काले-अंधेरे तहखानों से रू-ब-रू हो रहे थे जिसे चकाचौंध वाले कारोबार की तरह देखा जाता है. पीएनबी ने 29 जनवरी को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) का दरवाजा खटखटाया और अपनी शिकायत दर्ज की.

मगर 14 फरवरी को वह धोखाधड़ी की भारी-भरकम रकम 1.77 अरब डॉलर (11,000 करोड़ रु. से भी ज्यादा) के साथ सामने आया, जिसने शेयर बाजारों में तहलका मचा दिया और पहले ही 8 लाख करोड़ रुपए के असुरक्षित कर्जों से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कामकाज के ऊपर लंबी काली छाया डाल दी.

बदतर यह कि यह घोटाला इससे भी कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है. ताजातरीन रिपोर्टें कह रही हैं कि अगर नीरव, उसकी पत्नी एमी, नीशल और मामा तथा गीतांजलि जेम्स के चेयरैन मेहुल चैकसी को दिए गए असल कर्जों को भी जोड़ लें तो कम से कम 20,000 करोड़ रु. का चूना लगाया हो सकता है. ये सभी फरार हैं और माना जा रहा है कि अमेरिका में हो सकते हैं.

इस घोटाले ने हिंदुस्तान के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कुछ बदतरीन राज भी एक बार फिर बेनकाब कर दिए हैं—कामकाज में भारी गड़बडिय़ां, प्रबंधन की खराब जांच-परख और छानबीन, जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी, और गद्दीनशीनों के साथ अपने रिश्तों पर अक्सर इठलाने वाले अनैतिक और बेशर्म रसूखदार कारोबारियों के साथ नापाक सांठगांठ.

इसने सरकार और केंद्रीय बैंक के उस अभियान को भी भारी धक्का पहुंचाया है, जिनमें वे नए दिवालिया और धनशोधन संहिता (आइबीसी) के जरिए बैंकिंग व्यवस्था की सफाई में जुटे हैं. यह ठोकर खाने के बाद वे और भी तकलीफदेह नई नीतियां और नियम-कायदे बना सकते हैं.

इस बीच शर्मिंदा करने वाले और भी पोशीदा राज निकलकर बाहर आ सकते हैं और यह घोटाला कई फनों वाले विशालकाय नाग में बदल सकता है. जिस तरह नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं और नए मामले सामने आ रहे हैं, उसको देखते हुए अगले कई महीनों तक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) और सरकार का सिरदर्द अभी और बढ़ सकता है.

मीडिया में पहले ही एक और मामले का भारी हल्ला है जिसमें पेन बनाने वाले रोटोमैक के मालिक विक्रम कोठारी शामिल हैं. उन पर सीबीआइ का आरोप है कि वे सार्वजनिक बैंकों के 3,695 करोड़ रु. के कर्ज चुकाने से चूक गए हैं. जब भगोड़ा कारोबारी विजय माल्या हिंदुस्तानी बैंकों की तकरीबन 9,000 करोड़ रु. की देनदारियों के बावजूद लंदन में आराम से बैठा है, ऐसे में मोदी और कोठारी के मामले सरकार के लिए और भी शर्मिंदगी की बात बन गए हैं, खासकर तब जब जनता ऐसे बेईमान और धोखेबाज कारोबारियों से नफरत करती है जो पूरी व्यवस्था को धता बताकर उनकी गाढ़ी कमाई के पैसों के बूते दौलतमंद बन जाते हैं.

इस धोखाधड़ी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करदाताओं की और ज्यादा रकम लगाने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को भी ज्यादा कड़ी तहकीकात के दायरे में ला दिया है (सरकार ने पिछले साल अक्तूबर में सरकारी बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रु. की नई पूंजी लगाने का ऐलान किया था).

पूरी संभावना है कि लोग अब और ज्यादा यह सवाल पूछेंगे कि सरकार को खोटी रकम की भरपाई के लिए अच्छी रकम क्यों झोंकते रहना चाहिए, क्या केवल इसलिए कि कुछ धोखेबाज उसे हड़प लें और आखिरकार देश से भाग खड़े हों.

विडंबना यह है कि इस घोटाले ने बैंकिंग क्षेत्र की भारी-भरकम गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) से निजात पाने की बड़ी मुहिम की निगरानी में मुब्तिला आरबीआइ को भी बैकफुट पर ला दिया है. सरकार उससे पूछ रही है कि यह घोटाला उसकी ऐन नाक के नीचे इतने वर्षों तक बगैर किसी मालूमात के कैसे चलता रहा (आरबीआइ का मुख्यालय ब्रैडी हाउस से महज कुछ कदम की दूरी पर है).

नीरव मोदी वाकई इतनी भारी-भरकम रकम की लूट कैसे कर सका और इसे 2011 से पर्दे के पीछे छिपाकर कैसे रख सका? उसकी कारस्तानी का तरीका इस प्रकार था (ग्राफिक देखें). मोदी की मिल्कियत वाली कंपनियां—डायमंड आर यूएस, सोलर एक्सपोट्र्स और स्टेलर डायमंड्स—पीएनबी के अफसरों के पास गईं और उनसे लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) यानी साख पत्र जारी करने की मांग की.

इन साख पत्रों की बिना पर वे जूलरी बनाने के मकसद से बेशकीमती मोती और हीरे आयात करने के लिए विदेशों में पूंजी उगाह सकते थे. विदेशों में पूंजी उगाहना कहीं ज्यादा सस्ता है (हिंदुस्तान में ब्याज दरें 10 फीसदी जितनी ऊंची हो सकती है, जबकि विदेशी कर्ज पर 3.5 फीसदी के आसपास ब्याज हो सकता है).

एलओयू का मतलब यह है कि ग्राहक (नीरव ऐंड कंपनी) के कर्ज चुकाने से चूकने पर उसे जारी करने वाला बैंक (पीएनबी) अदा करने वाले बैंक को पूरी रकम चुकाने की गारंटी देता है और ये आम तौर पर 90 दिनों के लिए जारी किए जाते हैं. हालांकि दस्तूर तो यही है कि ये साख पत्र जमानत की एवज में जारी किए जाते हैं और जमानत भी आम तौर पर कर्ज की रकम के 100 फीसदी के बराबर होती है.

पीएनबी के मामले में, उसके अफसरों—सेवानिवृत्त डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी और मनोज हनुमंत खरात और कुछ दूसरों—ने मोदी की कंपनियों के अफसरों के साथ सांठगांठ कर ली और जमानत मांगे बगैर एलओयू जारी कर दिए और वे भी आरबीआइ के दिशानिर्देशों के खिलाफ एक साल के लिए जारी कर दिए गए.

शेट्टी बैंक के आयात भुगतानों की देखरेख करने वाले विदेश विनिमय महकमे में 2011 से पिछले साल रिटायर होने तक छह साल से ज्यादा वक्त तक जमा रहा—यह अपने आप में एतराज की बात थी क्योंकि बैंक अपने अफसरों का, खासकर संवेदनशील ओहदों पर तैनात अफसरों का तो और भी, हर तीन साल में तबादला करता रहता है.

पीएनबी ने स्विफ्ट (यानी सोसायटी फॉर वल्र्डवाइड इंटरबैंकिंग फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन, जो सुरक्षित वित्तीय संदेश भेजने की वैश्विक सेवा है) पर एक्सिस बैंक और इलाहाबाद बैंक सहित बहुत-से बैंकों की विदेशी शाखाओं को संदेश भेजे. ऐसा करते हुए पीएनबी ने कोर बैंकिंग प्रणाली (सीबीएस) को पूरी तरह दरकिनार कर दिया, जिस पर ये लेनदेन सामान्य हालत में जरूर सामने आए होते.

भारतीय बैंकों की इन विदेशी शाखाओं ने रकम पीएनबी के 'नोस्ट्रो' खाते में (पीएनबी के ग्राहकों के लिए विदेश में रकम रखने के लिए बनाए गए) जमा करवा दी, मगर उन्होंने भी अनिवार्य जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया.

पीएनबी ने यह रकम मोदी और कंपनियों को चुका दी, कथित तौर पर उन सामान की खरीद के लिए, जिन्हें खरीदने का दावा उन्होंने किया था. हालांकि, पीएनबी ने 12 फरवरी को 30 बैंकों को लिखे गए चेतावनी नोट में कहा कि इस रकम का इस्तेमाल केवल 'आयात बिलों के निपटारे या कुछ दूसरे बैंकों के मियाद पूरी कर रहे खरीदार के कर्ज की भरपाई के लिए' किया गया.

इसे पोंजी योजना की तरह चलाया गया. मोदी की कंपनियों ने पिछले एलओयू को बढ़ाते हुए नए एलओयू की मांग की और इस बार इसमें अदा किए जाने वाले ब्याज को भी जोड़ लिया. यह सिलसिला कर्जों की 'सदाबहार' खेप की तरफ ले गया, और इस तरह आखिरकार बढ़ते-बढ़ते यह रकम बहुत बड़ी हो गई. घोटाला तभी सामने आया जब बैंक में काम करने वालों के चेहरे बदले. जब मोदी की कंपनियां नए साख पत्रों के लिए पीएनबी के पास आईं, तो उनसे सामान के 110 फीसदी मूल्य के बराबर पर्याप्त जमानत पेश करने के लिए कहा गया.

मोदी की कंपनियों ने विरोध किया और कहा कि ऐसे साख पत्र बगैर किसी हुज्जत के पहले भी जारी किए जाते रहे हैं. इसके बाद आंतरिक जांच बैठाई गई, जिसने बेहिसाब पेचीदगियों का पिटारा खोल दिया और पीएनबी ने पाया कि उसे 280 करोड़ रु. का चूना लगाया जा चुका है.

इसके बाद ही 31 जनवरी को पीएनबी ने सीबीआइ में मोदी, एमी, नीशल, चौकसी और पीएनबी के इन अफसरों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और लोक सेवकों द्वारा सरकारी पद के दुरुपयोग के आरोप लगाते हुए एफआइआर दाखिल की.

फिर पीएनबी ने धोखाधड़ी के आंकड़ों को भी संशोधित कर दिया. शेट्टी और खरात को 17 फरवरी को गिरफ्तार कर लिया गया और मोदी की कंपनियों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता और उनके करीबी रिश्तेदार हेमंत भट्ट के साथ 14 मार्च तक सीबीआइ की हिरासत में भेज दिया गया. 17 फरवरी को पीएनबी के तीन और अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया और तीन दिन बाद मोदी की फायरस्टार डायमंड कंपनी के सीएफओ विपुल अंबानी को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

मगर यह कहना कि यह पूरा घोटाला महज कुछेक जूनियर अफसरों की कारस्तानी था, असलियत से मुंह फेरना होगा. वे कोई अलग-थलग काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक बैंकिंग नेटवर्क के तहत काम कर रहे थे, जिसके नियंत्रण और संतुलन की कई परतों से मजबूत होने की अपेक्षा की जाती है. बुनियादी खामियां क्या थीं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?    

 नाकामी-1

सरकारी बैंकः आपराधिक सांठगांठ

पीएनबी के नोस्ट्रो खाते में हुए लेनदेन आखिर भारतीय स्टेट बैंक के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक के कोर बैंकिंग सिस्टम में क्यों नहीं दिखाई पड़े? अकेले यही मामला यह बताने को पर्याप्त है कि इस बैंक में सड़ांध किस स्तर तक फैली हुई है.

इसी का नतीजा है कि 31 दिसंबर, 2017 को इस बैंक की गैर-निष्पादित संपत्ति 57,519 करोड़ रु. के चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी थी. विडंबना यह है कि वित्त वर्ष 2015-16 में 3,974 करोड़ रु. के शुद्ध घाटे में रहे पीएनबी ने 2016-17 में 1,325 करोड़ रु. का शुद्ध लाभ दर्शाते हुए एक सुखद बदलाव के संकेत दिए थे.

लेकिन अकेले इस घोटाले ने पीएनबी की फिर से कमर तोड़ कर रख दी. इसके शेयर में घोटाले के पर्दाफाश के बाद 28 प्रतिशत (19 फरवरी तक) तक की गिरावट आई और पीएनबी की अब तक 10,976 करोड़ रु. की कुल बाजार पूंजी स्वाहा हो चुकी है.

जानकार मानते हैं कि घोटाला जितना बड़ा दिखता है वास्तव में उससे कहीं ज्यादा बड़ा है. एक प्रॉक्सी फर्म स्टेकहोल्डर्स एम्पावरमेंट सर्विसेज के प्रबंध निदेशक तथा पूर्व बैंकर जे.एन. गुप्ता कहते हैं, ''इस पैमाने का घोटाला बिना बैंक के उच्च अधिकारियों की मिलीभगत के हो ही नहीं सकता. जब ग्राहक इतनी बड़ी रकम जुटाने के लिए एलओयू मांग रहा था, उसी समय खतरे की घंटी बज जानी चाहिए थी."

