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आवरण कथा-जाति से परे, समता की दिशा में

हमारी सामाजिक व्यवस्था का दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है... यह जिन भी कारणों से शुरू हुई हो, हम सब अस्पृश्यता को भयावह गलती मानते हैं और जरूरी है कि इसे पूरी तरह से निकाल फेंका जाए...

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 23 April 2019
आवरण कथा-जाति से परे, समता की दिशा में सबको न्याय पीएम मोदी दिल्ली स्थित आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए

आपातकाल के दौरान 1976 में जब मैं यरवदा जेल में बंद था, उस समय मेरी बैरक के साथियों में कोल्हापुर के गोपालराव माने भी थे. मुझे उनका स्मरण है क्योंकि वे सेक्स वर्करों के बच्चों के पुनर्वास के काम में लगे थे. जब यह बात मैं अपने साथियों को बताता था, तो इससे उन्हें सांस्कृतिक आघात जैसा लगता था. लेकिन तथ्य यही है कि जनसंघ के दिनों से ही भारतीय जनता पार्टी पूरे मनोयोग से सामाजिक समता के लिए काम करती रही है. हमारा विश्वास है कि हमारे पारंपरिक मानसिक ढांचे के रूपांतरण के बिना समता स्थापित होना संभव नहीं है.

सामाजिक समता के लिए सार्वजनिक आंदोलनों से कहीं ज्यादा जो बात कारगर होती है वह है सामाजिक न्याय का सिद्धांत और समरसता के साथ भावात्मक एकीकरण के लिए किए जाने वाले काम. ये दोनों परस्पर आश्रित हैं. यह इस बात की भी व्याख्या करता है कि 1990 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने असामान्य पहल करते हुए सामाजिक कल्याण मंत्रालय का नाम बदल कर सामाजिक न्याय मंत्रालय क्यों रखा था.

'बांटो और राज करो' नीति के सहारे अंग्रेजों ने भारत पर 150 साल से अधिक समय तक शासन किया. आजादी के बाद माना जाता था कि हमारे अपने बीच से निकले शासक ऐसी नीतियां अपनाएंगे जिससे समाज का और विखंडन रुक सकेगा. लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेसी सरकारें जाति-आधारित दबाव-समूहों के सामने हार गईं और उन्होंने संकेत दिया कि वे सामाजिक एकीकरण के मूल सिद्धांतों के साथ किसी भी तरह का समझौता करने के लिए तैयार हैं. कई शोधार्थियों ने भी संकेत किया है कि सबसे ज्यादा मत पाकर जीत हासिल करने की व्यवस्था ने भी हमारे सामाजिक विभाजन को निर्विवाद रूप से बढ़ावा दिया है.

भाजपा जैसी सभी को साथ लेकर चलने वाली पार्टियों को छोड़ दें तो भारत में ज्यादातर क्षेत्रीय दलों ने अपनी सामाजिक पहचान संबद्ध जातिगत समूहों के आधार पर ही बनाई है. ऐसे में स्पष्टतः राजनीतिक उत्तरजीविता के लिए इस जातिगत वोट बैंक को सुदृढ़ करना ही उनका एकमात्र एजेंडा रहा है. तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक कहानी एक ही है. ऐसी स्थिति में ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों ने जातिविहीन समाज के निर्माण के आदर्श से भी मुंह फेर लिया है.

भारतीय जनता पार्टी जब जनसंघ हुआ करती थी तभी से अंत्योदय—अर्थात् सर्वाधिक वंचित को सबसे पहले अधिकार देना—के लिए सक्रिय रही है. दीनदयाल उपाध्याय ने 1963 में जौनपुर क्षेत्र के लिए लोकसभा उपचुनाव में प्रत्याशी होने के बाद भी वोट हासिल करने के लिए अपनी जातिगत पहचान का उपयोग करने के सुझाव को ठुकरा दिया था. हार सामने खड़ी दिखाई देने पर भी उन्होंने अपना सैद्धांतिक रुख नहीं छोड़ा था. उनका मानना था कि राजनीतिक लाभ के लिए जातिगत पहचान का उपयोग करने में भेदभाव अंतर्निहित है.

इसके दो दशक बाद 1983 में संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने इस रुख की दोबारा पुष्टि कीः ''अस्पृश्यता हमारी सामाजिक व्यवस्था का दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है... यह जिन भी कारणों से शुरू हुई हो, हम सब अस्पृश्यता को भयावह गलती मानते हैं और जरूरी है कि इसे पूरी तरह से निकाल फेंका जाए... यह घोषित करना हम सब का दायित्व है कि श्यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है तो इस दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है!"

यही वह सैद्धांतिक विरासत है जिसे भाजपा आगे बढ़ा रही है. शायद यह अकेली पार्टी है जिसने संगठन में महिलाओं और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए किसी तरह की अनौपचारिक सकारात्मक कार्रवाई को आत्मसात किया है. वर्षों से भाजपा सांसदों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की संख्या का सर्वाधिक होना अपने आप में इस का प्रमाण है कि पार्टी सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को अंगीकृत करने में खासी सफल रही है.

दशकों पहले बाबासाहब आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों के बीच पारंपरिक उद्यमिता के गुणों को प्रोत्साहित करने की जरूरत पर बल दिया था. युवाओं से की गई उत्साहपूर्ण अपील में उन्होंने कहा था कि वे काम मांगने वाले बनने की बजाए काम देने वाले बनें. इस अपील की मूल भावना ने अब से कोई 50 वर्ष पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व-प्रचारक मधुकर देवल के मन पर प्रभाव डाला तो उन्होंने महाराष्ट्र में सांगली के निकट म्हाइसल में एक अनोखी परियोजना की शुरुआत की. सहकारी खेती के माध्यम से दलितों की आर्थिक मुक्ति को लक्ष्य करने वाली यह परियोजना अत्यंत सफल रही.

इस परियोजना को बाद में 'म्हाइसल मॉडल' के नाम से भी जाना गया. एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुद्रा योजना की संकल्पना की जिससे सामाजिक रूप से हीन वर्गों में उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जा सके. इस योजना के 16 करोड़ लाभार्थियों में से 4.25 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्होंने पहली बार ऋण लिया है. इस योजना से निश्चित रूप से अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सदस्यों की सामाजिक-आर्थिक दुर्बलता में कमी आई है.

कुछ भी हो, समता एकांगी नहीं हो सकती. डॉ. आंबेडकर और उन जैसे अन्य लोगों ने जिस समता की कल्पना की थी उसके तीन मुख्य पक्ष—अवसर, गरिमा तथा सुरक्षा—हैं, जिनकी समानता समाज और राज्य को मिलकर सुनिश्चित करनी है. एक मिसाल दलित इंडियन चैंबर ऑफ कामर्स ऐंड इंडस्ट्रीज के साथ सरकार की भागीदारी की कामयाबी की है. इसके माध्यम से हैदराबाद और दिल्ली में सैकड़ों सफाईकर्मियों को हाथ से गंदगी साफ करने के काम से मुक्त कराकर उद्यमी बनाए जाने जैसे विस्मयकारी परिणाम आए हैं.

यह सब तभी संभव है जब कोई सरकार कमजोर वर्गों की पीड़ाओं और आकांक्षाओं के प्रति वास्तव में संवेदनशील हो. मोदी सरकार ने सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है और यही वजह है कि वह जाति के नाम पर नहीं, भेदभाव समाप्त करने वाले सफल उपायों के नाम पर वोट मांग रही है. जातियों के समापन की ओर जाने वाला रास्ता भी इसी ओर ले जाता है.

(विनय सहस्रबुद्धे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष हैं)

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