एडवांस्ड सर्च

कहानी संग्रह: रूढ़ नैतिकता के विपक्ष में

कथाकार मृदुला गर्ग स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग ढांचे-खांचे बनाने का विरोध करती रही हैं. उनकी अधिकांश कहानियां, जिन्हें 'स्त्री-विमर्श' के खाते में डाला जाता है, एक मुक्त मन की चेतस स्त्री की कहानियां हैं.

Advertisement
aajtak.in
चंद्रकांतानई दिल्‍ली, 23 October 2011
कहानी संग्रह: रूढ़ नैतिकता के विपक्ष में

मृदुला गर्ग की यादगारी कहानियां
हिंद पॉकेट बुक्स, जोरबाग लेन,
नई दिल्ली-3,
कीमतः 135 रु.

निजी स्पेस की तलाशः
मृदुला गर्ग

कथाकार मृदुला गर्ग स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग ढांचे-खांचे बनाने का विरोध करती रही हैं. उनकी अधिकांश कहानियां, जिन्हें 'स्त्री-विमर्श' के खाते में डाला जाता है, एक मुक्त मन की चेतस स्त्री की कहानियां हैं, जो परंपरा से समर्थ पुरुष सत्ता द्वारा स्थापित नैतिक अनुशासनों, लक्ष्मण रेखाओं को पार कर अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती है. स्त्री यहां न पुरुष से श्रेष्ठ है और न कमतर, बल्कि पुरुष की तरह ही खूबियों-खराबियों समेत एक व्यक्ति है, एक मनुष्य. जीवन को मनचाहे ढंग से जीने की ललक स्त्री के भीतर भी उतनी ही है, जितनी पुरुष में. फिर दृष्टि/व्यवहार में द्वैत क्यों?

हरी बिंदी, मीरा नाची और साठ साल की औरत कहानियों की स्त्रियां समाज की तय की गई हदबंदियों को धता बताकर निजी सोच और आकांक्षाओं के अनुरूप जीना चाहती हैं. स्थापित व्यवस्था ने यदि जीवन के छोटे-छोटे सुख भी स्त्री से छीने हैं, तो वह भी रुढ़िबद्ध समाज में दरारें डाल अपने लिए एक निजी स्पेस तलाश ही लेगी.

मृदुला ने दांपत्य-संबंधी कहानियों में पुरुष की अधिकार चेतना और स्त्री  की आकांक्षाओं के बीच द्वंद्वात्मक स्थितियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तुक और वितृष्णा में स्त्री मन की गहराई में उतर कर किया है. स्त्री की आंतरिकताओं, चाहनाओं और गोपन दर्द का परीक्षण करतीं वे पति द्वारा पत्नी के मन और शरीर पर अधिकार जताकर  'इस्तेमाल' करने की प्रवृत्ति पर चोट करती हैं. तुक  में पति-पत्नी की रुचियां भिन्न हैं.

पत्नी संपूर्ण समर्पण में प्रेम का प्रतिदान चाहती है, पर पति अपने मूड के हिसाब से पत्नी के देह-मन का मनचाहे ढंग से इस्तेमाल करता है. हार का आक्रोश हो या जीत का जश्न, प्रतिक्रिया और प्रयोग स्त्री-देह पर होते हैं. यहां दांपत्य संबंध आपसी समझ और आत्मीयता पर आधारित न रहकर एक व्यवसाय बन गया है, जहां नफा-नुक्सान मुआवजा मानी रखता है, प्रेम में समान भागीदारी नहीं. बल्कि पत्नी तो यहां 'रोबोट' है, मानवी भी नहीं. सो उसकी इच्छा-भावना को समझ्ने की दरकार ही कहां है?

मृदुला की स्त्री में जीवन जीने का भरपूर उछाह है. ग्लेशियर से कहानी में स्थिर-रुटीन ज़िंदगी में रोजमर्रा की ऊब और अनुशासनों की घुटन बीच जी रही मिसेज दत्ता, पति के साथ 'ताजीवास ग्लेशियर' देखने निकली है. मिस्टर दत्ता एक दिद टूरिस्ट बंगले में आराम कर अगले दिन ग्लेशियर देखने का प्रोग्राम बनाते हैं. पर मिसेज दत्ता को चीड़ के दरख्तों बीच थिरकती मनमौजी हवाएं बाहें खोल साथ चलने के लिए बुलाती हैं. वह अकेली ग्लेशियर की ओर निकल पड़ती है और साथ चलती है विवाह पूर्व की वह मनमौजी लड़की, जो सोनमर्ग की पहाड़ियों, हहराती नदियों और चीड़ की फुनगियों से अटी बर्फ पर बेरोक दौड़ रही  है. मृदुला यहां स्त्री को झ्झिंेड़कर मन-जेहन की सचेतनता के साथ जीने को उकसाती हैं.

सामाजिक विडंबनाओं और अंधविश्वासों को आड़े हाथों लेती मृदुला, लोकविश्वासों के रूढ़ अर्थों को सात कोठरी कहानी में नए सिरे से परिभाषित करती हैं. मांडू की यात्रा में गाइड सात कोठरी की कहानी सुनाता है, जिसमें छह कुमारियां विवाह न हो पाने के कारण समाज की लांछना से बचने के लिए महादेव का नाम पुकार खाई में खूद पड़ती हैं और छह सतियों की उपाधि पा लेती हैं.

सातवीं कुमारी महादेव का नाम लेकर गांव से पलायन करती है तो सूखे ताल में पानी फूट आता है. लोग छह कोठरियों और पानी के ताल को पवित्र मान पूजते हैं. सातवीं कोठरी को पत्थरों से पाट दिया जाता है और सातवीं कुमारी 'कुलटा' कहलाई जाती है. सातवीं महादेव नाम से चरवाहे के साथ भागकर जीवन को चुनती है. यानी अपना निर्णय आप लिया. पितृसत्तात्मक समाज इसे कैसे स्वीकारता? प्रकृति ने इसे स्वीकार लिया.

मेरे देश की मिट्टी अहा में पर्यावरण प्रदूषण, बढ़ती जनसंख्या, परिवार नियोजन में धार्मिक हस्तह्नेप से लेकर प्रशासनिक प्रदूषण को व्यंग्य-विनोद शैली में परीक्षित कर, भ्रष्ट व्यवस्था को आईना दिखाया गया है. उर्फ सैम विदेश आवास की सुविधाओं से आकर्षित देश छोड़ तो गए पर विदेश में रहकर उन्हें अपनी जड़ों की याद सताने लगी. बुढ़ापे में किसी ओल्ड होम में, परायों के बीच मरने का भय इस कदर व्याप गया कि घर के विजिट के दौरान पुष्प विहार में एक मकान खरीद डाला.

वक्त जरूरत अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता! विभाजित मन की ग्रंथियां! कुछ कहानियां गहरे जीवनानुभवों से निकली हैं, कुछ व्यवस्था की विसंगतियों से. भाषा शैली में कहीं मनोवैज्ञानिक अप्रोच से अंतर्मन की गोपन आकांक्षाओं का उत्खनन है, कहीं सामाजिक विद्रूपों पर व्यंग्य-विनोद का लहजा अपनाया गया है. अधिकांश कहानियां पितृसत्तात्मक समाज के मुखौटे उतार रूढ़ नैतिकता के विपक्ष में खड़ी हैं. स्त्री को खुद ईजाद किए सोच से मूल्यों को परखने के लिए उकसाती ये कहानियां न सिर्फ पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज के आगे चुनौतियां खड़ी करती हैं, बल्कि स्त्री के सोच को भी टहोकती है. अंततः उसे पूरी स्त्री जाति की अस्मिता के बारे में सोचना होगा.  

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay