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आवरण कथाः जोर लगाने का वक्त

हिंदुस्तान को नीतियों और सुधारों को नए सिरे से गढऩा होगा, बाहर कम और भीतर ज्यादा देखना होगा, क्योंकि भविष्य की वृद्धि ज्यादा घरेलू मांग पैदा करने पर टिकी होगी.

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जहांगीर अजीज 15 January 2018
आवरण कथाः जोर लगाने का वक्त

हिंदुस्तान की मौजूदा आर्थिक सुस्ती को लेकर सबसे प्रमुख अफसाना दो लफ्जों में बयान किया जा सकता हैः बेमौके फैसले! ठीक उस वक्त जब वैश्विक अर्थव्यवस्था 2010 से बारी-बारी से आने वाले अपने सबसे मजबूत दौर में दाखिल हुई, हिंदुस्तान को एक के बाद एक नीतिगत फैसलों—नोटबंदी, माल और सेवा कर की शुरुआती दिक्कतों और बैंकों के डूबत कर्ज को नई शक्ल देने—के दुखद नतीजों में झोंक दिया गया. इन फैसलों ने घरेलू सप्लाई चेन को कुछ वक्त के लिए तहस-नहस कर दिया. इनका असर फीका पड़ते ही वैश्विक ज्वार हिंदुस्तान को उठाकर ज्यादा ऊंची विकास दर पर ले जाएगा. 

इस बीच सुधारों को जारी रखते हुए कारोबार करने की लागत को आसान बनाने पर ध्यान देना जारी रखना चाहिए, वहीं समायोजन का बोझ हल्का करने के लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियां छोटे वक्त की राहत मुहैया करवाने वाली होनी चाहिए. लिहाजा नीतिगत ब्याज दरों में कटौती, कहीं ज्यादा कमजोर मुद्रा और मौजूदा तथा अगले साल ज्यादा राजकोषीय घाटा बर्दाश्त करना वक्त का तकाजा है. 

निजी निवेश की बुरी हालत को देखते हुए राजकोषीय विस्तार की नीति का लक्ष्य बुनियादी ढांचे पर खर्च में बढ़ोतरी और निचले और मध्यम आमदनी के आवासों के लिए सब्सिडी होना चाहिए. मगर जब चुनाव मुंहबाए खड़े हों, तब किसानों को भी कुछ सहायता अलग से दी जा सकती है.

पहली नजर में यह दलील पुख्ता लगती है, सिवाए इसके कि इसका हकीकत से ज्यादा लेना-देना नहीं है. अब वैश्विक वृद्धि से शुरुआत करते हैं. 2016 के बाद के छह महीनों से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में चहुंमुखी चक्रीय वृद्धि देखी जा रही हैरू विकसित अर्थव्यवस्थाएं खपत और निवेश दोनों के लिहाज से पूरी ताकत से जोरदार प्रदर्शन कर रही हैं, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाएं चतुराई के साथ उबरने में कामयाब रही हैं. 

2018 में हालात और भी बेहतर होने की उम्मीदें हैं. यूरो जोन और अमोरिका दोनों रुझानों से कहीं ज्यादा तेज बढ़ेंगे. इस चक्रीय उछाल की तह में एक ऐसी वैश्विक अर्थव्यवस्था है जो ढांचागत दुश्वारियों में फंसी है. आर्थिक संकट के बाद से तकरीबन हर जगह मापी गई उत्पादकता में गिरावट आई है, तब जब किसी भी जगह सप्लाई या आपूर्ति से जुड़े सार्थक सुधार नदारद हैं. यहां तक कि अमेरिका में जिन कर सुधारों की इतनी शेखी बघारी गई, उनसे भी मध्यावधि की आपूर्ति बढ़ाए बगैर कम समय के लिए मांग में ही इजाफा होने की उम्मीद की जा सकती है. 

