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संतुलन की मुश्किल कोशिश

खर्च बढ़ाने की जोरदार मांग के बावजूद, बजट 2019 में राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई

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aajtak.in
श्वेता पुंज नई दिल्ली, 17 July 2019
संतुलन की मुश्किल कोशिश इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे

बजट 2019 का मसौदा ऊंची आकांक्षाओं और भारी दिक्कतों के बीच तैयार किया गया था. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राजकोषीय संतुलन के सीधे और संकीर्ण रास्ते पर चलने का फैसला किया. विकास सर्वोपरि के पक्षधरों को निराशा हुई होगी, लेकिन सीतारमण ने इंडिया टुडे के बजट राउंड टेबल में इतना ही कहा, ''मुझे राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना है... यह कानून है.''

इसमें वित्त सचिव एस.सी. गर्ग ने यह जोड़ा, ''देश में तकरीबन 80-85 प्रतिशत बचत सरकारी बैंकों में जमा की जाती है. इससे निजी बैंकों के लिए बहुत कुछ नहीं बचता है [उनके पास कर्ज बांटने के लिए बहुत कम ही धन उपलब्ध होता है]. ब्याज दरें ऊंची हैं, जो निजी क्षेत्र में निवेश को हतोत्साहित करती हैं. सो, किसी तरह का प्रोत्साहन निजी क्षेत्र से और अधिक बचत निचोड़ लेगा.'' कुछ अर्थशास्त्री गर्ग से सहमत हैं. देश की कुल उधारी सकल घरेलू उत्पाद का 8-9 प्रतिशत है और कुल घरेलू बचत भी इसी के आसपास है. यह बात ब्याज दरों को कम करने के रास्ते में एक बड़ी बाधा है.

बजट में इस साल के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 3.3 प्रतिशत पर रखा गया है, जो फरवरी के अंतरिम बजट में रखे गए 3.4 प्रतिशत से कम है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए रखे गए 70,000 करोड़ रु. से उनकी बैलेंस-शीट की चिंताओं को कम करने और कर्ज देने में आसानी होगी. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुधर सकती है. बजट के अनुसार, मार्च और दिसंबर 2018 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए 11.5 प्रतिशत से घटकर 10.1 प्रतिशत हो गया.

बजट विदेशी पूंजी के लिए भी राह बनाता है. राजस्व की कमी को पूरा करने के लिए कुछ नए स्रोतों को भुनाने की कोशिश करता है. कर राजस्व में अधिकांश वृद्धि पेट्रोल और डीजल पर लगाए गए उच्च अधिभार और उपकर से होगी. सीमा शुल्क में वृद्धि और आयकर पर सरचार्ज से 30,000 करोड़ रु. के अतिरिक्त राजस्व की उम्मीद है. उच्च आय वर्ग के लिए प्रभावी कर की दरों में बड़ी वृद्धि हुई है और 2 करोड़ रु. से अधिक की आय पर 38 फीसदी और 5 करोड़ रु. से अधिक की आय पर 42 प्रतिशत कर लगेगा.

इन सबके बावजूद बजट के राजस्व और व्यय अनुमानों में एक समस्या है. जैसा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक रथिन रॉय ने बताया कि आर्थिक सर्वेक्षण और बजट में 2018-19 के लिए राजस्व अनुमानों के बीच विसंगति है. सर्वेक्षण में इसे बजट के आंकड़ों से एक पूर्ण प्रतिशत अंक नीचे रखा गया है. इसमें कुल 1.7 लाख करोड़ रु. का अंतर आता है. इन पृष्ठों को लेकर कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं.

बजट को लेकर सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इसमें विकास को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए बहुत कम चीजें हैं. इसमें बस बुनियादी ढांचे और ग्रामीण खर्चों में वृद्धि और छोटे उद्योग पर ध्यान केंद्रित करके मध्यम अवधि में ही विकास को गति देने की बात हुई है.

बजट में रूढि़वादी नजरिए के भी संकेत दिखते हैं: आयात शुल्क वृद्धि संरक्षणवादी रुख है, और अति धनाढ्यों पर अधिभार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के डरने की संभावना है. 400 करोड़ रु. से कम टर्नओवर वाली कंपनियों के लिए कम कॉर्पोरेट दरों के निर्णय का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक पूर्व सदस्य कहते हैं, ''भावनाओं से निवेश प्रभावित होता है. बजट में कई अच्छी नीतियां हैं लेकिन उद्योग के शीर्ष 0.7 प्रतिशत को इससे बाहर रखने से उसकी भावनाएं आहत होती हैं.''

मोदी सरकार के पास 50 खरब डॉलर का सपना तो है, लेकिन बजट में उसके संकेत नहीं हैं. जैसा भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन ब्रुकिंग्स इंडिया के पेपर मूविंग इंडिया टू द न्यू ग्रोथ ट्रैजेक्टरी में चेताते हैं, ''राजनैतिक प्रतिष्ठान, नौकरशाही, सार्वजनिक टिप्पणीकार और शिक्षाविद् सभी वितरण तंत्र ज्यादा कुशल बनाने की बात कर रहे हैं. इस पर चर्चा कम है कि विकास को अनुमानित स्तर तक कैसे पहुंचाया जाए,... जब तक नीतिगत विकास पर ध्यान नहीं दिया जाता, इसकी संभावना बहुत कम है कि देश निकट भविष्य में ऊपरी-मध्य आय की स्थिति में पहुंचेगा.''

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