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कैसे लूटा बैंक का खजाना

पीएनबी को भारी-भरकम 11,400 करोड़ रु. की चपत लगाने के लिए नीरव मोदी का धूर्त दिमाग ही काफी नहीं था, बैंक अधिकारियों की सांठगांठ और बैंकिंग प्रणाली को गहरे भेदना जरूरी था. ऐसी धुआंधार लूट-खसोट करके चंपत हो जाने की रोकथाम का क्या कोई तरीका है?

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एम.जी. अरुणमुबंई,दिल्ली, 27 February 2018
कैसे लूटा बैंक का खजाना साभार फॉर्च्यून इंडिया

इस साल जनवरी केशुरू में पंजाब नेशनल बैक (पीएनबी) के अफसरों को जब उस धोखाधड़ी का अंदाज हुआ, जिसे वे शुरुआत में 280 करोड़ रु. का मामला ही मान रहे थे तो भगोड़े हीरा कारोबारी 47 वर्षीय नीरव मोदी के भाई नीशल को मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित अपनी ब्रैडी हाउस शाखा में बुलाया.

नीरव को मोटे तौर पर मृदुभाषी और तहजीबयाफ्ता शख्स के तौर पर जाना जाता है, लिहाजा, बैंक के अफसरों ने उसके छोटे भाई के भी उतने ही विनम्र और सौम्य होने की उम्मीद की थी. मगर शुरुआती दुआ-सलाम के बाद जब अफसरों ने जोर देकर कहा कि नीरव ने धोखा देकर रकम वाकई हड़प ली है जिसे लौटाना जरूरी है, तो नीशल आक्रामक हो उठा.

बताया जाता है कि उसने अधिकारियों से कहा, ''तुम्हें जो करना हो कर लो." कई साल में यह पहला मौका था जब बैंक के अफसर उस कारोबार के काले-अंधेरे तहखानों से रू-ब-रू हो रहे थे जिसे चकाचौंध वाले कारोबार की तरह देखा जाता है. पीएनबी ने 29 जनवरी को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) का दरवाजा खटखटाया और अपनी शिकायत दर्ज की.

मगर 14 फरवरी को वह धोखाधड़ी की भारी-भरकम रकम 1.77 अरब डॉलर (11,000 करोड़ रु. से भी ज्यादा) के साथ सामने आया, जिसने शेयर बाजारों में तहलका मचा दिया और पहले ही 8 लाख करोड़ रुपए के असुरक्षित कर्जों से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कामकाज के ऊपर लंबी काली छाया डाल दी.

बदतर यह कि यह घोटाला इससे भी कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है. ताजातरीन रिपोर्टें कह रही हैं कि अगर नीरव, उसकी पत्नी एमी, नीशल और मामा तथा गीतांजलि जेम्स के चेयरैन मेहुल चैकसी को दिए गए असल कर्जों को भी जोड़ लें तो कम से कम 20,000 करोड़ रु. का चूना लगाया हो सकता है. ये सभी फरार हैं और माना जा रहा है कि अमेरिका में हो सकते हैं.

इस घोटाले ने हिंदुस्तान के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कुछ बदतरीन राज भी एक बार फिर बेनकाब कर दिए हैं—कामकाज में भारी गड़बडिय़ां, प्रबंधन की खराब जांच-परख और छानबीन, जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी, और गद्दीनशीनों के साथ अपने रिश्तों पर अक्सर इठलाने वाले अनैतिक और बेशर्म रसूखदार कारोबारियों के साथ नापाक सांठगांठ.

इसने सरकार और केंद्रीय बैंक के उस अभियान को भी भारी धक्का पहुंचाया है, जिनमें वे नए दिवालिया और धनशोधन संहिता (आइबीसी) के जरिए बैंकिंग व्यवस्था की सफाई में जुटे हैं. यह ठोकर खाने के बाद वे और भी तकलीफदेह नई नीतियां और नियम-कायदे बना सकते हैं.

इस बीच शर्मिंदा करने वाले और भी पोशीदा राज निकलकर बाहर आ सकते हैं और यह घोटाला कई फनों वाले विशालकाय नाग में बदल सकता है. जिस तरह नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं और नए मामले सामने आ रहे हैं, उसको देखते हुए अगले कई महीनों तक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) और सरकार का सिरदर्द अभी और बढ़ सकता है.

मीडिया में पहले ही एक और मामले का भारी हल्ला है जिसमें पेन बनाने वाले रोटोमैक के मालिक विक्रम कोठारी शामिल हैं. उन पर सीबीआइ का आरोप है कि वे सार्वजनिक बैंकों के 3,695 करोड़ रु. के कर्ज चुकाने से चूक गए हैं. जब भगोड़ा कारोबारी विजय माल्या हिंदुस्तानी बैंकों की तकरीबन 9,000 करोड़ रु. की देनदारियों के बावजूद लंदन में आराम से बैठा है, ऐसे में मोदी और कोठारी के मामले सरकार के लिए और भी शर्मिंदगी की बात बन गए हैं, खासकर तब जब जनता ऐसे बेईमान और धोखेबाज कारोबारियों से नफरत करती है जो पूरी व्यवस्था को धता बताकर उनकी गाढ़ी कमाई के पैसों के बूते दौलतमंद बन जाते हैं.

इस धोखाधड़ी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करदाताओं की और ज्यादा रकम लगाने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को भी ज्यादा कड़ी तहकीकात के दायरे में ला दिया है (सरकार ने पिछले साल अक्तूबर में सरकारी बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रु. की नई पूंजी लगाने का ऐलान किया था).

पूरी संभावना है कि लोग अब और ज्यादा यह सवाल पूछेंगे कि सरकार को खोटी रकम की भरपाई के लिए अच्छी रकम क्यों झोंकते रहना चाहिए, क्या केवल इसलिए कि कुछ धोखेबाज उसे हड़प लें और आखिरकार देश से भाग खड़े हों.

विडंबना यह है कि इस घोटाले ने बैंकिंग क्षेत्र की भारी-भरकम गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) से निजात पाने की बड़ी मुहिम की निगरानी में मुब्तिला आरबीआइ को भी बैकफुट पर ला दिया है. सरकार उससे पूछ रही है कि यह घोटाला उसकी ऐन नाक के नीचे इतने वर्षों तक बगैर किसी मालूमात के कैसे चलता रहा (आरबीआइ का मुख्यालय ब्रैडी हाउस से महज कुछ कदम की दूरी पर है).

नीरव मोदी वाकई इतनी भारी-भरकम रकम की लूट कैसे कर सका और इसे 2011 से पर्दे के पीछे छिपाकर कैसे रख सका? उसकी कारस्तानी का तरीका इस प्रकार था (ग्राफिक देखें). मोदी की मिल्कियत वाली कंपनियां—डायमंड आर यूएस, सोलर एक्सपोट्र्स और स्टेलर डायमंड्स—पीएनबी के अफसरों के पास गईं और उनसे लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) यानी साख पत्र जारी करने की मांग की.

इन साख पत्रों की बिना पर वे जूलरी बनाने के मकसद से बेशकीमती मोती और हीरे आयात करने के लिए विदेशों में पूंजी उगाह सकते थे. विदेशों में पूंजी उगाहना कहीं ज्यादा सस्ता है (हिंदुस्तान में ब्याज दरें 10 फीसदी जितनी ऊंची हो सकती है, जबकि विदेशी कर्ज पर 3.5 फीसदी के आसपास ब्याज हो सकता है).

एलओयू का मतलब यह है कि ग्राहक (नीरव ऐंड कंपनी) के कर्ज चुकाने से चूकने पर उसे जारी करने वाला बैंक (पीएनबी) अदा करने वाले बैंक को पूरी रकम चुकाने की गारंटी देता है और ये आम तौर पर 90 दिनों के लिए जारी किए जाते हैं. हालांकि दस्तूर तो यही है कि ये साख पत्र जमानत की एवज में जारी किए जाते हैं और जमानत भी आम तौर पर कर्ज की रकम के 100 फीसदी के बराबर होती है.

पीएनबी के मामले में, उसके अफसरों—सेवानिवृत्त डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी और मनोज हनुमंत खरात और कुछ दूसरों—ने मोदी की कंपनियों के अफसरों के साथ सांठगांठ कर ली और जमानत मांगे बगैर एलओयू जारी कर दिए और वे भी आरबीआइ के दिशानिर्देशों के खिलाफ एक साल के लिए जारी कर दिए गए.

शेट्टी बैंक के आयात भुगतानों की देखरेख करने वाले विदेश विनिमय महकमे में 2011 से पिछले साल रिटायर होने तक छह साल से ज्यादा वक्त तक जमा रहा—यह अपने आप में एतराज की बात थी क्योंकि बैंक अपने अफसरों का, खासकर संवेदनशील ओहदों पर तैनात अफसरों का तो और भी, हर तीन साल में तबादला करता रहता है.

पीएनबी ने स्विफ्ट (यानी सोसायटी फॉर वल्र्डवाइड इंटरबैंकिंग फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन, जो सुरक्षित वित्तीय संदेश भेजने की वैश्विक सेवा है) पर एक्सिस बैंक और इलाहाबाद बैंक सहित बहुत-से बैंकों की विदेशी शाखाओं को संदेश भेजे. ऐसा करते हुए पीएनबी ने कोर बैंकिंग प्रणाली (सीबीएस) को पूरी तरह दरकिनार कर दिया, जिस पर ये लेनदेन सामान्य हालत में जरूर सामने आए होते.

भारतीय बैंकों की इन विदेशी शाखाओं ने रकम पीएनबी के 'नोस्ट्रो' खाते में (पीएनबी के ग्राहकों के लिए विदेश में रकम रखने के लिए बनाए गए) जमा करवा दी, मगर उन्होंने भी अनिवार्य जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया.

पीएनबी ने यह रकम मोदी और कंपनियों को चुका दी, कथित तौर पर उन सामान की खरीद के लिए, जिन्हें खरीदने का दावा उन्होंने किया था. हालांकि, पीएनबी ने 12 फरवरी को 30 बैंकों को लिखे गए चेतावनी नोट में कहा कि इस रकम का इस्तेमाल केवल 'आयात बिलों के निपटारे या कुछ दूसरे बैंकों के मियाद पूरी कर रहे खरीदार के कर्ज की भरपाई के लिए' किया गया.

इसे पोंजी योजना की तरह चलाया गया. मोदी की कंपनियों ने पिछले एलओयू को बढ़ाते हुए नए एलओयू की मांग की और इस बार इसमें अदा किए जाने वाले ब्याज को भी जोड़ लिया. यह सिलसिला कर्जों की 'सदाबहार' खेप की तरफ ले गया, और इस तरह आखिरकार बढ़ते-बढ़ते यह रकम बहुत बड़ी हो गई. घोटाला तभी सामने आया जब बैंक में काम करने वालों के चेहरे बदले. जब मोदी की कंपनियां नए साख पत्रों के लिए पीएनबी के पास आईं, तो उनसे सामान के 110 फीसदी मूल्य के बराबर पर्याप्त जमानत पेश करने के लिए कहा गया.

मोदी की कंपनियों ने विरोध किया और कहा कि ऐसे साख पत्र बगैर किसी हुज्जत के पहले भी जारी किए जाते रहे हैं. इसके बाद आंतरिक जांच बैठाई गई, जिसने बेहिसाब पेचीदगियों का पिटारा खोल दिया और पीएनबी ने पाया कि उसे 280 करोड़ रु. का चूना लगाया जा चुका है.

इसके बाद ही 31 जनवरी को पीएनबी ने सीबीआइ में मोदी, एमी, नीशल, चौकसी और पीएनबी के इन अफसरों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और लोक सेवकों द्वारा सरकारी पद के दुरुपयोग के आरोप लगाते हुए एफआइआर दाखिल की.

फिर पीएनबी ने धोखाधड़ी के आंकड़ों को भी संशोधित कर दिया. शेट्टी और खरात को 17 फरवरी को गिरफ्तार कर लिया गया और मोदी की कंपनियों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता और उनके करीबी रिश्तेदार हेमंत भट्ट के साथ 14 मार्च तक सीबीआइ की हिरासत में भेज दिया गया. 17 फरवरी को पीएनबी के तीन और अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया और तीन दिन बाद मोदी की फायरस्टार डायमंड कंपनी के सीएफओ विपुल अंबानी को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

मगर यह कहना कि यह पूरा घोटाला महज कुछेक जूनियर अफसरों की कारस्तानी था, असलियत से मुंह फेरना होगा. वे कोई अलग-थलग काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक बैंकिंग नेटवर्क के तहत काम कर रहे थे, जिसके नियंत्रण और संतुलन की कई परतों से मजबूत होने की अपेक्षा की जाती है. बुनियादी खामियां क्या थीं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?    

 नाकामी-1

सरकारी बैंकः आपराधिक सांठगांठ

पीएनबी के नोस्ट्रो खाते में हुए लेनदेन आखिर भारतीय स्टेट बैंक के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक के कोर बैंकिंग सिस्टम में क्यों नहीं दिखाई पड़े? अकेले यही मामला यह बताने को पर्याप्त है कि इस बैंक में सड़ांध किस स्तर तक फैली हुई है.

इसी का नतीजा है कि 31 दिसंबर, 2017 को इस बैंक की गैर-निष्पादित संपत्ति 57,519 करोड़ रु. के चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी थी. विडंबना यह है कि वित्त वर्ष 2015-16 में 3,974 करोड़ रु. के शुद्ध घाटे में रहे पीएनबी ने 2016-17 में 1,325 करोड़ रु. का शुद्ध लाभ दर्शाते हुए एक सुखद बदलाव के संकेत दिए थे.

लेकिन अकेले इस घोटाले ने पीएनबी की फिर से कमर तोड़ कर रख दी. इसके शेयर में घोटाले के पर्दाफाश के बाद 28 प्रतिशत (19 फरवरी तक) तक की गिरावट आई और पीएनबी की अब तक 10,976 करोड़ रु. की कुल बाजार पूंजी स्वाहा हो चुकी है.

जानकार मानते हैं कि घोटाला जितना बड़ा दिखता है वास्तव में उससे कहीं ज्यादा बड़ा है. एक प्रॉक्सी फर्म स्टेकहोल्डर्स एम्पावरमेंट सर्विसेज के प्रबंध निदेशक तथा पूर्व बैंकर जे.एन. गुप्ता कहते हैं, ''इस पैमाने का घोटाला बिना बैंक के उच्च अधिकारियों की मिलीभगत के हो ही नहीं सकता. जब ग्राहक इतनी बड़ी रकम जुटाने के लिए एलओयू मांग रहा था, उसी समय खतरे की घंटी बज जानी चाहिए थी."

नियमों की जैसे जमकर धज्जियां उड़ाई गईं, गुप्ता उस पर भी प्रश्न उठाते हैं. वे पूछते हैं, ''ऐसे संवेदनशील पद (विदेशी ऋण मामले को देखने वाले पद) पर एक अधिकारी सात साल तक कैसे टिका रह सकता है?" यह घोटाला बैंक के ऑपरेशनल रिस्क टीम, बैंक के आंतरिक और बाहरी ऑडिटरों के साथ ही साथ कई साल तक आरबीआइ की निगाह में भी नहीं आया. यह बैंकिंग सिस्टम में पैठ जमा चुकी बीमारी की ओर इशारा करता है.

यह बात भी हैरान करती है कि कैसे पीएनबी के नोस्ट्रो खाते में रकम भेजने वाला दूसरे बैंक भी बिना यह जांचे एलओयू को बट्टा करते रहे कि क्या किसी सामान की आवाजाही हुई है या शिपिंग से जुड़े कोई दस्तावेज मौजूद हैं. एक जानकार कहते हैं, ''ऐसा लगता है जैसे हर कोई आंख मूंदकर बैंकिंग करता जा रहा था."

बैंकिंग की बुनियादी बात यह है कि कर्ज देने से पहले खूब ठोक बजाकर जांच लो लेकिन इस मामले में इस मूलभूत सिद्धांत की भरपूर अवहेलना हुई. नियामक के नजरिए से बात करें तो, गैर-संपत्ति वस्तु के मामले में 2 करोड़ डॉलर से ऊपर के हर ऋण की सूचना अनिवार्य रूप से रिजर्व बैंक को देनी होती है. इस मामले में तो इस निर्देश की भी धज्जियां उड़ाई गईं.

उस सिस्टम के मूलभूत सिद्घांतों की भी धज्जी उड़ा दी गई जो कंप्यूटरीकृत वातावरण में जरूरी थे. सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के पूर्व अध्यक्ष नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ''आम तौर पर स्विफ्ट सिस्टम के कई पासवर्ड (दो या तीन) होते हैं जिनकी संख्या बैंक और लेनदेन के आकार पर निर्भर करती है.

रकम बड़ी हो, जैसा मोदी के मामले में था, तो कम से कम तीन पासवर्ड होने चाहिए लेकिन यहां तो एक व्यक्ति ही तीनों पासवर्ड के साथ खेल रहा था." ऐसा संभव है कि उस व्यक्ति ने गलत तरीके से तीनों पासवर्ड हासिल कर लिए हों या फिर अधिकारियों की मिलीभगत से उसे तीनों पासवर्ड दे दिए गए हों.

दूसरी बात, स्विफ्ट सिस्टम का बैंक के सीबीएस के साथ अनिवार्य रूप से मिलान किया जाना जरूरी है जो इस मामले में नहीं किया गया. ऐसे मामले हो सकते हैं जहां एक बैंक की दो प्रणालियों के बीच पूर्ण एकीकरण संभव न हो पाए लेकिन ऐसा था तो फिर इनका व्यक्तिगत रूप से किसी अधिकारी द्वारा मिलान जरूर किया जाना चाहिए था.

आइआइएम बेंगलूरू का एक अध्ययन बताता है कि वाहियात निगरानी और जांच-पड़ताल में हद दर्जे की कोताही के कारण 2012 से 2016 के बीच देश में सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों को 22,473 करोड़ रु. की चपत लगी है. विनसम डायमंड्स घोटाला, जिसमें प्रोमोटरों ने हेराफेरी करके स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक की अगुवाई वाले बैंकों के कंसोर्शियम से 6,800 करोड़ रु. निकाल लिए, उसमें भी पीएनबी को 1,800 करोड़ का चूना लगा है.

इसे कैसे रोका जाए

नामी ऑडिटिंग फर्म केपीएमजी के पार्टनर और उसकी फॉरेंसिक सेवाओं के प्रमुख मोहित बहल के मुताबिक, ऐसी जालसाजियों को रोकने के लिए तीन स्तर पर कदम उठाने की सख्त जरूरत है. पहले स्तर पर जो उपाय किए जाने चाहिए उसमें बैंक (उदाहरण के लिए यहां पीएनबी को ही ले लें) को चाहिए कि वह अपने चालू जोखिम का तुरंत आकलन करे और व्यापार आधारित कर्ज देने की गतिविधियों में धांधली की हर संभावना पर लगाम कसे. दूसरा उपाय, बैंक को अपने आंतरिक ऑडिट के कार्यकलापों में तत्काल परिवर्तन की जरूरत है.

तीसरा उपाय यह होगा कि बैंकों को धोखाधड़ी के जोखिम के आकलन का एक ढांचा तैयार करना चाहिए जो बैंक के नियंत्रण ढांचे का अनिवार्य अंग हो. यह कार्य आंतरिक और बाहरी ऑडिटरों की टीम की सहायता से किया जा सकता है. पहले मामले में बैंकों को चाहिए कि वे अपने नेटवर्क में हुए हर लेनदेन की गहराई से पड़ताल करें कि कहीं नीरव मोदी ने जो हथकंडा आजमाया था, उसी हथकंडे का इस्तेमाल करके कोई और लेनदेन तो नहीं हुआ है.

उसके बाद सभी उन सभी विदेशी शाखाओं/क्षेत्रों की पहचान की जाए जो इससे प्रभावित हुए हैं, और इन लेनदेन के दौरान हुई सारी प्रक्रिया और इससे जुड़े सभी आंतरिक दस्तावेजों की समीक्षा की जाए. इसके बाद, व्यापारिक लेनदेन की निगरानी के लिए बैंक ने जो आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था बना रखी है (जिसमें सीबीएस और स्विफ्ट के बीच की मिलान प्रक्रिया, नोस्ट्रो एंट्री, आवधिक सत्यापन शामिल हैं) उसका गंभीरता से आकलन करे.

साथ ही कर्मचारियों की भूमिका का आकलन करें और कोई भी अनियमितता या लापरवाही पकड़ में आती है तो उसकी जांच कराए, यहां तक कि नौकरी में बदलाव से जुड़े दिशा-निर्देशों में कोई समझौता होता कहीं दिखता हो तो उसकी भी पड़ताल कराई जाए. अंतिम लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण बात कि व्यापार आधारित ऋण देने की गतिविधियों (घरेलू और विदेशी) के धोखाधड़ी के जोखिम का आकलन कराया जाए और पता किया जाए कि इससे बैंक के जोखिम की वास्तविक स्थिति क्या है.