आठ साल के विस्तार के बाद क्षमता पर लगातार ज्यादा दबाव पडऩे और उत्पादकता के अपेक्षानुसार न बढऩे के साथ, आखिरकार तनख्वाहें बढ़ेंगी, जो मुद्रास्फीति को और ऊपर धकेल देंगी और केंद्रीय बैंकों को और ज्यादा सख्ती के लिए मजबूर कर देंगी.

विकसित अर्थव्यवस्थाओं से परे, सामान की वैश्विक मांग का अकेला दूसरा स्रोत चीन है. हाल ही में हुई 19वीं कांग्रेस में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने औपचारिक तौर पर कबूल किया था कि चीन अब कम आमदनी वाली अर्थव्यवस्था नहीं रह गया, जो लाखों नौकरियां पैदा करने की चुनौती से घिरा हो, बल्कि वह बढ़ती मध्यम आमदनी वाला देश बन चुका है, जो जिंदगी को और बेहतर बनाने को लालायित है. 1981 में डेंग 'ओपिंग ने वर्ग संघर्ष की जगह बढ़ती आर्थिक वृद्धि को पार्टी के प्रमुख उद्देश्य के तौर पर पहचाना था. फिर अगले तीन दशकों तक प्रांतीय और निचले स्तर के अफसरों ने हर मुमकिन तरीके से ऊंची वृद्धि हासिल करने में पूरा जोर लगा दिया, भले ही इसके दुष्परिणाम झेले.

हिंदुस्तान की खास वजहों का रुख करें, तो वृद्धि के सुस्त पडऩे की वजहों के तौर पर नोटबंदी और जीएसटी के उलटे असर और डूबत कर्जों को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ये फैसले उथलपुथल मचाने वाले थे, शायद उससे ज्यादा ही जितने अब माने जाते हैं, पर पूरा दोष इन्हीं के मत्थे मढऩा मुश्किल है. 

वजह साफ हैः देश की विकास दर में नोटबंदी से छह महीने पहले और जीएसटी के लागू होने से एक साल पहले 2016 की दूसरी तिमाही से ही गिरावट देखी गई है. डूबत कर्जों की दिक्कतें 2016 में सुर्खियों में आ गई थीं और बहुत ज्यादा कर्ज देने के चलते 2014 से बैंकों की सेहत पर भारी पडऩे लगी थी.

तो 2016 से वृद्धिदर में गिरावट की क्या वजह थी? यह तेल के दामों में आया बदलाव था, जिन्होंने 2014-15 में वृद्धि को हांका था. 2013 के उत्तरार्ध में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद दुनिया भर में तेल की कीमतें 2014-15 के दौरान तकरीबन 70 फीसदी गिर गईं और 2016 की पहली तिमाही आते-आते निचले स्तर पर पहुंच गईं. यह भारी-भरकम गिरावट भारत के लिए जोरदार सकारात्मक धक्का था, जो तकरीबन पूरे 2014-15 के दौरान ग्रोथ के रफ्तार पकडऩे की वजह माना जाता है. 

2016 के शुरुआती महीनों के बाद से तेल की कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं, जिसने बहुत बुरा असर डाला और वृद्धि को लगातार धीमा किया. नोटबंदी, जीएसटी और डूबत कर्जों ने तो बुरी हालत को बस और बदतर ही किया, उन्होंने यह बुरी हालत पैदा नहीं की. 

जाहिर है, कुछ लोग दलील देंगे कि इस अफसाने में इसी वक्त के दौरान सियासत में आए आमूलचूल बदलाव और उसके साथ आमजनों की भावना और सरकार के फैसले लेने में आए बदलावों की अहमियत को घटाकर बताया जा रहा है. मैं ऐसा नहीं कर रहा हूं. मैं केवल यह कह रहा हूं कि असलियत में इनमें से किसी भी दूसरी वजह की बजाए तेल की वैश्विक कीमतों ने हिंदुस्तान की वृद्धि की रफ्तार को कहीं ज्यादा प्रभावित किया.

2018 में और उसके आगे हम कहां जा सकते हैं, यह जानने के लिए हमें इस बात को ज्यादा अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि अव्वल तो हम यहां पहुंचे कैसे. एक बार जब हम कामचलाऊ और आकस्मिक दलीलों को खारिज कर देते हैं, तभी हम ऊबडख़ाबड़ और पेचीदा जवाबों की दुनिया में कदम रखते हैं, जो लंबे वक्त से चली आ रही गलत धारणाओं से निजात पाने के लिए जरूरी है. मैं ऐसी ही एक गलत धारणा से बात शुरू करने जा रहा हूं. 

हिंदुस्तान वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रति लंबे वक्त से, जितना माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा खुला रहा है और है. विश्लेषकों और नीति-निर्माताओं के बीच वाकई एकराय है कि 2003-08 के दौरान देश की बेहद सराही गई 9 फीसदी की वृद्धि दर के पीछे निवेश में नाटकीय बढ़ोतरी की काफी भूमिका रही थी. 1991-92 के उदारीकरण और उसके साथ 1990 के दशक के आखिरी सालों में कंपनियों में आए ढांचागत सुधारों की बदौलत कॉर्पोरेट निवेश 2000 के दशक की शुरुआत के जीडीपी के 5-6 फीसदी से बढ़कर 2008 तक जीडीपी के 17 फीसदी पर पहुंच गया. 

मगर इसके लिए दोनों जिम्मेदार हैं. निवेश में बढ़ोतरी से ढेरों चीजों का उत्पादन हुआ, जिनका किसी न किसी को तो उपभोग करना ही पड़ा. हरेक कोने में शॉपिंग मॉल के विस्फोट के बावजूद यह घरेलू खपत नहीं थी जिसने उत्पादन में इस बढ़ोतरी को खपा लिया, जैसा कि आम तौर पर माना जाता है. बल्कि यह निर्यात था जो हर साल तकरीबन 18 फीसदी की चौंकाने वाली रफ्तार से बढ़ा. दूसरी तरफ, निजी खपत 7.5 फीसदी की रक्रतार से बढ़ी, जो अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर से भी इतनी कम थी कि जीडीपी में इसका हिस्सा 62 फीसदी से घटकर 57 फीसदी पर आ गया. 

इसे और अच्छी तरह समझने की गरज से, पिछले कुछ सालों के दौरान गिरावट के बावजूद हिंदुस्तान के जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 20 फीसदी है और यह इंडोनेशिया के बराबर और ब्राजील से दोगुना है.ग्रोथ में धीमेपन के रुझान के पीछे सबसे अहम वजह निवेश में लगातार गिरावट को माना जाता है, जो 2012 में जीडीपी के 37 फीसदी के सबसे ऊंचे स्तर से फिलहाल जीडीपी के 30 फीसदी से नीचे आ गया है. मगर कॉर्पोरेट निवेश तो 2009 में ही गोता लगा गए थे और तब से जीडीपी के तकरीबन 12 फीसदी से सपाट स्तर पर बने हुए हैं. 

बदले में, आवास और एसएमई क्षेत्र में निजी निवेश पिछले पांच सालों में जीडीपी के 15 फीसदी से गिरकर तकरीबन 10 फीसदी पर पर आ गया है. इनका मध्यम अवधि की ग्रोथ पर बेहद अहम असर पड़ा. 2003-08 के दौरान हिंदुस्तान की 9 फीसदी वृद्धि निर्यात में सालाना 18 फीसदी की उछाल की बदौलत थी. पिछले पांच साल में निर्यात सालाना महज 3 फीसदी की दर से बढ़ा है. आने वाले सालों में अगर निर्यात दोगुनी रक्रतार से भी बढ़ता है, तो भी कुल वृद्धि को 7 फीसदी से ऊपर जाते देख पाना मुश्किल है. 

हिंदुस्तान में निजी निवेश न तो इसलिए लडख़ड़ाए क्योंकि फंडिंग की लागत बहुत ज्यादा है और न ही इसलिए कि बैंक डूबत कर्जों से लाचार हैं और इसलिए भी नहीं कि विनिमय दर बहुत अधिक है, जैसा कि आज सामूहिक विलाप किया जाता है. वे इसलिए लडख़ड़ाए क्योंकि मांग इतनी पर्याप्त नहीं है कि बड़े निवेशों को जायज ठहरा सके. दूसरे लक्रजों में, वैश्विक ग्रोथ के गिरकर औसत पर लौटने की संभावना के साथ, जब तक हम इकोनॉमी के घरेलू कारकों को इतना परवान चढ़ते नहीं देख पाते कि कॉर्पोरेट को निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकें, तब तक 7 फीसदी ही नया 9 फीसदी होगा.

ऐसा कहना आसान है, कर पाना मुश्किल, क्योंकि इसके लिए उस तंत्र पर ही नए सिरे से विचार करने की जरूरत है जो आजादी के बाद से नीतियों और सुधारों की बुनियाद रहा है. अगर याद करने की जहमत उठाएं, तो हिंदुस्तान आपूर्ति-बाधित अर्थव्यवस्था रहा है जिसके ढांचे में ही ऊंची महंगाई दर और तकलीफदेह चालू खाते का घाटा निहित था. 

नीतियों और सुधारों को, तकरीबन पूरी तरह, समूची अर्थव्यवस्था में आपूर्ति की अड़चनों को कम करने के लिए ही बदला गयाः बुनियादी ढांचे पर खर्च से लेकर बैंकों में नई पूंजी लगाने तक और वित्तीय दबावों, नियामकीय झटकों और सार्वजनिक खर्च के विकल्पों के जाल के जरिए घर-परिवारों को बचत (सेवानिवृत्ति की आमदनी, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और मकान बनाने के लिए) बढ़ाते रहने के लिए मजबूर किया गया.

निष्पक्षता के साथ कहा जाए, तो जब तक देश में निर्मित सामान और सेवाओं की खपत के लिए विदेशी मांग पर्याप्त थी, यह एकांगी सोच सही थी. अब यह सही नहीं रह गया है. मुश्किल पहलू अलबत्ता इस 70 साल पुराने ढांचे पर सवाल उठाना और इसमें बदलाव लाना है और फिर तमाम केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच इस बदलाव की जरूरत पर आम राय बनाना है. 

नीतियों और सुधारों को नए सिरे से ढालना बनिस्बतन कम मुश्किल है और यह हिंदुस्तान के बुनियादी ढांचे को भीतर की तरफ ज्यादा और बाहर की तरफ कम देखने वाला बनाने, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की सार्वजनिक सुविधाओं को बढ़ाने, बुढ़ापे की देखभाल के लिए जबरिया बचत को कम करने वाले बीमे के नियम-कायदों में सुधार लाने और रिटायरमेंट बचतों पर रिटर्न बढ़ाने के लिए वित्तीय दबावों को खत्म करने के साथ शुरू हो जाता है. 

जहां 1,800 डॉलर प्रति व्यक्ति आमदनी वाले किसी भी मुल्क ने निर्यात पर निर्भर किए बगैर ऊंची वृद्धि बनाए रखने में सफलता हासिल नहीं की है, वहीं इस बात की भी कोई संभावना नहीं है कि वैश्विक व्यापार आर्थिक संकट से पहले की वृद्धि दर के आसपास भी कहीं लौट सकेगा. लिहाजा बढिय़ा विकल्प यही होगा कि नीतियों के पलड़े को और ज्यादा घरेलू मांग पैदा करने की तरफ झुका दिया जाए. 

क्या ऐसा होगा? केवल उम्मीद ही की जा सकती है, क्योंकि 7 फीसदी की वृद्धि दर काफी नहीं भी हो सकती हैः अगले 25 साल तक इस रफ्तार से बढ़कर भी हिंदुस्तान की प्रति व्यक्ति आय में विकसित देशों की प्रति व्यक्ति आय से महज तकरीबन 15 फीसदी का और अपने एशियाई हमराह मुल्कों से इसके आधे का ही इजाफा होगा.

जहांगीर अजीज जे.पी. मोर्गन में चीफ इमर्जिंग मार्केट्स इकॉनोमिस्ट हैं

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