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रक्षा मंत्रालय की बेरुखी से पस्तहाल फौज

रक्षा बजट की तंगी ने भारतीय सेना को दो मोर्चों पर लड़ाई की अपनी तैयारियों में भारी कटौतियां करने को मजबूर किया और उन रक्षा सुधारों का भी कोई अता-पता नहीं जिनका सरकार ने किया था ऐलान

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aajtak.in
संदीप उन्नीथन/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 08 May 2018
रक्षा मंत्रालय की बेरुखी से पस्तहाल फौज चंद्रदीप कुमार

इस साल किसी वक्त केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को सशस्त्र बलों के लिए नए संचालन निर्देश जारी करने हैं. "रक्षा मंत्री का अभियान निर्देश'' नाम का यह छोटा-सा चरम गोपनीय दस्तावेज आम तौर पर दशक में एक बार जारी किया जाता है और सशस्त्र बलों से पाकिस्तान और चीन, दोनों के मोर्चे पर एक साथ जंग की संभावना के लिए तैयारी करने को कहता है.

अलबत्ता जिस बात का जिक्र इस दस्तावेज में नहीं किया जाता, वह यह कि सेना पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों पर एक साथ जंग लड़ने और जीतने में साफ तौर पर असमर्थ है. सेना के एक बड़े अफसर कहते हैं, "फिलहाल हमारे पास दोनों मोर्चों को संभालने की काबिलियत मुश्किल से ही है.''

सैन्य रणनीति और क्षमता के बीच का फर्क तब सामने आया जब हाल ही में सेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद रक्षा मामलों की संसद की स्थायी समिति के सामने पेश हुए. 13 मार्च को संसद के पटल पर रखी गई रिपोर्ट के मुताबिक, सेना के उपाध्यक्ष ने कहा कि उसका 65 फीसदी असलहा पुराना और बेकार हो चुका है.

सेना के पास तोपों, मिसाइलों और हेलिकॉप्टरों की कमी है, जिसकी वजह से वह दो मोर्चों पर लड़ पाने में असमर्थ होगी. बदतर यह कि विदेश से गोला-बारूद मंगाने की मौजूदा कमियों और कोताहियों तक की भरपाई अभी की जानी है और सेना जिसे "10 दिन गहन'' या 10(आइ) जंग लडऩे की क्षमता कहती है, उसे भी पूरा नहीं किया गया है.

"गहन'' जंग का प्राथमिक मतलब गोला-बारूद की वह खपत है जिसमें टैंक और तोप "सामान्य'' टकराव के दिनों में होने वाले इस्तेमाल की तुलना में तीन गुना ज्यादा तादाद में बम के गोले और रॉकेट दाग सकें.

सेना की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि इस साल के बजट में उसे इतनी कम रकम दी गई कि यह 10(आइ) परिदृश्य के लिए साजोसामान जुटाने के लिहाज से भी नाकाफी है. सेना ने 125 योजनाओं के लिए पूंजी जुटाने के मकसद से 37,121 करोड़ रु. की मांग की थी. आखिर में 1 फरवरी को पेश बजट में उसे मिले 21,388 करोड़ रु., जो 15,783 करोड़ रु. कम थे.

सेना को मिली 21,388 करोड़ रु. की सारी की सारी रकम उसकी पहले की देनदारियों—यानी पिछले कुछ साल के दौरान खरीदे गए साजो-सामान के लिए सेना को जो ईएमआइ सरीखे भुगतान करने होते हैं, उसमें चली जाएगी. सेना उपाध्यक्ष के कहे मुताबिक, इसके बाद बचेगा 15,000 करोड़ रु. का घाटा और इसलिए 125 (खरीद) योजनाओं के लिए उसके हाथ में कोई रकम नहीं होगी.

इनमें हल्के उपयोगी हेलिकॉप्टरों से लेकर ऐंटी-टैंक मिसाइलों, गोला-बारूद तक और एयर डिफेंस मिसाइलों से लेकर असॉल्ट राइफलों, लाइट मशीनगनों और कारबाइनों सरीखे छोटे हथियारों तक की खरीद शामिल है. 43,000 करोड़ रु. से ज्यादा की इन जरूरतों को पूरा करने की कोशिशें एक दशक से चली आ रही हैं और अब अपने अंतिम नतीजे पर पहुंचने के करीब हैं (देखें असलहों की किल्लत).

इसका मतलब है दो में से कोई एक चीज—सेना इन सबकी खरीद को या तो अगले साल तक के लिए टाल दे या हाथ में कटोरा लेकर वित्त मंत्रालय के पास वापस जाए और रोकड़े की मदद मांगे. उसके लिए तो दोनों ही माथापच्ची का सौदा है. 2017 की जिन तयशुदा देनदारियों को वह इस साल नहीं चुका पा रही है, उन्हें 2018 के लिए आगे बढ़ा दिया जाएगा, जिससे उसका वित्तीय बोझ तो आखिर बढऩा ही है.

और वित्त मंत्रालय बजट से बाहर कोई रकम मुश्किल से ही मुहैया करता है. सेना यह देखकर भौंचक रह गई कि सॢजकल स्ट्राइक के बाद जो 11,738 करोड़ रु. के 19 करारों की फास्ट-ट्रैक खरीद की गई थी, उनकी रकम भी उसके सैन्य बजट से काट ली गई, बजाए इसके कि उसे अतिरिक्त मंजूरी दी जाती.

साउथ ब्लॉक में एक वित्तीय रोक पहले ही तारी हो गई है. अफसरों का कहना है कि हाल ही में शुरू किए गए ठेकों के लिए रकम जारी नहीं की जा रही है, जिससे मंजूर परियोजनाएं ठप पड़ गई हैं. ऐलान तो बहुत किए जा रहे हैं, पर करारों पर दस्तखत बहुत कम किए जा रहे हैं.

सरकार के लाडले "मेक इन इंडिया'' कार्यक्रम को भी इसका नुक्सान उठाना पड़ा है—सेना की 468 जू-23 ऐंटी-एयरक्राफ्ट बंदूकों को अपग्रेड करने के लिए निजी कंपनी पुंज लॉयड के साथ 670 करोड़ रु. का करार पिछले साल के आखिर से ही रक्षा मंत्रालय में अटका हुआ है.

इस साल सेना उपाध्यक्ष ने संसद की स्थायी समिति से कहा, "दो मोर्चों पर जंग की संभावना हकीकत है. यह बेहद जरूरी और अहम है कि हम इस मुद्दे को लेकर सजग हों और अपने को आधुनिक बनाने पर ध्यान दें और अपनी कमियों को पूरा करें... हालांकि मौजूदा बजट इस जरूरत को पूरा करने के लिए नाकाफी है.'' उधर दो मोर्चों पर जंग के सही साबित होने वाली भविष्यवाणी बनने का खतरा पैदा हो गया है.

पाकिस्तान से सटी 760 किमी लंबी नियंत्रण रेखा 2003 के युद्धविराम के बाद से अपने सबसे हिंसक मुकाम पर है, जहां तकरीबन रोज ही गोलाबारी की घटनाएं हो रही हैं. चीन के साथ लगी 4,000 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पिछले साल डोकलाम में 72 दिनों के टकराव के दौरान जंग सरीखे हालात की गवाह बनी थी, जब हिंदुस्तान को सरहद पर तेजी से टैंक और टुकडिय़ां भेजनी पड़ी थीं और पूर्वी कमान एलर्ट की हालत में आ गया था.

उस गतिरोध को 28 अगस्त, 2017 को कूटनीतिक रास्ते से सुलझा तो लिया गया, पर उससे पहले लड़ाकू सरकारी चीनी मीडिया की जंग की धमकियों के बीच अपनी तैयारियों की बेहद अहम कमियां भी सेना के सामने उजागर हो गईं, जिनमें खास तौर पर पहाड़ी इलाकों में अधूरी बनी सड़कें और पुल भी थे.

हिंदुस्तान का रक्षा बजट फिलहाल जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर महज 1.6 फीसदी (पेंशन को छोड़कर) है. यह चीन के खिलाफ 1962 की जंग के बाद सबसे कम है. खासकर तब जब विश्लेषक उस वक्त के फलक से अशुभ समानताएं देख रहे हैं जिसमें 1962 की सरहदी जंग में चीनी सेना ने साजोसामान की कमी से पस्त भारतीय सेना को धूल चटा दी थी. चीन का 175 अरब डॉलर का सैन्य बजट भारत के 45 अरब डॉलर के बजट से तिगुना है.

पिछले साल हिंदुस्तान की सेना के तीनों अंगों को आधुनिक बनाने के लिए 2017 से 2022 के बीच 13वीं पंचवर्षीय योजना में 400 अरब डॉलर की मंजूरी देने की मांग की गई थी. इतनी रकम की मंजूरी का मतलब होगा सैन्य बजट के लिए बजट में 2 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी करना और रक्षा के लिए मुकर्रर रकम में ठहराव के मौजूदा पैटर्न को देखते हुए इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती. एक बड़े सैन्य नियोजक कहते हैं, "हमारी सेना को आधुनिक बनाने का मकसद भय दिखाकर टकराव को रोकना है.

