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शिक्षाः कम से नहीं चलेगा काम

बजटीय आवंटन में कमी इस बात का संकेत है कि शिक्षा क्षेत्र के लिए आगे का रास्ता कठिन होगा.

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aajtak.in
कौशिक डेकानई दिल्ली, 12 February 2020
शिक्षाः कम से नहीं चलेगा काम पढ़ाई राजस्थान के नीमराना में एनआइआइटी यूनिवर्सिटी में छात्र

वर्ष 2019 में जारी नई शिक्षा नीति (एनईपी) के मसौदे में अनुमान लगाया गया था कि नीतिगत प्रस्तावों के उचित कार्यान्वयन के लिए, शिक्षा पर बजटीय आवंटन को अगले 10 वर्षों तक प्रतिवर्ष 10 फीसद बढ़ाना होगा. हालांकि 2020-21 के बजट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. इस क्षेत्र के लिए 99,300 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है जो जुलाई, 2019 में आवंटित 94,854 करोड़ रुपए की राशि से थोड़ा ही अधिक है. कौशल विकास के लिए 3,000 करोड़ रुपए अलग से आवंटित किए गए हैं. दोनों को मिलाकर भी देखें, तो वृद्धि पिछले साल के मुकाबले पांच फीसद से भी कम है.

2020-21 के बजट में मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं में बड़ी कटौती हुई है. उदाहरण के लिए, उच्च शिक्षा क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार के लिए धन में लगभग 50 फीसद की कटौती हुई है.

पिछले वर्ष इस क्षेत्र के लिए आवंटन 609 करोड़ रुपए था जो इस बार घटकर 307 करोड़ रुपए हो गया है.

उसी तरह राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (आरयूएसए) के आवंटन में भी 85 फीसद की कटौती हुई और यह 2,100 करोड़ रुपए से घटकर 300 करोड़ रुपए हो गया है.

ऐसा लगता है कि फंड के खराब उपयोग और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण आवंटन में कटौती की गई है. उच्च शिक्षा विभाग दिसंबर, 2019 तक पिछले वर्ष के आवंटन का 25 फीसद ही खर्च कर सका.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने आरयूएसए व्यय में 2 करोड़ रुपए से ज्यादा की हेराफेरी पाई. इसके अलावा, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अकाउंटबिलिटी इनिशिएटिव (उत्तरदायी पहल) ने पाया कि केंद्र सरकार ने 15 दिसंबर, 2019 तक समग्र शिक्षा अभियान के लिए स्वीकृत धन का सिर्फ 57 फीसद ही जारी किया था.

हालांकि एनईपी को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, सरकार ने कुछ प्रस्तावों की घोषणा की है जो एनईपी मसौदे से प्रेरित नजर आते हैं.

नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क के शीर्ष 100 में शामिल संस्थानों में डिग्री स्तर के शिक्षा कार्यक्रमों की ऑनलाइन पेशकश की जाएगी.

लगभग 150 उच्च शिक्षण संस्थान मार्च 2021 तक प्रशिक्षु (अप्रेंटिसशिप)-सन्निहित डिग्री/ डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू करेंगे. 

योग्य डॉक्टरों की कमी को स्वीकार करते हुए, सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत एक मेडिकल कॉलेज को जिला अस्पताल के साथ संलग्न करने का प्रस्ताव दिया है.

विदेशों में शिक्षकों, पैरामेडिक्स और देखभाल करने वालों की मांग को पूरा करने के लिए कौशल विकास मंत्रालय भाषा कौशल के पाठ्यक्रमों के साथ एक ब्रिज कोर्स तैयार करेगा.

अफ्रीकी और एशियाई देशों के विदेशी छात्रों को भारतीय उच्च शिक्षा केंद्र में छात्रवृत्ति और बेंचमार्क करने के लिए इंड-सैट (आइएनडी-एसएटी) नामक परीक्षा होगी.

विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों से वांछित सुधारों की संभावना नहीं है. दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दिनेश सिंह कहते हैं, ''अप्रेंटिसशिप का कोई खास लाभ नहीं हुआ है.

विश्वविद्यालयों को इंसेंटिव देकर स्टार्ट-अप्स, उद्योगों के साथ तालमेल और स्थानीय जरूरतों के मुताबिक कोर्स में बदलाव के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए था.'' उधर, शिक्षा में एफडीआइ की अनुमति का संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच ने विरोध किया है.

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