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फिर दांव पर लगी अयोध्या

बेवक्त चौरासी कोसी परिक्रमा का राग छेड़कर विश्व हिंदू परिषद नरेंद्र मोदी के लिए 2014 का चुनावी मंच तैयार करना चाहती है. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति बीजेपी और समाजवादी पार्टी के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकती है. परिक्रमा के लिए विहिप के अड़ियल रवैए ने तनाव पैदा करने की कोशिश की वहीं सपा सरकार ने सख्त तेवर अपनाते हुए परिक्रमा को मंजूरी देने से इंकार कर दिया.

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aajtak.in
पीयूष बबेले और मोहम्मद वक़ासनई दिल्ली,उत्तर प्रदेश, 27 August 2013
फिर दांव पर लगी अयोध्या

उनके पास एक मुर्दा है जिसे वे श्मशान लिए जा रहे हैं. और कहते हैं कि मरीज को अस्पताल ले जा रहे हैं. राम मंदिर मुद्दे को अब किसी भी हाल में जिंदा नहीं किया जा सकता.’’ फलाहारी बाबा के नाम से मशहूर महंत कौशल किशोर शरण अयोध्या में राजगोपाल मंदिर से थोड़ी दूर स्थित राम जन्मभूमि परिसर की ओर इशारा करते हुए दो टूक कहते हैं. माथे पर त्रिपुंड, धवल दाढ़ी, धोती और जनेऊ धारण किए सांवली काया वाले इस बाबा का हिंदू समाज में ठीक-ठाक रसूख है. 150 साल पुराने उनके मंदिर के नीचे सड़क पर सावन मेले की धूम वाली अयोध्या में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ डोल रही है, इस मंदिर से उस मंदिर. आस-पास के दर्जनभर जिलों से झुंडों में लोग अयोध्या आ पहुंचे हैं. सिर पर पोटली, एक हाथ में झोला, दूसरे में किसी बच्चे का हाथ. बदन पर मामूली कपड़े. मन में राम नाम होगा, लेकिन जबान पर ‘‘जय श्री राम’’ नहीं है.

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव को उलाहना देने वाले साधुओं के अगुआ रहे फलाहारी बाबा अरसे बाद फिर से आवेश में हैं, ‘‘समझ नहीं आता कि 84 कोसी परिक्रमा का मुद्दा इस वक्त उठाने की क्या तुक है? वैसे भी, यह यात्रा साधु-संन्यासी करते हैं, आम लोगों का इसमें क्या काम? और यह यात्रा तो चौत्र पूर्णिमा से बैशाख पूर्णिमा तक होती है, सावन-भादों में इस पर इतना हल्ला! क्यों?’’ उन्हें पूरा अंदेशा है कि इस सारी हलचल के पीछे असल मकसद अगले साल मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले अयोध्या को एक बार फिर से राजनीति के केंद्र में लाना है.

अयोध्या को सांप्रदायिक राजनीति का केंद्र बनाने का विरोध उनके जैसे सोच के संत ही कर रहे हों, ऐसा नहीं है. अब आम आदमी भी इस ‘‘झंझट’’ से खुद को दूर ही रखना चाहता है. आप जैसे-जैसे अयोध्या के अंदर पैठते जाते हैं, यह एहसास बढ़ता जाता है कि मंदिर-मस्जिद विवाद ने अयोध्या का चौन छीन लिया है. फैजाबाद से कांग्रेस सांसद निर्मल खत्री जैसे इसकी तस्दीक करते हैं, ‘‘बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से ही अयोध्या मायूस शहर बनकर रह गया है. यहां के लोग कभी सांप्रदायिक नहीं रहे. जो भी आंदोलन खड़े किए गए, वे बाहरी लोगों के बल पर चलाए गए.’’ फलाहारी बाबा की तरह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष खत्री को भी लगता है कि अब अयोध्या में मंदिर के नाम पर कोई आंदोलन खड़ा नहीं हो सकता. लेकिन एक बार फिर से हलचल तो बढ़ ही गई है. राम के नाम पर न सही, 84 कोसी परिक्रमा यात्रा के नाम पर सही.

बढ़ रहा है धर्म नगरी में तनाव
फैजाबाद से 10 किमी आगे आ जाने पर एक प्रवेश द्वार पर रामचरित मानस की चौपाई लिखी हैः प्रविसि नगर कीजै सब काजा, हृदय राखि कौसलपुर राजा. बस, अब अयोध्या शुरू. घुसते ही जो चीजें आपका ध्यान खींचती हैं, वे हैं साधारण माली हालत वाले श्रद्धालुओं की भीड़, सड़क के दोनों ओर पूजा सामग्री की दुकानें, मकाननुमा मंदिरों की कतार, जगह-जगह लगे पुलिस के बैरीकेड्स और चप्पे-चप्पे पर बंदूकधारी. प्रवेश द्वार के बाद तमाम सड़कें हजारों मंदिरों की ओर रास्ता बनाती हैं तो बैरीकेड्स वाली मुख्य सड़क विवादित स्थल की ओर चली जाती है. उस स्थल को अब लोग जन्मभूमि ही कहते हैं. यहां के थाने का नाम भी राम जन्मभूमि थाना रख दिया गया है. बाबरी मस्जिद स्थान को जैसे जान-बूझकर जेहन से निकाला जा रहा है. करीब 77 एकड़ का पूरा परिसर पीले पेंट से पुती सलाखों और कंटीले तारों की बाड़ से घिरा है. श्रद्धालुओं के लिए यह जन्मभूमि और सुरक्षाकर्मियों के लिए ‘‘यलो जोन’’ है. उत्तर प्रदेश पुलिस, पीएसी और सीआरपीएफ के 2,500 जवानों की तीन स्तर की सुरक्षा के बीच यही वह जगह है, जहां रामलला विराजमान हैं और जहां 6 दिसंबर, 1992 तक बाबरी मस्जिद अस्तित्व में थी.

सावनी मेले की सुरक्षा में आए पुलिसवाले आश्वस्त थे कि रक्षा बंधन पर मेला पूरा होते ही यहां से उनकी ड्यूटी पूरी हो जाएगी. तभी 84 कोसी परिक्रमा के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया. मेले के लिए आई पीएसी की अतिरिक्त कंपनियों को अनिश्चितकाल के लिए यहीं रोक लिया गया. सारे पुलिसवालों की छुट्टियां रद्द कर दी गईं. वीएचपी यह यात्रा 25 अगस्त से कराने पर अड़ी है. लेकिन उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए किसी भी कीमत पर यात्रा को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है. बाहर से आए साधु-संतों से जिला प्रशासन ने अब अपने-अपने धाम लौट जाने की अपील की है. लेकिन चतुराई के साथ यह भी जोड़ दिया है कि धार्मिक कार्यक्रमों पर कोई प्रतिबंध नहीं है. सरकार सकते में है, तभी तो उसने प्रशासन से यहां अस्थायी जेलों का इंतजाम करने को कहा है.

सक्रियता भगवा खेमे में भी कम नहीं है. वीएचपी ने भी आसपास के जिलों के कार्यकर्ताओं को चौकस कर दिया है. संगठन के महामंत्री चंपत राय अयोध्या में डेरा डाले हुए हैं. वीएचपी के वृद्ध शेर अशोक सिंघल भी यहां होते लेकिन परिवार में शोक होने के कारण फिलहाल नहीं आ सके. संगठन ने खम ठोका है कि किसी में हिम्मत हो तो यात्रा रोककर दिखाए. फिर वही भाषा और तेवर, जैसा कि 1980 के दशक के अंत में हुआ करता थाः बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का. 30 अक्तूबर, 1990 को अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलने की घटना के समय अयोध्या से जनता दल विधायक रहे और अब सपा सरकार में राज्यमंत्री जयशंकर पांडे ‘‘फैज’’ अहमद फैज की शायरी की किताब को मेज पर रखते हुए राय देते हैः ‘‘तब (लालकृष्ण) आडवाणी की घुड़चढ़ी की तैयारी थी. अब! मोदी को दिल्ली पहुंचाने की यलगार है.’’ 1992 में 11 साल के बच्चे रहे और अब अयोध्या से सपा विधायक तेज नारायण उर्फ पवन पांडे पूरे घटनाक्रम पर झल्लाए हुए हैं, ‘‘सूबे में कई बार बीजेपी की सरकार बनी, तब इन्हें 84 कोसी परिक्रमा की सुध नहीं आई.

