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आर्थिक वृद्धि के मसले

छह विशेषज्ञ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पहले बजट की छानबीन कर रहे हैं और बता रहे हैं कि इसमें किए गए उपाय खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए काफी हैं या नहीं

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aajtak.in
एम.जी. अरुण/ श्वेता पुंज नई दिल्ली, 17 July 2019
आर्थिक वृद्धि के मसले बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे इकोनॉमिस्ट्स (बाइट)

आप इस बजट को किस खाने में रखते हैं? क्या यह ग्रोथ बजट है? क्या यह आर्थिक वृद्धि को तेज करेगा?

प्र. डी.के. जोशी

जोर राजकोषीय मजबूती पर है और बजट वृद्धि को सहारा देने के लिए आक्रमक ढंग से खर्च करने के प्रलोभन से बचता है. यह कहा तो गया लेकिन इसमें वृद्धि को सहारा देने वाले उपायों के छिपे अर्थों को समझना जरूरी है. पहली बात तो यह कि राजकोषीय संयम को वृद्धि को बल देने वाली मौद्रिक नीति की खातिर तिलांजलि दी जाएगी. मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने वाली व्यवस्था के तहत मौद्रिक नीति भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) को प्रमुख इशारा है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि वह अगस्त की अपनी नीति बैठक में रेपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती करेगा. दूसरे, बैंकों में 70,000 करोड़ रु. की पूंजी लगाना और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को दी गई सहायता उनकी कर्ज देने की क्षमता में इजाफा करेगी, जो वृद्धि को तेज रफ्तार देने के लिहाज से बेहद अहम है. सिक्योरिटाइजेशन के लिए सरकार की ओर से आंशिक ऋण गारंटी के चलते बैंकों के लिए एनबीएफसी के कर्जों को उठा लेना आसान होगा और इस क्षेत्र के ऊपर दबाव में कमी आएगी.

इन उपायों के साथ हम उम्मीद कर रहे हैं कि जीडीपी की वृद्धि में इस वित्तीय साल के दूसरे आधे हिस्से में सुधार आने लगेगा. अच्छी बारिश और तेल की कीमतों में नरमी के साथ यह 7 फीसदी के निशान को पार कर सकती है. नहीं, तो हम बजट की कोशिशों से भी 7 फीसदी से कुछ नीचे की वृद्धि दर की उम्मीद कर रहे हैं.

एन.आर. भानुमूर्ति

मैं कहूंगा कि यह वृद्धि के अनुकूल बजट है जिसमें जोर मध्यम अवधि पर है. बजट 2019 प्रक्रियाओं (कारोबारी सहूलियत) पर ज्यादा जोर दे रहा है. पांच साल में 50 खरब डॉलर तक पहुंचने के लक्ष्य को देखते हुए कई ढांचागत मुद्दों से निपटना जरूरी था. बजट आर्थिक वृद्धि के लिए निजी निवेश पर ज्यादा जोर देता है, जबकि सरकार विकास के मुद्दों (रहन-सहन में आसानी) पर ध्यान केंद्रित करे. बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने के प्रस्तावों से अर्थव्यवस्था में तेजी आ सकती है. ग्रामीण विकास की कुछ योजनाओं में सरकार की तरफ से बढ़ोतरी से मांग में तेजी आनी चाहिए.

साजिद चिनॉय

2019-20 के लिए केंद्र के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य—परिसंपत्तियों की बिक्री के समायोजन के साथ—तकरीबन वही हैं जो पिछले साल थे. लिहाजा वृद्धि के लिए बजट से कोई सीधा अतिरिक्त राजकोषीय संबल नहीं दिया गया है. यह राहत की बात है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की कुल उधारी जीडीपी के 8-9 फीसदी पर है और तमाम घरेलू वित्तीय बचत का वाकई इस्तेमाल कर लेती है, ऐसे में इसे बढ़ाने की कोई राजकोषीय गुंजाइश थी भी नहीं. अलबत्ता बजट दो तरीकों से वृद्धि में मदद करेगा. पहला, राजकोषीय अनुशासन के चलते ब्याज दरों में कमी आएगी और यह मौद्रिक मोर्चे पर आरबीआइ के आगे बढऩे में मदद करेगा. दूसरे, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में लगाई जाने वाली नई पूंजी का कुछ हिस्सा 'ग्रोथ कैपिटल' या वृद्धि पूंजी का निर्माण करेगा. इससे कर्ज दे सकने वाले फंड की सप्लाई बाधाएं दूर होंगी.

विक्रम किर्लोस्कर

यह बजट धन शोधन क्षमता, राजकाज और तरलता के मुद्दों से दोचार है, ताकि निवेशकों के भरोसे और खपत को बढ़ावा दे सके. निजी आयकर में कटौतियों और कॉर्पोरेट इनकम टैक्स को 25 फीसद घटाने के जरिए लोगों के हाथ में पैसा रखना, ये ग्रोथ को प्रोत्साहित करने के उपाय हैं.

अभिजित सेन

इसे बजट कह पाना ही मुश्किल है. इसमें 2018-19 की असल और 2019-10 की प्रस्तावित प्राप्तियों और खर्चों का कोई ब्यौरा नहीं है, जो आम तौर पर होता है. बजट में जरूरी आंकड़े हैं, पर वे मुख्य तौर पर फरवरी के अंतरिम बजट पर आधारित हैं और राजस्व में भारी-भरकम नाकामियों को छिपा लेते हैं. आर्थिक सर्वेक्षण के खंड 2 में स्टैटिस्टिकल एपेंडिक्स की टेबल 2.5 से पता चलता है कि 2018-19 में वास्तविक शुद्ध कर राजस्व अब अनुमानित 13.16 लाख रु. ही हैं, जबकि संशोधित अनुमान 14.84 लाख करोड़ रु. का था जो अंतरिम और मौजूदा बजट, दोनों में दिखाया गया है. कर संग्रह में इस भारी गिरावट—जीडीपी की एक फीसदी—के चलते अंतरिम बजट के अनुमानों पर नए सिरे से काम करने की जरूरत थी.

लगता नहीं कि ऐसा किया गया है. 2019-20 के अनुमानित कर राजस्व को अंतरिम बजट के मुकाबले थोड़ा-सा घटा दिया गया है (17.05 लाख करोड़ रुपए से 16.49 लाख करोड़ रुपए), मगर इन्हें 'कंजरवेटिव' के तौर पर पेश किया गया है, यानी 2018-19 के संशोधित अनुमान से सिर्फ 11 फीसदी ज्यादा, 12 फीसदी की अनुमानित जीडीपी ग्रोथ के मुकाबले. असल में ये कर अनुमान 'बहुत ज्यादा आशावादी' हैं, 2018-19 के वास्तविक से 25 फीसदी ज्यादा और जीडीपी ग्रोथ के दोगुने से भी ज्यादा. पूरे बजट को थोड़ा संदेह से देखने की जरूरत है.

तजम्मुल हक

यह प्रगतिशील बजट है. यह आर्थिक वृद्धि में सुस्ती, कृषि संकट और लघु, छोटे तथा मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और वित्तीय क्षेत्र की परेशानियों की पृष्ठभूमि में पेश किया गया. बजट में ये चिंताएं झलकती हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में वास्तविक जीडीपी के 7 फीसदी से बढऩे की उम्मीद करता है. यह मुमकिन है जब निजी निवेश के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में पूंजी की सीमांत उत्पादन कुशलता में सुधार हो, जिसकी खास उम्मीद नहीं दिखती. वजह यह कि एमएसएमई क्षेत्र फिलहाल गहरे संकट में है.

कृषि संकट जारी है और वित्तीय क्षेत्र एनपीए के बुखार से उबरा नहीं है. यह बजट देश की अर्थव्यवस्था की लंबे समय से चली आती बीमारियों का इलाज और वृद्धि को तेज करने के उपाय पेश नहीं करता. पर मोटा-मोटी एक दिशा दी गई है जिसमें निवेश और वृद्धि आगे बढ़ेगी.

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