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भगवान बचाए कारोबार

लॉकडाउन में आर्थिक नुक्सान से कोई कारोबार बच न सका. अब छोटे-बड़े तमाम कारोबारी वकीलों के साथ बैठकर व्यापारिक अनुबंध में छिपे दांव-पेच निकाल नुक्सान पाटने की जुगत में. भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 ने उनमें जगाई उम्मीद.

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aajtak.in
शुभम शंखधरनई दिल्ली, 19 May 2020
भगवान बचाए कारोबार	अगला शो कब? राजधानी दिल्ली में पीवीआर शृंखला का एक सिनेमा हॉल

रायपुर का मैग्नेटो—द मॉल शहर का बड़ा व्यवसायिक केंद्र है. लॉकडाउन के दौरान मॉल के प्रबंधन को चार-पांच बड़ी कंपनियों की ओर से नोटिस मिले. इनमें कंपनियों ने लॉकडाउन की अवधि का किराया देने में असमर्थता जताई है. उनकी दलील है कि कोविड-19 और इसके कारण हुआ लॉकडाउन अप्रत्याशित घटना (फोर्स मैज्योर) है, जिस पर किसी का बस नहीं. इस दौरान व्यापारिक गतिविधियां न हो पाने के कारण मॉल का किराया और मेंटेनेंस का खर्चा देना संभव नहीं है.

मैग्नेटो मॉल्स के प्रबंध निदेशक आनंद सिंघानिया कहते हैं, ‘‘कंपनियों ने अपने लेटर में फोर्स मैज्योर का जिक्र जरूर किया है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोविड-19 को प्राकृतिक आपदा घोषित नहीं किया गया है, जिससे इसे फोर्स मैज्योर माना जा सके.’’ सरकार अगर कोरोना को प्राकृतिक आपदा घोषित करती है तो हम बीमा कंपनियों के समक्ष नुक्सान की भरपाई का दावा पेश कर सकते हैं.

सिंघानिया आगे कहते हैं, ‘‘हमें कहीं से कोई राहत मिलती है तो उसको आगे बढ़ाने में हमें कोई दिक्कत नहीं. लेकिन अगर बीमा कंपनी या सरकार से कोई मदद नहीं मिलेगी और दुकानदार भी पैसा नहीं देंगे तो हम बैंक को कर्ज की किस्त कैसे चुकाएंगे?’’ ऐसी दुविधा में अगर कोई रास्ता नहीं बनता तो अदालत का दरवाजा खटखटाना ही अंतिम विकल्प बचता है.

यह कहानी एक मॉल, शहर या किसी खास धंधे की नहीं. देशभर में विभिन्न व्यवसायों का आधार एक अनुबंध ही होता है और इसमें लिखे नियम-शर्तें ही कारोबार को दिशा देती हैं. अनुबंध में लिखी इन्हीं शर्तों में से एक 'फोर्स मैज्योर’ का सहारा लेकर कारोबारी नुक्सान को साधने की कसरत शुरू कर चुके हैं.

कुछ मिसालें देखें:

• उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और दादरा-नगर हवेली के डिस्कॉम (बिजली वितरण कंपनियां) ने बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों को फोर्स मैज्योर का हवाला देते हुए उत्पादन रोकने को कहा. साथ ही अगली सूचना तक भुगतान में भी असमर्थता जताई है.

बिजली उत्पादन कंपनियों के साथ डिस्कॉम बिजली खरीद करार (पीपीए) करती हैं, जिसमें एक स्थायी और एक परिवर्तनीय लागत होती है. डिस्कॉम ने फिलहाल स्थायी लागत देने से भी मना कर दिया है. एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स के मुताबिक, डिस्कॉम की ओर से जारी फोर्स मैज्योर पीपीए की शर्तों का उल्लंघन है.

• देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन पीवीआर ने फोर्स मैज्योर के आधार पर सभी मॉल मालिकों से किराए माफ करने को कहा है. पीवीआर की भारत और श्रीलंका में 800 से ज्यादा स्क्रीन हैं.

• देश की सबसे बड़ी दुपहिया वाहन कंपनी हीरो मोटो कॉर्प ने भी लॉकडाउन में ठप बिक्री के बाद फोर्स मैज्योर लगाकर वेंडर्स का भुगतान रोक दिया.

• बड़ी कंपनियों से इतर क्रेन मालिक जैसे छोटे कारोबारी भी फोर्स मैज्योर के सताए हैं. क्रेन ओनर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने लॉकडाउन के कारण हुए नुक्सान से उबरने के लिए दो बार एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी को चिट्ठी लिखकर राहत की गुहार लगाई है. चिट्ठी में एसोसिएशन की ओर से व्यापार प्रभावित होने के जो कारण बताए गए हैं उनमें क्लाइंट्स की ओर से फोर्स मैज्योर लगाकर भुगतान रोक देना भी है.

• फुटबॉल क्लब ईस्ट बंगाल ने सभी खिलाडिय़ों और अधिकारियों के साथ किए करार को फोर्स मैज्योर का हवाला देते हुए समय से पहले ही रद्द कर दिया. खिलाड़ी इस निर्णय के खिलाफ फुटबॉल प्लेयर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का दरवाजा खटखटाने पर विचार कर रहे हैं.

छोटे कारोबारियों से लेकर बड़ी कंपनियों तक कई और ऐसे किस्से हैं जहां लॉकडाउन की स्थिति को फोर्स मैज्योर मानकर कंपनियां नोटिस भेज रही हैं. साथ ही कई संगठन भी इसी के सहारे सरकार से रियायतों की गुहार लगा रहे हैं.

19 फरवरी को वित्त मंत्रालय की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोविड-19 को एक अप्रत्याशित घटना मानने की बात कही गई. इससे उन सभी कंपनियों को राहत मिलेगी जो केंद्र सरकार के साथ किसी तरह के व्यापारिक अनुबंध में हैं. लेकिन इससे इतर दो कारोबारियों के बीच हुए अनुबंध के लिए केंद्र सरकार का यह निर्णय नजीर बनेगा, इसकी गुंजाइश कम है.

लॉ फर्म एसएसए लीगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुनील गर्ग कहते हैं, ‘‘सरकार का फैसला उन अनुबंधों तक ही सीमित होगा, जिनमें वह खुद एक पक्ष है. लेकिन दो कारोबारियों के बीच कोई अनुबंध है तो उन्हें सरकार बाध्य नहीं कर सकती.’’

इस फैसले का असर सरकारी बैंकों पर देखने को मिल सकता है. वे इसे फोर्स मैज्योर मानकर किस्त टालने की मोहलत जैसी राहतें बढ़ा सकते हैं. गर्ग कहते हैं, ‘‘निश्चित तौर पर सरकार की कोशिश यह संदेश देने की है कि मुकदमेबाजी न बढ़े और दूसरे लोग भी इसे फोर्स मैज्योर की तरह देखें.’’ लेकिन यह हर अनुबंध की स्थिति में संभव नहीं.

अनुबंध बनेगा आधार

क्या वाकई फोर्स मैज्योर के नाम पर सभी कारोबारियों को राहत मिल जाएगी? इस स्थिति को समझाते हुए पीएस लॉ ग्रुप के सीनियर एडवोकेट जसपाल सिंह सेठी कहते हैं, ‘‘फोर्स मैज्योर के तहत किसे राहत मिलेगी और किसे नहीं, यह अनुबंध में लिखी शर्तों पर निर्भर करता है.’’ आमतौर पर अनुबंध में फोर्स मैज्योर शब्द का जिक्र होता है. लेकिन कोविड-19 की स्थिति में उसका लाभ तभी मिलेगा जब फोर्स मैज्योर या दैवी आपदा की शर्त के अंतर्गत महामारी को जोड़ा गया हो. या फिर ‘ऐक्ट ऑफ गवर्नमेंट’ को जोड़ा गया हो. इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि सरकार के फैसले के कारण अनुबंध का पालन नहीं कर सके.

जसपाल यह भी कहते हैं, ‘‘बड़ी कंपनियां तो लीगल फर्म हायर करती हैं. लेकिन छोटे कारोबारी इसे गंभीरता से नहीं लेते. वे पहले से लिखे किसी समझौते पर बस पक्षकारों का नाम बदलकर खानापूर्ति करते हैं.’’ मकान या दुकान मालिक और किराएदार के बीच लिखे समझौतों में यह बहुत आम है. दिल्ली के ही अपने एक क्लाइंट का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि उन्होंने किराएदार और मकान मालिक के बीच किराए का अनुबंध तैयार करते समय ‘ऐक्ट ऑफ गवर्नमेंट’ को फोर्स मैज्योर क्लॉज में जोड़ा. इसका फायदा न केवल कोविड-19 के दौरान व्यापारिक गतिविधियां बंद होने पर पार्टी को मिलेगा बल्कि कर्फ्यू लग जाने की स्थिति में भी यह उतना ही वैध होगा.

अगर मोटा पैसा खर्च करके अनुबंध नहीं बनवाया तो बीमा पॉलिसी क्या किसी काम आ पाएगी?

बीमा कंपनियों का दांव

फोर्स मैज्योर जैसी स्थिति में बीमा कंपनियों की भूमिका भी अहम हो जाती है क्योंकि बड़ी कंपनियां अप्रत्याशित घटना से होने वाले नुक्सान की भरपाई के लिए बड़ी-बड़ी बीमा पॉलिसी खरीदती हैं. बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के नेशनल हेड (प्रॉपर्टी ऐंड रिस्क इंजीनियरिंग सॢवस) सी.आर. मोहन कहते हैं, ‘‘बीमा कंपनियों की ओर से व्यावसायिक दावों के निबटारे का आधार आमतौर पर माल के नुक्सान से जुड़ा होता है.’’ बात को थोड़ा और खोलते हुए वे कहते हैं, ‘‘मान लीजिए किसी फैक्ट्री में आग लग जाती है या बाढ़ आ जाती है जिसकी वजह से फैक्ट्री में रखा सामान नष्ट हो जाता है. तो ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी भुगतान करेगी. लेकिन कोविड-19 की स्थिति में ऐसा नहीं है.

मोहन यह भी कहते हैं, ‘‘फोर्स मैज्योर के आधार पर किसको बीमा का लाभ मिलेगा और किसको नहीं, यह पॉलिसी के नियम और शर्तों पर निर्भर करता है. बीमा कंपनी जिस रिस्क का प्रीमियम ले रही है, उसी का भुगतान करेगी.’’ मोहन एक और अहम बात समझाते हुए कहते हैं, ‘‘आमतौर पर कारोबारी फैक्ट्री, गोदामों या स्टोर्स के लिए फायर इंश्योरेंस जैसी पॉलिसी लेते हैं क्योंकि यह बैंक से कर्ज लेने के लिए अनिवार्य हो जाती है.

लेकिन किसी भी कारण से व्यापारिक गतिविधि रुकने के समय नुक्सान की भरपाई के लिए काम आने वाली बिजनेस इंटरप्शन पॉलिसी लेने वालों की संख्या बहुत कम है.’’ फायर इंश्योरेंस पॉलिसी की तुलना में बिजनेस इंटरप्शन पॉलिसी लेने वाले सिर्फ 0.1 फीसद हैं. हालांकि बिजनेस इंटरप्शन पॉलिसी का लाभ लेने की स्थिति में भी माल के नुक्सान की शर्त जुड़ी होती है.

अदालत का सहारा

अनुबंध की शर्तों पर एक मत न होने की स्थिति में कंपनियों के पास अदालत का ही विकल्प बचता है, जहां कंपनियां पिछले मुकदमों को आधार बनाते हुए पक्ष रखकर अपना हित साधने की कोशिश कर सकती हैं. लॉ फर्म मैवेन लीगल एडवोकेट्स ऐंड कंसल्टेंट्स के लीड पार्टनर जीवेश मेहता बताते हैं, ‘‘कोविड-19 का संकट किसी से छुपा नहीं है. इसलिए ज्यादातर मामलों में कोशिश यही है कि सुलह का रास्ता निकल आए. लेकिन इसके बाद भी बड़ी संख्या में मुकदमे अदालतों में पहुंचेंगे, इसका अंदेशा तो है ही.’’

अपने एक क्लाइंट (बड़े ब्रांड के लिए शोरूम बनाने वाले) की ओर से भेजे गए अपने सबसे ताजा नोटिस का जिक्र करते हुए मेहता कहते हैं, ‘‘क्लाइंट ने एक बड़ी कंपनी के साथ शोरूम तैयार करने का कॉन्ट्रैक्ट किया था जो 30 मई तक पूरा होना था. काम चल रहा था कि अचानक लॉकडाउन हो गया. अब मेरा क्लाइंट 30 मई की डेडलाइन को पूरा नहीं कर पाएगा. इसकी सूचना के लिए कंपनी को नोटिस भेजा. जवाब में कंपनी ने अनुबंध ही रद्द करने को कह दिया.

लेकिन मेरा क्लाइंट तो वह अनुबंध पूरा करने के लिए पहले ही अच्छी खासी रकम निवेश कर चुका है. उसकी भरपाई कैसे होगी?’’ वे कहते हैं, ‘‘ऐसे न जाने कितने मामले होंगे जिनकी दिक्कतें अपनी तरह की होंगी. अब अगर कोई रास्ता नहीं निकलता है तो निश्चित तौर पर मुकदमेबाजी होगी ही. इसमें फिर और उपाय ही क्या बचता है?’’

लॉकडाउन खुलने के बाद व्यावसायिक गतिविधियां कब तक पटरी पर लौटेंगी, इसका कोई सटीक अनुमान हमारे पास नहीं. लेकिन बड़ी संख्या में मुकदमें अदालतों में पहुंचने का अंदेशा है. और मुकदमों के नतीजे या सुलह के रास्ते सामने आने में अगर ज्यादा समय लगा तो बैंकों की बैलेंसशीट पर इसका असर दिखने लगेगा. डूबते कारोबार बढ़ते डूबत खाते का कारण बनेंगे.

क्या कहता है कानून?

• फोर्स मैज्योर भारतीय अनुबंध कानून, 1872 की धारा 32 के तहत एक प्रावधान है. यह युद्ध, दंगा, महामारी या दूसरी दैवी आपदाओं की स्थिति में दो पक्षों के बीच हुए अनुबंध की शर्तों से मुक्त कर देता है

• इसी कानून की धारा 56 ''डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन’’ से जुड़ी है. इसका ताल्लुक परिस्थितियों में ऐसे बदलाव है, जिसकी वजह से समझौते के अनुबंधों का पालन कर पाना असंभव हो जाता है. कानून विशेषज्ञ जीवेश मेहता बताते हैं, ‘‘ऐसे व्यावसायिक अनुबंध जिनमें फोर्स मैज्योर का जिक्र नहीं होता, वहां कंपनियां अधिनियम की धारा 56 का सहारा लेती हैं.’’

वे एक मिसाल से इसे समझाते हैं. मान लीजिए एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ने कोई कॉन्सर्ट बुक किया है जो लॉकडाउन की स्थिति में होना संभव नहीं, तो यह फ्रस्ट्रेशन ऑफ कॉन्ट्रैक्ट माना जाएगा क्योंकि यह अनुबंध पूरा नहीं किया जा सकता. ‘‘ऐसी स्थिति में इवेंट कंपनी ने अगर कोई एडवांस लिया है तो उसे लौटाना पड़ेगा’’

रियल एस्टेट में फोर्स मैज्योर

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसी हक्रते राहत पैकेज के ऐलान के दौरान एक बार फिर कोविड-19 को फोर्स मैज्योर मानने की बात कही. इस बार मौका रियल एस्टेट क्षेत्र को सहूलत देने का था. उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के कारण प्रभावित गतिविधियों के बीच ऐसा खतरा है कि डेवलपर परियोजना को पूरा करने वाली रेरा की तय समयसीमा से चूक सकते हैं. इस समयसीमा को बढ़ाने की जरूरत है.

इस संबंध में शहरी विकास मंत्रालय सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों और उनके नियामकों को यह सलाह देगा कि वे कोविड-19 को रेरा के अंतर्गत ‘फोर्स मैज्योर’ मानते हुए परियोजनाओं के पंजीकरण और उन्हें पूरा करने की तारीख को स्वत: संज्ञान लेते हुए छह माह आगे बढ़ा दें. इसके बाद जरूरत पडऩे पर नियामक इस समयसीमा को तीन महीने और बढ़ा सकते हैं. इसके साथ ही अन्य वैधानिक अनुपालनों में भी रियायत दी जाए.

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