एडवांस्ड सर्च

आवरण कथा-दीवाली में रूठी लक्ष्मी

देश की अर्थव्यवस्था मंदी के सबसे चिंताजनक दौर में है और उबारने की सभी सरकारी कोशिशें नाकाम होती गई हैं, यहां तक कि उत्सवों का मौसम भी कोई आस नहीं जगा रहा है और सरकार के पास कोई खास विकल्प बचे नहीं हैं.

Advertisement
aajtak.in
श्वेता पुंज/ एम.जी. अरुण नई दिल्ली, 22 October 2019
आवरण कथा-दीवाली में रूठी लक्ष्मी जमा-पूंजी पर संकट

यकीनन किसी बड़े वित्तीय संकट का उसकी पूरी व्यापकता के साथ पूर्वानुमान बड़ा कठिन है, और सही समय पर उसे पहचान लेना उससे भी कठिन. लेकिन अब, अधिकांश अर्थशास्त्री यह स्वीकार करने लगे हैं कि भारत हाल के दौर में सबसे बुरे आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. अपनी पत्नी एस्टर डुक्रलो और हार्वर्ड के माइकल क्रेमर के साथ संयुक्त रूप से 2019 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी का कहना है, ‘‘अर्थव्यवस्था बहुत बुरे दौर में जा पहुंची है.

मांग बड़ी समस्या बनी हुई है.’’ भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने अक्तूबर 2019 की अपनी मौद्रिक नीति रिपोर्ट में कहा है कि 2019-20 की पहली छमाही में ‘आर्थिक गतिविधि उसके अपने अप्रैल 2019 के अनुमानों से कमजोर रही है’ और ‘निजी खपत और निवेश बढऩे की उम्मीद पूरी नहीं हुई.’ आरबीआइ ने 2019-20 के लिए देश में वृद्घि दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.1 प्रतिशत कर दिया है. विश्व बैंक और आइएमएफ जैसी रेटिंग एजेंसियों और वित्तीय संस्थानों ने भी अपने अनुमानों को संशोधित किया है.

मसलन, विश्व बैंक ने स्थानीय मांग में गिरावट और कमजोर वित्तीय क्षेत्रों का हवाला देते हुए 2019-20 के लिए अपने पूर्वानुमान को 7.5 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. फिलहाल अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्र नाजुक स्थिति में दिखते हैं.

वित्तीय प्रणाली चरमरा रही है और निजी क्षेत्र-खराब कॉर्पोरेट गर्वनेंस और पैसा गबनकर भाग जाने या प्रमोटरो के मनी-लॉन्ड्रिंग—तमाम गलत कारणों से खबरों में हैं और सरकार भी इस संकट की रोकथाम के लिए उन पर कोड़े बरसाने की मुद्रा में दिख रही है.

मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन के चेयरमैन टी.वी. मोहनदास पै कहते हैं, ‘‘अर्थव्यवस्था ने नोटबंदी, माल और सेवा कर (जीएसटी), दिवालियापन कोड, रियल एस्टेट नियामक अधिनियम, गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) संकट और गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) में नकदी संकट जैसे झटके लगातार एक के बाद एक झेले हैं. इससे संकट संभालने की संस्थानों की क्षमता नष्ट हो गई है. ब्याज दरों में कमी दो साल पहले होनी चाहिए थी. निवेशक कर आतंकवाद से डरे हुए हैं. सरकार उद्योग जगत से बात नहीं कर रही है और धन सृजनकर्ताओं को विश्वास में नहीं लिया गया है.’’ हालांकि, पै सरकार के कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती के कदम को दूरगामी मानते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह अगले 2-3 वर्षों में अच्छा कदम साबित होगा.’’

कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के एमडी नीलेश शाह कहते हैं, ‘‘मौजूदा मंदी ऐसी मौत की तरह है जिसमें शरीर के हजार टुकड़े हो गए हों. एनपीए सफाई, रेरा, राजकोषीय संतुलन, मुद्रास्फीति नियंत्रण और कर अनुपालन में सुधार जैसे कुछ अच्छे कदमों से भी विकास रफ्तार कुछ समय के लिए धीमी हुई है. लेकिन उच्च वास्तविक ब्याज दर, पीसीए ढांचे के कारण कर्ज का सीमित प्रसार, एनबीएफसी संकट और भूमि, श्रम और पूंजी नियमों के कारण कारोबारियों और उद्यमियों के प्रति सम्मान की कमी जैसे कुछ अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाले प्रयास भी हुए हैं.’’

इस साल सितंबर में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा, ‘‘यह सरकार के लिए अप्रत्याशित-सी स्थिति है. पिछले 70 वर्षों में, ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया गया—पूरी वित्तीय प्रणाली खतरे में है और कोई भी किसी पर भरोसा नहीं कर रहा है. निजी क्षेत्र में, कोई भी कर्ज देने को तैयार नहीं है.’’

लेकिन क्या कोई बुनियादी कारण है? आखिर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की तमाम उपायों की घोषणा के बावजूद त्योहारी मौसम में भी बाजार में सुस्ती क्यों है? इन उपायों में करों में कटौती भी है जिससे कारोबारियों के हाथ में अधिक पैसा आएगा. इसे समझने के लिए, अर्थव्यवस्था में सहयोग करने वाले प्रमुख किरदारों—व्यक्ति और परिवार; बैंक, सहकारी बैंक, एनबीएफसी जैसे तमाम वित्तीय क्षेत्र; और बड़े-छोटे सभी कारोबार की अलग-अलग समीक्षा की आवश्यकता है.

घरों की तंगी

जयपुर में हेयर सैलून और कैफे चलाने वाले 41 साल के सवाई मकवाना कुछ चिंतित हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह लगभग 30 वर्षों में मेरी सबसे खराब दिवाली होगी.’’ तीसरी पीढ़ी के हेयर स्टाइलिस्ट, मकवाना का कहना है कि 2016 में नोटबंदी ने उनके धंधे को पहली बार करारा झटका दिया. हालात उसके बाद बदतर ही होते चले गए और उन्हें अपने सैलून के एक हिस्से को बंद करना पड़ा. वे अपने 16 कर्मचारियों में से 14 को हटाने के लिए विवश हो गए. मकवाना कहते हैं, ‘‘पुरुष ग्राहक, जो पहले औसतन 2,500 रु. खर्च करते थे, उन्होंने या तो सैलून आना बंद कर दिया है या अब केवल बाल कटवाने के लिए आते हैं, जिसके सिर्फ 300 रु. देने पड़ते हैं.’’

इसमें कई वजहों का योगदान है. पहला तो रोजगार संकट है—सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत पर 2017-18 में 45 साल में सबसे अधिक है. अर्थव्यवस्था में चौतरफा मंदी का मतलब है कि वेतन-वृद्धि और बोनस गुजरे जमाने की बातें बन गई हैं. इस आय अनिश्चितता ने उपभोक्ताओं को खर्च में बड़ी कटौती के लिए मजबूर किया, जिससे मांग में बड़ी गिरावट आई है. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि निजी खपत भारत की आर्थिक वृद्धि का मुख्य चालक है, जो सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 60 प्रतिशत का योगदान देता है.

(आरबीआइ की मौद्रिक नीति रिपोर्ट के अनुसार, 2019-20 की पहली तिमाही में यह संख्या घटकर 55.1 प्रतिशत हो गई, जो एक साल पहले 56.1 प्रतिशत थी) निजी उपभोग खर्च में वृद्धि भी 3.1 प्रतिशत तक गिरी है. जून में यह पिछले साढ़े चार वर्षों में सबसे कम रहा है. मुद्रास्फीति के परिणामस्वरूप खर्च में और गिरावट आने की उम्मीद है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 15 अक्तूबर को खुदरा मुद्रास्फीति, 14 महीने के उच्च स्तर पर रही जो  खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों का परिणाम था. केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, ‘‘व्यापक महंगाई भले चिंता का विषय न हो, लेकिन खाद्य मुद्रास्फीति तो एक मुद्दा है.’’

भारतीय बचत भी कम कर रहे हैं. देश की सकल बचत वर्ष 2015-16 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 31.1 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 30.5 प्रतिशत हो गई, जबकि घरेलू बचत 2011-12 में जीडीपी के 23.6 प्रतिशत से गिरकर 2017-18 में 17.2 प्रतिशत रह गई. निवेश के लिए रास्ते भी सीमित हैं. शेयर बाजार हाल के दिनों में बेहद अस्थिर हैं और एनबीएफसी के संकट ने म्यूचुअल फंडों में रुचि कम कर दी है. कुल मिलाकर बैंकों में जमा, जिस पर कम ब्याज मिलता है, और छोटी बचत योजनाओं जैसे कुछ विकल्प ही बचते हैं.

सबनवीस कहते हैं, ‘‘आइएलऐंड एफएस संकट के कारण, डेट फंड प्रभावित हुए और डिफॉल्ट बढ़ गया. नतीजतन, लोग आंशिक रूप से बैंक जमा की ओर लौटे हैं—जहां कम ब्याज दरों के कारण उन्हें कम रिटर्न मिलता है.’’ पिछले तीन या उससे अधिक वर्षों में जमा पर ब्याज दरों में 1-1.5 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसका सबसे ज्यादा नुक्सान तो सेवानिवृत्त लोगों को हुआ है, जिनकी जमा राशि सिस्टम में कुल जमा राशि का 20-30 प्रतिशत है. ब्याज में कमी से आय में कमी आती है और खपत और मांग घट जाती है. और अन्य विकल्प बहुत कम हैं, इस तरह वित्तीय प्रणाली में उपभोक्ताओं का विश्वास कम हुआ है. यहां तक कि नोटबंदी के बाद लोगों के लिए अपने पास नकदी रखने की भावना को भी आघात पहुंचा है. सबनवीस कहते हैं, ‘‘जब बात मुद्रा की बात आती है, तो लोगों में विश्वास की कमी दिखी है. अगर भारतीय अर्थव्यवस्था को विकास के पथ पर लौटना है तो इन मुद्दों का तत्काल हल किया जाना चाहिए.’’

कर्ज की परेशानी

वित्तीय क्षेत्र में उपभोक्ताओं के गिरते भरोसे की जड़ें एक के बाद एक उन संकटों में हैं जिसने पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र को हिला दिया है. सबसे ताजा पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक का संकट है. इस क्षेत्र के बड़े मसलों के ब्यौरे इस प्रकार हैं.

23 सितंबर को, पीएमसी बैंक के 6,500 करोड़ रु. के ऋण पर रियल एस्टेट फर्म एचडीआइएल के डिफॉल्ट के बाद, आरबीआइ ने पीएमसी की बैंकिंग गतिविधियों पर प्रतिबंधित लगा दिया और छह महीने के लिए हरा खाताधारक पर सिर्फ 1,000 रु. निकासी का अंकुश लगा दिया. इससे गुस्साए ग्राहकों ने अगले ही दिन पीएमसी की शाखाओं पर प्रदर्शन किया. हालांकि निकासी की सीमा जल्द ही बढ़ाकर 10,000 रु. (और फिर 25,000 रु. और फिर 40,000 रु.) कर दी गई, लेकिन तब तक बहुत नुक्सान हो चुका था. लोगों का भरोसा डोल गया और आरबीआइ के हस्तक्षेपों को भी ‘कामचलाऊ’ किस्म का माना गया.

कॉरपोरेट गवर्नेंस की महत्वपूर्ण नाकामी भी सामने आई. मसलन, तत्कालीन-पीएमसी बैंक के अध्यक्ष वरियाम सिंह 2005-2015 से एचडीआइएल बोर्ड के सदस्य थे (जब उन्होंने पीएमसी बैंक में अपना पद संभाला था) और 2017 तक एचडीआइएल में उनकी वित्तीय हिस्सेदारी थी. इससे हेराफेरी उजागर हुई. ऐसे ही एनपीए ने पिछले कुछ वर्षों में देश के वित्तीय क्षेत्र को तबाह कर रखा है—और लोग सरकार से पूछने लगे हैं कि बैंकों में कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार या पी.जे. नायक पैनल रिपोर्ट सहित बैंकिंग सुधार के लिए बनाई गई विभिन्न आधिकारिक समितियों की सिफारिशों को ठीक से लागू करने पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया. मुंबई स्थित वित्तीय सलाहकार अश्विन पारेख कहते हैं, ‘‘बैंकों का धराशाई होना और अर्थव्यवस्था में गिरावट साथ-साथ आती है.’’

इस क्षेत्र में लगातार संकटों ने कर्ज के मामले को काफी प्रभावित किया है, जिससे अर्थव्यवस्था में गंभीर व्यवधान उत्पन्न हुए. मसलन, पिछले साल प्रमुख एनबीएफसी फर्म आइएलऐंडएफएस और दीवान हाउसिंग फाइनेंस ने ब्याज भुगतान में चूक की, जिसके कारण म्यूचुअल फंड्स—एनबीएफसी के फंड के बड़े स्रोत—ने इस क्षेत्र में अपने जोखिम को कम करना शुरू किया. नतीजा यह हुआ कि जुलाई 2018 और जून 2019 तक म्यूचुअल फंड ने लगभग 64,000 करोड़ रु. निकाल लिए. हाल ही में, निजी क्षेत्र के एक प्रमुख खिलाड़ी यस बैंक द्वारा कॉर्पोरेट गवर्नेंस में कथित खामियों के लिए रिजर्व बैंक ने थोड़ी सख्ती दिखाई क्योंकि बैंक ने बड़े कर्जों में अनियमितताएं बरती थीं.

इसका नतीजा हुआ कि यस बैंक के शेयर धड़ाम हो गए. जिन बैंकों की हालत फिलहाल ठीक-ठाक है, वे भी औद्योगिक और बुनियादी ढांचा क्षेत्र के बड़े खिलाडिय़ों द्वारा किए गए लगातार डिफॉल्ट के बाद, कर्ज देने में बहुत  सावधानी बरत रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में, पूर्व रियल एस्टेट दिग्गज यूनिटेक, आम्रपाली, एचडीआइएल और जेपी (और भी कई) ने भुगतान में चूक की तो कई बैंक परेशानी में आ गए और इससे उनकी निर्माण परियोजनाओं अधर में लटक गई हैं. इससे बैंक बुनियादी ढांचे, बिजली और रियल एस्टेट जैसे जोखिम वाले क्षेत्रों में ऋण देने से हिचक रहे हैं. ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनके उबरने से अर्थव्यवस्था में कुछ जान लौट सकती है.

एनपीए संकट के सामने आने के बाद बैंकिंग क्षेत्र की सफाई करने के प्रयासों में एक और मुद्दा कुछ हद तक विरोधाभास के रूप में सामने आया है. लगभग उसी समय जब नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था से 18 लाख करोड़ रु. की नकदी हटा लिया था, कई कमजोर बैंकों पर फौरन सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) पर अमल से उतनी ही राशि बाहर निकल गई जिससे अर्थव्यवस्था में कर्ज का बड़ा संकट खड़ा हो गया. इसे इस तरह समझें: 2014 में, जीडीपी में प्रति 100 रु. की बढ़ोतरी पर देश में बैंकों ने लगभग 144 रु. का कर्ज जारी किया. 2018 में, यह संख्या 88 रु. तक गिर गई. इसके मुकाबले चीन में, जीडीपी में प्रत्येक 100 रु. की वृद्धि पर, बैंक लगभग 400 रु. का ऋण देते हैं, जबकि अमेरिका में, यह 270 रु. है. कई अन्य कारणों से एनबीएफसी द्वारा कर्ज लगभग 80 प्रतिशत तक घट गया है. आरबीआइ के आंकड़ों से पता चलता है कि 2016-17 में वाणिज्यिक क्षेत्र में जहां 15 लाख करोड़ रु. के ऋण दिए गए थे वहीं 2019-20 में, यह घटकर 2.5 लाख करोड़ रु. रह गई है, जो देश के आर्थिक इतिहास में सबसे तेज गिरावट है.

कॉर्पोरेट संकट

इस बीच, कॉर्पोरेट क्षेत्र का संकट कई पैमानों में दिखाई देता है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आइसीआरए के अनुसार, वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में देश के कॉर्पोरेट क्षेत्र की कमाई में वृद्धि लगभग तीन वर्षों में सबसे कम रही. इस साल अगस्त में औद्योगिक उत्पादन 1.1 फीसदी पर था, जो सात साल में सबसे बड़ी गिरावट है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2019 में समाप्त तिमाही में निवेश 15 साल के निचले स्तर पर आ गया.

हालांकि भारतीय कंपनियों ने सितंबर 2019 में समाप्त तिमाही में 95,300 करोड़ रु. की नई परियोजनाओं की घोषणा की जो जून 2019 की तिमाही की तुलना में 16 प्रतिशत अधिक तो है लेकिन अगर इसकी तुलना एक साल पहले के आंकड़ों से करें तो इसमें 59 प्रतिशत की गिरावट दिखती है. कैपेक्स घोषणाओं के लिए जून की तिमाही ऐतिहासिक रूप से नीचे रही और सितंबर की तिमाही में सुधार के बावजूद, कैपेक्स घोषणाओं का मूल्य अभी भी 14 वर्षों में दूसरे सबसे कम है. निजी क्षेत्र का निवेश पिछली तिमाही में घटा ही है और नई निजी कैपेक्स घोषणाएं 16 साल के निचले स्तर पर आ गई हैं.

वैश्विक विश्लेषण फर्म क्रिसिल के एक अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2020 की दूसरी तिमाही में बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, बीमा और तेल को छोड़कर अन्य सभी क्षेत्रों में मांग में तेज गिरावट से कॉर्पोरेट कमाई में तीन प्रतिशत की गिरावट आई है. इससे यह भी पता चला है कि 430 कंपनियां, जो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के बाजार पूंजीकरण का 65 प्रतिशत योगदान करती हैं, के राजस्व में लगभग चार वर्षों में पहली बार गिरावट आई. एचआर टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस कंपनी पीपुल्सट्रॉन्ग के पंकज बंसल बताते हैं कि इस दिवाली, कंपनियां अपने पास मौजूद संसाधनों को संभाल रही हैं, क्योंकि कोई यह ठीक-ठीक नहीं समझ पा रहा है कि आगे क्या होगा. वे कहते हैं, ‘‘सब कुछ बाजार के उतार-चढ़ाव पर टिक गया है. कंपनियों ने खर्च घटा दिए हैं.’’

कॉर्पोरेट के लिए बड़ी परेशानी जीएसटी रहा है. हालांकि यह निस्संदेह एक महत्वपूर्ण सुधार था, लेकिन यह कंपनियों पर अनुपालन बोझ को कम करने के सरकार के वादे पर खरा नहीं उतरा है. इसकी शुरुआत ही गड़बड़ थी. इसने छोटे और मझोले फर्मों के लिए भारी कठिनाई पैदा की, जो पहले ही नोटबंदी से तबाह थे. सरकार यही कहती रही कि जीएसटी का प्रमुख उद्देश्य कर-भुगतान करने वाली फर्मों के आधार का विस्तार करना है, लेकिन फर्मों को कर अधिकारियों द्वारा धमकाने की खबरें, या टैक्स अधिकारियों के राडार में आए बड़े संस्थानों के सीनियर मैनेजमेंट के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी करने जैसी चीजों ने कॉर्पोरेट जगत में काफी बेचैनी पैदा की है. आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने 9 अक्तूबर को अमेरिका के ब्राउन यूनिव‌र्सि,टी में, एक व्याख्यान में कहा, ‘‘नोटबंदी और उसके तुरंत बाद जीएसटी, भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोडऩे वाले कदम रहे क्योंकि अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर थी.’’

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay