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आवरण कथाः सरकार का कारगर औजार

ईडी के प्रमुख विशेष निदेशक सीमांचल दास ने इन आरोपों का खंडन किया कि एजेंसी राजनैतिक प्रतिशोध के लिए सरकार के औजार की तरह काम कर रही है. दास कहते हैं, ''ईडी राजनैतिक प्रतिशोध का औजार नहीं है.

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aajtak.in
कौशिक डेका नई दिल्ली, 07 October 2019
आवरण कथाः सरकार का कारगर औजार कठघरे में पूर्वमंत्री चिदंबरम

रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव-प्रचार के दौरान अपने विरोधियों को 'खान मार्केट गैंग' कहकर उनका मजाक उड़ाया. इस तंज का निशाना था मध्य दिल्ली के लुटियन्स बंगला जोन का वह लकदक मार्केट परिसर, जो राष्ट्रीय राजधानी के ऊंचे और असरदार नेताओं, सरकारी अधिकारियों, जजों, रईसों या कहें सत्ता के अभिजनों की रिहाइश वाले इलाके का कथित तौर पर खास ठिकाना है. उसी पांत के कुछ नेता अब बेतरह छटपटा रहे हैं क्योंकि एक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) 'गैंग' कथित वित्तीय अनियमितताओं के लिए उनके पीछे पड़ा है. विडंबना देखिए कि यह भी उसी खान मार्केट से सक्रिय है. वे आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार बदला भंजा रही है.

आरोप है कि विदेशी मुद्रा उल्लंघन और मनी लॉन्ड्रिंग की तहकीकात करने वाला ईडी और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ऐन चुनावों के पहले

विरोधियों को धमकाने के लिए भाजपा के प्रतिद्वंद्वी नेताओं के खिलाफ मुकदमे दर्ज करने और जांच में जुट जा रही है. ये आरोप न नए हैं, न अनोखे हैं. असल में, मई, 2013 में केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ को 'पिंजरे में बंद तोता' कहा था, जो उसके पास वास्तविक स्वायत्तता के अभाव की ओर इशारा था. ईडी, अपने नए अवतार में वही तमगा हासिल करने की होड़ में है, ऐसा मोदी विरोधियों का दावा है.  

केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाले ईडी की स्थापना 1957 में हुई थी. यह विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) 1999, धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 और भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम (एफईओए), 2018 के प्रावधानों के तहत कार्य करता है. एजेंसी में सीधे सहायक निदेशक के स्तर की भर्ती होती है और इसमें सीमा शुल्क, आयकर और पुलिस महकमे से भी अधिकारी लिए जाते हैं.

ईडी पीएमएलए के तहत तमाम अपराधों की पड़ताल करता है. यह कानून ईडी को आरोपियों की संपत्ति कुर्क करने और मुकदमा चलाने का अधिकार देता है. कानून का दायरा कई संशोधनों के जरिए बढ़ा दिया गया, जिससे ईडी के हाथ अब और लंबे हो गए हैं. इस साल इस कानून में हुए संशोधनों से ईडी को अप्रत्याशित अधिकार हासिल हो गए हैं, जिसके तहत वह किसी को बिना एफआइआर के गिरफ्तार कर सकता है. सभी अपराध अब संज्ञेय और गैर-जमानती हैं. पीएमएलए के तहत किसी जांच अधिकारी के सामने रिकॉर्ड किया गया बयान अदालत में सबूत माना जा सकता है.

सबसे हालिया सुर्खियों में छाने वाला ईडी मामला, महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) में 2,500 करोड़ रुपए के ऋण संबंधी धोखाधड़ी के केस में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार को भेजा गया समन है. मामला बॉम्बे हाइकोर्ट के निर्देश पर अगस्त, 2019 में दर्ज मुंबई पुलिस की एफआइआर पर आधारित है. एफआइआर में बैंक के निदेशकों, शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र के पूर्व उप-मुख्यमंत्री अजित पवार और बैंक के 70 पूर्व पदाधिकारियों के नाम हैं. मूल शिकायत 2015 में आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) में दर्ज की गई थी. शरद पवार का आरोप है कि 21 अक्तूबर के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ऐन पहले सरकार विरोधियों को फंसाने और परेशान करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है. शरद पवार ने ऐलान किया कि वे ''दिल्ली के तख्त के आगे झुकेंगे नहीं.''

भाजपा ने अपने बचाव में कहा कि एमएससीबी घोटाले में मुकदमा हाइकोर्ट के निर्देशों पर दर्ज किया गया था. ईडी के समन से केंद्र और महाराष्ट्र सरकार का कुछ लेनादेना नहीं है. लेकिन शंका इससे पैदा होती है कि पुलिस एफआइआर के बराबर ईडी की प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआइआर) में शरद पवार का नाम है लेकिन मुंबई पुलिस की एफआइआर में नहीं है, जिस पर यह आधारित है. पवार का नाम शिकायतकर्ता सुरिंदर अरोड़ा के मुंबई पुलिस को दिए पूरक बयान में आया है, जिसमें कहा गया कि यह घोटाला एनसीपी प्रमुख की मिलीभगत के बिना संभव नहीं था.

यह पहली बार नहीं है जब कोई नेता चुनाव के दौरान ईडी के घेरे में आया है. 26 अगस्त को, ईडी ने पंचकूला में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी के स्वामित्व वाले एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड को आवंटित भूमि में कथित अनियमितताओं को लेकर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा के खिलाफ अभियोजन शिकायत दर्ज की थी. हरियाणा और महाराष्ट्र, दोनों में एक ही दिन चुनाव होने वाले हैं.

2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले, ईडी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से जुड़े खाते में 104 करोड़ रुपए और बसपा प्रमुख मायावती के भाई आनंद कुमार के खाते में लगभग 1.5 करोड़ रुपए का पता लगाया था. इस साल जनवरी में, लोकसभा चुनाव से पहले, ईडी ने 1,400 करोड़ रुपए के दलित स्मारक घोटाले में यूपी में सात स्थानों पर छापे मारे, जो राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में मायावती के कार्यकाल में हुए थे. उसी महीने, ईडी ने अवैध खनन मामले में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया था.

ईडी के प्रमुख विशेष निदेशक सीमांचल दास ने इन आरोपों का खंडन किया कि एजेंसी राजनैतिक प्रतिशोध के लिए सरकार के औजार की तरह काम कर रही है. दास कहते हैं, ''ईडी राजनैतिक प्रतिशोध का औजार नहीं है. वह पुलिस या सीबीआइ के मामला दर्ज करने के बाद ही कोई कदम उठाता है. लगभग सभी राजनैतिक मामलों में, अदालतों ने ईडी की कार्रवाई को उचित पाया है.'' सुप्रीम कोर्ट के वकील विजय पाल डालमिया, जिन्होंने ईडी मामलों में अपने कई मुवक्किलों का बचाव किया है, दास से सहमत हैं. डालमिया कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं कि हाल के दिनों में ईडी आक्रामक है. पूछताछ का जो समय चुना गया है उस पर संदेह हो सकता है, लेकिन देश के ऊंचे और रसूखदार लोग शायद अब अपने पिछले पापों की कीमत चुका रहे हैं.''

ईडी के आक्रामक रवैए के दो हालिया उदाहरणों में पहला आइएनएक्स मीडिया मामला है जिसमें पी. चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कंपनी के खिलाफ विदेशी मुद्रा निकासी से जुड़ी अनियमितताओं के मामले की अनदेखी की, और दूसरा मामला कर्नाटक के कांग्रेस के कद्दावर नेता डी.के. शिवकुमार के खिलाफ मनी-लॉन्ड्रिंग का है. सीबीआइ भी आइएनएक्स मीडिया मामले की जांच कर रही है और सीबीआइ की ओर से गिरफ्तार किए जाने के बाद से चिदंबरम दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं.

आइएनएक्स घोटाले का पता ईडी को 2016 में तब लगा था, जब वह 2006 में चिदंबरम के वित्त मंत्री रहने के दौरान एयरसेल-मैक्सिस सौदे में दी गई इसी प्रकार की एक मंजूरी की जांच कर रहा था. दिसंबर, 2016 में, ईडी के तत्कालीन संयुक्त निदेशक (मुख्यालय) राजेश्वर सिंह ने आइएनएक्स मामले से जुड़ी अनियमितताओं के बारे में सीबीआइ निदेशक को पत्र लिखा था. सीबीआइ ने 15 मई, 2017 को एक आपराधिक मामला दर्ज किया. तीन दिन बाद, ईडी ने सीबीआइ की प्राथमिकी का संज्ञान लिया और पीएमएलए के तहत मामला दर्ज किया.

चिदंबरम की गिरफ्तारी के लगभग दो हफ्ते बाद, 3 सितंबर को, ईडी ने शिवकुमार को गिरफ्तार किया. शिवकुमार के बेंगलूरू स्थित घर पर 2017 में आयकर के छापे में कथित रूप से आय से अधिक धन की बरामदगी हुई थी और उसी मामले की जांच के बाद शिवकुमार की गिरफ्तारी हुई है. कर्नाटक के पूर्व मंत्री, तिहाड़ जेल की उसी यूनिट में बंद हैं जिसमें चिदंबरम हैं. दोनों को जेल से साजिश की अटकलों को हवा दे दी. उनमें एक यह कि केंद्रीय जांच एजेंसियां पूर्व में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ इन दोनों नेताओं के अपमान का 'हिसाब चुकता' करने में जुटी हैं.

शाह की जुलाई, 2010 में सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी मुठभेड़ मामले में गिरफ्तारी हुई थी, उस समय चिदंबरम केंद्रीय गृह मंत्री थे. 2014 में, सीबीआइ की एक अदालत ने शाह को सभी आरोपों से बरी कर दिया. 2017 में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल के गुजरात से राज्यसभा के चुनाव के दौरान और फिर 2018 में कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) की सरकार बनाने के दौरान, शिवकुमार ने भाजपा को दो बार मात देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यह अलग बात है कि ईडी वित्त मंत्रालय के तहत है.

कांग्रेस नेताओं का दावा है कि ईडी ने आत्मसमर्पण की पेशकश के बावजूद चिदंबरम की हिरासत की मांग नहीं की है, क्योंकि वह आइएनएक्स मीडिया से जुड़े सीबीआइ के मामले में जमानत मिलने के बाद ही कदम उठाना चाहता है. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और प्रसिद्ध वकील अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, ''चिदंबरम को जेल में लंबे समय तक रहना पड़े, इसे तय करने के लिए एजेंसियों ने सारा नाटक रचा है. ईडी तभी इसमें दखल देगा और चिदंबरम का रिमांड मांगेगा जब वह समझ लेगा कि सीबीआइ के लिए स्वाभाविक कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें और जेल में रखना संभव नहीं हो सकेगा.''

सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा भी कई भूमि सौदों में कथित अनियमितताओं के लिए सीबीआइ और ईडी के निशाने पर रहे हैं. दो एजेंसियों में से ईडी, अब तक आठ बार वाड्रा से पूछताछ कर चुका है. इसने वाड्रा के स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी और संलग्न संपत्तियों के कार्यालयों पर छापा मारा है. हालांकि सीबीआइ अदालत ने वाड्रा को अग्रिम जमानत दे दी है, लेकिन ईडी ने दिल्ली हाइकोर्ट में उस जमानत को चुनौती दी है. इसमें कहा गया है कि वाड्रा से हिरासती पूछताछ आवश्यक है क्योंकि हेरफेर के मामले के तार सीधे वाड्रा से जुड़े हैं.

सोनिया के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार अहमद पटेल पर ईडी की भृकुटियां तनी हुई हैं. पिछले तीन महीनों में, एजेंसी ने स्टर्लिंग बायोटेक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पटेल के बेटे और दामाद से पूछताछ की है. 20 अगस्त को, ईडी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को कई करोड़ के बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया. पुरी को पिछले महीने ईडी कार्यालय अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था.

विपक्ष का आरोप है कि ईडी अपने निशाने चुनने में भेदभाव बरत रहा है और भाजपा के नेताओं या उसके दोस्तों के खिलाफ दर्ज मामलों की जांच में उसकी सक्रियता नहीं दिखा रहा है. दो उदाहरण मुकुल रॉय और हेमंत बिस्वा सरमा के दिए जा रहे हैं, जिन्होंने क्रमश: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और कांग्रेस से भाजपा का रुख किया. रॉय और सरमा के नाम सारदा चिटफंड घोटाले में सामने आए हैं, लेकिन ईडी ने अभी तक उनसे पूछताछ नहीं की है जबकि वह कई टीएमसी नेताओं से पूछताछ और चार्जशीट दायर कर चुका है. सरमा कहते हैं, ''मेरे खिलाफ ईडी में कोई केस ही नहीं है. सीबीआइ ने सारदा घोटाले में गवाह के नाते मुझसे पूछताछ की थी.''

राज्यसभा सांसद वाइ.एस. चौधरी और नारायण राणे के खिलाफ ईडी के मामलों पर भी सबकी नजर है. एक कथित बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में ईडी, चौधरी की भूमिका की जांच कर रहा है और उसने अप्रैल में चौधरी की 316 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच कर दी थी, जब वे तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद थे. दो महीने बाद, चौधरी भाजपा में शामिल हो गए. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री राणे कथित मनी लॉन्ड्रिंग की जांच का सामना कर रहे हैं. बॉम्बे हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिससे यह आशंका बढ़ रही है कि ईडी की जांच की गति इस मामले में अब धीमी हो सकती है क्योंकि राणे निर्दलीय राज्यसभा सदस्य हैं और उन्हें भाजपा का समर्थन प्राप्त है.

आरोप है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में भी ईडी का इस्तेमाल राजनैतिक हिसाब चुकता करने के लिए किया जा रहा था. कर्नाटक के पूर्व मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी को 2012 में खनन घोटाले में सीबीआइ ने चार्जशीट किया था. वाइएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ एक मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया गया था जो आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता को जोरदार चुनौती दे रहे थे. योग गुरु रामदेव और उनके करीबी बालकृष्ण के खिलाफ भी मामले दर्ज किए गए. केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद ईडी ने 2014 में मामलों को बंद कर दिया.

ईडी पर राजनैतिक दबाव में काम करने के आरोप तो लगते ही हैं, इसके अपने कुछ अधिकारियों पर भी गलत काम करने के आरोप हैं. 2018 में, एक पत्रकार रजनीश कपूर ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की,जिसमें ईडी के अधिकारी राजेश्वर सिंह के खिलाफ कथित रूप से आय से अधिक संपत्ति रखने के लिए जांच की मांग की गई थी. कोर्ट ने केंद्र को जांच शुरू करने की अनुमति दी; तब राजेश्वर को ईडी से बाहर स्थानांतरित कर दिया गया. 2018 में, सीबीआइ ने ईडी के पूर्व संयुक्त निदेशक जे.पी. सिंह को आइपीएल सट्टेबाजी घोटाले के एक अभियुक्त का पक्ष लेने के एवज में रिश्वत मांगने के आरोप में पकड़ा. जे.पी. सिंह ने केंद्रीय सतर्कता आयोग से शिकायत की कि उन्हें ईडी के निदेशक करनाल सिंह के जरिए फंसाया जा रहा है, जिन्होंने सट्टेबाजी की जांच रोकने के लिए सटोरियों से पैसे लिए थे. 2016 और 2018 के बीच ईडी के मुखिया रहे करनाल सिंह ने इन आरोपों का खंडन किया है.

इस साल जुलाई में ईडी ने अपने ही एक पूर्व अधिकारी बी.एस. गांधी के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया. उसी महीने, सीबीआइ ने गांधी के घर पर छापा मारा और वहां कथित रूप से 3.74 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति मिली. गांधी ने जगन मोहन रेड्डी, जो अब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामलों की जांच की थी.

इसी साल मार्च में उस समय लोग अवाक् रह गए जब ईडी के संयुक्त निदेशक सत्यब्रत कुमार, जो पंजाब नेशनल बैंक धोखाधड़ी मामले में नीरव मोदी के खिलाफ जांच कर रहे थे, के स्थानांतरण की खबर आई. यह आदेश तब आया जब सत्यब्रत मोदी के प्रत्यर्पण में सहायता के लिए लंदन में थे. ईडी प्रमुख एस.के. मिश्र ने हालांकि उस आदेश को उलट दिया था, लेकिन तब तक एजेंसी की उठापटक और राजनीति सतह पर आ चुकी थी.

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