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आवरण कथा-बालाकोट की अनकही कहानी

बालाकोट ऑपरेशन की विशेष अनजानी दास्तान, निशानों के बारे में बारीक खुफिया जानकारी के साथ अत्याधुनिक हथियारों और हवाई रणनीति के साथ कैसे दिया गया अंजाम?

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aajtak.in
राज चेंगप्पा/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 18 March 2019
आवरण कथा-बालाकोट की अनकही कहानी 26 फरवरी को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक की अध्यक्षता करते प्रधानमंत्री मोदी

पाकिस्तान के धुर अंदर बालाकोट स्ट्राइक के कुछ घंटे पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिलने वालों को जरा-सा भी इशारा नहीं दिया कि वे कोई ऐतिहासिक फैसला कर चुके हैं. यह ऐसा फैसला था जो दोनों देशों को जंग के मुहाने पर खड़ा कर देता. दोनों के बीच टकराव का यह मंजर 2002 से ही जारी है, जब पाकिस्तान की शह पर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के कालूचक में हमला किया था और 30 लोगों की जान ले ली थी.

1971 के बाद पहली दफा भारत पाकिस्तान के भीतर हवाई हमला करने जा रहा था. यह फैसला उतना ही दूरगामी असर वाला था, जैसे इंदिरा गांधी ने 1974 और अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में परमाणु परीक्षण करके भारत की परमाणु ताकत का ऐलान किया था. यह फैसला भविष्य में आतंकी हमलों की स्थिति में पाकिस्तान से भारत के सलूक में भारी बदलाव का परिचायक था.

हालांकि मोदी हरी झंडी देने के बाद रात 9.30 बजे अपने सरकारी निवास 7, लोक कल्याण मार्ग लौटे तो हमेशा की तरह शांत और संतुलित थे.

14 फरवरी को पुलवामा में जैश-ए-मोहम्मद  के फिदायीन हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का मोदी के भाषणों में खास जिक्र नहीं था, जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान मारे गए थे.

लेकिन प्रधानमंत्री का स्टाफ यह देख हैरान था कि वे आधी रात को भी सोने नहीं गए. इसके बदले वे अपनी स्टडी में बालाकोट हवाई हमले की प्रगति की जानकारियां लेते वक्त फाइलों पर नजर डालते रहे और ईमेल भेजते रहे.

तड़के 3 बजे प्रधानमंत्री को जानकारी दी गई कि भारतीय वायु सेना के लड़ाकू जेट का बेड़ा उड़ान भर चुका है और जल्दी ही पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश करने वाला है.

आधे घंटे बाद उन्हें बताया गया कि जेट विमानों ने पाकिस्तान में निशाने पर बम दाग दिए हैं और सुरक्षित अपने ठिकानों पर लौट आए हैं.

वे उसके बाद पाकिस्तान में हुए नुक्सान की भी जानकारी लेते रहे. वे खुद सोशल मीडिया को खंगाल रहे थे कि इस हमले पर खासकर पाकिस्तान से क्या प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.

आखिर सुबह 9.40 बजे जब मोदी ने सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक बुलाई तब उनकी टीम को पता चला कि उन्होंने रतजगा क्यों किया. इसमें वित्त, विदेश, गृह और रक्षा मंत्री होते हैं.

अगले कुछ दिनों में पाकिस्तान की जवाबी हवाई कार्रवाई के बाद इस बड़े सवाल पर विवादों का घना कुहरा छाने लगा कि आखिर पाकिस्तान की मुख्य भूमि में हवाई हमले के फैसले के पीछे मोदी का मकसद क्या था? भारतीय जेट विमानों के निशाने पर जैश का सक्रिय शिविर था या खाली कर दिया गया शिविर, जैसा कि पाकिस्तान दावा कर रहा है?

क्या सबूत है कि भारतीय विमानों ने घातक हथियारों से निशाने पर सटीक हमले किए या उस इलाके में महज कुछ पेड़ों पर कहर बरपा हुआ, जैसा कि पाकिस्तान दावा करके मखौल उड़ा रहा है?

बालाकोट हमले के बाद पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई के दौरान उसके विमानों को खदेड़ने में पाकिस्तान के एफ-16 विमान गिराने के क्या सबूत हैं?

इस अहम फैसले की प्रक्रिया में शामिल रहे उच्च सरकारी सूत्रों से भरोसे के साथ बातचीत करके इंडिया टुडे पहली दफा पूरे ब्यौरे को सामने ला रहा है, जिससे बालाकोट ऑपरेशन के बाद उभरे कई अहम सवालों से संबंधित खास जानकारियां मिलती हैं.

मोदी ने सीमा रेखा लांघने का फैसला आखिर क्यों किया?

मोदी ने 14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हमले की खबर सुनी तो उनके सहयोगियों के मुताबिक, सुरक्षा बलों के जवानों की मौत से गमजदा और जैश तथा पाकिस्तान में उसके आकाओं के दुस्साहस से वे भारी गुस्से से भर उठे.

उन्होंने सार्वजनिक सभाओं में कहा कि हमले के दोषियों को उसका अंजाम भुगतना होगा. सहयोगियों के मुताबिक मोदी कभी भी कोई फैसला भावनाओं में बहकर या किसी फितूर में नहीं करते हैं. वे कहते हैं कि संकट काल में पूरी सफाई होनी चाहिए कि आप चाहते क्या हैं, ताकि जैसा उनके एक सहयोगी कहते हैं, ''कोई अपने सामान्य वजूद से पुख्ता हैसियत में पहुंच जाए.''

मोदी के दिमाग में यह साफ था कि पाकिस्तान दशकों से जो अपनी परमाणु ताकत का हौवा दिखाता आ रहा है, उसकी हवा हमेशा के लिए निकाल देनी है. इसके पहले पाकिस्तान पर हमले से भारत को यही हौवा रोकता रहा है और इस तरह हमारे विकल्प थोड़े हो जाया होते रहे हैं.

इससे पाकिस्तान को कम खर्चीले आतंकी हमलों के सिलसिले से भारत को लहू-लुहान करने की शह मिलती रही है. सितंबर 2016 में उड़ी हमले के बाद मोदी ने नियंत्रण रेखा के पार सर्जिकल स्ट्राइक करने का आदेश दिया था. उड़ी हमले में 23 लोग मारे गए थे. सर्जिकल स्ट्राइक का मकसद यह संकेत देना था कि भारत जवाबी कार्रवाई से नहीं हिचकेगा. हालांकि आलोचकों ने कहा कि ऐसी कार्रवाइयां पहले भी होती रही हैं लेकिन उसका हल्ला नहीं मचाया जाता रहा है.

पाकिस्तान पर हमले का फैसला करते वक्त शायद मोदी ने चीन के एक जनरल की इस उक्ति पर अमल किया कि ''अगर दुश्मन से वाकिफ हो और खुद का भी अंदाजा है तो आपको सौ युद्घों से भी डरने की दरकार नहीं है.

अगर आपको अपना अंदाजा है मगर दुश्मन का नहीं तो हर जीत के साथ आपको हार भी झेलनी पड़ेगी. अगर आपको न खुद का अंदाजा है, न दुश्मन का तो आप हर लड़ाई हार जाएंगे.''

इसमें संदेह नहीं कि भारत पाकिस्तान से ताकतवर है. वह तेजी से उभरती आर्थिक ताकत है, यहां सुरक्षित बहुमत की सरकार है और ऐसा नेता है, जो सख्त और कई बार जोखिम भरे फैसले करने से नहीं हिचकता.