नाकामी-2

डूबत कर्जः लुटेरे कॉर्पोरेट

देश में सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों की पहुंच का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन 21 बैंकों को मिलाकर देश के कुल बैंकिंग उद्योग का 70 प्रतिशत तैयार होता है. पीएनबी की धोखाधड़ी बैंकों के सामने मुंह बाए खड़ी एक बड़ी चुनौती एनपीए का हिस्सा है. आरबीआइ के आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 की दूसरी तिमाही के अंत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज में से 7.34 लाख करोड़ रु. का कर्ज डुबत ऋण हो चुका था.

दूसरी तरफ, निजी क्षेत्र के बैंकों का एनपीए इसके मुकाबले काफी कम—मात्र एक लाख करोड़ रु. का है. पीनएबी का फर्जीवाड़ा एनपीए का मामला नहीं है. बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज कुछ हद तक तो तब खराब होकर एनपीए बन गए जब सारे व्यवसाय मंदे पड़े थे, खासकर 2008 में लीमन ब्रदर्स के धराशाई हो जाने के बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर, पावर और स्टील क्षेत्र तो बुरी तरह तबाह हुआ था.

उस दौरान बैंकों के ऋण का एक बड़ा हिस्सा एनपीए हो गया था. कुछ कर्ज तो प्रमोटरों के नौसिखुएपन के कारण एनपीए हुआ क्योंकि प्रमोटर उस व्यवसाय में प्रवेश कर गए जिसका उन्हें पहले से कोई खास अनुभव नहीं था. पीनएबी के मामले में तो कर्ज के रूप में ली गई रकम का इस्तेमाल पुराने ऋण चुकता करने में तब तक होता रहा, जब तक ऋण बढ़ते-बढ़ते इतना नहीं हो गया कि उसे चुकता करना कर्जदार के बूते की बात ही नहीं रह गई.

विक्रम कोठारी के मामले, जो अभी सुर्खियां बटोर रहा है, में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है. रोटोमैक के प्रमोटर पर आरोप है कि उसने सात बैंकों से यह कहकर फॉरेन लेटर्स ऑफ क्रेडिट हासिल किए कि उसे गेहूं खरीदने और कई अन्य चीजों में काम आने वाली वस्तुओं के निर्यात के लिए कर्ज की जरूरत है.

इस नाम पर जुटाए गए पैसे को, उसने घुमाकर अपनी कंपनी और सिस्टर फर्मों में लगा दिया. कोठारी को फरवरी 2017 में एक स्वेच्छाचारी गबनकर्ता (विलफुल डिफॉल्टर) घोषित करते हुए बैंकों ने कर्ज वसूली के लिए उसकी और उसके परिवार की विभिन्न संपत्तियों की नीलामी कराई. जिस समय यह खबर छपने के लिए प्रेस में जा रही थी, उस समय सीबीआइ कोठारी से पूछताछ कर रही थी.

2014 में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने शराब कारोबारी विजय माल्या को स्वेच्छाचारी गबनकर्ता घोषित कर दिया. फिर तो एसबीआइ और पीएनबी ने भी उसका अनुसरण करते हुए माल्या को गबनकर्ता घोषित कर दिया. माल्या, जो बाद में देश छोड़कर इंग्लैंड भाग गया, पर भारतीय बैंकों का 9,000 करोड़ रु. का कर्ज है.

उसे वापस लाने की कोशिशों में अब तक कामयाबी नहीं मिली है, न ही दूसरे प्रमोटरों अथवा बैंक अधिकारियों पर ही मुकदमा चलाया जा सका है. किंगफिशर ऋण मामले में आइडीबीआइ बैंक के पूर्व सीएमडी योगेश अग्रवाल के साथ बैंक के एक अन्य पूर्व अधिकारी को जनवरी 2017 में गिरफ्तार तो किया गया था लेकिन उन्हें बाद में जमानत मिल गई.

सीबीआइ के मुताबिक, इन दोनों अधिकारियों ने किंगफिशर एयरलाइंस, जो अब बंद हो चुकी है, के प्रति 'आवश्यकता से अधिक कृपादृष्ट' रखते हुए एयरलाइंस के खस्ताहाल होने के बावजूद उसे 1,000 करोड़ रु. का ऋण दे दिया. 2014 में सिंडिकेट बैंक के पूर्व अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक एस.के.जैन 8,000 करोड़ रु. का ऋण मंजूर करने के एवज में घूस लेने के आरोपों में गिरफ्तार हुए थे.

उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया गया था. 2013 में एसबीआइ के डिप्टी एमडी श्यामल आचार्य को सीबीआइ ने घूसखोरी के एक मामले में आरोपी बनाया था लेकिन बाद में उसी साल बैंक ने अपनी एक आंतरिक जांच में उन्हें आरोपमुक्त कर दिया. एक साल बाद उन्हें एसबीआइ में फिर से बहाल करके बैंक के हैदराबाद स्थित निगरानी और मैनेजमेंट ऑडिट विभाग के डिप्टी एमडी का पद दिया गया.

इसे कैसे रोका जाए

आइबीसी को लाकर सरकार और आरबीआइ, राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के माध्यम से कंपनियों की त्वरित बिक्री की व्यस्था बना रही है ताकि बैंकों को एनपीए के झमेले से निकाला जाए. इस दिशा में प्रयास जारी हैं. सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों के लिए पूंजी का पुनप्र्रबंध करने के उद्देश्य से 2.11 लाख करोड़ रु. बैंकिंग क्षेत्र में डालने की योजना भी बना रही है.

इस क्षेत्र पर नजर जमाए रखने वाले लोग बताते हैं कि सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र में प्रशासन के मुद्दे पर पी.जे. नायक कमेटी की कुछ सिफारिशों को लागू करने का निर्णय कर लिया होता, तो इस प्रणालीगत विफलता की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकता था. बैंकिंग परामर्शदाता अश्विन पारेख के अनुसार, नायक कमेटी ने रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन को 82 ढांचागत सिफारिशें सौंपी थीं लेकिन उनमें से महज छह या सात को ही अब तक लागू किया गया है.

पारेख कहते हैं, ''नायक कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मानव चालित व्यवस्था से तकनीकी व्यवस्था में हस्तांतरण के दौरान प्रशासन और परिवर्तन प्रबंधन से जुड़ी कई संभावित खामियों को लेकर आगाह किया था." ऑपरेशन टेक्नोलॉजी और इंटरफेस टेक्नोलॉजी, दोनों ही तकनीकों में डिजाइन को लेकर सवाल उठते रहे हैं.

वे कहते हैं कि जो बदलाव हुआ वह रि-इंजीनियरिंग से ज्यादा सिस्टम का नए प्रारूप में अनुवाद ज्यादा लगता है. पारेख कहते हैं, ''बैंकिंग क्षेत्र की नई चुनौतियों का इस सिस्टम में ध्यान ही नहीं रखा गया. उस समय जो प्रश्न उठाए गए थे उनमें से कुछ आज बड़े प्रासंगिक नजर आते हैं. मसलन, बिना कोर बैंकिंग सिस्टम को छूए, कैसे कोई एलओयू जारी कर लेता है?"

दूसरे, अमेरिका और यूरोप से इतर, भारत में बैंकिंग प्रणाली काफी विस्तृत है. इसमें काफी फैलाव दिखता है. इस प्रकार के प्रसार को ध्यान में रखकर प्रणाली के नियंत्रण की व्यवस्था तो बनाई गई लेकिन वह किसी अन्य युग के लिए मुफीद थी. पारेख कहते हैं, ''क्या हमने ऐसी नियंत्रण प्रणाली विकसित की है जो हमारी आज की जरूरतों के अनुकूल हो? नहीं.

बढ़ते एनपीए और धोखाधड़ी के मामलों से साफ है कि सिस्टम में हर स्तर पर रिसाव की गुंजाइश है." तीसरे, आंतरिक ऑडिट की गुणवत्ता बढ़ाने की जरूरत है चाहे वैधानिक ऑडिटरों को पर्याप्त भुगतान करना पड़े या ऑडिट के लिए प्रतिष्ठित फर्मों की सेवाएं लेनी पड़े.

नाकामी-3

ऑडिटरः आपराधिक खामियां

ऊपर से देखने पर बैंक की ऑडिट यानी लेखा परीक्षण की व्यवस्था पुक्चता नजर आती है. सहायक महाप्रबंधक के ओहदे का एक अधिकारी पीएनबी की ब्रैडी हाउस शाखा का मैनेजर है. एक समवर्ती ऑडिटर दिन भर के तमाम लेनदेन पर नजर रखता है और दिन के आखिर में अपनी रिपोर्ट देता है जिस पर समवर्ती ऑडिटर और मैनेजर दोनों के दस्तखत होते हैं. फिर यह रिपोर्ट हेड ऑफिस को भेज दी जाती है.

ऑडिटर बैंक के हेड ऑफिस को रिपोर्ट करता है, इसलिए उसे प्रभावित नहीं किया जा सकता. मगर पीएनबी के मामले में ये लेनदेन बैंक के कोर बैंकिंग नेटवर्क को दरकिनार करके किए गए.

यही नहीं, जब पीएनबी के नोस्त्रो खाते में लेनदेन हुए थे, तब उनका बैंक की ट्रेजरी शाखा के साथ मिलान होना चाहिए था, पर यह नहीं हुआ. यहां तक कि जिन विदेशी शाखाओं ने रकम उधार दी, उन्होंने भी तमाम खामियों की तरफ से आंखें मूंद ली.

जांच और नियंत्रण का तीसरा स्तर कानूनी या बाहरी ऑडिटरों के साथ आता है. हालांकि कई मामलों में वे आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट पर ही भरोसा करते हैं. पीएनबी की 2016-17 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक छाजेड़ ऐंड दोषी, आर. देवेंद्र कुमार ऐंड एसोसिएट्स, हेम संदीप ऐंड कंपनी, सूरी ऐंड कंपनी और एसपीएमजी ऐंड कंपनी उसके ऑडिटर थे.

फिर आरबीआइ के ऑडिटर भी थे, जो हेड ऑफिस से वास्ता रखते हैं और बैंक के रोज-ब-रोज के कामकाज की जांच नहीं करते. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पूछा, ''हमारे ऑडिटर क्या कर रहे हैं? अंदरूनी और बाहरी दोनों ऑडिटरों ने आंख फेर ली."

इसे कैसे रोका जाए. बहल कहते हैं कि बैंक की आंतरिक ऑडिट कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए आंतरिक, आइटी, समवर्ती और प्रबंधन वगैरह सरीखे मौजूदा लेखा परीक्षणों में शामिल बातों और उनके हिस्सों की दोबारा पड़ताल करना बेहद जरूरी है ताकि उन्हें गतिशील जोखिम प्रबंधन और नियम-कायदों में बदलावों के मुताबिक ढाला जा सके.

जरूरत इस बात की है कि लेनदेन की निगरानी के लिए एक केंद्रीयकृत इकाई हो जो मिलान को दरकिनार किए जाने, नाकाफी मुनाफों, दिशानिर्देशों के उल्लंघन वगैरह की हालत में जल्दी से जल्दी खतरे की घंटी बजा दे. मौजूदा आंतरिक ऑडिट व्यवस्था के ढांचे और भूमिकाएं तथा जिम्मेदारियां सौंपने की व्यवस्था को भी मजबूत करने की दरकार है ताकि इकाई के कुल कामकाज में सुधार लाया जा सके और असल वक्त में मैनेजमेंट को रिपोर्टिंग का ढांचा बनाया जा सके.

नाकामी-4

आरबीआइः निगरानी लापता

आलोचकों का कहना है कि केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति से लडऩे में इतना  मशगूल था कि उसने बैंकिंग कारोबार का नियामक और उपभोक्ताओं का संरक्षक होने के नाते अपने अनिवार्य कामकाज के दूसरे पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया. पीएनबी की धोखाधड़ी में कई लोग इस बात से भौंचक हैं कि आरबीआइ के ऑडिटर भी घोटाले को नहीं पकड़ पाए.

इसे कैसे रोका जाए

ऐसी धोखाधडिय़ों को रोकने में आरबीआइ की स्वाभाविक जिम्मेदारियों की तरफ इशारा करते हुए जेटली कहते हैं, ''अहम चुनौती वह है जहां निगरानी एजेंसियों को अब अपने भीतर झांकना होगा और देखना होगा कि उन्हें ऐसी कौन-सी अतिरिक्त व्यवस्थाएं कायम करनी होंगी ताकि यह पक्का किया जा सके कि छिटपुट मामले कहीं पैटर्न न बन जाए और उन्होंने शुरुआत में ही कुचला जा सके."

अपने एक ताजातरीन फैसले में, जिसे पीएनबी घोटाले के ही एक नतीजे के तौर पर देखा जा रहा है, आरबीआइ ने 21 फरवरी को केंद्रीय बैंक के सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के एक पूर्व सदस्य वाइ.एच. मालेगम की अध्यक्षता में बैंकों में धोखाधडिय़ों के बढ़ते मामलों का अध्ययन करने और उनकी रोकथाम का ब्लूप्रिंट तैयार करने के लिए एक समिति बनाने का ऐलान किया है. यह देखना होगा कि आखिर इस समिति की सिफारिशें रोकथाम के लिए कितनी कारगर होती हैं.

नाकामी-5

सरकारः नीतिगत खामियां

बड़ी हिस्सेदारी के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मालिक होने के नाते सरकार इस मामले में अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकती. हालांकि वह बैंकों के रोज-ब-रोज के कामकाज में दखल नहीं दे सकती, पर घोटालों का बेहतर पता लगाने और रोकथाम के लिए मुकम्मल व्यवस्थाएं तो कायम कर ही सकती है.

एक वरिष्ठ अफसरशाह कहते हैं, ''सरकार के सामाजिक और विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हमें बैंकों की जरूरत है. सरकार बैंकों के लिए एक नियंत्रक कंपनी बनाने पर विचार कर सकती है जिसे पेशेवर ढंग से चलाया जाए और जो सरकारी बैंकों को कामकाज की बेहतर प्रथाएं अपनाने पर मजबूर कर सके."

2016 में पूर्व सीएजी विनोद राय की अगुआई में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का संपूर्ण कायापलट करने के लिए बड़ी धूमधाम से जो बैंक बोर्ड ब्यूरो बनाया गया था, वह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है. राय मार्च में रिटायर होने वाले हैं और ब्यूरो का भविष्य डांवाडोल दिखाई देता है.

इसे कैसे रोका जाए

सरकार ने बैंकों के शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत के लिए और अक्सर विचार साझा करने के लिए कई रास्ते बनाए हैं. उनमें से एक 'विचार मंथन' था जिसमें वित्त मंत्री को बैंकिंग सेक्टर पर असर डालने वाले अहम मुद्दों पर इन बैंकों के सीएमडी के साथ विचार-विमर्श करना था. यह 'मंथन' की तर्ज पर था जिसे मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के फौरन बाद शुरू किया गया था.

प्रधान आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने सरकारी बैंकों के निजीकरण की पैरवी की है, पर अगर यही इसका जवाब होता, तो कोई भी निजी बैंक कदाचरण के कठघरे में नहीं खड़ा होता. बैंकों में नियुक्तियां विशेषज्ञता की बजाए सेवा में बिताए साल की बिना पर की जाती हैं.

उधर, एक सियासी दंगल चल रहा है जिसमें भाजपा और कांग्रेस, दोनों एक दूसरे को दोषी ठहरा रही हैं. केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दावा किया कि मोदी को दिए गए 'कर्जों' की ज्यादा बड़ी तादाद 2011 और 2014 के बीच कांग्रेस की हुकूमत के दौरान मंजूर की गई थी.

अलबत्ता 15 फरवरी को दाखिल सीबीआइ की एफआइआर कहती है कि मोदी और उसकी कंपनियों ने अकेले 2017-18 में पीएनबी से 143 एलओयू जारी करवाकर 4,886.72 करोड़ रु. की लूट की. वकील-ऐक्टिविस्ट प्रशांत भूषण नेताओं-कारोबारियों की सांठगांठ को दोषी ठहराते हैं. उन्होंने एक न्यूज चैनल से कहा, ''ज्यादा बड़े स्तरों पर मिलीभगत रही है और इन बैंकों को इसे चलते रहने देने का सियासी इशारा किया गया है, वरना ऐसा होना बहुत, बहुत मुश्किल होता."

व्हिसलब्लोअरों के मेल को नजरअंदाज कर दिया गया—2013 में भी और 2015 में भी. इलाहाबाद बैंक में सरकार के नामजद किए गए एक पूर्व निदेशक दिनेश दुबे खुलकर सामने आए और कहा कि 2013 में उनके असहमति के नोट के बावजूद गीतांजलि जेम्स को कर्जों की मंजूरी दी गई थी.

वे दावा करते हैं कि उन्होंने उस वक्त आरबीआइ के डिप्टी गवर्नर के.सी. चक्रबर्ती को भी लिखा था. इसी तरह बेंगलूरू के कारोबारी हरि प्रसाद भी सामने आए और कहा कि चौकसी के हाथों 13 करोड़ रु. की कथित धोखाधड़ी का शिकार होने के बाद उन्होंने चौकसी और उसके समूह की कंपनियों के खिलाफ 2015 में सिटी पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाई थी.

उन्होंने दावा किया कि यही नहीं, उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआइ, सेबी और प्रधानमंत्री कार्यालय को भी लिखा था. पीएमओ ने उन्हें जवाब भी दिया और कहा कि उनकी शिकायत को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज को भेज दिया गया है, पर उसके बाद कुछ नहीं हुआ. गीतांजलि जेम्स के पूर्व एमडी संतोष श्रीवास्तव ने 19 फरवरी को दावा किया कि कंपनी में कामकाज के कई मुद्दे उठे थे, मगर चौकसी ने उन्हें अपने रसूख के दम पर दबा दिया.  

क्या वापस मिल पाएगी रकम?

नीरव मोदी और उसके परिवार से रकम हासिल करने की प्रक्रिया और मुकदमेबाजी लंबी चलने वाली है, इसमें कई साल लग सकते हैं. बताया जाता है कि जांच एजेंसियों ने मोदी के विभिन्न ठिकानों से 5,000 करोड़ रु. से ज्यादा के माल और प्रॉपर्टी को सील या जब्त किया है.

लेकिन इससे नीरव मोदी ब्रांड के वैल्यू को काफी ठेस पहुंचेगी, जिसकी वजह से जब इन प्रॉपर्टीज की बिक्री की जाएगी तो उनकी बहुत ज्यादा कीमत नहीं मिलेगी. मोदी ने पीएनबी प्रबंधन को जो लेटर लिखा है उसमें दावा किया है कि उसकी कंपनी का बकाया 5,000 करोड़ रु. से भी कम है. उसने कहा है कि अब मीडिया में बहुत ज्यादा प्रचार होने से पैसा लौटाना मुश्किल होगा.

बताया जाता है कि उसने चिट्ठी में लिखा है, ''अपने बकाए को तत्काल हासिल करने की आपकी अधीरता में, मेरे पेशकश के बावजूद (सार्वजनिक घोषणा से एक दिन पहले 13 फरवरी को और उसके दो दिन बाद भी) किए गए कार्यों ने मेरे ब्रांड और कारोबार को नष्ट कर दिया है, इसलिए अब आपके लिए यह सब बकाया वसूल पाना मुश्किल है." (इंडिया टुडे ने चिट्ठी नहीं देखी है)

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले साल के अपने बजट भाषण में यह घोषणा की थी कि वे देश छोड़कर भागने वाले आर्थिक अपराधियों की संपत्ति को जब्त करने का एक कानून लाने जा रहे हैं. सरकार मोदी के मामले को इस कानून को प्रभावी बनाने के परीक्षण के तौर पर ले सकती है.

अब सवाल उठता है कि मौजूदा जालसाजी की कितनी जिम्मेदारी पीएनबी की है? एक बैंकर ने कहा, ''इस मामले में पूरा पैसा लौटाने की जिम्मेदारी पीएनबी की है." ऐसी खबरें आई हैं कि रिजर्व बैंक ने पीएनबी को यह निर्देश दिया है कि वह पूरा पैसा उन बैंकों को लौटाए, जिन्होंने उसके एलओयू के आधार पर मोदी को रकम दी. पीएनबी के एमडी सुनील मेहता ने हाल में कहा, ''हम अपने सभी प्रामाणिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करेंगे."

पीएनबी घोटाला तो एक बड़ी गड़बड़ी का छोटा-सा सिरा हो सकता है. इसमें जितनी ही सख्ती बरती जाएगी, जनता के पैसे की निर्लज्जता से बर्बादी का ज्यादा-से-ज्यादा वाकया खुल सकता है. लेकिन यह ऐसा दर्द है जिसे भारतीय बैंकिंग सिस्टम को सहन करना ही होगा.  —साथ में, श्वेता पुंज

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