एडवांस्ड सर्च

आवरण कथाः कौन (नहीं) नागरिक?

नए बनाए नागरिकता (संशोधन) कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर सरकार के दोमुंहे बयानों से उभरे खौफनाक सवाल, क्या खतरा है और देश भर में लोग क्यों विरोध में उतर आए हैं?

Advertisement
aajtak.in
कौशिक डेकानई दिल्ली, 14 January 2020
आवरण कथाः कौन (नहीं) नागरिक? सीएए, एनआरसी का विरोध प्रदर्शन

पिछले साल 27 नवंबर को बांग्लादेश के क्रिकेटर सैफ हसन कोलकाता हवाई अड्डे पर थे. भारत में टेस्ट सीरीज खेलने के बाद वे घर वापस जाने के लिए अपनी फ्लाइट का इंतजार कर रहे थे, जब उन्हें एहसास हुआ कि उनका वीजा तो दो दिन पहले ही समाप्त हो चुका है. एग्जिट क्लियरेंस पाने के लिए उन्हें 21,600 रुपए का जुर्माना भरना पड़ा. अब यहीं पचड़ा फंसा है. अगर हसन मुसलमान न होते, तो वे महज 100 रुपए जुर्माना देकर बच सकते थे. इसके लिए कोई सुसंगत आधिकारिक स्पष्टीकरण तो नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार ने जनवरी 2019 में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन और पारसी लोगों के लिए अनुमति से अधिक अवधि तक भारत में रुकने की एवज में जुर्माने की रकम में भारी कटौती की घोषणा की.

नियमों में यह अजीब फेरबदल इन तीन मुसलमान बहुल देशों के अल्पसंख्यकों को भारत में आने का महज परोक्ष प्रोत्साहन ही नहीं, बल्कि नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए), 2019 की पूर्वपीठिका भी है. इस विवादास्पद कानून से न सिर्फ संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के सरासर उल्लंघन के सवाल उठ खड़े हुए हैं, बल्कि धार्मिक और स्थानीय पहचान को लेकर गहरी दरारें भी उभर आई हैं. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस कानून के खिलाफ मुख्य रूप से छात्रों और आम लोगों के विरोध प्रदर्शनों से उभरे राष्ट्रीय आक्रोश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा नीत सरकार के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण संकट पैदा कर दिया है, जिसका सामना उसे 2014 में सत्ता में आने के बाद से अब तक नहीं करना पड़ा है.

और यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, जिससे बचा जा सकता था. तीन तलाक को अपराध बनाने और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने जैसे अन्य विवादास्पद विधायी फैसलों के अपेक्षाकृत मामूली विरोध से उत्साहित केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में पार्टी के बहुमत के जोर से सीएए को भी पारित करा लिया.

सभी संबंधित पक्षों—आम लोग, विपक्षी दलों और पड़ोसी देशों—से चर्चा-बहस चलाकर सर्वानुमति बनाने के बजाए, उन्होंने ऐलान कर दिया कि ''मुस्लिम देशों में उत्पीडऩ के शिकार करोड़ों अल्पसंख्यकों'' को आश्रय देने की भारत की नैतिक जिम्मेदारी के लिए सीएए जरूरी है.

इस एकतरफा बयान ने बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे मित्रवत पड़ोसियों को भी नाराज कर दिया. इस गुस्से की आग में घी का काम किया शाह के पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के उत्तेजक बयान ने. उन्होंने कहा, ''क्रोनोलॉजी (क्रम) समझें, हम पहले सीएए और फिर एनआरसी लाएंगे.''

गृह मंत्री के शब्दों को आधार बनाकर सरकार के आलोचकों का कहना है कि सीएए देश में सभी गैर-मुस्लिम प्रवासियों को वैध करेगा, और उसके बाद एनआरसी आएगा जिसका इस्तेमाल मुसलमानों को अलग-थलग और परेशान करने के लिए होगा और इस तरह भाजपा और उसके वैचारिक संगठन आरएसएस का भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का बड़ा प्रोजेक्ट पूरा होगा. सीएए के लिए इससे बुरा वक्त भी नहीं हो सकता था. इसे असम के एनआरसी के छह महीने के भीतर लाया गया जिससे 19 लाख लोग बाहर हो गए और उनका भविष्य अधर में है.

सीएए को लेकर असहज कुछ सहयोगियों ने भी फौरन एनआरसी के खिलाफ मोदी सरकार को चेताया. राजनैतिक रूप से देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य, भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शनों पर बर्बर सरकारी कार्रवाई से 21 लोगों की जान चली गई. इसलिए देर से ही सही, प्रधानमंत्री मोदी को एनआरसी से दूरी बनानी पड़ी.

लेकिन सरकार के कदम पीछे खींचने की कोशिश ज्यादा देर नहीं टिक पाई क्योंकि चंद दिनों में एक और गलत वक्त की घोषणा हुई कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) तैयार किया जाएगा, जो कानून के अनुसार, एनआरसी निर्माण की दिशा में पहला कदम है.

तो, ये तीनों प्रावधान सड़क पर उतरे आम लोगों को कैसे प्रभावित करेंगे और देश में लोगों की गिनती की एक से ज्यादा प्रक्रियाओं का उद्देश्य क्या है?

क्या सीएए भेदभावपूर्ण कानून है?

सीएए के अनुसार, ऊपर बताए देशों के गैर-मुस्लिम समुदायों के ऐसे आप्रवासी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर चुके हैं और पांच साल से रह रहे हैं.

अविभाजित भारत का हिस्सा रहे देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के विचार का पहले विपक्षी नेताओं ने भी समर्थन किया था. फिर भी, वर्तमान संदर्भ में विभिन्न आधारों पर सीएए की आलोचना की जा रही है. मुस्लिम प्रवासियों को छोड़ने के प्रावधान के साथ, यह कथित रूप से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, जो देश की राजनैतिक सीमा में रहने वाले सभी लोगों के लिए समान अधिकारों की बात करता है. केंद्र का तर्क है कि सीएए अनुच्छेद 14 में 'तर्कसंगत वर्गीकरण' की शर्त पर खरा है.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, अनुच्छेद 14 समाज में विकास के मकसद से कुछ खास लक्ष्य हासिल करने के लिए लोगों, वस्तुओं, लेनदेन के 'तर्कसंगत वर्गीकरण' की अनुमति देता है. केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कहते हैं, ''इन तीन घोषित इस्लामी देशों में छह समुदायों का धार्मिक आधार पर उत्पीड़न तर्कसंगत वर्गीकरण पर खरा उतरता है.'' सरकार के इस नजरिए से पूर्व महाधिवक्ता हरीश साल्वे सहमत हैं, जो कहते हैं कि सीएए के तहत वर्गीकरण पर्याप्त तर्कसंगत है क्योंकि यह 'बुद्धिपरक भिन्नता' पर आधारित है.

हालांकि, इससे आलोचक असहमत हैं. सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को रद्द करने की मांग के लिए पैंसठ याचिकाएं दायर की गई है. संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि कानून के पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क हैं. वे कहते हैं, ''सभी मौलिक अधिकार तर्कसंगत वर्गीकरण के अधीन हैं. सीएए का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत इस कानून के तहत वर्गीकरण को तर्कसंगत मानती है या नहीं.'' इस संशोधन के पारित होने से पहले संसदीय समिति को दिए अपने सुझाव में कश्यप ने कहा था कि विशिष्ट धार्मिक समूहों का उल्लेख करने की बजाए 'सताए गए अल्पसंख्यक' शब्द का प्रयोग ज्यादा उचित होगा क्योंकि इससे संशोधन के मकसद को मजबूत कानूनी और संवैधानिक आधार मिल जाएगा.

सरकार का तर्क था कि अपने देश से भागने वाले प्रवासी के लिए उत्पीड़न के दस्तावेजी सबूत देना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन आलोचक इससे देश के लिए बढ़ते सुरक्षा जोखिमों की ओर इशारा करते हैं. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कहते हैं, ''मैं इस बात से गंभीर रूप से चिंतित हूं कि सीएए का घुसपैठिए दुरुपयोग करेंगे, खासकर पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्यों में. यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक संभावित खतरा है.'' देश की विदेशी जासूस एजेंसी, रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) ने भी इसको लेकर सरकार को आगाह किया है.

पूर्वोत्तर में लोग सीएए के विरोध में इसलिए हैं क्योंकि वे किसी भी धर्म के अवैध प्रवासियों को वहां की मूल आबादी की भाषा, संस्कृति और जनसंख्या के लिए खतरा मानते हैं. कानून में पहले से ही अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय के लगभग सभी हिस्सों और असम के आदिवासी बेल्ट को बाहर रखा गया है. इंडिया मूविंग: अ हिस्ट्री ऑफ माइग्रेशन के लेखक चिन्मय तुंबे कहते हैं, ''सीएए से लोग इसलिए नाराज हैं कि कई 'अवैध प्रवासी' आर्थिक कारणों से आए हैं और यह जरूरी नहीं कि उन्हें धर्म के आधार पर सताया ही गया हो. इससे खास धर्मों और देशों के सभी अवैध आप्रवासियों को माफी मिल जाएगी.''

सरकार खुद को सही ठहराने के लिए अविभाजित भारत की यादों और नैतिक दायित्वों की आड़ ले रही है. मसलन, पश्चिम पाकिस्तान से आए 80,000 से अधिक और अधिकांश हिंदू शरणार्थी आजादी के बाद से बिना नागरिकता के कश्मीर में रह रहे हैं. सीएए उन्हें वैधता देगा. सीएए के विरोधियों का सवाल है कि सरकार ने म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों और श्रीलंका के तमिल हिंदुओं को यही अवसर क्यों नहीं दिया. इंस्टीट्यूट ऑफ पीस ऐंड कॉन्फिलक्ट स्टडीज के निदेशक रूही नियोगी के अनुसार, सीएए की चुनिंदा व्यवस्था बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों और अन्य पड़ोसी देशों के उन्हीं धर्मों के लोगों के बीच फर्क करती है. वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर दिब्येश आनंद कहते हैं, ''शरणार्थियों को दया या अधिकार आधारित वरीयता का कोई सबूत नहीं है. धर्मनिरपेक्ष, बहुलवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए, सीएए विभेदकारी और धर्म आधारित नागरिकता की ओर खतरनाक प्रस्थान है.''

सरकार की दलीलों पर सकारात्मक सोचें तो पूर्ववर्ती सरकारों ने भी विशेष देश से आने वाले चुनिंदा समूहों को नागरिकता की पेशकश की है. उदाहरण के लिए, श्रीलंका के 4,61,000 तमिलों को 1964 से 2008 के बीच नागरिकता दी गई थी.

क्या सीएए की वाकई जरूरत है?

शरणार्थियों और प्रवासन जैसे विषयों की समझ रखने वाले विशेषज्ञों का दावा है कि देश को शरणार्थियों को संभालने के लिए सीएए के बजाए एक व्यापक नीति की आवश्यकता है. यूएनएचसीआर के 2018 के अनुमानों के अनुसार, भारत में 15 देशों के 1,95,867 शरणार्थी हैं, पर भारत उन चुनिंदा देशों में है जिनके पास कोई राष्ट्रीय शरणार्थी सुरक्षा नीति और ढांचा नहीं है. इसने 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि, या इसके 1967 प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर भी नहीं किए हैं. मामला इससे भी उलझता है कि यहां शरणार्थी और अवैध आप्रवासी के बीच फर्क करने का कोई कानून या तंत्र नहीं है. दक्षिण एशिया मानवाधिकार के कार्यकारी निदेशक रवि नायर कहते हैं, ''पारदर्शी कानूनी निर्धारण प्रक्रिया के बिना, सीमा पार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बारे में फैसले बाबूगीरी के जरिए होने लगेंगे. यह पूरी तरह से अनुचित है.''

इन वर्षों में शरणार्थियों के विभिन्न समूहों ने देश के विभिन्न हिस्सों को अपना प्राथमिक निवास क्षेत्र बनाया है. विभाजन के बाद हिंदू और सिख प्रवासी दिल्ली, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में बसे तो पश्चिम बंगाल और असम में बांग्लादेश से आया सबसे बड़ा अप्रवासी समूह बस गया जबकि नेपाली मूल के लोग पूरे पूर्वोत्तर की तराई में बसे, श्रीलंका से आए तमिल शरणार्थी तमिलनाडु में तो बौद्ध तिब्बतियों ने धर्मशाला, दिल्ली और ओडिशा में शरण ली. देश ने सभी प्रकार के शरणार्थियों का स्वागत किया है.

गृह मंत्रालय ने विभिन्न शरणार्थी समूहों के लिए 'मानक प्रक्रिया' बनाई है. इन शरणार्थियों को मिलने वाली सुविधाएं और अधिकार अस्पष्ट हैं और हर मामले में व्यक्ति के स्तर पर विचार किया गया है. तिब्बतियों जैसे कुछ शरणार्थियों समूहों को जमीनें दी गई हैं, आधार और पैन कार्ड दिए गए हैं, उन्हें बैंक खाते खोलने और देश में काम करने की अनुमति दी गई है.

