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जम्मू-कश्मीर में सैलाब में बह गई सरकार

जम्मू-कश्मीर में सैलाब आया तो तेज धार में मानो राज्य सरकार भी बह गई, लेकिन पानी उतर जाने के बाद क्या वह इतनी साबुत बची है कि हालात से निबट पाए? क्या वह जिंदगी को पटरी पर लाने में मददगार हो पाएगी? स्थानीय अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि तबाही से 1,00,000 करोड़ रु. का नुक्सान हुआ है.
जम्मू-कश्मीर में सैलाब में बह गई सरकार
ज्योति मल्होत्रानई दिल्ली, 29 September 2014

जिंदा हो? ’’ श्रीनगर की फिजाओं में गूंजता यह सीधा-सपाट कठोर सवाल मानो एक-दूसरे का हाल जानने का एक मासूम-सा सबब बन चुका है, जहां झेलम के सैलाब में हमेशा के लिए बदल चुकी जिंदगियां दो हफ्ते बाद पटरी पर लौटने को जबरन मजबूर हैं. इसे आप सामान्य हालात मान सकते हैं, हालांकि ‘‘अस्सलाम अलैकुम’’ के संबोधन तक आते-आते इस शहर को अभी एकाध हफ्ता और लग जाएगा. फिलवक्त तो इतना ही पूछना काफी है कि क्या तुम जिंदा हो. इसमें आधी तल्ख हकीकत है और बाकी एक सुकून, कि सब ठीक है.

पिछले पखवाड़े यहां जो कुछ घटा, वह श्रीनगर में बसी एक भरी-पूरी दुनिया को अब तक घेरे हुए लगातार चक्कर काट रहा है. सात दिन पहले यानी 12 सितंबर तक बाढ़ का कहर यहां कम होने लगा था और उससे ठीक हफ्ता भर पहले यानी 6 सितंबर को यह सैलाब बस आने को था. यहां बचे हुए लोग उन पलों को जैसे-जैसे याद करते हैं, ऐसा लगता है कि याददाश्त के उमड़ते सैलाब और एक निपट खालीपन के दो सिरों के बीच झूलते उनके मद्धम बयान कुछ और कहना चाह रहे हों.

फर्ज करें कि इस कहानी में आप हैं. हालात कुछ यूं बनते हैं कि 7 सितंबर की उस कभी न भुलाई जा सकने वाली सुबह के 6.30 बजे अचानक आपकी रसोई में आपके पैरों के नीचे पानी भर जाता है. आप जवाहर नगर के अपने ग्राउंड फ्लोर के अपार्टमेंट से बाहर यह देखने निकलते हैं कि आखिर पानी आ कहां से रहा है.

आप अपार्टमेंट का छोटा-सा गेट खोलकर बाहर देखते हैं और आपकी नजर सड़क के दाहिनी ओर जाती है. करीब 8 से 10 फुट ऊंची पानी की लहर एक सफेद स्कॉर्पियो गाड़ी को बहाते हुए आपकी दिशा में बढ़ी आ रही है. आप पीछे हटते हैं और घर के भीतर बदहवास दौड़ पड़ते हैं. आपका दिल जोर-जोर से धड़क रहा है. अपने बुजुर्गवार मकान मालिक का सामान दूसरे से तीसरे माले पर पहुंचाने में आपका अगले एक घंटे का वक्त जाया हो जाता है.

जब तक आप ग्राउंड फ्लोर के अपने घर में लौटते हैं, आप पाते हैं कि गैस सिलिंडर पानी में तैर रहा है. आप बमुश्किल पैर जमीन पर टिका पा रहे हैं और सिलिंडर तैरते-तैरते आपकी छाती से टकरा रहा है. आप कोशिश करते हैं कि 250 साल पुराने हाथ से लिखे कुरान को बचा लिया जाए जो आपकी खानदानी विरासत है. इसे आपने सबसे ऊंचे शेल्फ पर रखा था ताकि वहां न बच्चों का हाथ जाए और न ही कोई नुक्सान होने पाए. आप पाते हैं कि उस तक पहुंच पाना अब नामुमकिन है.
बाढ़ से बेहाल श्रीनगर का मुख्य बाजार लाल चौक
(बाढ़ से बेहाल श्रीनगर का मुख्य बाजार लाल चौक)
करीब दो हफ्ते बाद जब श्रीनगर अपनी विरासत को जैसे-तैसे बचा पाने की जंग में जुटा है, तो उसका नागरिक जीवन अपनी तमाम कमजोरियों के साथ समूची दुनिया की आंखों के सामने बेपर्दा हो चुका है. हवाई अड्डे के करीब बेमिना-तेंगपुरा रोड पर सैलाब से विस्थापित तमाम लोगों ने फ्लाइओवर के नीचे टेंट गाड़ दिए हैं.