भय प्रतिरोधक को घटाकर और खुद को कमजोर करके हम अपने आपको वाकई कमजोर बना रहे हैं क्योंकि हम दूसरे पक्ष को सैन्य कार्रवाई पर विचार करने का मौका दे रहे हैं. इसके नतीजतन हमें दो मोर्चों पर लड़ाई लडऩी पड़ सकती है.''

झूठमूठ गुहार नहीं

सैन्य बलों, खासकर थल सेना की, जिसके हिस्से में 45 अरब डॉलर के रक्षा बजट का 50 फीसदी जाता है, कमियां और अभाव कई दशकों पुराने जाने-पहचाने लग सकते हैं. सशस्त्र बल इन कमियों के बारे में जिन रास्तों से सीधे कार्यपालिका को बताते हैं, वे संकरे होते जा रहे हैं. सैन्य बलों की हालत के बारे में दी जाने वाली सालाना प्रस्तुतियों को कुछ साल पहले चिट्ठी लिखने की कवायद में बदल दिया गया था.

2012 में उस वक्त के सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने ऐसी ही एक चिट्टी में सेना को उपेक्षा और बेरुखी से खोखला कर दिए जाने—गोला-बारूद के बगैर टैंक, मिसाइलों के बगैर एयर डिफेंस बैटरियां और ऐंटी-टैंक मिसाइलों के बगैर पैदल सेना—की शिकायत की थी. वह चिट्टी जब मीडिया को लीक कर दी गई, तो यह कवायद भी पूरी तरह बंद हो गई.

तब से रक्षा मामलों की संसद की स्थायी समिति (पीएससी) के आगे पेश होकर अपनी बात कहना सेना के लिए अकेला मंच रह गया है, जहां वह अपनी कमियों की बात कर सकती है. ये प्रस्तुतियां सेना उपाध्यक्ष पर छोड़ दी गई हैं, जो सेना की जंग की तैयारी की अगुआई करने वाली नियोजन और खरीद-फरोक्चत शाखाओं के लिए जवाबदेह हैं. उन्होंने जो तस्वीर—यानी घटती हुई सैन्य मशीन और सरकार के हाथों बजट में लगातार उपेक्षा—पेश की है, वह वाकई कान खड़े कर देने वाली है.

2015 में सेना उपाध्यक्ष लेफ्टि. जनरल फिलिप कंपोज ने पीएससी को बताया था कि तकरीबन 50 फीसदी सैन्य मशीन पुरानी और बेकार हो चुकी हैं. चार साल बाद यह आंकड़ा 65 फीसदी हो गया है.

स्वदेशी सैन्य-औद्योगिक कड़ी के टूटने और उसके रक्षा जरूरतों को पूरा करने में नाकाबिल होने के कारण भारत हथियारों का आयात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन गया है.

आयातित गोला-बारूद भरना, खासकर 10 दिन की गहन जंग लडऩे की खातिर अगली कतार के विशिष्ट हथियारों के लिए, महंगा पड़ता है. कुछ साल पहले सेना अपने 40(आइ) जंग लडऩे के पूर्वानुमानों को जबरदस्त तरीके से घटाकर 10(आइ) जंग पर ले आई थी. यहां तक कि यह लक्ष्य भी पहुंच से बाहर बना हुआ है.

सेना को 10(आइ) जंग की खातिर सिर्फ अपने सभी 42 रूस निर्मित "स्मर्च'' 300 मिमी रॉकेट लॉन्चरों के लिए 3,744 रॉकेट खरीदने के वास्ते 2,000 करोड़ रु. से ज्यादा की जरूरत है.

वहीं रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने सेना की बजट की कमियों की चिंताओं को खारिज कर दिया है. उन्होंने 11 अप्रैल को चेन्नै में साल में दो बार होने वाले डीफेक्स्पो-2018 के उद्घाटन सत्र में मीडिया से कहा, "हमारे पास जो है उसके इस्तेमाल की प्राथमिकता तय करने पर हमारा ध्यान है. हम रकम का अधिकतम इस्तेमाल पक्का कर रहे हैं. रक्षा मंत्रालय में काम जारी है.''

एक हफ्ते बाद 18 अप्रैल को सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अध्यक्षता में एक रक्षा नियोजन समिति बनाने का ऐलान किया. यह रक्षा की योजना का रोडमैप बनाएगी, सामरिक और सुरक्षा से जुड़े सिद्धांत तय करेगी. इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का मसौदा, अंतरराष्ट्रीय रक्षा संबंध की रणनीति और सशस्त्र बलों के लिए क्षमता विकास की योजनाएं भी शामिल हैं.

इस बीच सीतारमन का "प्राथमिकता तय करने'' का मंत्र सशस्त्र बलों को बता दिया गया है कि वे पहले बेहद जरूरी साजोसामान पर ध्यान दें और फिर इस वित्त वर्ष में लिए गए फैसलों को जल्दी से जल्दी पूरा करें.

जाहिरा तौर पर यह मंत्रालय के भीतर दोहरे एहसास के बाद तय किया गया है—रक्षा खर्चों में कोई बड़ी बढ़ोतरी की संभावना नहीं है, खासकर तब जब बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी जा रही है. मसलन, इस साल के बजट में बुनियादी ढांचे के लिए 5.97 लाख करोड़ रु. का प्रावधान है, जो 2014-15 के बजटीय आवंटन के तीन गुना से ज्यादा है.

रक्षा मंत्रालय को साजोसामान की खरीद के लिए उपलब्ध रकम को अच्छे तरीके से खर्च करने में भी मुश्किलें पेश आती हैं. रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे ने नवंबर के आखिर में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को एक आंतरिक अध्ययन पेश किया था, जिसमें मंत्रालय की कार्यप्रणाली की तीखी आलोचना की गई थी.

हेडक्वाटर्स इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के अध्ययन में पाया गया कि 2014 और 2017 के बीच किए गए 144 योजनाओं के करारों को पूरा होने में औसतन 52 महीने लगे, जो तय 16 से 22 महीनों की मियाद के दोगुने से भी ज्यादा थे.

इसके लिए जिन्हें दोषी ठहराया गया, वे थेः "बहुत सारे और बिखरे हुए ढांचे जिनमें एक जगह जवाबदेही की कोई व्यवस्था नहीं है. फैसले लेने वाले कई सारे प्रमुख, प्रक्रियाओं का दोहराव—फालतू और बेकार हो चुकी परतें जो एक ही काम करती रहती हैं, टिप्पणी में देरी, फैसलों में देरी, अमल में देरी, काम के साथ-साथ कोई निगरानी नहीं, परियोजना आधारित तौर-तरीकों का नहीं होना, आगे बढ़ाने के बजाय गलतियां ढूंढने की आदत.''

साजो-सामान की किल्लत

पूंजी बजट में कटौती से तीनों सेनाएं प्रभावित होती हैं, खासतौर से मशीनों पर आश्रित वायुसेना और नौसेना जो दो-मोर्चे पर आकस्मिक खर्चों का सामना करती हैं. पिछले महीने वायुसेना के पिछले तीन दशकों में अब तक के सबसे बड़े अभ्यास गगनशक्ति 2018 का आयोजन किया गया.

इसमें एसयु-30 एमकेआई लड़ाकू जहाज असम से उड़कर अरब सागर में 4,000 किमी तक गए. वायुसेना को तत्काल 110 नए लड़ाकू जहाजों की जरूरत है जिसके लिए 18 अरब डॉलर चाहिए. नौसेना ने इस साल अपने पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों पर दो अञ्जयास किए.

वह फिक्रमंद है कि क्या वह नए हेलिकॉप्टर और पनडुब्बियां हासिल कर पाएगी जिसकी उसे सख्त जरूरत महसूस हो रही है. सैनिकों का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. यह 2010-11 के 44 प्रतिशत से इस साल 56 प्रतिशत हो गया.

इस दौरान पूंजी व्यय 26 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो गया. सामरिक आयात पर लगने वाले जीएसटी और सेल्स टैक्स (पहले इसे छूट प्राप्त थी) ने लागत 15 फीसदी बढ़ा दिया है, जिससे साजोसामान खरीदने के लिए धन में और कमी आई है.

इस बजटीय अंसुतलन से विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सेना सबसे ज्यादा प्रभावित होती है. भारत के कुल सैन्यकर्मियों में से 85 फीसदी थल सेना में हैं लेकिन कुल रक्षा बजट में इसका हिस्सा बस 55 फीसदी है.

सेना की यह दुर्दशा वास्तव में विभिन्न परेशानियों के धीमे-धीमे एकत्र होते जाने का परिणाम है. खर्चीले मैनपावर (सैन्यकर्मी) की लगातार भर्ती करके यह विस्तार कर रही है जबकि इसका साजो-सामान पुराना पड़ता जा रहा है और धन की कमी से नई खरीद नहीं हो पा रही.

भारत अपने 22 लाख पूर्व सैन्यकर्मियों की पेंशन पर करीब 15 अरब डॉलर की रकम खर्च करता है जो कि पाकिस्तान के कुल 9.6 अरब डॉलर के रक्षा बजट का करीब दोगुना है.

वित्त मंत्रालय सैनिकों के पेंशन की रकम को कुल रक्षा खर्च में ही जोड़ता है. सेना अपने बजट का 83 फीसदी पूंजीगत व्यय, वेतन देने, अपने उपकरणों और सुविधाओं के रख-रखाव पर खर्च करती है.

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