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विकल्प इतने भी आसान नहीं

पाकिस्तान को उसकी करतूत के लिए सबक सिखाने के वास्ते भारत कूटनीतिक प्रयासों के साथ-साथ सैन्य विकल्पों पर भी विचार कर रहा. सैन्य विकल्प क्या हों और इसका अंजाम क्या हो सकता है, इसी पर असली माथापच्ची.

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संदीप उन्नीथन 26 February 2019
विकल्प इतने भी आसान नहीं तोपखाना एफएम-77बी बोफोर्स

हमारे पास विकल्प हैं, हमारे पास बेशुमार विकल्प हैं," सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने पिछले साल इंडिया टुडे के साथ बातचीत में पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों के सनसनीखेज हमले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यही बातदोहराई थी. उन्होंने 2016 में विशेष सैन्य बलों की ओर से सीमा-पार हुई छापेमारी की तर्ज पर सर्जिकल स्ट्राइक-2 की संभावना को कम कर दिया था. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ''एक बार की गई कार्रवाई दुश्मन को ज्यादा सतर्क कर देती है क्योंकि वह जानता है कि आगे क्या होने वाला है. इससे खतरा बढ़ जाता है." एक आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की हत्या के एक दिन बाद 15 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के झांसी में एक रैली में घोषणा की कि ''हमारी सेनाओं को निर्णय की पूरी आजादी दे दी गई है."

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इसका मतलब साफ है कि जवाबी कार्रवाई सेना की ओर से होगी न कि वायु सेना या नौसेना की ओर से, और जिसका मतलब होगा वृहद स्तर की एक महत्वपूर्ण कार्रवाई.

भारत ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग करने के लिए अपने कूटनीतिक प्रयास शुरू कर दिए हैं. उसने पाकिस्तान को दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन या सर्वाधिक तरजीही मुल्क का दर्जा वापस ले लिया है और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) में ब्लैकलिस्ट कराने के लिए माहौल तैयार किया जा रहा है जिससे खस्ताहाल पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के सामने बहुत-सी ऐसी नई मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी जिसे संभालना उसके लिए बहुत कठिन होगा.

साथ ही एक सैन्य विकल्प पर भी गंभीरता से विचार चल रहा है. सेना के अधिकारियों का कहना है कि सैन्य कार्रवाई के लिए समय का चुनाव भी एक बेहद अहम पहलू है. ऐसी कई वजहें हैं जो यह संकेत दे रही हैं कि सैन्य कार्रवाई हो सकती है. अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने 15 फरवरी को अपने भारतीय समकक्ष अजीत डोभाल को फोन पर भारत को अपनी तरफ से की जाने वाली हर जवाबी कार्रवाई के लिए एक तरह से सहमति प्रदान कर दी.

शीत युद्ध के रणनीतिकार हरमन कान ने 44 पायदानों वाले एक सोपान के जरिए यह समझाने की कोशिश की है कि किस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका और यूएसएसआर के बीच छोटी-छोटी घटनाएं एक ऐसे पूर्ण युद्ध में बदल सकती हैं जो नियंत्रण से बाहर हो सकता है. 2011 में एक अध्ययन में रोडनी जोन्स ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की संभावनाओं पर एक 'न्यूक्लियर एस्केलेशन लैडर्स इन साउथ एशिया्य रिपोर्ट बनाई. उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच 18 पायदानों वाला एक सोपान बनाया जिसमें कान के 44 पायदानों वाले सोपान की तर्ज पर पूर्व-युद्ध, पारंपरिक युद्ध, पूर्व-परमाणु और परमाणु युद्ध की स्थितियों का पूरा खाका खींचा गया था.

भारत के रणनीतिकारों का लक्ष्य होगा कि वे सैन्य कार्रवाई को संघर्ष या यहां तक कि एक सीमित युद्ध में बदलने से रोकें. इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि नियंत्रण रेखा के पार, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सैन्य कार्रवाई को लक्षित किया जाएगा और भारत का ऐसा मानना है कि यही क्षेत्र पाकिस्तान का दिल है, न कि पंजाब प्रांत. इसलिए भारत की प्रतिक्रिया, जोन्स के तैयार सोपान के पांचवें पायदान से नीचे की हो सकती है (देखें क्यों पूर्ण युद्ध एक विकल्प नहीं है).

क्रूज मिसाइल से हमला या फिर हवाई हमले जैसे विकल्प मुश्किल हो सकते हैं क्योंकि वे शत्रुपक्ष को तीव्र प्रतिक्रिया देने के लिए और प्रतिशोध के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. आर्टिलरी के पूर्व महानिदेशक लेक्रिटनेंट जनरल पी. रविशंकर कहते हैं, ''हम किस तरह से प्रतिशोध लेंगे यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस तरह के परिणामों के लिए तैयार हैं और उसका क्या प्रभाव होगा. अगर हम मात्र मिसाइल हमले के रूप में मारक शक्ति प्रदर्शन का विकल्प चुनते हैं, तो बदले में पाकिस्तान भी ऐसा कर सकता है. यदि हमारा प्रहार हमारी सैन्य क्षमता के अनुरूप नहीं होगा, तो यह भारतीय सेना को शर्मिंदा करेगा."

यानी ऐसी स्थिति में कोई भी विकल्प अब जोखिम-मुक्त नहीं है. जबकि जनरल रावत कहते हैं कि उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व को स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें किसी भी प्रकार की कार्रवाई के लिए आदेश मिलता है, वे उस पर आगे बढ़ेंगे, भले वह कितना भी कठिन क्यों न हो. हालांकि वे इसके कुछ अन्य तथ्यों को लेकर भी पूरी तरह से सचेत हैं. रणनीतिकारों में से एक ने बातचीत में कहा, ''भारतीय सेना ने 2016 में नियंत्रण रेखा पार कर कार्रवाई करके पाकिस्तान की सेना को अचंभित कर दिया था." लेकिन पाकिस्तानी सशस्त्र बल अब ज्यादा चौकस है.

यानी इसका मतलब है कि उन्होंने अपनी सभी शुरुआती चेतावनी प्रणाली को सक्रिय कर दिया होगा. नियंत्रण रेखा के साथ मौजूद पाकिस्तानी चैकियों और बंकरों की खोज में निकलने वाले भारतीय वायुसेना के विमानों का पता लगाकर आसमानी हमले को रोकने के लिए उनका एयरबोर्न वार्निंग ऐंड कंट्रोल सिस्टम (एडब्लूएसीएस) पूरे अलर्ट पर होगा, तो अरब सागर में बढ़ते भारतीय नौसेना के युद्धपोतों की तलाश के लिए उनके टोही विमान तैयार होंगे. इस बार भारत के सामने एक ऐसा शत्रु खड़ा मिलेगा जो पूरी तरह से तैयार है और जिसने जवाब की धमकी भी दी है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस बात को खुलकर कहा. इसका अर्थ होगा कि अब आगे कोई भी सैन्य कार्रवाई होती है तो उसमें लोगों की जान जाएगी. यही वजह है कि सरकार के लिए किसी भी विकल्प का चयन एक कठिन निर्णय होगा और जो भी सैन्य विकल्प चुना जाता है वह बढ़ता हुआ कहां तक पहुंच सकता है, कहना मुश्किल है. 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम तक पहुंचाने वाले सेना की उत्तरी कमान के कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ''हर विकल्प पर चर्चा होगी. हम कितनी दूर तक जाने के लिए तैयार हैं और हम कितने जाने-माल का नुक्सान उठाने को तैयार हैं. इन सारी बुनियादी बातों पर बहस होगी. लेकिन यह चर्चा यहीं पर नहीं रुकेगी; इसका भी विश्लेषण करना होगा कि शत्रु पक्ष से होने वाली जवाबी कार्रवाई पर हम क्या करेंगे."

यदि सरकार वास्तव में अर्ध-पारंपरिक गुप्त विकल्पों को आजमाने का निर्णय करती है, तो वह 155 मिमी तोपों से नियंत्रण रेखा पर स्थित आतंकवादी ठिकानों और लॉन्च पैड को ध्वस्त कर सकती है. 2016 में जिस प्रकार की कमांडो छापेमारी की गई थी उसे दोहराना तो अब मुश्किल होगा क्योंकि श्रीनगर केंद्रित 15 कोर, जिसके जरिए एलओसी के 750 किलोमीटर भूभाग में से 450 किलोमीटर का क्षेत्र कवर होता है, उसके इलाके में फिलहाल बड़े पैमाने पर बर्फ जमी हुई है और उसके लिए सीमा पार करके ऑपरेशन करना बहुत मुश्किल काम होगा.

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद नियंत्रण रेखा के साथ मौजूद सूखे नालों पर पाकिस्तानी सेना ने बड़े पैमाने पर एंटी-पर्सनल माइंस बिछाकर कई रास्तों को बंद कर दिया है. उसी तरह सतह से सतह पर मार करने में सक्षम ब्रह्मोस मिसाइलों से हमला और आतंकवादी ठिकानों पर हवाई हमले करने जैसे विकल्पों को आजमाए जाने की संभावनाएं भी कम ही दिखती हैं. हमारे विमान बिना नियंत्रण रेखा को पार किए भी सटीक हवाई हमलों से लक्ष्य को ढेर करने में सक्षम हैं, जैसा कि उन्होंने करगिल युद्ध के दौरान किया था.

वायु सेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल फली मेजर कहते भी हैं कि ऐसे हमलों के जरिए सटीक कार्रवाई में सबसे बड़ी चुनौती होती है लक्ष्य के बारे में सटीक खुफिया जानकारी का होना.

उनके शब्दों में, ''जानकारी सटीक होनी चाहिए क्योंकि आप जो हमला करते हैं उसमें आपकी तरफ से नागरिकों के जान-माल का भारी नुक्सान नहीं होना चाहिए." यहां पर सबसे बड़ी चुनौती है मौलाना मसूद अजहर और जैश-ए-मोहम्मद (जेएम) के अन्य सरगनाओं समेत आतंकवादियों की गतिविधि पर वास्तविक समय में पुख्ता खुफिया जानकारी हासिल करना.

हवाई हमलों के साथ एक बड़ी परेशानी यह है कि वे स्थिति को जल्द ही काफी तनावपूर्ण और आंदोलित कर देंगे और इस बात की बहुत ज्यादा आशंका रहेगी कि पाकिस्तानी वायु सेना जवाबी कार्रवाई करे.

अगर उसने ऐसा किया तो बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि हमले के बाद बनने वाली स्थितियों में भारत सरकार किस हद तक जोखिम का साहस दिखाती है. यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर किसी को नहीं पता. संक्षेप में कहें तो भारत सरकार की ओर से सैन्य कार्रवाई को लेकर कोई भी फैसला ऐसा नहीं होने वाला जो निरापद हो और जिससे खुद को कोई चोट न पहुंचे.

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