1950 और 1987 के बीच पैदा हुए उनके सभी बच्चे नागरिकता का दावा कर सकते हैं. छह अल्पसंख्यक समुदायों के पाकिस्तानी और अफगान नागरिकों, जो 'दीर्घकालिक वीजा' पर यहां रहते हैं, 2015 से उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस दिया जा सकता है, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच हो सकती है और 'स्व-व्यवसाय या स्व-रोजगार के लिए वे छोटी आवास इकाइयां' खरीद सकते हैं. रोहिंग्या जैसे अन्य समूह—जो अब देश के लिए सुरक्षा खतरे के रूप में देखे जाते हैं—पूरी तरह से यूएनएचसीआर की दया पर निर्भर हैं और बदतर हालात में शरणार्थी शिविरों में रहते हैं.

यह अभी स्पष्ट नहीं है कि कितने आप्रवासी इस कानून के दायरे में आएंगे. जनवरी 2019 में आई संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) का अनुमान है कि लंबी अवधि के वीजा पर भारत में रहने वाले 31,313 में से 25,447 हिंदू,  5,807 सिख, 55 ईसाई, दो बौद्ध और दो पारसी हैं जो सीएए के प्रत्यक्ष लाभार्थी होंगे.

गृह मंत्री शाह का दावा है कि यह संख्या ''लाख या करोड़'' में हो सकती है. वास्तविक संख्या का पता तो नागरिकता के लिए आने वाले आवेदनों के आधार पर इस वर्ष के अंत तक ही चलेगा.

सीएए की राजनीति

इस कानून का अल्पकालिक उद्देश्य पश्चिम बंगाल और असम में रह रहे हिंदू 'आप्रवासी मतदाताओं' का भरोसा जीतना लगता है, जो चुनाव नतीजे में उलट-फेर कर सकते हैं. दोनों राज्य में 2021 में चुनाव होंगे. हालांकि, यह असम में सरकार को सत्ता में बरकरार रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा जहां देश में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी (35 प्रतिशत) रहती है जबकि पश्चिम बंगाल को भगवा पार्टी अपना अंतिम मोर्चा मानती है जिसे जीतने का उसने लक्ष्य बनाया है.

सीएए पश्चिम बंगाल में हिंदू बांग्लादेशी आप्रवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करता है जिनमें से ज्यादातर मतुआ समुदाय के लोग हैं जिन्होंने 1971 के बाद भारत में प्रवेश किया था. 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की कुल 10 करोड़ की आबादी में मतुआ लोगों की संख्या 17 प्रतिशत थी. वे बंगाल में कुल 294 में से 70 विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी राजनैतिक ताकत हैं. उनके पास मतदान के अधिकार हैं लेकिन अभी तक उन्हें नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं मिला है. सीएए के लागू होने से भाजपा का मतुआ आबादी के बीच समर्थन और मजबूत होगा जिसने आम चुनाव में पार्टी को 9-10 सीटें जीतने में मदद की है.

एक और सीधा-सा गणित है जिससे पहले एनआरसी और उसके बाद सीएए भाजपा के आग्रह को स्पष्ट करता है. असम की एनआरसी से जो 14 लाख हिंदू बाहर हो गए हैं, उन्हें नागरिकता के साथ-साथ मतदान के अधिकार मिल जाएंगे और इससे भाजपा को उन दलों पर बढ़त मिल जाएगी जो मुस्लिम वोटों पर आश्रित हैं.

एनआरसी से बाहर किए गए 5,00,000 मुसलमानों के पास अभी भी वोटिंग अधिकार हैं, लेकिन अगर वे विदेशी ट्रिब्यूनल और अदालतों में दाखिल अपील हार जाते हैं तो उनसे यह अधिकर छिन जाएगा.

बंगाल में भी मुस्लिम प्रवासियों (6.9 करोड़ अल्पसंख्यक वोटों का 28 प्रतिशत) को बाहर कर दिया जाता है तो इस वोट बैंक पर निर्भर पार्टियों के लिए बिजली गिरने जैसी स्थिति हो सकती है.

एनआरसी क्यों?

देशव्यापी एनआरसी का विचार 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा नीत एनडीए सरकार के वक्त उभरा.

करगिल युद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा की समीक्षा के लिए गठित मंत्री-समूह की सिफारिश पर, नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया और यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक नागरिक, विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों, को एक पहचान पत्र दिया जाएगा.

अगले साल, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो नागरिकता अधिनियम में धारा 14 ए की व्यवस्था की गई जिसके तहत भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य पंजीकरण जरूरी बनाया गया और इसके लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाने की बात कही गई. ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार भारत में ही हो रहा है. दुनिया के कई लोकतंत्र अपने सभी नागरिकों के अनिवार्य पंजीकरण के आधार पर राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करते हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay