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बघेल की नई चुनौती

महज छह महीने पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने भूपेश बघेल के सामने लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. क्या है उनकी रणनीति

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aajtak.in
राहुल नरोन्हा नई दिल्ली, 01 July 2019
बघेल की नई चुनौती मुआयना सरकारी योजनाओं का जायजा लेने दल-बल समेत जगदलपुर जिले में पहुंचे मुख्यमंत्री बघेल

छत्तीसगढ़ के मुख्ययमंत्री भूपेश बघेल को जो काम करने हैं, उन सूची में विपक्षी भाजपा की तरफ से उनकी सरकार को अस्थिर करने के प्रयासों की बारीकी से निगरानी शामिल नहीं है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में उनकी पार्टी के मुख्ययमंत्रियों क्रमश: कमलनाथ और अशोक गहलोत को यह सुविधा प्राप्त नहीं है.

ऐसे समय में जब कांग्रेस अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में से एक से गुजर रही है, दिसंबर में 90 सदस्यीय विधानसभा में 68 सीटें जीतकर छत्तीसगढ़ के इतिहास में अब तक के सबसे व्यापक जनादेश के साथ मुख्ययमंत्री की कुर्सी पर बैठे बघेल को हमेशा सरकार बचाने के लिए चौकन्ना रहने की जरूरत नहीं है. उन्हें अपने तरीके से सरकार चलाने की पूरी आजादी हासिल है. लेकिन राज्य में लोकसभा चुनाव के नतीजे उनकी उम्मीद के अनुरूप नहीं आए सो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अब दिसंबर में हुए लाभ को मजबूत करने के तरीके खोज रही है. प्रदेश में भाजपा लकवाग्रस्त दिखती है और इससे भूपेश बघेल अपने कार्यक्रमों को लागू करने में बहुत सहूलियत की स्थिति तो महसूस करते होंगे लेकिन उनके रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. आखिर कौन-सी चुनौतियां हैं और बघेल उनसे किस तरह लड़ रहे हैं?

सत्ता में आने के कुछ ही हक्रतों के भीतर, बघेल ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में नरवा, गरवा, घुरवा, बारी का नाम लिया. छत्तीसगढ़ी बोली के इन शब्दों का अगर मोटे तौर पर हिंदी में अनुवाद किया जाए तो इन्हें क्रमश: छोटे पानी के चैनल, पशुधन, खाद और घरों से सटे छोटे कृषि क्षेत्र कहा जा सकता है. योजना में जल स्रोतों की पुर्नस्थापना, पशुधन के प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण परिदृश्य के व्यापक विकास की परिकल्पना की गई है ताकि कृषि कार्य लाभकारी हो सके. चूंकि छत्तीसगढ़ मुख्य रूप से कृषि प्रधान राज्य है और प्रदेश की दो-तिहाई से ज्यादा आबादी इसी पर निर्भर है, लिहाजा बघेल का मानना है कि इस योजना से न केवल राज्य को आर्थिक रूप से लाभ होगा, बल्कि एक सकारात्मक राजनीतिक प्रतिफल भी मिलेगा.

लोकसभा चुनाव के बाद सीएम ने अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया है. चूंकि योजना कई विभागों से जुड़ी हुई है, इसलिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली एक संचालन समिति बनाई गई है. ग्रामीण विकास, जल संसाधन, पशुपालन, कृषि और वन विभाग के प्रमुख सचिव इसके सदस्य हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव सुनील कुमार कुजूर कहते हैं, ''हमने कार्यक्रम पर काम करना शुरू कर दिया है और सबसे पहले पशुधन के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है.''

पहले चरण में लक्ष्य, गांवों में पशुधन का प्रबंधन करना है, खासकर आवारा पशुओं का. उन्हें खेतों से दूर रखने के लिए, जहां वे फसलों को बहुत बर्बाद करते हैं और मानसून में सड़कों पर जमा होते हैं और बड़ी संख्या में इन्सानी मौत के जिम्मेदार बनते हैं. कुल 1,446 गौथान या मवेशियों के बाड़े बनाए जा रहे हैं. राज्य के लगभग हर ब्लॉक में ऐसे 10 बाड़ों का निर्माण किया जा रहा है.

गौथान में डिजाइन के नौ हिस्से हैं, जिनमें पांच एकड़ का न्यूनतम क्षेत्र, मवेशियों के बैठने के लिए प्लेटफॉर्म, पानी की निकासी और आसपास के चरागाह शामिल हैं. ग्राम गौथान समिति में सरपंच, मवेशी चराने वाले और गांव के प्रमुख नागरिक सदस्य के रूप में होते हैं. यह समिति इस गौथान का प्रबंधन करेगी और यह आत्मनिर्भर होगी. इस गौथान में वर्मी कंपोस्ट तैयार करके उसे एक रुपए प्रति किलो की दर पर बेचा जाएगा और इससे होने वाली आय को वापस समिति चलाने के लिए लगाया जाएगा.

गौथान के अलावा, घुरवा या खाद पर भी काम शुरू हुआ है. मुख्यमंत्री के कृषि सलाहकार प्रदीप शर्मा कहते हैं, ''एक अनुमान के अनुसार हर गांव में कम से कम तीन घुरवा या खाद के गड्ढे हैं जिनसे लगभग 1,500 टन खाद तैयार होती है. इस खाद का एक बड़ा हिस्सा खरीफ के मौसम में खेतों को तैयार करने के लिए पहले ही खेतों में भेजा जा चुका है.''

इसी तरह नरवा यानी पानी के छोटे चैनलों को पारिस्थितिकीय जलक्षेत्रों में बनाया जाना है और इसमें वन विभाग को भी शामिल किया गया है क्योंकि ज्यादातर छोटी नदियां वन क्षेत्रों से निकलती हैं.

बघेल अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं लेकिन एक पहलू जिससे उन्हें जल्द से जल्द निबटना होगा, वह यह धारणा है कि ज्यादातर मुद्दों पर नौकरशाही और कार्यपालिका में एकराय नहीं है. पंद्रह साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस हालांकि इससे इनकार कर सकती है, लेकिन नौकरशाही में उसके प्रति एक अविश्वास है. यह अविश्वास राज्य में दिसंबर के बाद से तबादलों और पोस्टिंग के कई दौर के कारण बढ़ा है. मैदानी तैनातियों में तो उतना नहीं लेकिन मंत्रालय और निदेशालय स्तर पर अच्छा-खासा अविश्वास है. सिविल प्रशासन, पुलिस स्थानांतरण और तैनातियों के मामलों में सामान्य प्रशासन के मुखिया मुख्यय सचिव या पुलिस के बॉस डीजीपी की राय बहुत कम ली गई है या कहें कि अधिकांश तैनातियां और तबादले सियासी आधार पर हो रहे हैं, योग्यता के आधार पर नहीं.

दूसरी ओर नौकरशाही अपने राजनीतिक आकाओं के दिमाग को पढऩे में असमर्थ रही है. जमीन पर इसका यह असर हो रहा है कि अधिकारी परियोजनाओं या कार्यों का उत्तरदायित्व लेने से या तो आनाकानी कर रहे हैं या फिर इसे आधे-अधूरे मन से लागू किया जा रहा है. नाम न छापने की शर्त पर मंत्रालय में तैनात एक आइएएस अधिकारी कहते हैं, ''ज्यादातर अधिकारियों को लगता है कि जो लोग पिछली सरकार के करीबी माने जाते थे, अगर उन्होंने कोई फैसला लिया तो उन पर कार्रवाई हो सकती है.'' मुख्यमंत्री लगातार तबादलों का इस आधार पर बचाव करते हैं कि यह उनका विशेषाधिकार है.

बघेल स्पष्ट करते हैं, ''अधिकारियों को काम पूरा करने के लिए समय सीमा दी गई है. जो लोग समय पर काम पूरा नहीं करते, उन्हें हटा दिया जाता है. अन्यथा इससे पूरी परियोजना की गति पर उलटा असर पड़ेगा.'' नौकरशाही के प्रति अविश्वास मुख्यमंत्री के महत्वाकांक्षी नरवा, गरवा, घुरवा, बारी कार्यक्रम पर भी असर डाल सकता है क्योंकि इसका कार्यान्वयन बहुत हद तक नौकरशाही पर निर्भर करता है, भले ही इन कार्यक्रमों में अच्छी जन भागीदारी देखी जाती हो.

राज्य में राजनीतिक हलकों में एक और बात बहुत तेजी से फैल रही है कि बघेल अपने अन्य कैबिनेट सहयोगियों को खुलकर काम करने की इजाजत नहीं दे रहे हैं. मंत्रिमंडल में दुर्ग क्षेत्र का वर्चस्व है, मंत्रियों को अपने विभागीय सचिवों के तबादलों का अधिकार नहीं है और कुछ वरिष्ठ विधायकों को मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में समायोजित नहीं करने की बातें खूब हो रही हैं. राजनीतिक सरगर्मियां इशारा करती हैं कि ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव और गृह मंत्री तार्मध्वज साहू की मुख्यमंत्री से लगातार ठनी रहती है, क्योंकि ये भी दोनों कांग्रेस के चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद के कद्दावर दावेदार माने जाते थे. बघेल को सरकार सुचारु रूप से चलाने के लिए मंत्रियों को साथ लेकर चलना होगा, विशेष रूप से उन्हें जो खुद ताकतवर हैं.

मुख्यमंत्री को दंतेवाड़ा के बैलाडीला में अडानी समूह के खनन से जुड़े विवादास्पद मुद्दे से भी निबटना पड़ा. बड़ी संख्या में आदिवासी मौके पर एकत्र हुए और निजी क्षेत्र की कंपनी के खनन कार्य का इस आधार पर विरोध करने लगे कि यह पहाड़ी उनके देवताओं के निवास स्थानों में से एक है. बघेल ने खनन रुकवाकर, कथित रूप से पेड़ों की कटाई की जांच का ऐलान किया और उस ग्राम सभा की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई जिसके क्षेत्र में परियोजना है. उन्होंने अस्थायी तौर पर ही सही लेकिन मामले को व्यक्तिगत हस्तक्षेप से सुलझाया है.

छत्तीसगढ़ में माओवाद चिंता का विषय बना हुआ है. बघेल ने माओवाद से निबटने में परामर्शी दृष्टिकोण की बात कही है. उनके शब्दों में, ''मैंने सिविल सोसाइटी समूहों, पत्रकारों, सुरक्षाकर्मियों के साथ बैठक की है जिन्होंने प्रभावित इलाकों में काम किया है और सबके साथ परामर्श के बाद ही इस दिशा मंा आगे बढ़ा जाएगा.'' विधानसभा चुनावों के बाद माओवादियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच कुछ समय तक शांति के बाद नक्सलवादियों ने फिर गतिविधियां शुरू कर दी हैं. पिछले कुछ समय में हुई बड़ी घटनाओं में दंतेवाड़ा के भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या प्रमुख है. बघेल का दावा है कि राज्य में माओवाद नियंत्रित होने की जगह भाजपा के शासन के दौरान पूरे राज्य में फैल गया था. अब अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद, जो माओवादियों पर स्पष्ट सख्त नीति रखते है, बघेल को आगे बढऩे का निर्णय शीघ्र लेना होगा.

इसके अलावा कांग्रेस के घोषणा पत्र में शराबबंदी का वादा एक विवादास्पद मुद्दा है. कांग्रेस सरकार ने शराब की दुकानों की संख्या कम करने की बात की है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि क्या सरकार शराबबंदी पर आगे बढ़ेगी.

पार्टी के मोर्चे पर बघेल को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपना उत्तराधिकारी चुनना होगा. यह देखते हुए कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी भी आदिवासी हैं, संकेत हैं कि वे बघेल इस पद पर आदिवासी नेता अमरजीत भगत की नियुक्ति कर सकते हैं.

विधानसभा में प्रचंड जीत की कांग्रेस की खुशी जल्द ही काफूर हो गई जब वह लोकसभा में सिर्फ दो सीटें जीत सकी. हालांकि पार्टी ने 2014 के चुनावों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है. पिछली लोकसभा में उसने एक सीट जीती थी. फिर भी भाजपा राज्य में निष्क्रिय है और कांग्रेस सरकार के सामने जमीन पर कोई चुनौती खड़ी नहीं कर रही है. राज्य में विपक्ष की भूमिका बघेल के धुर विरोधी अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) निभा रही है. जेसीसी शराब की दुकानों के खिलाफ आंदोलन कर रही है और बैलाडीला खदानों में भी आदिवासियों के विरोध प्रदर्शन में वह आगे थी. बघेल सरकार ने अंतागढ़ टेप मामलों में जोगी के बेटे अमित जोगी को नोटिस जारी कर उन पर लगाम कसने की कोशिश तो की लेकिन जोगी घबराए नहीं और सरकार पर हमलावर बने हुए हैं.

आने वाले महीनों में बघेल की काम करके दिखाने की क्षमता की परीक्षा होगी. उन्हें नौकरशाही और किसान जैसे विभिन्न समूहों का विश्वास जीतना होगा जो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के पीछे मजबूती से खड़े थे पर लगता है, चुनाव आते-आते उन्होंने कांग्रेस का हाथ झटकना शुरू कर दिया. हालांकि सरकार ने कृषि ऋण माफ किए और 2,500 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर धान की खरीद भी की.

अपने पूरे राजनीतिक जीवन में बघेल को हमेशा चुनौतियों से ताकत मिलती रही और कुशल योद्धा की तरह वे हर मुश्किल को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे हैं. शायद, वे केवल तभी बेहतर काम कर पाते हैं जब उनके सामने रुकावटें खड़ी होती हैं.

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