फिर, मोदी सरकार को चीन के अलावा दुनिया की बड़ी ताकतों का समर्थन हासिल है. दूसरी तरफ, पाकिस्तान आर्थिक बदहाली के कगार पर खड़ा है और वहां फौज पर आश्रित कमजोर नेता है.

फिर भी, चीन और अमेरिका दोनों को उसकी दरकार है, एक को अपनी ताकत में इजाफे के लिए और दूसरे को अफगानिस्तान में समझौते की खातिर.

यह भी अहम है कि पाकिस्तान परमाणु ताकत है इसलिए पूरी सावधानी बरती जानी चाहिए, जिसके बारे में एक उच्चपदस्थ सरकारी सूत्र कहते हैं, ''पहले हमला करने की परमाणु नीति के साथ अस्थिर इस्लामी नजरिया.''

मोदी एकदम साफ थे कि वे पुलवामा की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान से उलझने पर दोनों तरफ तय तबाहियों की बात सोचकर नहीं हिचकेंगे.

परमाणु हौवे से लोहा

मोदी के सहयोगी इस पर भी विचार कर रहे थे कि परमाणु युद्घ के किसी तरह के खतरे को टालते हुए साहसिक और कल्पनाशील हमला क्या हो सकता था.

जैसा एक ने बताया, ''हम मूर्खों की तरह बिना सोचे-समझे साहस नहीं दिखा सकते थे. संकट काल में प्रधानमंत्री हमेशा सही सवाल पर उंगली रखते हैं और खांटी गुजराती की तरह हमेशा नफा-नुक्सान को खंगालते हैं.

उनका मानना है कि खर्च मकसद के मुकाबले अधिक नहीं होना चाहिए और चाहते हैं कि हमेशा यह सवाल करें कि हम कहां हैं और कहां पहुंचना चाहते हैं.''

मोदी ने तब अपनी टीम के सामने मकसद का बयान किया कि भारत पाकिस्तान के लोगों या उसकी सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि वहां आतंकी गुटों और उसके आकाओं के खिलाफ है. यह भी कि भारत का जवाब उसी अनुपात में होना चाहिए, जो पाकिस्तान ने किया है.

भारत की ओर से कोई हमला उसी दायरे में होना चाहिए, जिसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी 'तार्किक' कार्रवाई माने. इसलिए गैर-फौजी ठिकानों यानी आतंकी प्रशिक्षण केंद्रों पर ही संतुलित कार्रवाई की दरकार थी. आम नागरिकों या फौजी ठिकानों पर किसी तरह के नुक्सान से बचा जाना चाहिए था. एक सहयोगी कहते हैं, ''मकसद युद्ध से बचना नहीं, बल्कि उसे दायरे में रखना था.'' भारत को पता था कि हवाई ताकत के इस्तेमाल में जोखिम हैं लेकिन प्रधानमंत्री एकदम स्पष्ट थे कि हमें कुछ ऐसा करना है, जो चौंका दे.

प्रधानमंत्री ने इसी हद को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों को खुली छूट दी थी कि वे सीमित लक्ष्य पर कोई हमला करें और सभी विकल्पों की उन्हें जानकारी दें. एक दूसरे उच्च स्तरीय सहयोगी ने खुलासा किया, ''प्रधानमंत्री एकदम स्पष्ट थे कि किसी भी सूरत में युद्ध में इजाफा नहीं होना चाहिए. वैसा कोई लक्ष्य नहीं है. हम किसी इलाके पर कब्जा करने की बात नहीं सोच रहे हैं.

दोनों देशों को इसके खतरे का अंदाजा है.'' मोदी ने उनसे कहा कि पाकिस्तान को माकूल जवाब देने के लिए वे जरूर कुछ करें लेकिन यह भी ध्यान रखें कि आम लोगों का कोई नुक्सान न हो. हर ब्यौरे की पुष्टि की जानी चाहिए और निशाने के बारे में खुफिया जानकारियां एकदम सटीक होनी चाहिए. इसलिए डोभाल, खुफिया एजेंसियों के प्रमुख और सेना के तीनों अंगों के प्रमुख ऐसे निशाने की तलाश में जुट गए जो 'पूरी तरह सटीक' हो, यानी किसी तरह का दूसरा नुक्सान उससे न हो.  

बालाकोट का चुनाव क्यों और कैसे किया गया

उसके बाद खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तान में चल रहे करीब पंद्रह शिविरों को हमले के लिए खंगाला. लेकिन फैसला यह किया गया कि पुलवामा हमले में जैश ही शामिल था इसलिए उसी के शिविर को निशाना बनाना चाहिए. ऐसे तीन शिविरों की पहचान की गईः पाकिस्तान के पंजाब में बहावलपुर, मुजफ्फराबाद (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) के पास सवाई नाला और खैबर पख्तूनख्वा में बालाकोट. बहावलपुर के शिविर पर हमले में आम लोगों को होने वाले नुक्सान से बचना मुश्किल था, क्योंकि कई साल के दौरान वहां मस्जिद, अस्पताल और ट्रेनिंग कैंप उभर आए थे और यह पंजाब के घनी आबादी वाले इलाके में है.

सवाई नाला जैश के सबसे बड़े कैंपों में है लेकिन इसका चुनाव इसलिए नहीं किया गया क्योंकि यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में है. 2016 में उड़ी हमले के बाद मोदी ने पीओके में जैश के कैंप पर सर्जिकल स्ट्राइक का आदेश दिया था. लेकिन पुलवामा का आतंकी हमला इतना बड़ा था कि प्रधानमंत्री ने तय किया हुआ था कि निशाना नियंत्रण रेखा के पार हमले से कुछ बड़ा होना चाहिए.

इस तरह बालाकोट में जैश के कैंप को ही सही निशाने के रूप में चुना गया क्योंकि वह पाकिस्तान की मुख्य भूमि में है. मरकज सैयद अहमद शहीद के नाम से पहचाने जाने वाले इस कैंप की स्थापना 2004-05 में हुई थी और यह जाबा टॉप पहाड़ी की ढलान पर स्थित है. यह इलाका सुनसान है और घाटी से तीन किमी की खड़ी चढ़ाई के बाद ही यहां पहुंचा जा सकता है. उस कैंप पर भारतीय खुफिया एजेंसियों की वर्षों से नजर रही है.

इससे वहां उन्होंने कैंप की गतिविधियों की जानकारी के लिए कुछ भेदिए भी बना रखे हैं. छह एकड़ में फैले इस कैंप में 10 बड़े मकान या परिसर विभिन्न गतिविधियों के लिए हैं. सबसे अहम बात यह है कि यह कैंप मसूद अजहर के साले यूसुफ अजहर की निगरानी में चलता था और वह यहीं एक इमारत में रहता था जिसमें पहले स्कूल हुआ करता था.

भारत के हवाई हमले के बाद पाकिस्तान ने दावा किया कि इस कैंप को तो जैश वर्षों पहले खाली कर चुका था. हालांकि बालाकोट कैंप पर जब 26 फरवरी के तड़के हवाई हमले हुए तब वह सुनसान नहीं था. इंडिया टुडे को भारतीय खुफिया एजेंसियों के जुटाए ब्यौरे और तस्वीरें देखने को मिली हैं जिनसे खुलासा होता है कि कैंप जेहादियों और दूसरों से भरापूरा था (देखें दहशतगर्दी की मांद).

कैंप वीराना नहीं

भारतीय एजेंसियों के पास बालाकोट से कैंप के रास्ते की तस्वीरें हैं जिनमें एक बिलबोर्ड पर कैंप की जानकारी और दूसरे पर रंगरूटों की भर्ती का संदेश लिखा हुआ है. तस्वीरों से पता चलता है कि मुख्य  परिसर की ओर जाने वाली सीढिय़ों पर अमेरिका, ब्रिटेन और इज्राएल के झंडे उकेरे गए हैं, ताकि जो वहां से गुजरे, ये झंडे उसके पैरों के नीचे कुचले जाएं. मुख्य परिसर अंग्रेजी के अक्षर यू के आकार के एक बड़े हॉल जैसा है.

इसके ग्राउंड फ्लोर पर आठ कमरे हैं और दूसरी मंजिलों पर डॉरमिट्री बनी है. भारतीय एजेंसियों को हमले के वक्त यह जानकारी थी कि उन कमरों में कौन ठहरा हुआ है. कमरा नं. 1 चीफ ट्रेनर युसूफ अजहर का था. दूसरे कमरों में जैश के सीनियर ट्रेनर मुफ्ती उमर और मौलाना जावेद (कमरा नं. 2), मौलाना असलम और मौलाना अब्दुल गफूर कश्मीरी (कमरा नं. 3), मौलाना अजमल और मौलाना जुबैर (कमरा नं. 4) थे. कमरा नं. 5 से लेकर 8 में दूसरे छह ट्रेनर थे. इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर कथित तौर पर 97 फिदायीन थे जिनकी ट्रेनिंग चल रही थी.  

कुछ दूरी पर मस्जिद का परिसर था. भारतीय खुफिया एजेंसियों के पास तस्वीर में मस्जिद की दीवारों पर कश्मीर में मारे गए कथित सर्जिकल 'शहीदों' या उग्रवादियों की तस्वीरें टंगी थीं. इसकी बगल में एक दो मंजिला इमारत थी जिसकी हर मंजिल पर तीन कमरे थे और इसे गेस्ट हाउस की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था. वहां लाहौर से आए तीन कट्टर आतंकवादी ट्रेनर मौलाना कुदरतुल्ला, मौलाना जुनैद और मौलाना कासिम रुके हुए थे. ये तीनों पाकिस्तान के दहशतगर्दी विरोधी कानून के तहत भगोड़े घोषित किए जा चुके हैं और वर्षों से अपने घर नहीं लौटे हैं. कुदरतुल्ला को बड़ा उस्ताद माना जाता था जबकि कासिम नए रंगरूटों को मार्शल आर्ट में माहिर बनाता था.

कैंप के उत्तरी छोर पर एक और विशाल परिसर है. इसमें एक हॉस्टल, डायनिंग रूम और बड़ा-सा हॉल है जिसमें विभिन्न तरह के डेढ़ सौ रंगरूट रुके हुए थे. एजेंसियों के पास रंगरूटों और उनकी कैटगरी के बारे में भी जानकारी थी कि वे जैश के संगठन में क्या हैसियत रखते हैं. कुल मिलाकर वहां करीब 200 रंगरूट अलग-अलग तरह के ट्रेनिंग कोर्स कर रहे थे. उन्हें तीन हिस्सों में बांटा गया थाः दौरा-ए-आम (जिसमें 93 को बुनियादी ट्रेनिंग दी जा रही थी), दौरा-ए-खास (जिसमें 81 को मिलिट्री ट्रेनिंग दी जा रही थी) और दौरा-ए-जरार (जिसमें 25 रंगरूटों को अत्याधुनिक हथियारों की ट्रेनिंग दी जा रही थी).

बालाकोट शहर में बिलबोर्ड विज्ञापन पर नए कोर्स के लिए रंगरूटों को आमंत्रित किया गया था, जिन्हें 25 फरवरी से ट्रेनिंग दी जानी थी. उस तारीख के बाद कैंप में अनुमानित 300 लोग होने चाहिए थे. हवाई स्ट्राइक की योजना के लिए बनी कोर टीम की अगुआई डोभाल कर रहे थे और उन्होंने बालाकोट के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी दी. 19 फरवरी को मोदी ने वायु सेना को स्ट्राइक करने की हरी झंडी दे दी.  

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