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साइबर पर बेपर्दा होती बाली उमर

माता-पिता की पीढ़ी इन शब्दों और कोड वर्ड से बिल्कुल अनजान है. यह इंटरनेट पर यंग जेनरेशन की नई भाषा है, जिसके जरिए वे अपने सिक्रेट शेयर करते हैं. लेकिन सावधान! इंटरनेट पर इस बातचीत को हो सकता है कि कोई लंपट सुन-देख रहा हो. फिलहाल तो फेसबुक जैसे सोशल साइट आधुनिक किशोरों के लिए पढ़ने का कोना भी है और खेल का मैदान भी.

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aajtak.in
सोनाली आचार्जी और अदिति पैनई दिल्ली, 16 October 2013
साइबर पर बेपर्दा होती बाली उमर

जब पिछले महीने हर्ष कनोरिया के अंग्रेजी के टेस्ट के नंबर तीस प्रतिशत से नीचे चले गए तो उसकी मां को चिंता हुई. उन्होंने हर्ष की नोट बुक, ई-मेल और फेसबुक पोस्ट खंगाली तो पता चला कि उनका 15 वर्षीय बेटा अब आम लफ्जों में नहीं, कोड में अपनी बातों को लिखता है. यह अपरिचित जुबान थी.

अंकों और अक्षरों में गुंथे हुए कोड, गूढ़ शब्द और कुछ खिचड़ी शब्द जो किसी सीक्रेट मिशन से लिए हुए लगते थे. साथियों का एक झुंड बियर की बोतलों के बीच बैठा था और पोस्ट पर Ridneck, पिछली रात MWI हो गया था, PIR TTYL जैसे अक्षर चमक रहे थे. हर्ष की साइबर दुनिया से बेखबर आर्किटेक्ट मम्मी जब इन शब्दों की गुत्थी को नहीं सुलझ पाईं तो उन्होंने इन्हें कुछ ऐसी वेबसाइट्स पर डाला जो किशारों के फेसबुक कोड बताती हैं.

तब उन्हें इसमें छिपे गुप्त संदेश पढऩे को मिले-‘‘शर्म आती है,’’ ‘‘कल रात नशे में टली हो गया था’’, ‘‘पेरेंट्स कमरे में हैं,’’ बाद में बात करते हैं. मुंबई के संभ्रांत सबअर्बन स्कूल का यह छात्र अब वीकेंड में एक काउंसलर के पास बैठकर फेसबुक की शब्दावली को भूलने के साथ-साथ यह भी सीख रहा है कि अजनबियों के सामने अपनी अंतरंग बातें नहीं बतानी चाहिए.

हर्ष का इलाज कर रहीं मुंबई की चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट सुधा रामेश्वर ने बताया, ‘‘आज के किशोर अपनी जिंदगी और निजी पलों की जानकारी जिस तरह एकदम अजनबी लोगों को बता देते हैं, उसे देखकर हैरत होती है. असल में इन सब बातों को अपने माता-पिता से छिपाने के लिए वे कोड वर्ड्स का सहारा लेते हैं, जबकि बच्चों और पेरेंट्स के रिश्तों को सबसे खुला होना चाहिए. वे सच्चाई से भागकर नकली दुनिया में रहने लगते हैं और असल जिंदगी में बेहद गोपनीय हो जाते हैं, जिस वजह से पहचान का संकट खड़ा हो जाता है.’’

हर्ष की तरह पूरे भारत में फेसबुक और चौट के दीवाने करोड़ों किशोर कोड से जुड़ी एक नई लैंग्वेज सीख रहे हैं, एक ऐसी जुबान जिससे उनके माता-पिता ही नहीं बल्कि कभी-कभी उनसे ठीक पहले की पीढ़ी भी अनजान है. एसओएस सिगनल से लेकर ड्रग्स के लिए कोड और सेक्स की बातों के लिए संक्षिप्त शब्दों वाली यह नई लैंग्वेज बन रही है और दूसरे लोगों को छकाने के लिए है.

वे ‘E’ (एक्सटेसी ड्रग) बांटते हैं, ‘juice’ (वीड यानी चरस) मांगते हैं, चौट विंडो में हॉट गर्ल्स से कहते हैं, TDTM (टॉक डर्टी टू मी यानी मुझसे गंदी बात करो) और झटपट यह एलान करने के बाद कि वे ‘Legal’ (16 की उम्र और सेक्स करने की अनुमति) हैं. साफ  कहते हैं, IWSN (आई वांट सेक्स नाउ यानी मुझे सेक्स करना है). वे अपनी दबी हुई भावनाएं और सीक्रेट्स को असली दुनिया की बजाए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटस पर पोस्ट करते हैं, कैंपस में नए बच्चे की रैगिंग करते हैं और पार्टनर बनाते हैं.

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के जेन वाइ सर्वेक्षण 2012-13 के नतीजे बताते हैं कि 1996 के बाद जन्मी पीढ़ी में से करीब 74 फीसदी फोन पर बात करने की बजाए सोशल मीडिया को पसंद करते हैं और सर्वेक्षण में शामिल 92 फीसदी के लिए साथियों से संपर्क का पहला माध्यम फेसबुक जैसे नेटवर्क हैं.

शहरी किशोरों में स्मार्टफोन का होना अनिवार्य होता जा रहा है. किसी भी समय चाहें वे चल ही क्यों न रहे हों, चोट करना अब आम बात हो चुकी है. टीसीएस सर्वेक्षण यह भी बताता है कि 17 साल से कम उम्र में हर दस में से छह किशोरों के पास स्मार्टफोन रहता है, जिससे उनके बीच बातचीत का माध्यम साइबर कम्युनिकेशन हो गया है.



जिंदगी उतनी प्राइवेट नहीं रही
जब एनआरआइ अनमोल सरना ने कनाडा में अपनी वीड (चरस) की मस्ती और कॉलेज में नशे की हालत में झगड़ों की जानकारी फेसबुक और ट्विटर पर डाली थी, तब उसे इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि एक दिन उसका हर शब्द देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में छपेगा. इस 21 वर्षीय एनआरआइ नौजवान की 13 सितंबर को दिल्ली में त्रासदीपूर्ण हालात में मौत हो गई.

कहते हैं कि उसकी रेव पार्टी (नशे और मस्ती की पार्टी) में सब गड़बड़ हो गया था. वैसे सोशल मीडिया पर अपना सब कुछ उधेड़कर रख देने वाला वह अकेला नौजवान नहीं है. इंस्टाग्राम पर पहली डेट की तस्वीरों से लेकर फेसबुक पर अपनी वर्जिनिटी (कौमार्य) खोने की पोस्ट तक, ट्विटर पर परीक्षा के पर्चे में नकल से लेकर बदला लेने वाली विशेष अश्लील वेबसाइट्स पर अपनी पूर्व प्रेमिका के नंगे कार्टून तक आज ऑनलाइन पोस्ट में कुछ भी बहुत प्राइवेट नहीं रह गया है.

दिनेश वर्मा (बदला हुआ नाम) का कहना है, ‘‘अनमोल तो एक औसत नौजवान था. जब आप किसी ट्वीट का जवाब देते हैं या किसी के स्टेटस पर टिप्पणी करते हैं तो आपको जरा भी अंदाजा नहीं होता कि एक दिन सारी दुनिया इनको देख-पढ़ लेगी. यह एक बुलबुले जैसा है, जिसमें आप अपनी जिंदगी को प्राइवेट और सुरक्षित मानते हैं, असल में ऐसा होता नहीं है.’’  अनमोल के कुछ दोस्तों ने दिल्ली के 20 वर्षीय दिनेश की जान-पहचान न्यूयॉर्क के हिक्सविल में कराई थी, जहां वह बड़ा हुआ था.

हाल ही में हैदराबाद में एक 14 वर्षीया स्कूली छात्रा उस समय हैरान रह गई, जब उसकी फेसबुक पर उसे बाइसेक्सुअल और लेस्बियन (समलैंगिक) बताने वाले संदेशों की बौछार होने लगी. असल में उसने अपनी सबसे खास सहेली को गले लगाने की तस्वीर फेसबुक पर डाल दी थी. उसने यह तस्वीर हटा दी, फिर भी उसके पेज पर अश्लील कमेंट बरसते रहे. इस साइबर दादागीरी के सदमे से उबरने के लिए उसे काउंसलर की मदद लेनी पड़ी.

पुणे में किशोरों की काउंसलिंग करने वाले ध्रवव फनसालकर का कहना है, ‘‘अधिकतर लोगों के लिए सोशल नेटवर्किंग अपनी हर छोटी-बड़ी बात की नुमाइश करने के लिए है. वे ये नहीं जानते कि निजी तस्वीरों और गतिविधियों की जानकारी से उन्हें भावनात्मक रूप से चोट पहुंच सकती है.’’

फर्स्ट मंडे नाम की एक ऑनलाइन पत्रिका के सर्वेक्षण से पता चला कि अमेरिका में यूनिवर्सिटी के पहले साल के 1,115 छात्रों के समूहों में से सिर्फ 26 प्रतिशत ने फेसबुक पर अपनी प्राइवेसी सेटिंग नियमित रूप से अपडेट की और उस पर नजर रखी. सर्वे में जवाब देने वाले अधिकतर नौजवानों को सोशल मीडिया नेटवर्क्स पर प्राइवेसी के बारे में या तो कोई जानकारी नहीं थी या कोई दिलचस्पी नहीं थी.

गुडग़ांव में स्टुडेंट्स काउंसलर 42 वर्षीया सुनीता मखचंदानी के मुताबिक, ‘‘छात्र जानते हैं कि ऑनलाइन प्राइवेसी सेटिंग्स होती हैं, लेकिन  नियमित रूप से उन्हें चेक नहीं करते. इसकी वजह यह है कि बहुत लोग सोशल मीडिया नेटवर्क्स का इस्तेमाल करते हैं. लोग अपने आप मान लेते हैं कि जब इतने सारे लोग इस साइट को इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह सुरक्षित ही होगी.

बिना सोचे-समझे स्कूल में टॉयलेट ब्रेक से लेकर सिगरेट पीने तक हर बात की जानकारी ऑनलाइन पोस्ट की जा रही है.’’ अनमोल ने अपनी पोस्ट में खुलेआम अपने दोस्तों को निग्गाज (हब्शी) कहा था. इससे पता चलता है कि प्राइवेट ऑफलाइन जिंदगी और दिखने में प्राइवेट वर्चुअल जिंदगी के बीच की विभाजन रेखा मिटती जा रही है.



नीरस और खतरनाक
बहुत-से बच्चों के लिए सोशल मीडिया, स्कूल के बाद का नया शगल है. नॉर्टन ने 18 से 64 साल के अक्सर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले 500 लोगों के बीच एक सर्वेक्षण किया, जिससे पता चला कि एक औसत भारतीय हफ्ते में 9.7 घंटे फेसबुक करते हुए गुजारता है. दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज की प्रिंसिपल मीनाक्षी गोपीनाथ का कहना है कि पेरेंटिंग और शिक्षा किशोरों की ऑनलाइन जिंदगी तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

एकल परिवार, किशोरावस्था से पहले अनदेखी, साथियों का दबाव और समाज में एक-दूसरे को जोडऩे वाले संपर्कों का अभाव बहुत से लोगों को ऑनलाइन जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर रहा है. गोपीनाथ कहती हैं, ‘‘जब हम बड़े हो रहे थे तो संगीत या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाते थे, दादा-नाना के साथ घूमने जाते थे और अगर वाकई में कोई दिन उबाऊ होता था तो कॉलोनी के दोस्तों के साथ पिट्ठू खेल लेते थे.

आज के बच्चे पूरी तरह एकल माहौल में जी रहे हैं. पहले जो समय ऑफलाइन सामाजिक संपर्कों में बीतता था, अब वह सोशल मीडिया पर गुजरता है.’’

यह पीढ़ी ज्यादा से ज्यादा समय साइबर स्पेस में बिता रही है और साइबर स्पेस में साइबर स्नूपिंग और नफरत फैलाने वाले समूहों की ओर से ऑनलाइन धमकाने जैसी कई घटनाएं सामने आ रही हैं. पिछले दिनों दिल्ली में एक लड़के ने अपने एक सहपाठी को इसलिए पीट दिया कि उसने शराब की एक पार्टी की तस्वीर को डिजिटली बदलकर ऑनलाइन पोस्ट कर दिया था.

साइबर सदमे की घटनाओं और पिछले दिनों सोशल मीडिया पर धमकाए जाने के बाद अमेरिका में 13 वर्षीया छात्रा की आत्महत्या की खबर आने के बाद माता-पिता, शिक्षक और विशेषज्ञ सोशल नेटवर्किंग के बेहिसाब इस्तेमाल के खतरों के प्रति जागरूक हो रहे हैं.

इस साल के शुरू में बीजेपी के पूर्व नेता के.एन. गोविंदाचार्य ने दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि नाबालिग बच्चों को फेसबुक पर खाता खोलने से रोका जाए. याचिका के अनुसार इस तरह के खाते खोलने की अनुमति देना इंडियन मेजॉरिटी एक्ट और इंडिया कॉन्ट्रेक्ट एक्ट और सूचना एवं प्रौद्योगिकी अधिनियम का उल्लंघन है.

अठारह साल से कम उम्र के लोगों के लिए सोशल नेटवर्किंग पर कोर्ट ने अभी तक चाबुक नहीं चलाया है, लेकिन गुडग़ांव स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल और बंगलुरू के विद्या निकेतन जैसे स्कूलों ने सोशल मीडिया से जुड़ी समस्याओं से बचने के लिए स्टुडेंट्स के फेसबुक इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी है.

पुणे में बहुत से स्कूल स्टुडेंट्स को इस साइबर जिंदगी से अलग करने के तरीके तलाश रहे हैं. जो भी हो, फिलहाल तो फेसबुक आधुनिक किशोरों के लिए पढऩे का कोना भी है और खेल का मैदान भी.

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