नियमों की जैसे जमकर धज्जियां उड़ाई गईं, गुप्ता उस पर भी प्रश्न उठाते हैं. वे पूछते हैं, ''ऐसे संवेदनशील पद (विदेशी ऋण मामले को देखने वाले पद) पर एक अधिकारी सात साल तक कैसे टिका रह सकता है?" यह घोटाला बैंक के ऑपरेशनल रिस्क टीम, बैंक के आंतरिक और बाहरी ऑडिटरों के साथ ही साथ कई साल तक आरबीआइ की निगाह में भी नहीं आया. यह बैंकिंग सिस्टम में पैठ जमा चुकी बीमारी की ओर इशारा करता है.

यह बात भी हैरान करती है कि कैसे पीएनबी के नोस्ट्रो खाते में रकम भेजने वाला दूसरे बैंक भी बिना यह जांचे एलओयू को बट्टा करते रहे कि क्या किसी सामान की आवाजाही हुई है या शिपिंग से जुड़े कोई दस्तावेज मौजूद हैं. एक जानकार कहते हैं, ''ऐसा लगता है जैसे हर कोई आंख मूंदकर बैंकिंग करता जा रहा था."

बैंकिंग की बुनियादी बात यह है कि कर्ज देने से पहले खूब ठोक बजाकर जांच लो लेकिन इस मामले में इस मूलभूत सिद्धांत की भरपूर अवहेलना हुई. नियामक के नजरिए से बात करें तो, गैर-संपत्ति वस्तु के मामले में 2 करोड़ डॉलर से ऊपर के हर ऋण की सूचना अनिवार्य रूप से रिजर्व बैंक को देनी होती है. इस मामले में तो इस निर्देश की भी धज्जियां उड़ाई गईं.

उस सिस्टम के मूलभूत सिद्घांतों की भी धज्जी उड़ा दी गई जो कंप्यूटरीकृत वातावरण में जरूरी थे. सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के पूर्व अध्यक्ष नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ''आम तौर पर स्विफ्ट सिस्टम के कई पासवर्ड (दो या तीन) होते हैं जिनकी संख्या बैंक और लेनदेन के आकार पर निर्भर करती है.

रकम बड़ी हो, जैसा मोदी के मामले में था, तो कम से कम तीन पासवर्ड होने चाहिए लेकिन यहां तो एक व्यक्ति ही तीनों पासवर्ड के साथ खेल रहा था." ऐसा संभव है कि उस व्यक्ति ने गलत तरीके से तीनों पासवर्ड हासिल कर लिए हों या फिर अधिकारियों की मिलीभगत से उसे तीनों पासवर्ड दे दिए गए हों.

दूसरी बात, स्विफ्ट सिस्टम का बैंक के सीबीएस के साथ अनिवार्य रूप से मिलान किया जाना जरूरी है जो इस मामले में नहीं किया गया. ऐसे मामले हो सकते हैं जहां एक बैंक की दो प्रणालियों के बीच पूर्ण एकीकरण संभव न हो पाए लेकिन ऐसा था तो फिर इनका व्यक्तिगत रूप से किसी अधिकारी द्वारा मिलान जरूर किया जाना चाहिए था.

आइआइएम बेंगलूरू का एक अध्ययन बताता है कि वाहियात निगरानी और जांच-पड़ताल में हद दर्जे की कोताही के कारण 2012 से 2016 के बीच देश में सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों को 22,473 करोड़ रु. की चपत लगी है. विनसम डायमंड्स घोटाला, जिसमें प्रोमोटरों ने हेराफेरी करके स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक की अगुवाई वाले बैंकों के कंसोर्शियम से 6,800 करोड़ रु. निकाल लिए, उसमें भी पीएनबी को 1,800 करोड़ का चूना लगा है.

इसे कैसे रोका जाए

नामी ऑडिटिंग फर्म केपीएमजी के पार्टनर और उसकी फॉरेंसिक सेवाओं के प्रमुख मोहित बहल के मुताबिक, ऐसी जालसाजियों को रोकने के लिए तीन स्तर पर कदम उठाने की सख्त जरूरत है. पहले स्तर पर जो उपाय किए जाने चाहिए उसमें बैंक (उदाहरण के लिए यहां पीएनबी को ही ले लें) को चाहिए कि वह अपने चालू जोखिम का तुरंत आकलन करे और व्यापार आधारित कर्ज देने की गतिविधियों में धांधली की हर संभावना पर लगाम कसे. दूसरा उपाय, बैंक को अपने आंतरिक ऑडिट के कार्यकलापों में तत्काल परिवर्तन की जरूरत है.

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