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आवरण कथा-अर्थव्यवस्था में जांन फूंकने के नुस्खे

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर तथा फिलहाल यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में फाइनेंस के प्रोफेसर रघुराम राजन के बदहाल भारतीय अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के सुझाव.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 10 December 2019
आवरण कथा-अर्थव्यवस्था में जांन फूंकने के नुस्खे चक्का थमा मांग के अभाव में उत्पादन क्षेत्र भारी मंदी की चपेट में

रघुराम राजन

देश की अर्थव्यवस्था में गहरी बीमारी के लक्षण दिख रहे हैं. विकास की रफ्तार काफी धीमी हो चली है और  सरकार के पास खर्च बढ़ाने की राजकोषीय गुंजाइश फिलहाल बेहद कम है. कॉर्पोरेट और घरेलू देनदारी बढ़ रही है और वित्तीय क्षेत्र के कई हिस्से गहरे संकट से ग्रस्त हैं. बेरोजगारी, खासकर नौजवनों के बीच लगातार छलांग लगा रही है, जिससे युवा नाराजगी के विस्फोट की आशंकाएं घिर आई हैं. मूडीज ने भारत की क्रेडिट रेटिंग को लेकर चेतावनी की घंटी बजा दी है.

2017 के आखिर में, नोटबंदी जैसे गलत फैसले और माल तथा सेवा कर (जीएसटी) के बहुत खराब क्रियान्वयन के बावजूद, मूडीज ने भारत की रेटिंग में सुधार किया था, इसलिए मूडीज पर पूर्वाग्रह का आरोप शायद ही लगाया जा सके.

सरकार बार-बार 2024 तक देश में पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का क्चवाब दिखा रही है. इसके लिए अर्थव्यवस्था में सालाना 8-9 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि दर्ज करने की दरकार मौजूदा वक्त से ही है. तो, यह दावा महज खुशफहमी जैसा लगता है. आखिर क्या गड़बड़ी है और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?

हालांकि आर्थिक मोर्चे की बदहाली से सरकार की सफलताओं में कोई अड़चन नहीं दिखती.

महाराष्ट्र में हालिया पराजय से पहले तक अपने राजनैतिक और सामाजिक एजेंडे पर सरकार ने लगातार सफलताएं हासिल कीं, चाहे वह जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना हो या अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण. फिर भी ये एक ही सिक्के के दो पहलू हो सकते हैं. जिन वजहों से सरकार अपने राजनैतिक और सामाजिक एजेंडे में सफल रही है, वास्तव में वही उसकी विकास की महत्वाकांक्षाओं के पूरा नहीं होने की वजह भी हो सकती है.

विरासत की समस्या

यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में कार्यभार संभालने के वक्त कई समस्याएं विरासत में मिलीं. बड़ी संख्या में इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण की कठिनाइयों, कोयले या गैस जैसे इनपुट की कमी या सरकारी मंजूरी में लेट-लतीफी के कारण ठप हो गईं.

बिजली पैदा करने वाली कंपनियां मुश्किल में आ गईं क्योंकि बुरी तरह से कर्ज में डूबी बिजली वितरण कंपनियां समय पर भुगतान नहीं कर रहीं थीं या फिर बिजली की खरीद बंद ही कर दी. मांग के अनुरूप बिजली की आपूर्ति न होने के बावजूद देश बिजली की अतिरिक्त क्षमता की विचित्र असंगति के दौर से गुजरा. ज्यादातर कंपनी प्रमोटर वित्तीय संकट में घिर गए इसलिए बैंकों की बैलेंस-शीट पर खोटा कर्ज बढ़ता चला गया जिससे नए कर्ज का प्रवाह धीमा हो गया.

