एडवांस्ड सर्च

बजट 2020-मोदीनॉमिक्स 2.0

सूझ-बूझ से भरे बजट से प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि अर्थव्यवस्था को जिलाने की कोशिशें ग्रोथ की कीमत पर नहीं हो सकतीं. मगर 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्हें आहिस्ता सुधार के बजाए तेज और बड़े सुधारों वाला ज्यादा साहसी रोडमैप लेकर आना होगा.

Advertisement
aajtak.in
राज चेंगप्पानई दिल्ली, 11 February 2020
बजट 2020-मोदीनॉमिक्स 2.0 ताकत का बखान लखनऊ में डिफेंस एक्सपो में पीएम मोदी

नरेंद्र मोदी ने अपना दूसरा कार्यकाल बड़े धमाकेदार सुधारों की फेहरिस्त के साथ शुरू किया. उन्होंने बहुत तेजी से लंबे वक्त से टलते आ रहे बड़े मुद्दों पर एक के बाद एक फैसले लिए. इनमें संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करना, कारोबार को बढ़ावा देने के लिए कॉर्पोरेट कर की दर में जबरदस्त कटौती और सशस्त्र बलों को कारगर बनाने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ या रक्षा प्रमुख की नियुक्ति करना शामिल हैं. दिसंबर में उन्होंने विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) को सारे विरोध के बावजूद संसद से पारित करवाया ताकि तीन पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक भारतीय नागकिरता के लिए आवेदन कर सकें.

जब अर्थव्यवस्था में कमजोर करने वाली सुस्ती से निपटने की बात आई तब भी मोदी से इसी तेजी और रफ्तार को बनाए रखने की उम्मीद की गई थी. आखिरकार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 11 साल की सबसे निचली वृद्धि उनकी सरकार की आंखों में एकटक ताक रही थी. इससे पहले कि उसकी साख को हमेशा के लिए चोट पहुंचे, बजट 2020 को मोदी सरकार के लिए बीच रास्ते सुधार का सबसे अच्छा मौका माना जा रहा था. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को संसद में जब अपना लंबा (और थकाऊ) भाषण दिया, तब बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे एक्सपटर्स (देखें अमल की चुनौती) के विशेषज्ञों की साफ राय थी कि यह कामयाबी के जरा भी नजदीक नहीं था. इसके बजाए निष्कर्ष यह था कि बजट में अनेक क्षेत्रों में कई संभावनों से भरी पहल की गई हैं लेकिन कुल मिलाकर यह उम्मीदों पर पूरा खरा नहीं उतरता. इससे भी बदतर यह कि अपनी तमाम तरह-तरह की योजनाओं और प्रोत्साहनों के लिए पैसा जुटाने की सरकार की क्षमता पर गंभीर संदेह जाहिर किए गए.

ऐसा क्यों है कि कठोर और अप्रिय फैसले लेने की प्रतिष्ठा हासिल करने वाले मोदी भारत को उसके मौजूदा आर्थिक दलदल से निकालने के लिए जरूरी बड़ी छलांग लगाने से कतरा गए? उन्होंने पिछले महीनों में तमाम हितधारकों के साथ व्यापक सलाह-मशविरे के बाद भी ऐसा बजट क्यों आने दिया जिसे आर्थिक बहाली का विश्वसनीय रोडमैप बनाने के बजाए कामकाजी बजट बताया गया? और क्या बजट के नतीजों को लेकर विशेषज्ञों का निराशावादी होना वाजिब है?

इन बड़े सवालों का जवाब शायद इस बात की पड़ताल में निहित है कि मोदी अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए मौजूद विकल्पों के साथ किस तरह पेश आए हैं. उन्हें अच्छी तरह जानने वाले कहते हैं कि प्रधानमंत्री अपनी सोच को विचारधारा—फिर चाहे वह वाम हो या दक्षिणपंथी—के बंधनों से बाधित नहीं होने देते. इसके बजाए आर्थिक वृद्धि के समावेशी होने की चिंता उन्हें रास्ता दिखाती है. वे अपने सामने मौजूद स्थिति के हिसाब से चलते हैं और व्यावहारिक होना पसंद करते हैं और अगर जरूरत पड़े तो बंधे-बंधाए ढांचे तोडऩे से नहीं हिचकते.

नागरिकों को सरकारी खैरातों पर ज्यादा निर्भर बनाने के बजाए उनकी सरकार की आर्थिक और सामाजिक नीतियां उन्हें ताकतवर बनाने के लिए बनाई जाएंगी. अपने पहले कार्यकाल में किसानों के लिए अकथनीय संकट पैदा करने वाले एक के बाद एक सूखों से परेशान और विपक्ष के हाथों ''सूट-बूट की सरकार'' के आरोपों से घिरे मोदी ने तेजी से बायां (वाम) मोड़ लिया और खुद को गरीबों, दबे-कुचलों और किसानों के मसीहा के तौर पर पेश किया. पहले कार्यकाल में उन्होंने एक किस्म का स्वदेशी समाजवाद अपनाया—जो गरीबों को शौचालय, आवास, सस्ती कीमत पर रसोई गैस देने और तेज रफ्तार से राजमार्ग और ग्रामीण सड़क की बहुतेरी योजनाओं के लिए याद किया जाता है. 

अपने पहले कार्यकाल में अर्थव्यवस्था संभालने के अनुभव ने शायद उनके इस विश्वास को और पुख्ता कर दिया कि सुधारों को धीरे-धीरे क्रमवार अंजाम देना आमूलचूल बदलावों या शॉक ट्रीटमेंट से कहीं ज्यादा बेहतर नतीजे दे सकता है. यह सीख उस वक्त बहुत मुश्किलें उठाकर सीखी गई थी जब नोटबंदी के बुरे प्रभाव जाहिर हुए थे और माल व सेवा कर (जीएसटी) को जल्दबाजी में लागू करना अपने पीछे और भी भीषण नतीजे छोड़ गया था. हालांकि एक बड़े अफसर सफाई में कहते हैं, ''यह कहना गलत होगा कि हमने धमाकेदार सुधारों से मुंह फेर लिया है—पहले कार्यकाल में जीएसटी के अलावा हम बैंकों के लिए दिवाला संहिता लाए और कई नए क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत दी.''

दूसरी तरफ मोदी 2.0 की विशेषता अब तक यह जान पड़ती है कि इसमें विकास के लिए मध्यमार्गी या बीच का रास्ता अपनाया गया है. यह इसलिए और भी बेहद जरूरी हो गया क्योंकि सरकार ने आर्थिक वृद्धि में नई जान फूंकने और सामाजिक क्षेत्र की अपनी भारी-भरकम योजनाओं में पैसा लगाने की खातिर संकेत दिया है कि वह अर्थव्यवस्था को निजी और विदेशी निवेश तथा नियंत्रण के लिए और ज्यादा खोलेगी. 

ऐसा करने के लिए मोदी ने दोबारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद जल्दी ही भारतीय अर्थव्यवस्था को दोगुना बढ़ाकर पांच सालों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की घोषणा की. फिर उन्होंने देश की आर्थिक वृद्धि के चार मुख्य कारकों—व्यक्तिगत खपत, निजी निवेश, सरकारी खर्च और निर्यात—को तेज करने के उपाय शुरू किए. जुलाई 2019 में पेश बजट में कर्जों से लदे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नई पूंजी डालने के लिए 70,000 करोड़ रुपए अलग रखे गए, ताकि वित्तीय क्षेत्र में कर्ज के जबरदस्त संकट को कम किया जा सके.

सरकारी खर्च के जरिए खपत और नौकरियों के सृजन को बढ़ावा देने के लिए मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में ऐलान किया कि उनकी सरकार बुनियादी ढांचे की नई परियोजनाओं पर पांच सालों में 100 लाख करोड़ रु. की भारी-भरकम धनराशि खर्च करने को प्रतिबद्ध है. सितंबर में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने कॉर्पोरेट कर की दर में जोरदार कटौती की घोषणा कर व्यवसायों के हाथ में और ज्यादा रकम दे दी. मगर उनके हाथ निराशा ही लगी जब निवेशों ने रफ्तार नहीं पकड़ी और ज्यादातर कारोबारियों ने मुनाफे अपनी जेबों के हवाले करने या बैंकों का कर्ज चुकाने को तरजीह दी. सरकार ने हरेक सेक्टर की परेशानियां दूर करने के भी रास्ते निकाले.

साथ ही मोदी को संघ परिवार के संगठनों और खासकर स्वदेशी जागरण मंच के दबाव के साथ तालमेल बिठाना पड़ा था, जो अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोलने और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के विनिवेश का विरोध कर रहे थे. भारतीय खुदरा व्यापारियों और किराना दुकानदारों (संघ परिवार का मुख्य समर्थन आधार) को बाजार से बाहर होने से बचाने के लिए वे ज्यादा सक्चत ई-कॉमर्स नियम-कायदे लागू करने पर भी जोर देते आ रहे थे.

जानकार अफसरों का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की छाप वाला राष्ट्रवाद मोदी सरकार के विचारों से मेल खाता है जो कि भारत को महाशक्ति बनाने के नजरिए से ओतप्रोत है. मगर जब भारत को देश में खपत होने वाले सभी उत्पादों में आत्मनिर्भर बनाने और विदेशी निवेश से मुंह फेरने को लेकर स्वदेशी समर्थकों की मांगों की बात आती है, तब मोदी ज्यादा व्यावहारिक रास्ते पर चलते हैं. पहले कार्यकाल में उन्होंने बहुत धूमधाम से मेक इन इंडिया लॉन्च किया था, वहीं 2020 का आर्थिक सर्वेक्षण 'एसेंबल इन इंडिया' की बात करता है, हालांकि इसे वह इलेक्ट्रॉनिक्स सरीखे कुछेक क्षेत्रों तक सीमित रखना चाहता है.

इन अंतर्विरोधों को साधने की कोशिश में बजट 2020 कई नई शुरुआत करता है और कुछ सीमित रेल मार्गों और जिला अस्पतालों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी के लिए खोलने की पेशकश करता है. सबसे दिलचस्प मोड़ शायद वहां है जहां मोदी सरकार संपदा निर्माण (इथिकल वेल्थ क्रिएशन) की बात करती है. आर्थिक सर्वेक्षण बाजारों के उस दिशा में आगे बढऩे की वकालत करता है जिसे उसने 'नैतिक संपदा सृजन' कहा है.

अलबत्ता, जैसा कि एक अन्य अफसर बताते हैं, मोदी का स्पष्ट विचार है कि संपदा सर्जक (वेल्थ क्रिएटर्स) या निर्माता मुट्ठी भर उद्योगपतियों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों में फैला होना चाहिए. स्टार्ट-अप और एमएसएमई को मुद्रा लोन और प्रोत्साहन लाभ प्रदान करना ऐसी पहल थीं जिन्होंने अब तक विकास के फायदों से वंचित भारतीयों के विशाल वर्गों के लिए संपदा के निर्माण में मदद दी. लिहाजा बजट 2020 को मोदी की अपनाई गई नीतियों से निर्णायक अलगाव के बजाय उन्हीं नीतियों की निरंतरता और क्रमिक विकास के तौर पर देखा जाना चाहिए.

निजी निवेशों के साथ निर्यात की वृद्धि में अब भी छाई सुस्ती को देखते हुए बजट 2020 के लिए बेहद जरूरी था कि वह, दूसरी चीजों के अलावा, जबरदस्त सरकारी खर्च के जरिए लोगों की जेब में पैसा देकर और ज्यादा नौकरियां पैदा करके मांग में उछाल लाने का जतन करे. मगर वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय दोनों के अधिकारियों को संसाधनों की जबरदस्त कमी का पूरा एहसास था. जीएसटी के संग्रह में भारी गिरावट आई है और 2019-20 के लिए विनिवेश का लक्ष्य एक चौथाई ही पूरा हो सका है. ऐसे में राजस्व प्राप्तियों की स्थिति डांवाडोल और जोखिम भरी है. अफसर खुलासा करते हैं कि वित्त मंत्रालय और पीएमओ में इसको लेकर जबरदस्त बहस चली कि सरकारी खर्च में इजाफे के लिए क्या राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को ताक पर रख दिया जाए. यह वह विकल्प था जिसकी पिछले प्रधान आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने जोरदार वकालत की थी.

मोदी राजकोषीय घाटे की उस सीमा का उल्लंघन करने के एकदम खिलाफ थे, जिसकी इजाजत फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी ऐंड बजट मैनेजमेंट ऐक्ट (एफआरबीएम) के तहत दी गई है. एक बड़े अफसर कहते हैं, ''प्रधानमंत्री दिल से राजकोषीय समझदारी में यकीन करते हैं. वे बहुत ज्यादा खर्च में यकीन नहीं करते. वे सार्वजनिक धन को बर्बाद नहीं करते और कहते हैं कि इसका उपयोग निवेशों और खपत को बढ़ावा देने के लिए जरूर हो, पर यह जनहित की कीमत पर नहीं होना चाहिए.'' मोदी की दूसरी चिंता यह थी कि इसका नतीजा आखिरकार ज्यादा महंगाई में हो सकता है और आम आदमी को नुक्सान पहुंचा सकता है. यही नहीं, ऐसे में सरकार को बॉन्ड मार्केट से उधार भी लेना पड़ेगा और इस प्रक्रिया में निजी क्षेत्र की उधारियां बाहर हो जाएंगी. मोदी ने इस बात पर भी जोर दिया कि बजट, घाटे को पटरी पर लाने का पक्का रास्ता बताए, ताकि राजकोषीय फिजूलखर्ची के किसी भी आरोप से या अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के हाथों भारत की रेटिंग घटाए जाने से बचा जा सके.

निजी खपत और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने बजट 2020 में पांच मुख्य उपायों पर भरोसा किया है. एक, कुछ निश्चित आमदनियों वाले लोगों के लिए आयकर की दरों में अहम कटौती करके मध्यम वर्ग को दी गई कर रियायतें. विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए उसने लाभांश वितरण कर के जरिए कंपनियों पर करभार डालना खत्म कर दिया है. रकम जुटाने के लिए सरकार ने बजट में अपना सबसे साहसी कदम उठाया है और सार्वजनिक क्षेत्र की विशालकाय कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम का सीमित आइपीओ लाने की घोषणा की है.

उसने विनिवेश के लिए 2.1 लाख करोड़ रुपए के लक्ष्य का भी ऐलान किया है, पिछले साल के उसके प्रदर्शन को देखते हुए सवाल उठाए जा रहे हैं कि वह इसे हासिल कर पाएगी या नहीं. अगर विनिवेश का लक्ष्य पूरा नहीं होता है, तब भी अधिकारियों को यकीन है कि इसकी भरपाई उन आयकर विवादों के समाधान के जरिए मिलने वाले राजस्व से हो जाएगी, जिनमें 9.41 लाख करोड़ रुपए फंसे हुए हैं. ऐसा 31 मार्च 2020 तक भुगतान करने पर जुर्माने माफ करने के बजट के वादे की बदौलत हो सकेगा.

मोदी नहीं चाहते कि बजट 2020 को अलग-थलग करके परखा जाए. वे चाहते हैं कि इसे उस लंबे वक्त की योजना के हिस्से के तौर पर देखा जाए जिसमें संपदा की समावेशी और समतामूलक साझेदारी पक्की करते हुए ग्रोथ में जान फूंकने के लिए अहम मगर जरूरी बदलाव किए गए हैं. उन्होंने इशारों में कहा है कि सरकारी खर्च की सीमा है और वे चाहते हैं कि निजी क्षेत्र हमेशा रिरियाने और रियायतें मांगने के बजाए अपनी समूची बुनियादी और स्वाभाविक ताकत उन नए क्षेत्रों में लगाए जिन्हें उन्होंने खोला है. मोदी का बजट लोगों और खासकर नौजवानों को पुरजोर प्रेरित करता है कि वे विकास की कांवड़ में अपना कंधा लगाएं. ये इरादे तो नेक हैं पर इनका असली इम्तहान बजट में की गई बड़ी पहलों की तेज रफ्तार और प्रभावी अमल में होगा.

मुख्य दिक्कत यह है कि बजट 2020 जहां कई सुधारों को गले लगाता है, वहीं सबको खुश करने की उसकी कोशिशों का हश्र कइयों को नाखुश करने में हुआ है. ऑटोमोटिव, स्टील, रियल एस्टेट और बिजली सरीखे कई अहम क्षेत्रों की तकलीफों को दूर करने में बजट नाकाफी रहा है. चाहे जमीन हो या श्रम या पूंजी, बड़ी ढांचागत समस्याएं भी हैं, जिन्हें मोदी सरकार को सुलझाना होगा. बुनियादी ढांचा क्षेत्र और खासकर रेलवे में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. भारत ने 1990 के दशक में खुलेपन की नीति के साथ जैसा उड्डयन क्षेत्र के लिए किया था, उसी तरह सरकार को ट्रेन, रेलमार्गों, स्टेशनों और रख-रखाव सहित रेलवे को निजी क्षेत्र के लिए खोलना चाहिए.

निर्यात में ठहराव की मुख्य वजह यह है कि भारतीय उद्योग पर्याप्त प्रतिस्पर्धी नहीं है और अपने को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए सरकार से शुल्क बढ़वाने की शरण में भागता है. घरेलू उद्योग को बचाने के बजाए मोदी सरकार को चाहिए कि वह अर्थव्यवस्था को और ज्यादा क्षेत्रों में खोले ताकि भारतीय कारोबारी वैश्विक खिलाडिय़ों से मुकाबला करना सीखें. जहां तक कृषि की बात है, तो सरकार ने इस बजट में ठेके पर खेती की दिशा में कुछ पहल की हैं. मगर इस क्षेत्र को जरूरत इस बात की है कि सब्सिडियों और अनाज ही अनाज उगाने की सनक से मुक्त हुआ जाए और इसकी बजाए किसानों के लिए आमदनी-उन्मुख क्रांति पर पुरजोर ध्यान दिया जाए. ऊर्जा एक और क्षेत्र है जो बड़े बदलावों के लिए त्राहिमाम कर रहा है. 

संक्षेप में यदि 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर का अपना लक्ष्य हासिल करना है, तो मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था को वापस फास्ट-ट्रैक पर लाने के लिए बड़े सुधारों का कहीं ज्यादा साहसी रोडमैप लेकर आने की जरूरत है. धीमे-धीमे सुधार की नीति काम नहीं आएगी, क्योंकि सुधारों को फौरन और तेजी से अंजाम देने की जरूरत है. इसलिए और भी क्योंकि, जैसा कि जॉन मैनार्ड कीन्स ने आगाह किया था, ''लंबे समय में, हम सब मर जाएंगे.''

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay