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कौशिक डेका-उत्कृष्टता की खोज

नए आयामों की तलाश में जुटे रहने के कारण भी बेंगलूरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआइयू) 1998 के बाद से 17 बार टॉप पर रहा है. देश को कई शीर्ष कानूनी दिग्गज देने वाला एनएलएसआइयू अन्य पाठ्यक्रमों के टॉपर्स की तरह ही मूल्य-आधारित शिक्षा स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करता है.

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कौशिक डेका/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 22 May 2019
कौशिक डेका-उत्कृष्टता की खोज बेस्ट कॉलेज

प्रमुख केंल्टेंसी कंपनी एक्सेंचर की हालिया रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि लंबे समय से हुनर की कमी के चलते गंवाए अवसरों की शक्ल में भारत को करीब 1.97 ट्रिलियन डॉलर (1,37,57,000 करोड़ रु.) का नुक्सान होगा. मतलब भारत 2018 और 2028 के बीच अपनी मौजूदा जीडीपी का करीब दो-तिहाई गंवा देगा. वैसे इसका सकारात्मक पक्ष भी है, जैसा कि उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने पिछले महीने बताया, कि द्रुत औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास के कारण 2030 तक 25 करोड़ कुशल कार्यबल के अवसर पैदा होंगे और यह भारत को कुशल श्रमबल के वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरने में सक्षम बनाएगा. इस क्षमता को भुनाने में विभिन्न पाठ्यक्रमों में कॉलेज शिक्षा की अहम भूमिका होगी. दो दशक से इंडिया टुडे ग्रुप के वार्षिक कॉलेज सर्वेक्षण में देश के कॉलेजों की स्थिति और प्रगति को प्रामाणिक रूप से दर्शाया जाता रहा है. कॉलेज विशेषांक का यह 23वां संस्करण उस परंपरा का समुचित निर्वाह करता है.

पिछले साल की तरह दिल्ली की एक प्रतिष्ठित बाजार अनुसंधान एजेंसी मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) ने 14 विभिन्न पाठ्यक्रमों—आर्टस, साइंस, कॉमर्स, मेडिकल, डेंटल, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, लॉ, मास कक्वयुनिकेशन, होटल मैनेजमेंट, बीबीए, बीसीए, फैशन और सोशल वर्क में सर्वेक्षण किया. नवंबर 2018 और अप्रैल 2019 के बीच आयोजित इस साल के सर्वे में 1,207 कॉलेजों ने भाग लिया. पिछले साल यह संख्या 988 थी. 12 स्नातक पाठ्यक्रमों का मूल्यांकन किया गया, तो मास कम्युनिकेशन और सोशल वर्क जैसे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों का भी मूल्यांकन हुआ.

15 देशों में 10,478 अभिभावकों और 1,507 विश्वविद्यालयी छात्रों के बीच हुआ 2018 का एचएसबीसी वैल्यू ऑफ एजुकेशन सर्वे, जिसमें भारत के 505 अभिभावक और 100 छात्र शामिल थे, बताता है कि भारत में अभिभावकों ने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए सालाना 1,853 डॉलर (लगभग 1,30,000 रु.) खर्च किए. इसके लिए 53 प्रतिशत ने छुट्टियों में अपने आनंद पर होने वाला खर्च बंद या फिर कम कर दिया, 35 प्रतिशत ने एक और नौकरी शुरू की और 49 प्रतिशत ने छुट्टियों में कटौती की.

पढ़ाई की ऊंची लागत के पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इस साल कॉलेजों की रैंकिंग सबसे कम ट्यूशन फीस के पैमाने पर भी की गई है. यह फीस के अनुपात में बेहतर तनख्वाह के पैमाने पर की गई रैंकिंग (आरओआइ) के अलावा है. आरओआइ रैंकिंग सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों की संकेतक नहीं है, बस पाठ्यक्रम की फीस के संदर्भ में वेतन के रूप में मिलने वाले अधिकतम रिटर्न को दर्शाती है. कॉलेज शिक्षा में निवेश के लिहाज से वे सबसे महंगे हैं.

थोड़ा परेशान करने वाली बात है पिछले कुछेक वर्षों में नियमित होता गया एक रुझान, जिसे इस साल की रैंकिंग ने पुख्ता किया है, वह यह कि ज्यादातर टॉप कॉलेज कुछ बड़े शहरों में केंद्रित हैं, उनमें भी सबसे ज्यादा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में. यह बताता है कि आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में दाखिले का कट-ऑफ इतना ऊपर क्यों होता है और क्यों देशभर के छात्र इसी विश्वविद्यालय के अपनी पसंद के कॉलेज में सीट पाने की होड़ लगाते हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली के कॉलेजों में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण की मांग करके इसे सियासी रंग दे दिया है.

कौन-सी बात टॉप कॉलेजों को औरों से अलग बनाती है? इंडिया टुडे के संवाददाताओं ने इन संस्थानों के प्रमुखों और कई छात्रों से बात की. उत्तर स्पष्ट रूप से समान थे. सबका मानना था कि इन कॉलेजों ने शीर्ष स्थान पाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं. खुशफहमी की कोई जगह नहीं है; नवाचार ही आगे का रास्ता है. पिछले 23 साल में आर्टस के क्षेत्र में छह बार टॉप पर रहे सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर जॉन वर्गीस बताते हैं, ''छात्र यहां आते हैं, तो वे अच्छे होते हैं लेकिन हम यहां उनके कौशल और विषय ज्ञान को कहीं ज्यादा ऊंचाई पर ले जाने की कोशिश करते हैं.'' सर्वेक्षण शुरू होने के बाद से वाणिज्य में लगातार टॉप पर बने आ रहे श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स का ध्यान समग्र विकास पर है. इसकी प्रिंसिपल सिमरित कौर कहती हैं, ''हम छात्रों के समग्र विकास के लिए एक बहुत अच्छी पद्धति अपनाते हैं.''

ऐसा ही एक और चैंपियन जिसे उसके सिंहासन से हिलाया नहीं जा सका, वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स है. एम्स न केवल देश के सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर पैदा करता है, बल्कि चिकित्सा पद्धतियों और प्रबंधन की एक जीवित प्रयोगशाला के रूप में भी कार्य करता है. यहां बड़े पैमाने पर आने वाले मरीजों के कारण, यह अपने छात्रों को कार्य का जो अनुभव प्रदान करता है उसका सपना भारत के कुछ ही कॉलेज देख सकते हैं. एमबीबीएस की छात्रा लज्जाबेन जयेश कुमार पटेल कहती हैं, ''हमें कुछ सबसे अच्छे क्लिनिशियन-शोधकर्ताओं के काम को देखने का मौका मिलता है.'' फिर भी निदेशक रणदीप गुलेरिया को लगता है कि उन्हें कुछ नए कोर्स और विभाग खोलने से लेकर डिजिटल गवर्नेंस की शुरुआत तक अभी यहां बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

नए आयामों की तलाश में जुटे रहने के कारण भी बेंगलूरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआइयू) 1998 के बाद से 17 बार टॉप पर रहा है. देश को कई शीर्ष कानूनी दिग्गज देने वाला एनएलएसआइयू अन्य पाठ्यक्रमों के टॉपर्स की तरह ही मूल्य-आधारित शिक्षा स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करता है. जैसा कि इसके कुलपति प्रोफेसर एस.एन. वेंकट राव बताते हैं कि यह सफलता शिक्षण, सामाजिक रूप से प्रासंगिक विषयों में नवाचार और कानूनी शिक्षा को न्याय-उन्मुख बनाने का नतीजा है. ऐसा तभी हो सकता है जब सोचने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अनुमति दी जाए और यही बात संस्थान को अद्वितीय बनाती है. बीए-एलएलबी (ऑनर्स) की अंतिम वर्ष की छात्रा चांदनी ओचनाणी कहती हैं, ''मुझे नहीं लगता कि कोई अन्य संस्थान ऐसी स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देता है. प्रत्येक छात्र को विषय ज्ञान के अलावा जीवन के सभी पहलुओं से परिचित होने का अवसर मिलता है.''

इस सूची में शीर्ष स्थान पर दिखने वाले अधिकांश कॉलेज कड़ी मेहनत और विरासत का एक उचित मिश्रण हैं, भूगोल और अर्थशास्त्र अक्सर उत्कृष्टता अर्जित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. धन के वितरण में असमानता दिखती है क्योंकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के बजट का 65 प्रतिशत, केंद्रीय विश्वविद्यालय और उनके कॉलेज खर्च कर लेते हैं जबकि राज्य के विश्वविद्यालयों और उनके संबद्ध कॉलेजों को केवल 35 प्रतिशत मिलता है. यह महज संयोग नहीं है कि हमारे सर्वेक्षण में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय डीयू के अंतर्गत आने वाले कॉलेज ही लगातार शीर्ष पर बने हुए हैं.

खर्च में इस असमानता के अलावा पिछले 12 साल से उच्च शिक्षा पर भारत का खर्च उसके कुल बजट के औसतन 1.5 प्रतिशत की दर पर ही स्थिर बना हुआ है.

23 मई को सत्ता में आने वाली नई सरकार के लिए एक बड़ा काम होगा—उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए अधिक धनराशि का प्रबंध करना और हितधारकों को जवाबदेह बनाना. विश्व बैंक की 2018 की एक रिपोर्ट कहती है कि भारतीय जिस परिवेश में जन्म लेते हैं वह उन्हें विश्व के पांच अन्य बड़े विकासशील देशों—ब्राजील, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया और नाइजीरिया के नागरिकों की तुलना में अधिक लाचार बनाती है. इसलिए इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार की पहल निर्णायक सिद्ध होगी.ठ्ठ

23 मई को सत्ता में आने वाली नई सरकार के लिए बड़ा काम होगा उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए अधिक धन का प्रबंध करना.

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