आधा नवंबर बीतते-बीतते सर्दियां आ जाएंगी यानी उनके पास रहने के लिए एक अदद छत की तलाश को सिर्फ दो माह का वक्त बचा है. यहां सर्दी इतनी ज्यादा पड़ती है कि सीमेंट को भी जमने में वक्त नहीं लगता. आम तौर से यहां अप्रैल से नवंबर का सीजन होता है. इस बार यह सीजन सिकुड़ गया है.

मध्यवर्गीय नौकरशाहों और नव-धनाढ्यों की कॉलोनी जवाहर नगर और राजबाग में पानी अब भी छाती तक भरा हुआ है. कुछ बाशिंदे यहां अपने बचे-खुचे माल-असबाब को बचा लेने के लिए अभी लौट आए हैं. उन्हें डर है कि उनका सामान लुट जाएगा. उन्हें उन शिकारेवालों पर शक है जो फिलहाल लोगों की जानें बचा रहे हैं लेकिन कहते हैं कि रात के अंधेरे में वे कॉलोनियों में लौट आते हैं. झेलम जो देती है, वह ले भी लेती है.

इस दौरान केंद्र से भेजे गए दो हेवी ड्यूटी पंप राजबाग में हफ्ते भर बाद काम करना शुरू कर चुके हैं. पानी जैसे-जैसे घट रहा है, स्थानीय राहतकर्मियों का सामना ज्यादा-से-ज्यादा लाशों से हो रहा है जो निकल नहीं पाई थीं.
श्रीनगर की वीआइपी कॉलोनी जवाहर नगर में हुई सबसे ज्यादा तबाही
(श्रीनगर की वीआइपी कॉलोनी जवाहर नगर में हुई सबसे ज्यादा तबाही)
उपेक्षा से बढ़ता गुस्सा
उस सुबह क्या हुआ, किनारे तोड़कर झेलम कैसे और क्यों शहर के भीतर घुस आई, ऐसे सवाल पूछे जाने पर श्रीनगर के बुजुर्गवार धीरे-धीरे सुलगते नजर आते हैं. यहां एक के बाद एक आई सरकारों के अधूरे वादों से वे अब कुम्हला चुके हैं. उनके बरअक्स यहां के नौजवानों का मिज़ाज-जिन्हें संघर्ष-असंतोष, कर्फ्यू-हड़ताल और यहां तक कि ‘‘इंतिफ़ादा’’ जैसे भारी-भरकम शब्दावलियों की खुराक लगातार एक के बाद एक पिलाई गई है-जल्दी गरम हो जाता है.

लकड़ी की नावों और स्थानीय मस्जिद से मांगकर लाए गए ताबूतों से बनाई कुछ नावों से हालांकि जब वे पानी में उतरते हैं, तो ऐसा लगता है कि उनका गुस्सा एक गहरे धिक्कार में तब्दील हो गया है.

एक स्थानीय राहतकर्मी की नाव से अपने घर सामान पहुंचाने जा रहे मुश्ताक कहते हैं, ‘‘हमारे एमएलए कहां हैं? जरूरत की इस घड़ी में उन्होंने हमें अपना चेहरा तक नहीं दिखाया है. ये जो नासिर वानी है, जब तक वह अमीराकदल क्षेत्र से नेशनल कॉन्फ्रेंस का विधायक नहीं चुना गया था, जवाहर नगर की मेरी दुकान में उसका महीने का खाता चलता था और अकसर हिसाब चुकाने में दिक्कत आती थी. आज तो वह काफी रईस है... इतना सारा पैसा आया कहां से? इन लोगों को बस हमारे दुख-दर्द से पैसा बनाना आता है.’’

जब जीवनदायनी नदी यहां मौत का सबब बनकर आई, ऐन उसी वक्त अपनी अवाम के साथ खड़े होने में नाकाम रहे इन बेपरवाह नेताओं के खिलाफ लोगों के बढ़ते आक्रोश में घी डालने का काम यहां के संवेदनहीन नागरिक प्रशासन ने किया है. संकट की घड़ी में खाद्य आपूर्ति से जुड़ी औपचारिकताओं में कटौती कर काम तेज करने की बजाए प्रशासन सुस्ती और लालफीताशाही में फंसा रह गया.

ऐसे तमाम किस्से चर्चा में हैं कि चावल और गेहूं से भरे गोदामों को ऐन मौके पर इसलिए नहीं खोला जा सका क्योंकि वहां के तालों की चाबियां जिस शख्स के पास थीं, वह जम्मू गया हुआ था. इंडिया टुडे को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्वीकार किया कि सबसे अहम 24 घंटे अफसरों के इस आग्रह के चलते बरबाद हो गए कि खाद्य आपूर्ति ले जा रहे ट्रकों का पहले पंजीकरण करवाना होगा, फिर उनके डिस्पैच के ऑर्डर पर दस्तखत किए जाएंगे और उसके बाद ही माल रवाना किया जा सकता है.

स्थानीय लोगों में जो गुस्सा अब्दुल्ला सरकार के खिलाफ जमा है, वह रह-रहकर सेना, वायु सेना और राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) के कर्मियों पर भी फूट पड़ रहा है. दरअसल लोगों को लग रहा है कि ये राहत बल चाह रहे हैं कि यहां की ‘‘एहसानफरामोश’’ जनता उनके किए कामों के बदले उनका एहसान जताए, हालांकि कश्मीरी खुलकर स्वीकार करते हैं कि इन सब ने वाकई शानदार काम किया है.

कश्मीरियों के शब्दों में ही कहें, तो ‘‘पूरी तरह से संवेदनहीन मुख्यधारा का मीडिया’’ ने सेना-वायु सेना, एनडीआरएफ के बचाव कार्य का असल स्वर बदल डाला है और श्रीनगर के लोगों को वह सार्वजनिक आभार जताने को बाध्य कर रहा है.    

श्रीनगर के एक निर्धन इलाके में रहने वाले अवकाश प्राप्त ड्राइवर मंजूर अहमद कहते हैं, ‘‘हमें गलत मत समझिए. हम जानते हैं कि भारतीय फौज ने इस बाढ़ में सैकड़ों जिंदगियां बचाई हैं और हम इसके लिए उनके एहसानमंद हैं. फौज के लोग जब नावें लेकर आए तो उन्होंने इसकी फिक्र नहीं कि फंसे हुए लोग सैलानी हैं या कश्मीरी, मुस्लिम हैं या पंडित. उनकी इकलौती चिंता यह थी कि सबसे ज्यादा खतरे में कौन है और सबसे पहले किसे बचाया जाना चाहिए.

हम इसकी खूब सराहना करते हैं, लेकिन जब आपका मीडिया लगातार हमारे मुंह पर अपनी राय थोपता रहता है कि हमारे लिए जो कुछ किया जा रहा है, उसके लिए हम एहसानमंद नहीं हैं, तब वाकई हमें दिक्कत होती है.’’

अहमद कहते हैं कि लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सैकड़ों कश्मीरी लोगों ने भारी जोखिम उठाकर अपने शिकारे झेलम के उफनते पानी में सिर्फ इसलिए उतार दिए ताकि फंसे हुए लोगों, गर्भवती औरतों और बच्चों को बचाया जा सके. कुछ फौज के साथ मिलकर तो कुछ अकेले जुटे हुए थे. वे कहते हैं, ‘‘हम सबको उनका योगदान स्वीकार करना चाहिए.’’

यह पूछे जाने पर कि श्रीगनर की सड़कों से वे और उनकी सरकार क्यों नदारद है, मुख्यमंत्री अब्दुल्ला कहते हैं, ‘‘शुरुआत में संवाद की कमी के कारण हम खुद को बंधा हुआ महसूस कर रहे थे. टेलीफोन का नेटवर्क पूरी तरह से गायब था और मैं खुद अपने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क नहीं कर पा रहा था.

फिर हमने लोगों को बाहर निकालने की कोशिश की. लेकिन मैं इतना मानता हूं कि संकट की घड़ी में सरकार को अपनी अवाम के साथ दिखना चाहिए. भीड़ कभी-कभार भड़क भी सकती है, लेकिन हमें उसकी भावना को समझना होगा.’’
पानी की बोतलों के लिए उठे हाथ
(पानी की बोतलों के लिए उठे हाथ)
अब आगे क्या?
अब्दुल्ला मानते हैं कि इन हालात में उनके लिए चुनौतियां गंभीर हैं. अब भी शहर का बड़ा हिस्सा पानी में डूबा हुआ है-खासकर जवाहर नगर और राजबाग, जहां झेलम ने अपने किनारे तोड़ दिए और इन कॉलोनियों को मौत के भंवर में तब्दील कर डाला. इनके अलावा बेमिना, तेंगपुरा और बटमालू के कुछ इलाके भी पानी के नीचे हैं. जमा हुआ पानी जलजनित बीमारियों जैसे हैजा, पेचिश और गैस्ट्रोएन्ट्राइटिस को न्योता दे रहा है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन हालात का जायजा लेने श्रीनगर आए थे. उनके साथ आए डॉक्टरों ने सलाह दी है कि 15 साल तक के बच्चों को खसरे का टीका लगाया जाए. बाढ़ में बच गए कुत्ते अपनी भूख मिटाने के लिए बेचौन और डरे-मारे घूम रहे हैं. इसके चलते कुत्तों के काटने की खबरें भी आ रही हैं और रेबीज का खतरा बढ़ता जा रहा है. 

यहां इन्सुलिन और ऐंटी ब्लड प्रेशर की दवाओं की भारी मांग है. माना जा रहा है कि बायोकॉन कंपनी की किरण मजूमदार शॉ ने कुछ टन ऐसी दवाइयां बंगलुरू से यहां भिजवाई हैं. इस दौरान राहत संगठन सबसे बढिय़ा काम कर रहे हैं. इनमें एक कश्मीर वैली इन डेल्ही फॉर फ्लड रिलीफ (केवीआइडीएफआर) है जिसने दक्षिणी श्रीनगर के कुछ संपन्न बच्चों को इकट्ठा करके शहर से बाहर कुछ काम शुरू किया और जो धीरे-धीरे एक संगठित समूह की शक्ल लेता जा रहा है और शहर के भीतरी इलाकों तक इसने राहत कार्य देने में अपनी पहुंच बनाई है.

जल जमाव को साफ नहीं किया गया, तो महामारी का खतरा पैदा हो जाएगा जो सरकार समेत निजी चिकित्सकों के लिए भी चुनौती होगा. कश्मीर घाटी को डुबोने वाली 1902 में आई पिछली बाढ़ के ब्रिटिशकालीन दस्तावेज बताते हैं कि झेलम की विभीषिका में सिर्फ 92 लोगों की जान गई थी जबकि बाढ़ के बाद महामारी फैलने से करीब 15,000 लोगों की मौत हो गई थी.

सरकारी अस्पतालों के बंद होने के कारण अधिकतर मरीजों को श्रीनगर हवाई अड्डे के करीब स्थित अहमद अस्पताल में ले जाया गया है. इस निजी अस्पताल के डॉ. नक्शबंदी का कहना है कि बाढ़ में बह चुके जांच उपकरणों के चलते बेहद सामान्य रोगों की पहचान में भी मुश्किलें आएंगी. बाढ़ में मारी गई मुर्गियों, कुत्तों और गायों जैसे सड़कों पर बिखरे जानवरों को हटाने के आदेश दिए गए हैं. श्रीनगर के बाहरी इलाके में 330 मवेशियों वाले फौज के विशाल डेयरी फार्म की आधे से ज्यादा आबादी साफ हो गई है.

सरकार अब भी इन्हें दफनाने की जगह तलाश रही है. सैलाब आने के सिर्फ तीन-चार दिनों के भीतर जिन लोगों को उनके घरों से निकाल लिया गया था, उनकी मानें तो फौज की डेयरी के पास से गुजरने पर उस रात मवेशियों की इतनी हौलनाक आवाजें आ रही थीं कि जैसे किसी कयामत की भविष्यवाणी हो.

फिलहाल, सरकारी और निजी दूरसंचार नेटवर्क कहीं-कहीं बमुश्किल पकड़ में आ रहा है. लाइनें अब भी दुरुस्त नहीं हुई हैं, इसलिए मुख्यमंत्री अब्दुल्ला कश्मीर के पूर्व महाराजा की तमाम आलीशान आरामगाहों में से एक हरि निवास से अपना राजकाज चला रहे हैं. बाढ़ को हफ्ता भर से ज्यादा बीत जाने के बाद आखिरकार अपनी मंत्रिपरिषद की एक बैठक उन्होंने यहां बुलाई थी क्योंकि सचिवालय अब भी कुछ फुट पानी में डूबा पड़ा है. बताया जा रहा है कि उनके विधायक श्रीगनर में नहीं रहना चाहते और उन्होंने इसके लिए बगावत कर दी है. 

इस सिलसिले में कई किस्से सामने आ रहे हैं. स्वास्थ्य मंत्री ताज मोहिउद्दीन राजधानी छोडऩे को इतने बेताब थे कि अपने चुनाव क्षेत्र उड़ी को निकलने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी से भी बमुश्किल घंटा भर ही मुलाकात की. राजस्व, राहत और पुनर्वास मंत्री एजाज अहमद खान ने अपने चुनाव क्षेत्र गुल अरनास के करीब जम्मू क्षेत्र में ही बने रहने को तरजीह दी और यही हाल रमन भल्ला का है जो यहां आवास, बागवानी, संस्कृति और खेल विभाग के मंत्री हैं.

इनमें से किसी को भी श्रीनगर की सड़कों पर नहीं देखा गया है, कुछ को हरि निवास की ताजा कटी घास पर चहलकदमी करते जरूर पाया गया है. माना जा रहा है कि अब इन मंत्रियों को खाद्य आपूर्ति करने वाले ट्रकों के साथ बाढ़ ग्रस्त इलाकों में भेजने को राजी किया जाएगा ताकि अकेला छोड़ दिए जाने से नाराज लोगों का गुस्सा उनके ऊपर न निकलने पाए.

राज्य के मुख्य सचिव इकबाल खांडे भी हरि निवास के बाग में भल्ला, शहरी विकास और स्थानीय निकाय मंत्री नवांग रिग्जिन जोरा और अब्दुल्ला के विश्वसनीय देविंदर राणा के साथ टहलते मिले. नागरिक राहत कार्य का नेतृत्व करने में वे और उनका नागरिक प्रशासन क्यों नाकाम हुआ है, इस बाबत सवाल पूछे जाने पर वे जवाब देने को तैयार नहीं दिखते.

यह पूछने पर कि सरकारी राहत शिविर कहां लगे हैं, खांडे डल झील की ओर इशारा करते हैं जिस पर उनका एक कनिष्ठ अधिकारी हल्के से बताता है कि वहां से ज्यादातर लोग जा चुके हैं जबकि कुछ और लोग हैं जो निशात बाग इलाके में हैं.

इस दौरान शहर को तीन हिस्सों में बांट दिया गया है और हरेक में एक वरिष्ठ अधिकारी को प्रभारी बनाया गया है जिसका काम मलबे के निस्तारण की निगरानी करना है. शहर में पानी की आपूर्ति बहाल करना एक प्राथमिकता है, जो सामान्य दिनों में भी एलम और क्लोरीन मिश्रित हुआ करता था. कुछ दिन पहले ही 200 टन क्लोरीन और एलम मंगाने का आदेश दिया गया है.

सेना ने यहां रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) सिस्टम लगाए हैं जो प्रति दिन तीन लाख गैलन पानी को साफ करने की क्षमता रखते हैं. इन इंतजामों के बावजूद शहर में हर कहीं सड़कों पर पड़े मलबे को स्थानीय निवासी ही साफ कर रहे हैं, फिर चाहे वह अलगाववादी नेता यासीन मलिक का गढ़ मैसुमा हो या बर्बर शाह का इलाका.

लाल चौक के करीब शेख बाग समेत बाकी जगहों पर दुकानदारों ने पानी निकालने के लिए अपने होजपाइप लगाए हुए हैं. सरकार ने अगर लोगों को इन कामों के लिए तैनात किया भी है, तो उनकी संख्या काफी कम है जो दूर-दूर तक नहीं दिखते.

फौज ने श्रीनगर में चिकित्सीय सेवाएं मुहैया कराने में बेशक बेहतरीन काम किया है. फौज चार दिन के नवजात का भी इलाज कर रही है. फौज ने यहां 80 मेडिकल टीमें तैनात की हैं और छह फील्ड अस्पताल भी बनाए हैं. माना जा रहा है कि कम-से-कम अगले एक माह तक इन्हें बनाए रखा जाएगा.
घाटी के बड़े जनरल अस्पताल एसएमएचएस हॉस्पीटल का बाढ़ग्रस्त वार्ड
(घाटी के बड़े जनरल अस्पताल एसएमएचएस हॉस्पीटल का बाढ़ग्रस्त वार्ड)
जलमग्न अर्थव्यवस्था
जम्मू इलाके में भी जन-धन का भारी नुक्सान हुआ है. ताकतवर चिनाब और तवी नदियां तथा उनकी कई उप नदियों और सहायक नदियों से गुलजार इस इलाके में देर से आए मानसून की मूसलाधार बारिश का झटका तब महसूस हुआ जब एक बारात लेकर जा रही बस नीचे नदी में जा गिरी.

अब तक मारे गए 164 लोगों में 63 अकेले इसी हादसे में मारे गए. राज्य में सेना के राहत कार्यों का नेतृत्व करने वाले उत्तरी कमान के मुखिया लेफ्टि. जनरल डी.एस. “हुड्डा कहते हैं, ‘‘किसी को उम्मीद नहीं थी कि इतनी तेज रफ्तार से पानी आ जाएगा. कई लोग ऊंचे पुल पार करने की कोशिश में मारे गए.’’

खुशकिस्मती से 8 सिंतबर के आसपास बारिश रुक गई. लिहाजा, अगले 24 घंटों में पानी आगे बहकर पाकिस्तान में चला गया. इससे राजौरी और पुंछ को जोडऩे का काम काफी आसान हो गया. बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल कर दी गई और संचार तथा अत्यंत आवश्यक सड़क मार्ग भी.

उद्यमी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य शकील कलंदर के मुताबिक सरसरी आकलन यह है कि जम्मू- कश्मीर की अर्थव्यवस्था को 1,00,000 करोड़ रु. का अनुमानित नुक्सान झेलना पड़ा है. दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और पुलवामा सरीखे कई जिलों के बाढ़ की चपेट में आने के साथ राज्य के तकरीबन 20 लाख घरों में लगभग तीन लाख घर पूरी तरह या आंशिक रूप से ढह गए हैं.

यही नहीं, आशंका है कि ठहरा हुआ पानी घरों की नींव को करीब 25 साल जितना खोखला कर देगा. केवल इसी क्षेत्र में अपेक्षित नुकसान 30,000 करोड़ रु. के बराबर है. सरकार ने क्षतिग्रस्त मकानों के लिए 75,000 रु. की और मृत्यु के लिए 3.5 लाख रु. की सहायता का ऐलान किया है. अब्दुल्ला ने बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार से आग लगने पर मुआवजे के रूप में दिए जाने वाले बीमे को बाढ़ के मामले में भी देने की गुजारिश की है.

कृषि (खेतों में खड़ी धान की फसल) और बागवानी (सेब से लदे पेड़) जैसे अन्य प्रमुख क्षेत्र राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक और हिस्से को लील सकते हैं. पर्यटन, जिसमें होटल, हाउसबोट और व्यावसायिक प्रतिष्ठान (हरेक दुकान का सामान करीब 25 लाख रु. का होगा) शामिल हैं, राज्य की अर्थव्यवस्था को और 25,000 करोड़ रु. पीछे धकेल देगा. बुनियादी ढांचे (सड़कों, पुलों वगैरह) को हुए व्यापक नुक्सान से बाकी अतिरिक्त धनराशि पूरी हो जाती है.

कलंदर कहते हैं, ‘‘ऐसी भीषण बाढ़ की तबाही से उबरने में दशकों लग जाएंगे. जम्मू-कश्मीर के लोगों की मदद करने के लिए हम सिविल सोसाइटी और देश की अन्य राज्य सरकारों के एहसानमंद हैं. हम केंद्र से गुजारिश करते हैं कि वह यूके सरीखे बाहरी मुल्कों और यूएन सरीखे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को हमारे इस गाढ़े वक्त में मदद करने की इजाजत दे.’’
पीड़ितों ने पुलवामा में नावों में शरण ली
(पीड़ितों ने पुलवामा में नावों में शरण ली)
सर्दियों की कंपकंपाहट
सिर पर मंडराते ठंड के मौसम को देखते हुए अधिकारियों का कहना है कि राज्य के पास अपने प्रमुख कामों को अंजाम देने के लिए केवल मध्य नवंबर तक का समय है. कश्मीर के लोग उम्मीद कर रहे हैं कि राष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां पूर्वनिर्मित घर बनाकर उन्हें जल्दी से जल्दी सौंप देंगी-शायद कुछ धनवान उद्यमी गांवों को या श्रीनगर शहर के कुछ हिस्सों को गोद ले लें.

घाटी की जीवन रेखा माने जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को खोलना एक और प्राथमिकता है. श्रीनगर-बारामूला रेलमार्ग को अभी-अभी बहाल किया गया है लेकिन बनिहाल को जोडऩे वाले मार्ग को सामान्य अवस्था में लाने में कुछ और समय लगेगा. बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब से आए कामगारों के वापस चले जाने से कश्मीर की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.

बेशक, 2014 की बाढ़ से श्रीनगर का खुद को देखने का नजरिया बदल गया है. अपनी किस्मत संवरने का इंतजार करते हुए वह करिश्माई किस्से सुन रहा है. ऐसा ही एक किस्सा फाजिल का है. टाइल्स का छोटा-सा व्यापार करने वाले 22 वर्षीय फाजिल ने 7 सितंबर की सुबह 5,000 रु. में एक नाव खरीदी और जवाहर नगर में मौत के जबड़ों से 100 लोगों को बचा लिया.

व्यंग्यकार और रेडियो कश्मीर के पसंदीदा ब्रॉडकास्टर तल्हा जहांगीर एक सरकारी अफसर से बातचीत कर रहे थे कि तभी झेलम ने शहर पर धावा बोलना शुरू किया. बेचारा नेकनीयत अफसर, लोगों को दहशत की गिरफ्त में आने से बचाने की गरज से, लगातार यकीन दिलाता रहा कि तबाही की अफवाहों से परेशान होने की जरूरत नहीं है.

यह सिलसिला चलता ही रहता अगर जहांगीर उन्हें यह न बताते कि मोहतरम पानी स्टुडियो में आपके पैरों के नीचे तक आ गया है और वह शो को बंद कर रहे हैं. रेडियो कश्मीर और स्थानीय दूरदर्शन इसके फौरन बाद बंद कर दिए गए.

चर्च लेन में श्रीनगर के वीआइपी लोगों को बादामी बाग छावनी इलाके के नजदीक सीआरपीएफ की 79वीं बटालियन के जवानों ने बचाया. इनमें प्रमुख सचिव खांडे सहित वरिष्ठ नौकरशाह, चीफ जस्टिस एम.एम. कुमार के अलावा तीन वरिष्ठ जज, राज्य के इंटेलीजेंस चीफ बी. श्रीनिवास भी थे.

इन्हें पीछे छूट गए 40-50 मददगारों के साथ बाहर निकाला गया. जिन सरकारी मंत्रियों के लिए ये काम करते थे, वे तो उफनती लहरों की खबरों से सावधान होकर पिछली रात ही भाग निकले थे. बदतरीन त्रासदी में भी कश्मीर के सरकारी कुलीन हकदारी की जाति व्यवस्था न छोड़ सके.
-साथ में मनु पब्बी.

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