कृषि क्षेत्र भी बदहाल था. एक हद तक तो यह दशकों के गलत मूल्य निर्धारण और सब्सिडी के रूप में गलत सरकारी हस्तक्षेप के कारण हुआ जिसका परिणाम है कि पानी की किल्लत वाला देश, चावल का निर्यात कर रहा था, जिसकी फसल को सबसे ज्यादा पानी चाहिए. दूसरे, कुछ हद तक यह उपेक्षा का नतीजा था, एक के बाद एक लगातार कई सरकारों ने कृषि पैदावार खेत से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचने के क्रम में मुनाफा कमाने वाले कई स्तरों के बिचौलियों को खत्म करने के कोई गंभीर प्रयास नहीं किए; अलबत्ता सरकारों ने नई तकनीकों, बीजों या भूमि तक किसान की पहुंच को बेहतर बनाने के बजाय संसाधनों की कमी से जूझते देश का संसाधन कर्ज माफी, गलत तरीके से नकद ट्रांसफर वगैरह में गंवा दिया. प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ अपने गुजरात के रिकॉर्ड से ही नहीं चुने गए कि वे विरासत की ऐसी समस्याओं को खत्म कर देंगे, बल्कि आवश्यक सुधारों के अपने वादे के लिए भी चुने गए, जो आर्थिक वृद्धि और रोजगार बढ़ाएगा.

आर्थिक वृद्धि के लिए सुधार जरूरी

सुधारों की लंबे समय से सख्त जरूरत थी. विकास को गति देने वाले उदारीकरण के दौर के सुधार 1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में अलग-अलग राजनैतिक झुकावों वाली सरकारों ने किए, इन सुधारों  के जरिए अर्थव्यवस्था की कुछ बेडिय़ां तोड़ी गईं.

मसलन, कारोबार शुरू करने के लिए लाइसेंस पाने की दिक्कतें, कुछ क्षेत्रों को केवल छोटे व्यवसायों या फिर सरकार के लिए सुरक्षित रखना और भारतीय व्यापार को गैर-प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए उच्च शुल्क के प्रावधान. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ही अंतिम सरकार थी जिसने लगातार सुधार पर ध्यान केंद्रित रखा लेकिन वह कारोबारी माहौल, श्रम, भूमि और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका जैसे सबसे कठिन सुधारों की ओर बढ़ पाती, चुनाव हार गई.

2004-2009 की यूपीए सरकार में विकास को गति देने वाले सुधारों को पारित करने की आंतरिक सहमति नहीं थी, जबकि 2009-2014 में दोबारा सत्ता में आई सरकार घोटालों और विपक्ष के असहयोग के कारण पंगु हो गई.

पार्टियों के बीच सर्वसम्मति केवल राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे पुनर्वितरण पर जोर देने वाले सुधारों के लिए ही बनी. वैश्विक वित्तीय संकट के बाद विकास धीमा हुआ और पुनर्वितरण पर केंद्रित सरकार के फोकस से राजकोषीय स्थिति पर दबाव आया. 2012 में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के नेतृत्व में, यूपीए ने व्यापक आर्थिक स्थिरता बहाल करने पर फोकस करना शुरू किया.

मोदी सरकार ने शुरू में इस प्रक्रिया को जारी रखा, जिसका उद्देश्य वित्तीय खर्चों को नियंत्रण में रखना और पिछले कई बजटों में हुई विंडो-ड्रेसिंग (ऊपरी सजावट) को बंद करना था. उसने महंगाई पर अंकुश लगाने की आरबीआइ की पहल को मंजूरी दी. सरकारी बैंकों में तेजी से बढ़ते डूबत कर्ज ने बैंकों की कर्ज देने की ताकत को कमजोर कर दिया और सरकार ने आरबीआइ के चलाए सफाई अभियान को इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) को पारित करके समर्थन दिया.

भारतीय बाजार को एक करने और कर अनुपालन में सुधार के मकसद से जीएसटी के साथ-साथ रियल एस्टेट क्षेत्र की गंदगी को साफ करने के लिए बनाया गया रियल एस्टेट (विनियमन) अधिनियम यानी रेरा भी देश के संस्थागत ढांचे में सुधार की दिशा में किए गए बेहतर प्रयास थे.

मगर, जैसा यूपीए सरकार के पर्यावरण नियमन में सुधार के साथ हुआ, मोदी सरकार ने भी पाया कि मौजूदा प्रचलन को बदलने की कोशिश वाले सुधारों के परिणाम अपेक्षित नहीं रहे हैं. उनसे विकास कार्यों की गति बाधित होती है. मसलन, जब प्रमोटरों को लगने लगा कि दिवालिया होने के कारण उन्हें अपनी फर्मों से हाथ धोना पड़ सकता है तो उन्होंने (सही ही) बैंक ऋणों को जोखिम पूंजी मानना बंद कर दिया.

बैंकर भी जोखम विमुख हो गए क्योंकि उन्होंने देखा कि अब उन्हें नुक्सान को स्वीकार करना पड़ेगा और वे इसे आगे उत्तराधिकारी के सिर नहीं डाल सकते. इसका सीधा मतलब था कि अब जोखिम पूंजी के नए स्रोतों को ढूंढने की जरूरत थी, सुधारों से पल्ला झाड़कर नहीं, जैसा प्रभावित पक्ष सुझा रहे थे, बल्कि और अधिक सुधारों के साथ आगे बढऩे की जरूरत थी.

मसलन, कॉरपोरेट गवर्नेंस में सुधार करने और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने या भारतीय बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों की मूल्यांकन क्षमताओं को बढ़ाकर उन्हें अधिक जोखिम लेने की अनुमति देने के कदम उठाए जाते.

इसका यह भी मतलब था कि सरकार को भूमि अधिग्रहण आसान बनाकर और आवश्यक मंजूरी देकर परियोजनाओं को जोखिम से बाहर लाना था. दूसरे शब्दों में, विकास को गति देने वाले सुधारों की आवश्यकता थी. सरकार को अपने कदमों के अनपेक्षित परिणामों को स्वीकार करना था और सुधार कार्य को आगे बढ़ाना था.

इस मामले में मोदी सरकार का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है. मसलन, सरकार ने जीएसटी कानून को संसद में पास कराने में तो पर्याप्त राजनैतिक कौशल दिखाया, लेकिन अमल के मामले में काफी चूक की गई. सरकार ने बेशक इसमें सुधार की जरूरत समझी. लेकिन, जीएसटी प्रक्रियाओं और दरों में बार-बार बदलावों से भ्रम और अनिश्चितता की स्थिति ही बढ़ती गई और उसके अनुपालन में दिक्क्तें आईं. मसलन, वाहनों पर जीएसटी दरों में कमी आने की संभावना से शायद हाल के दिनों में ऑटो बिक्री में गिरावट आई. इसके अलावा, फॉलो-अप भी गलत दिशा में रहे- इंस्पेक्टरों को वाहनों को रोकने और उनकी तलाशी की शक्तियां दी गईं, जिससे इंस्पेक्टरों की मनमानी को शह मिली. जीएसटी से कर संग्रह अनुमान से काफी कम है, और आर्थिक वृद्धि का लाभ उससे काफी कम है, जितना होना चाहिए था. केंद्र ने राज्यों से इस कानून के प्रति रजामंदी हासिल करने केलिए न्यूनतम राजस्व गारंटी की पेशकश की और इससे राजकोष पर और दबाव बढ़ा.

कम से कम जीएसटी के सिस्टम में सुधार की सरकारी कोशिशें जारी हैं, अलबत्ता जरूरत अनुभव के आधार पर एक स्पष्ट मध्यम अवधि की योजना बनाने की है जिसमें निरंतर अल्पकालिक सुधार की जगह साफ तौर पर बताया जाए कि क्या और कब तय किया जाएगा क्योंकि निरंतर संशोधनों से अनिश्चितता बढ़ती है. सरकारी बैंकों के कामकाज में सुधार के लिए बैंक बोर्ड ब्यूरो जैसी संस्था बनाने की कोशिशों को नौकरशाही के मकडज़ाल और राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण धक्का पहुंचा है. सरकारी बैंकों के बोर्ड में स्वतंत्रता बहुत कम होती है, और वित्त मंत्रालय के बैंकों के विलय के फरमान से प्रबंधन की सारी ऊर्जा इसी में खप जाएगी जबकि इस ऊर्जा को डूबत कर्ज के बोझ को खत्म करने और समझदार तरीके से नए सिरे से ऋण देने पर लगाने की आवश्यकता है. मुद्रा ऋण और ऋण मेलों पर जोर देकर भविष्य के लिए और अधिक समस्याएं पैदा की जा रही हैं, यहां तक कि बैंकों को इन ऋणों पर बढ़ते गैर-भुगतान को नजरअंदाज करने के लिए नियामक छूट दी गई है.

जहां तक कारोबारी माहौल, भूमि अधिग्रहण, श्रम और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका से जुड़े अधूरे सुधारों की बात है, तो मोदी सरकार कायरता का ही परिचय दिया है. शुरुआत में, सरकार ने इन सुधारों पर दृढ़ दिखाई दी. लेकिन जैसे ही विपक्ष ने सरकार पर कारोबारियों की शुभचिंतक होने का आरोप लगाना शुरू किया, सरकार ने इन सुधारों को प्राथमिकता सूची में नीचे सरकाना शुरू कर दिया. विश्व बैंक के 'कारोबारी सहूलियत' संकेतकों पर भारत की रैंकिंग सुधरी, दिल्ली और मुंबई (जहां विश्व बैंक प्रगति को मापता है) में कुछ प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया लेकिन बाकी जगहों पर कारोबारियों की राय से नहीं लगता हैं कि बुनियादी परेशानियां घटी हैं. वाजपेयी युग के सुधारों के लाभ अब लगभग समाप्त हो गए हैं और विरासत में मिली समस्याओं को दूर करने की कोशिश नहीं होने से आर्थिक वृद्धि की रफ्तार काफी धीमी हो गई है.

यूपीए की तरह ही मोदी प्रशासन के साढ़े पांच साल की सफलताएं पुनर्वितरण में रही हैं. जन धन कार्यक्रम से हर किसी के लिए बैंक खातों की सुविधा दी गई, स्वच्छ भारत कार्यक्रम के तहत सभी के लिए शौचालय का निर्माण हो रहा है, उज्ज्वला योजना गरीब महिलाओं को गैस कनेक्शन वितरित कर रही है, आयुष्मान भारत गरीबों के लिए चिकित्सा सेवा शुरू कर रही है, जबकि ऋण मेलों के साथ साझा रूप से मुद्रा कार्यक्रम व्यवसाय उन सभी को ऋण देने की कोशिश कर रहा है, जिन्हें इसकी आवश्यकता है. सरकार ने यूपीए सरकार के प्रमुख कार्यक्रम मनरेगा पर भी लगातार खर्च बढ़ाया है.

पुनर्वितरण एक योग्य लक्ष्य है और इनमें कई कार्यक्रमों ने गरीबों को लाभान्वित किया है. हालांकि, मजबूत राजस्व वृद्धि के बिना खर्च में लगातार वृद्धि से सरकारी खजाने में गिरावट आई है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि अब सरकारी ऋण के मूल्य को कम करने के लिए मुद्रास्फीति उपलब्ध नहीं है. यहां तक कि नियंत्रक और महालेखा परीक्षक को भी एक बार फिर से सरकार को ऑफ-बैलेंस शीट राजकोषीय अनियमितताओं को खत्म करने के लिए कहना पड़ा है. दरअसल, निजी क्षेत्र पर अब दबाव बढ़ रहा है क्योंकि कई सरकारी संस्थाएं अपना खर्च कम दिखाने के लिए भुगतान को दबाए रखती हैं.

चूक कहां हुई?

कहां चूक और क्या गड़बड़ी हुई, यह समझने के लिए हमें पहले मौजूदा सरकार के केंद्रीकृत स्वरूप पर गौर करना होगा. न सिर्फ फैसले, बल्कि आइडिया और योजनाएं भी प्रधानमंत्री के आसपास एक छोटी बिरादरी और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से निकलती हैं. यह बिरादरी पार्टी के राजनैतिक और सामाजिक एजेंडे को साधने में जुटी रहती है. ये एजेंडे पूर्व निर्धारित हैं और यह बिरादरी उसमें पारंगत है. आर्थिक सुधारों पर इसका ध्यान कम है, शीर्ष पर यह एजेंडे की स्पष्टता भी नहीं है और अर्थव्यवस्था राज्य के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर कैसे काम करती है, इसकी समझ भी कम है.

इसके अलावा, राजनैतिक और सामाजिक एजेंडे के प्राथमिकता हासिल करने की एक वजह शायद यह भी है कि सत्ता का केंद्र इसके साथ अधिक सहज अनुभव करता है और इसके पास दोनों को साधने के लिए राजनैतिक कौशल और दिमागी रुझान पर्याप्त नहीं है. विशेष रूप से, राजनैतिक और सामाजिक एजेंडे पर अमल के लिए राजनैतिक ताकत जुटाने की जरूरत होती है, जिसे लोकलुभावन आर्थिक उपायों से हासिल किया जाता है. हालांकि विकास, अक्सर घोषित उद्देश्य तो रहता है लेकिन जैसे ही यह एहसास होता है कि इसके लिए उठाए कदमों की राजनैतिक कीमत ज्यादा उठानी पड़ सकती है, उसका महत्व दूसरे स्थान पर चला जाता है.  

अत्यधिक केंद्रीकरण काम कर सकता है, बशर्ते उसके साथ केंद्र में एक सुसंगत आर्थिक दृष्टिकोण हो. पिछली सरकारें असंगत गठजोड़ की भले रही हों लेकिन वे लगातार आर्थिक उदारीकरण की राह पर बढ़ती रहीं और जहां कमजोर पक्ष देखा, सरकार के कदम पीछे खींचे और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया. मोदी सरकार सत्ता में 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' के नारे के साथ आई. इस नारे को अक्सर गलत समझा जाता है. इसका अर्थ यह था कि सरकार चीजों को ज्यादा कुशलता से करेगी, न कि लोग और निजी क्षेत्र को कुछ अधिक करने के लिए मुक्त किया जाएगा. सरकार ने ऑटोमेशन की ओर तो वाजिब कदम बढ़ाए- लाभार्थियों तक लाभ का प्रत्यक्ष हस्तांतरण महत्वपूर्ण उपलब्धि है- लेकिन कई क्षेत्रों में सरकार की भूमिका का विस्तार हुआ है, घटा नहीं है.

ऐसा अति केंद्रीकरण, ताकतवर मंत्रियों की गैर-मौजूदगी और सुसंगत मार्गदर्शक नजरिए की कमी से यह तय करता है कि सुधार के प्रयास केवल तभी आगे बढ़ते हैं जब पीएमओ उन पर फोकस करे और जैसे ही उसका ध्यान अन्य मुद्दों पर की ओर मुड़ता है, उससे फोकस हट जाता है. अक्सर, ऐसे प्रयास बड़ी नीतियों की तरह आते हैं क्योंकि समस्याएं बड़ी होती हैं और उन पर महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत होती है- इसलिए हमें नोटबंदी, बैंकों के विलय, कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती जैसे बड़े हल्ले वाले कदम देखने को मिलते हैं. हालांकि, जरूरी नहीं है कि ऐसे भारी बदलावकारी कदम सही समय पर या किसी बड़े नजरिए के साथ उठाए गए हैं, इसलिए उनका आर्थिक लाभ भी कमतर हुआ. इसके अलावा, अनपेक्षित परिणामों से निपटने के लिए फॉलोअप कार्रवाई भी अपर्याप्त है क्योंकि संबंधित मंत्रालयों को शक्तिहीन बना दिया गया है.

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