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चाक-चौबंद बनाने की जद्दोजहद

सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत क्या सेना का भारी आकार घटाकर उसे जंग के लिए अत्याधुनिक चुस्त फौज में तब्दील करने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना में कामयाब हो पाएंगे?

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संदीप उन्नीथननई दिल्ली, 14 January 2019
चाक-चौबंद बनाने की जद्दोजहद चंद्रदीप कुमार

आठ वरिष्ठतम लेफ्टिनेंट जनरलों और सेना प्रमुख की अगुआई में होने वाला सेना कमांडरों का अर्धवार्षिक अधिवेशन, सेना के बड़े फैसलों का सर्वोच्च मंच है. इसलिए जब जनरल बिपिन रावत ने इससे एक महीने पहले सितंबर 2018 में, सेना कमांडरों को अनौपचारिक बैठक के लिए बुलाया, तो सबने यही अंदाजा लगाया था कि कुछ तो पक रहा है. उनका अनुमान सही था. नई दिल्ली में हुए इस जुटान में, जनरल रावत ने सेना के सुधार और पुनर्गठन की एक योजना पेश की जिसकी कोशिश कई दशकों में नहीं हुई थी.

पिछली फरवरी में पेश रक्षा बजट में सेना के पास नए उपकरणों को खरीदने के लिए अब तक का अपना सबसे कम बजट उपलब्ध था—रक्षा बजट का मात्र 13 फीसदी या 26,826 करोड़ रु. ऐसा इसलिए था क्योंकि सेना के बजट का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा वेतन, ईंधन और गोला-बारूद खरीदने पर खर्च होता है. जब सेना के कमांडर औपचारिक रूप से अक्तूबर में फिर से मिले, वे जनरल रावत के शिनाख्त किए क्षेत्रों का विस्तृत जायजा लेने के लिए चार स्टडी ग्रुप को हरी झंडी दिखा चुके थे. चार लेफ्टिनेंट जनरलों के नेतृत्व में होने वाले ये चार अध्ययन, एक चार गुना विस्तारित मिशन हैं. ये अध्ययन फील्ड में तैनात सेना को चुस्त, पारंपरिक और हाइब्रिड युद्ध के लिए पूरी तरह से चाक-चौबंद बनाने, नई दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय के पुनर्गठन, अपने अधिकारियों के कैडर में युवाओं की झलक और सैनिकों की भर्ती की शर्तों को संशोधित करने से जुड़े हैं, क्योंकि अधिकांश 35 वर्ष की आयु में ही सेवानिवृत्त हो जाते हैं.

12 लाख संख्याबल वाली भारतीय सेना, चीन की 21 लाख जवानों वाली पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी थल सेना है. ऐसी संभावना जताई जा रही है कि इस पुनर्गठन से 1,00,000 सैनिकों की कटौती होगी और इससे सेना के राजस्व बजट (सैनिकों पर होने वाला खर्च) पर बोझ कम होगा. आने वाले वर्षों में राजस्व व्यय के 90 प्रतिशत से अधिक हो जाने का अनुमान है. जनरल रावत की इस व्यापक सुधार योजना का लक्ष्य है सेना को फिट बनाना और मौजूदा बजट से ही संसाधनों का प्रबंध करना.

योजना में, सेना के डिविजन की जगह, बल्क-अप ब्रिगेड की एक नई अवधारणा पेश की गई है जिसे इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप या आइबीजी कहा जाएगा. जनरल रावत अपनी इस योजना के तीन मुख्य उद्देश्य बताते हैं, ‘‘हमारी मौजूदा क्षमताओं को मजबूत करके भावी युद्ध के लिए तैयार रहना, अपने बजट को बेहतर बनाना और दक्षता बढ़ाना.ʼʼ (देखें बातचीत)

सेना के अधिकारी इसे, तीन दशकों में कैडर के पुनर्गठन का सेना का सबसे व्यापक प्रयास बता रहे हैं और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आजादी के बाद से सेना के इस सबसे दूरगामी परिवर्तन को कितने प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है.

2017 में रक्षा मंत्रालय ने ले. जनरल (रिटायर्ड) डी.बी. शेकतकर कमेटी की दिसंबर 2016 में प्रस्तुत जिस रिपोर्ट पर अमल करने की दिशा में कदम बढ़ाया था, जनरल रावत के ये हालिया प्रयास उस पहल को आगे लेकर जाते हैं. इन सुधारों के तहत अफसरों, जूनियर कमिशंड अफसरों (जेसीओ) और जवानों सहित 57,000 सैन्यकर्मियों की पुनः तैनाती और पुनर्गठन का काम होगा.

सुधार की शुरुआत हो चुकी है. पहली कड़ी में गुवाहाटी और उधमपुर में सेना की दो उन्नत बेस वर्कशॉप, जिनमें से प्रत्येक में 1,500 से अधिक लोग तैनात थे, बंद कर दी गईं और वहां तैनात सैन्यकर्मियों को सेना की यूनिटों में भेज दिया गया. इसके बाद लगभग 50 स्टेशन वर्कशॉप, जिनमें सेना के जवानों के साथ आंशिक रूप से आम लोगों की भी सेवाएं ली जाती हैं और सैन्य इंजीनियर (ईएमई) कोर में काट-छांट की बारी आएगी. इनमें से ज्यादातर को सरकार के स्वामित्व वाले व्यावसायिक रूप से संचालित मॉडल (जीओसीओएमओ) उद्योगों को आउटसोर्स कर दिया जाएगा.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर की सेना की डाक व्यवस्था और शांतिकाल में चलने वाले सैन्य फार्मों को बंद कर दिया जाएगा. हालांकि पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के दिमाग की उपज, शेकतकर समिति ने जिन सुधारों का प्रस्ताव दिया था, उसमें सेना की मददगार आपूर्ति वाहिनी और इंजीनियर कोर का आकार घटाने की बात ही की गई थी. समिति ने फील्ड में तैनात सेना के संयोजन में किसी बदलाव की सिफारिश नहीं की थी. लेकिन जनरल रावत के पुनर्गठन प्रयासों में वही क्षेत्र शामिल हैं जिन पर कमेटी ने किसी बदलाव की सिफारिश नहीं की है.

विशाल आइबीजी फोर्स  

जनरल रावत अपने दो-टूक अंदाज के लिए जाने जाते हैं. युद्ध मोर्चे पर तैनात जवानों के नेतृत्व के लिए महिला अधिकारियों को अनुपयुक्त बताए जाने संबंधी उनकी टिप्पणियों पर सोशल मीडिया पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया देखी गई. बेशक उनकी साफगोई कई बार लोगों को नागवार गुजरती है लेकिन उनमें अपने पीछे एक मजबूत सैन्य विरासत छोड़कर जाने का दृढ़ निश्चय भी स्पष्ट दिखता है. सैन्य दिग्गजों की हालिया बैठक में रावत ने कहा कि वे ऐसा संगठन छोड़कर जाना चाहते हैं जो चुस्त, तंदुरुस्त और सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम हो.

दिसंबर में जारी सेना की थल युद्घ सैद्धांतिकी में रावत की स्पष्ट छाप है. उसमें सैन्य अभियानों में परंपरागत युद्घ शैली की केंद्रीय भूमिका पर जोर है. यह भी कि सेना आतंकवाद, अलगाववाद विरोधी और छद्म युद्धों के खिलाफ अभियान जारी रखेगी.

उनके पुनर्गठन से उम्मीद है कि सेना बजटीय और परमाणु, दोनों तरह की चुनौतियों के मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगी. दोनों संभावित शत्रु—चीन और पाकिस्तान—परमाणु हथियारों से लैस हैं. रावत समझते हैं कि दोनों दुश्मनों के किसी संभावित साझा मोर्चे की चुनौतियों से निपटने से जुड़ी तैयारियों के लिए जितने बड़े रक्षा बजट की जरूरत है, वह सेना को शायद ही मिले. इसलिए उन्होंने इसका दूसरा रास्ता निकाला है और वे पारंपरिक युद्ध के लिए बनी क्षेत्रीय संरचनाओं में कतरब्योंत कर रहे हैं.

सेना में संरचनात्मक सुधार के जो भी प्रयास हुए हैं, विशेष रूप से युद्ध के लिए फील्ड की तैनाती, वे आम तौर पर यथास्थिति को बदलने के लिए प्रयासरत खास शख्सियतों से ही जुड़े रहे हैं. पिछली बार 1980 के दशक के मध्य में ऐसी पहल हुई थी जब दूरदर्शी सेना प्रमुख जनरल के. सुंदरजी ने अमेरिकी हवाई-जमीनी लड़ाई की अवधारणा को अपनाकर चार इनफैंट्री डिविजनों को पुनर्गठित करके उसे रिऑर्गेनाइज्ड आर्मी प्लेन्स इनफैंट्री डिविजन यानी रैपिड बनाया था. उन प्रत्येक मोबाइल डिविजन में दुश्मन की आक्रमण पंन्न्ति को ध्वस्त करने के लिए युद्धक टैंकों से लैस एक ब्रिगेड और दो मैकेनाइज्ड इनफैंट्री ब्रिगेड थे जो नई बख्तरबंद गाडिय़ों के जरिए सैनिकों को युद्धस्थल पर पहुंचाएं.

सेना के उप प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल लच्छू सिंह रावत के पुत्र बिपिन रावत को सरकार ने दिसंबर 2016 में दो अन्य वरिष्ठ जनरलों की वरीयता की अनदेखी करके सेना प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी थी. तब से, वे लगातार अपने फील्ड कमांडरों को युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार रहने को प्रोत्साहित कर रहे हैं. 2001 में पाकिस्तान की सीमा पर 10 महीने लंबे चले ऑपरेशन पराक्रम गतिरोध के बाद सेना की युद्ध की रणनीति ‘‘कोल्ड स्टार्टʼʼ विकसित हुई, जिसमें सेना के लिए कुछ घंटों के नोटिस पर लड़ाई में कूद पडऩे के लिए तैयार होने की परिकल्पना की गई है.

लेकिन, एक जनरल कहते हैं, रावत के आने से पहले ही कोल्ड स्टार्ट से संबंधित कई सामरिक प्रयास शुरू हो चुके थे. एक जनरल कहते हैं, ‘‘वे उन्हीं को लागू करने के गंभीर प्रयास कर रहे हैं.ʼʼ प्रस्तावित योजनाओं में एक योजना वर्तमान में चीन के सामने खड़ी सेना की मौजूदा संख्या को चार डिविजन से घटाकर सिर्फ दो करने की है.

अगर जनरल सुंदरजी ने सेना को रैपिड दिया, तो जनरल रावत आइबीजी को आगे बढ़ाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं. पैदल सेना, टैंक, तोपखाने और मशीनीकृत पैदल सेना से लैस, आइबीजी की कमान एक मेजर जनरल को सौंपी जाएगी और यह सेना के 14 कोर-आकार की संरचना के तहत सीधे संचालित होगी. यह अवधारणा अमेरिकी सेना के मनूवर यूनिट, पैदल सेना ब्रिगेड लड़ाकू समूह और चीन की पीएलए के संयुक्त हथियार ब्रिगेड के समान है, जिसे चीन 2013 से शुरू अपने सैन्य पुनर्गठन अभियान के तहत तैयार कर रहा है.

आइबीजी मूलभूत इनफैंट्री डिविजन, ऑल-आर्म्स फाइटिंग यूनिट की जगह लेगा. प्रत्येक इनफैंट्री डिविजन में करीब 18,000 सैनिकों के साथ 80 टैंकों का एक बख्तरबंद ब्रिगेड और 500 तोपों के साथ एक आर्टिलरी (तोपखाना) ब्रिगेड होता है और यह स्वतंत्र रूप से युद्धक्षेत्र में जमीनी युद्ध लडऩे में सक्षम है. सेना में एक राय है कि सभी 45 इनफैंट्री डिविजनों को लगभग 140 आइबीजी में बदल देना चाहिए. हालांकि, यह इस साल चंडीमंदिर स्थित पश्चिमी कमान के दो कोर में होने वाले एक परीक्षण के परिणामों पर निर्भर करेगा. 2,900 किलोमीटर लंबी भारत-पाक सीमा एक समान नहीं है.

कश्मीर में एलओसी का इलाका ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों का है तो जम्मू में अखनूर और छंब में सीमा रेखा मैदानी इलाके में है. पंजाब के साथ लगने वाली सीमा नदियों के जाल के बीच आड़ी-तिरछी है जबकि राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती इलाके रेगिस्तान और दलदल वाले हैं. पाकिस्तान के साथ पश्चिमी सीमा पर प्रत्येक आइबीजी, उस क्षेत्र विशेष को ध्यान में रखकर होगा और युद्ध की स्थिति में अलग-अलग क्षेत्र को युद्ध की खातिर सीमा पार करने के लिए अलग-अलग तरह के संसाधनों की आवश्यकता होगी. रेगिस्तानों में एक अलग व्यवस्था होगी. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ‘‘सेना प्रमुख प्रत्येक क्षेत्र के लिए, खासकर क्षेत्र विशेष के लिए बने आइबीजी को उसकी जरूरतों के उपकरणों से लैस करना चाहते हैं.ʼʼ

 सेना को लगता है कि आइबीजी एक तीर से कई निशाने साधने वाली व्यवस्था होगी. वे कोर मुख्यालय के अधीन सीधे संचालित होंगे, इस प्रकार उन्हें डिविजन मुख्यालयों से अलग कर दिया जाएगा. इस तरह लगभग 140 आइबीजी को कमांड करने के लिए लगभग 95 अतिरिक्त मेजर जनरलों की आवश्यकता होगी, जिससे निचले रैंक के अधिकारियों की पदोन्नति की संभावना बढ़ जाएगी. वर्तमान में, एक कर्नल को ब्रिगेडियर बनने के लिए लगभग 6-8 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है. सेना ने ब्रिगेडियर रैंक के महत्व को कम करके इसे ‘‘गैर-चयनʼʼ ग्रेड वाली नियुक्ति कर देने का प्रस्ताव दिया है क्योंकि यह भारतीय वायु सेना के एयर कमोडोर और नौसेना में कमोडोर के समकक्ष रैंक है. इस प्रकार सभी कर्नल स्वतरू ब्रिगेडियर बन जाएंगे, जिससे उन्हें उच्च वेतन प्राप्त होगा और उनके मेजर जनरल बनने की संभावना बढ़ जाएगी. ब्रिगेडियर की संख्या 1,165 से घटकर 936 तक हो जाएगी जबकि मेजर जनरलों की संख्या 301 से बढ़ाकर 396 हो जाएगी. यानी कुल मिलाकर सेना में 134 अधिकारी कम हो जाएंगे.

सेना ने अपने सभी डिविजन मुख्यालयों को हटाने का प्रस्ताव दिया है क्योंकि कोर अब सीधे आइबीजी को नियंत्रित करेंगे. वे एनसीसी निदेशालय, सैन्य प्रशिक्षण निदेशालय और उप महानिदेशक सैन्य फार्मों को भी समाप्त कर देंगे. कई अन्य निदेशालयों का विलय किया जाएगा. परिप्रेक्ष्य योजना (पर्सपेक्टिव प्लानिंग) और हथियार व उपकरण (वेपन ऐंड इक्विप्मेंट) के महानिदेशालयों का विलय करके एक महानिदेशक (पीपी ऐंड डब्ल्यूई) बनाया जाना है. महानिदेशक सिग्नल और दूरसंचार और महानिदेशक सूचना प्रौद्योगिकी का डीजी-एसटी में विलय होगा.

इस प्रकार से बचे कुछ अधिकारियों को हाइब्रिड वारफेयर के लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शेपिंग ऑफ इन्फॉर्मेशन एन्वायरमेंट (डीजीएसआइई) में ले जाया जाएगा. हाइब्रिड युद्ध एक ऐसी सैन्य रणनीति है, जो पारंपरिक युद्ध प्रणाली के साथ-साथ अनियमित युद्ध, कानूनी, साइबर युद्ध और कूटनीति का संयोजन करके एक बेहद घातक युद्धकौशल बन जाता है. यह प्रस्तावित विशेष बल, सेना को रक्षात्मक हाइब्रिड युद्ध की चुनौतियों से लडऩे में सक्षम बनाएगा.

पैसे कहां हैं

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना कई चुनौतियों का सामना कर रही है, जिनमें प्रत्येक चुनौती में पिछले तीन दशकों में काफी बदलाव आ चुका है. यह जम्मू-कश्मीर में एक आंतरिक विद्रोह से लड़ रही है जिसकी तीव्रता अलग-अलग समय पर अलग-अलग हो जाती है. इसके सैनिक पाकिस्तान और चीन के साथ 4,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमाओं पर डटे हैं. सेना की रणनीति अब खुद को चीन-पाकिस्तान के संयुक्त रूप से छेड़े एक पूर्ण पारंपरिक युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार रखना है. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ‘‘सिर्फ दो-मोर्चे पर छिड़े युद्ध को लडऩे की तैयारी नहीं करनी है, बल्कि दोनों ही मोर्चों पर निर्णायक सैन्य बढ़त हासिल करने की भी तैयारी चाहिए.ʼʼ हालांकि इसमें अगर कुछ नाटकीय रूप से बदला है तो वह इन तैयारियों के लिए आवश्यक भुगतान की सेना की क्षमता.

अगले दशक में, सेना को अपने 1980 के शस्त्रागार को बदलकर नए लड़ाकू हेलिकॉप्टरों, युटिलिटी हेलिकॉप्टरों और मिसाइलों के लिए कम से कम 1,00,000 करोड़ रु. की आवश्यकता है. सेना के पास 8,00,000 से अधिक पैदल सेना है. यानी इसकी खरीदारी की सूची में सबसे सस्ती वस्त—राइफल, कार्बाइन और हल्की मशीनगनों—के लिए ही 15,000 करोड़ रु. की जरूरत होगी. इसके अलावा, सेना चीन के साथ युद्ध की तैयारियों के मद्देनजर माउंटेन स्ट्राइक कोर के तीन डिविजन बना रही है. सूचना क्रांति के दौर में जन्मे नए खतरों से निपटने के नए निदेशालयों और उनके लिए स्टाफ की भी जरूरत होगी.

इन सबके लिए सेना के बजट में बड़ी वृद्धि की जरूरत है. ऐसे समय में जब सरकार का पूरा ध्यान राजस्व और आय के अंतर को पाटकर राजकोषीय घाटे को कम करने पर केंद्रित है, सेना के लिए बजट वृद्धि की संभावना कम ही है. इस साल के बजट में भी सेना को पूंजीगत व्यय के मद में 17,756 करोड़ रु. और राजस्व मद में 24,755 करोड़ रुपए कम मिले, जितनी उसने मांग रखी थी. थल सेना को रक्षा बजट का 55 प्रतिशत मिलता है, लेकिन यह तीनों सेवाओं के राजस्व बजट का 69 प्रतिशत हिस्सा निगल जाती है. सेना ने बजट बढ़ाने की मांग करते हुए तर्क दिया कि रक्षा बजट में जीडीपी का 1.58 प्रतिशत दिया गया जो पिछले 50 वर्षों में सबसे कम है. 

रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे के 23 जुलाई, 2018 को राज्यसभा में बयान से सरकार की सोच को समझा जा सकता है. भामरे ने कहा, ‘‘जीडीपी बहुत तेजी से बढ़ रही है इसलिए जीडीपी के प्रतिशत के रूप में रक्षा बजट तो कम किया जा सकता है पर रक्षा बजट के लिए आवंटित धन की मात्रा में कमी नहीं होगी.ʼʼ

अपने तर्क के समर्थन में भामरे ने इस साल के कुल रक्षा बजट का उल्लेख किया जो 4.04 लाख करोड़ रु. (न कि 2.9 लाख करोड़ रु. जो सरकार केवल सशस्त्र बलों पर खर्च करती है) था. इसमें सैन्य पेंशन भी शामिल है, जिसे 1980 के दशक में सशस्त्र बलों के बजट से हटाकर रक्षा मंत्रालय के बजट के तहत रखा गया था. अगर इसे संपूर्णता में देखा जाए तो रक्षा बजट वास्तव में इस छिपे हुए पेंशन घटक के कारण 31 प्रतिशत बड़ा है. भामरे ने कहा, 2018-19 में रक्षा बजट केंद्र सरकार के कुल खर्च का 16.6 प्रतिशत होगा.

भारत अपने दो करोड़ रक्षा पेंशनरों के लिए एक वर्ष में 15 अरब डॉलर (1 लाख करोड़ रु.) का भुगतान करता है. यह आंकड़ा सेवारत कर्मियों को किए जाने वाले भुगतान के लगभग बराबर है. विश्लेषकों का कहना है कि यह आंकड़ा इस साल के पाकिस्तान के 9.6 अरब डॉलर के रक्षा बजट से अधिक है और आने वाले वर्षों में इसमें इजाफा होगा जिससे सैन्य बजट का राजस्व घटक बढ़ जाएगा.

नौसेना और वायु सेना को थल सेना के मुकाबले छोटे परिव्यय ही प्राप्त हुए हैं. नौसेना ने 37,932 करोड़ रु. मांगे, लेकिन उसे 20,848 करोड़ रु. ही दिए गए जो उसके हिसाब से 17,084 करोड़ रु. कम थे. भारतीय वायु सेना को इसकी मांग से 41,924 करोड़ रु. कम मिले. बजटीय वृद्धि मामूली रही जिससे मुश्किल से मुद्रास्फीति की ही भरपाई हो सकी. इससे चारों ओर निराशा है. रक्षा उपकरणों के आयात पर कोई आयात शुल्क नहीं लगता था लेकिन 2017 में सरकार ने यह छूट भी हटा ली जिससे परेशानियां और बढ़ गईं. इससे तीनों सैन्य सेवाओं के पूंजीगत बजट पर 20 प्रतिशत की मार पड़ी है.

सैन्य सेवा के एक प्रमुख ने इंडिया टुडे को बताया, बजट में कटौती, सरकार के इरादे और हकीकत के बीच की खाई को दर्शाती हैं. वे कहते हैं, ‘‘हम महाशक्ति होने की आकांक्षा रखते हैं और हम रणनीतिक रूप से स्वायत्त होना चाहते हैं जिसका अर्थ है कि हम सैन्य गठबंधन नहीं कर सकते. लेकिन बड़ी शक्ति बनाने के लिए रक्षा खर्च में बढ़ोतरी की आवश्यकता होती है, जो हो नहीं रही है.ʼʼ

क्या यह हो सकेगा?

राजस्व और पूंजी के बीच असंतुलन का सामना, रावत के कई पूर्ववर्तियों ने भी किया. जहां तक 1975 की बात है तो लेक्रिटनेंट जनरल के.वी. कृष्णा राव ने एक समिति का गठन किया जिसने सेना में युद्धकर्मियों और आपूर्ति व रसद कर्मियों के अनुपात को घटाने की आवश्यकता बताई थी. 1998 में, जनरल वी.पी. मलिक ने अनौपचारिक रूप से सेना के भीतर 50,000 रिक्तियां घटा दीं जिसे ‘‘सेव एंड राइजʼʼ कहा जाता था. सेना संख्या बल कम करेगी और सेवानिवृत्त सैनिकों की जगह नई भर्तियां नहीं करेगी. यह शानदार विचार था, लेकिन 1999 के करगिल युद्ध के कारण इसे ताक पर रख दिया गया. सेना ने नियंत्रण रेखा पर कमी की भरपाई के लिए दो नए कोर, एक लद्दाख और दूसरा पठानकोट में, बनाए और रातोरात 1,50,000 से अधिक सैनिकों की भर्ती की.

सशस्त्र बलों में करियर अन्य जगहों से बेहतर हैं, ऐसा दर्शाने के लिए उन्होंने पिछले 20 वर्षों में छठे और सातवें वेतन आयोग के तहत उच्च वेतन और भत्ते तथा पेंशन का प्रस्ताव दिया. अब यह भारी पड़ रहा है. सेना के एक अधिकारी का कहना है, ‘‘हम असमंजस की स्थिति में हैं.ʼʼ एक अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का कहना है, ‘‘सशस्त्र बल एक कम प्राथमिकता वाला करियर विकल्प है इसलिए लोगों को आकर्षित करने के लिए वेतन को उसी स्तर पर रखना पड़ता है वरना आपको अच्छी प्रतिभाएं नहीं मिलेंगी.ʼʼ

जनरल रावत को भरोसा है कि सरकार उनके पुनर्गठन को मंजूरी देगी. इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए क्योंकि 1962 के युद्ध में हार के बाद से, जब नेहरू सरकार पर आरोप लगा था कि उन्होंने सेना पर एक अलोकप्रिय जनरल को थोप दिया था, लगातार सरकारें सेना की व्यवस्था से जुड़े फैसले उस पर ही छोड़ देती हैं.

लेकिन क्या वित्त मंत्रालय, जो बजट आवंटित करता है, राजस्व बचत को पूंजी खाते में स्थानांतरित करेगा? पूर्व में ऐसा कोई अवसर नहीं रहा जिसके आधार पर यह भरोसा किया जा सके. फिर भी, रावत का मानना है कि सरकार उनकी बात को समझेगी. वे कहते हैं, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि सरकार हमारा समर्थन करेगी. जब हम सरकार को बताएंगे कि हमने आधा रास्ता तय कर लिया है, अब क्या आप भी आधा रास्ता तय करने को तैयार हैं? मुझे यकीन है कि वे समझ जाएंगे.ʼʼ बहरहाल, यह देखना बाकी है कि वित्त मंत्रालय इस पर कैसी प्रतिक्रिया देता है. 

रक्षा मंत्रालय के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस (आइडीएसए) के एक विद्वान लक्ष्मण कुमार बेहरा कहते हैं, ‘‘पहले से ही सरकार के पूरे पूंजीगत खर्च का 33 प्रतिशत हिस्सा रक्षा मंत्रालय को चला जाता है. यह कहना मुश्किल है कि वित्त मंत्रालय इस आवंटन को क्यों बढ़ाना चाहेगा. सभी बचत केवल भारत के समेकित कोष में जाएगी.ʼʼ

उत्तरी सेना के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग का कहना है कि जब तक सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को अंतिम रूप नहीं देती तब तक सारे सुधार निरर्थक हैं. इसके बिना वह सैन्य आधुनिकीकरण, मसलन अमेरिका या चीन की सेनाओं की तरह युद्ध के मैदान में मौजूद सैनिकों को सूचना-प्रौद्योगिकी और संवेदी नेटवर्क से लैस करने का काम शायद ही कर सकेगी. सैन्यबल की संख्या को कम करने पर सरकार ने भी चिंता जताई है.

एनएसए अजीत डोभाल के तहत काम करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड की ओर से पिछले नवंबर में सौंपी गई एक रिपोर्ट में खर्च में कटौती के लिए 20 फीसदी स्थायी सेना को आरक्षित सेना के रूप में रखने की सिफारिश की गई है. सेना की ओर से किए जा रहे चार अध्ययनों से अलग इस रिपोर्ट को उत्तरी सेना के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा ने तैयार किया था. हालांकि यह भी एक बड़ी विसंगति है कि ऐसी सभी सुधार योजनाएं, जिनमें जनरल रावत की ओर से पेश योजनाएं भी शामिल हैं, ऐसे समय में आ रही हैं जब सरकार तेजी से चुनाव के मोड में जा रही है. और इसलिए जनरल रावत के बदलाव के प्रयास पर निर्णय होंगे, इस पर भी संदेह है.

संयुक्त कमान की मरीचिका

बजट की समस्याओं का सामना तीनों सेवाओं को करना पड़ रहा है इसलिए निदान की दिशा में प्रयास के लिए भी संयुक्त दृष्टिकोण की जरूरत है. लेफ्टिनेंट जनरल शेकतकर कहते हैं, ‘‘भविष्य के युद्ध केवल सेना या पैदल सेना केंद्रित नहीं रहेंगे. उन्हें एक साथ लडऩे के लिए सभी तीन सेवाओं की आवश्यकता होगी. इसलिए, संयुक्तता—एक साथ लडऩे वाली तीनों सेवाएं—समय की मांग हैं.ʼʼ

ये ऐसे समाधान हैं जिन्हें राजनैतिक स्तर पर आगे बढ़ाया जाना है. लेकिन यहां फिर से, सरकार को अभी तक शेकतकर समिति की सबसे विवादास्पद सिफारिशों में से एक पर काम करना है. केवल तीन संयुक्त थिएटर कमान उत्तर, दक्षिण और पश्चिम को बनाए रखने की सिफारिश की गई है जिससे मौजूदा 17 कमान का विलय हो जाएगा. प्रत्येक कमान, एक थिएटर कमांडर को रिपोर्ट करेगा. थिएटर कमांडर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) को रिपोर्ट करेंगे, जो सरकार के एकल बिंदु सैन्य सलाहकार हैं. इसे अभी एक स्थायी अध्यक्ष, चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के प्रस्ताव पर भी फैसला करना है. वर्तमान में, तीनों सेवा प्रमुखों में से जो सबसे वरिष्ठ होता है, उसे यह पद रोटेशन में दिया जाता है. वर्षों तक, तीनों सेवाएं स्थायी अध्यक्ष की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों पर आम सहमति नहीं बना सकीं. वर्षों बाद, हालांकि इस साल उन्होंने अकल्पनीय प्रयास किया. सीओएससी के अध्यक्ष नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा कहते हैं कि तीनों सेनाओं ने अंततः स्थायी अध्यक्ष, सीओएससी पर अपने मतभेदों को दफन कर दिया और इस साल के शुरू में सरकार के सामने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया. अब, गेंद सरकार के पाले में है.

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