आज जब सपा अयोध्या को विकास की राह पर ले जा रही है तो इनके सीने पर सांप लोट रहा है.’’  उन्होंने पांच बार से लगातार अयोध्या सीट से जीतते रहे बीजेपी के लल्लू सिंह को पिछले विधानसभा चुनाव में करारी मात दी. ऐसे में उनके गुस्से की वजह भी है. ‘‘जब ये अयोध्या तक हार बैठे तो किस मुंह से सांप्रदायिक मुद्दों को उठाना चाहते हैं? सारी खुराफात अयोध्या को फिर से हासिल करने के लिए हो रही है.’’ अयोध्या में सपा की जीत का बड़ा प्रतीकात्मक महत्व है.
अब अयोध्या में रैनबसेरा नजर आता है
बीजेपी की जमीन तैयार करने में जुटी वीएचपी
इसीलिए वीएचपी बड़ी सधी हुई बाजी खेल रही है. जरा पीछे जाएं तो उत्तर प्रदेश के बीजेपी प्रभारी बनाए गए नरेंद्र मोदी के खासमखास अमित शाह ने दो माह पहले अयोध्या का दौरा किया. शाह ने धीरे से सुरसुरी छोड़ दी कि राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए. इसके बाद वे वापस अपने चुनावी काम में लग गए. और बाकी का काम वीएचपी के जिम्मे छोड़ दिया. उधर, अमित शाह से आगे निकले उनके राजनीतिक गुरु नरेंद्र मोदी. एक तरफ अशोक सिंघल को लग रहा है कि नरेंद्र मोदी के अंदर भगवान राम की शक्ति प्रवेश कर गई है ताकि राम मंदिर का निर्माण हो सके, दूसरी तरफ मोदी इस मुद्दे पर ऐसे मौन हैं जैसे महादेव ने समाधि लगा ली हो. मोदी खुद विकास की बातों पर जोर दे रहे हैं और अपनी सांप्रदायिक पालकी ढोने का काम उन्होंने परिवार के वीएचपी जैसे सदस्यों पर छोड़ दिया है. मामूली संभावनों को भी बड़ी बारीकी से भुनाने वाले मोदी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश का सांप्रदायिक मुद्दा दुधारी तलवार है. जो बीजेपी मस्जिद गिरने से पहले उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत सरकार चलाती थी, मस्जिद गिरने के बाद उसकी किस्मत में विपक्ष में बैठने या जोड़-तोड़ की सरकार चलाने के अलावा कुछ नहीं मिला. ऐसे में अगर 84 कोस परिक्रमा का आंदोलन फुस्स हो भी जाए तो बीजेपी के तारणहार मोदी को कम से कम खुद तो बदनामी नहीं झेलनी पड़ेगी.

इसीलिए वीएचपी कार्यकर्ता 25 अगस्त से 13 सितंबर तक यात्रा जारी रखने पर आमादा हैं. उन्होंने परिक्रमा में हर रोज शामिल होने के लिए संतों की कम से कम 250 टीम बना दी हैं और गिरफ्तारी से बचने के लिए अंडरग्राउंड हो गए हैं. वीएचपी के एक नेता ने बताया, ‘‘अगर एक टीम गिरफ्तार हो जाएगी तो दूसरी टीम परिक्रमा जारी रखेगी. सरकार हमें रोक नहीं पाएगी.’’ उन्होंने पैंफलेट बांटे हैं जिसके मुताबिक, कानपुर और जयपुर के संत 25 अगस्त को सुबह अयोध्या में सरयू नदी से अपनी परिक्रमा शुरू करेंगे और शाम तक बस्ती जिले में पहुंच जाएंगे. फिर यह यात्रा फैजाबाद समेत संत कबीर नगर, बस्ती, बहराइच और श्रावस्ती जिलों में जारी रहेगी. इन सारे जिलों में अच्छी-खासी मुस्लिम आबादी है. ऐसे में प्रशासन को तनाव बढऩे की आशंका साफ दिखाई दे रही है. लोगों का जोश ठंडा बना रहे, इसलिए अयोध्या शहर में सुरक्षा बलों का फ्लैग मार्च भी शुरू कर दिया गया है.

पसोपेश में हैं अयोध्यावासी
रामधुन में मस्त रहने वाले अयोध्यावासी ऐसी हालत में क्या करें? जिस समय मस्जिद गिरी थी, लगभग उसी समय देश में उदारीकरण की बयार चल पड़ी. बाकी देश में तरक्की हुई, लेकिन अयोध्या को मिला स्थायी तनाव. न सड़कें सुधरीं, न रोजगार के कोई नए मौके. तभी तो यह शहर भारत में गरीबी की चलती-फिरती तस्वीर बन गया है. अयोध्या की आस्था के प्रमुख केंद्र कनक भवन मंदिर के बाहर जब वीएचपी के प्रमुख चेहरे महंत बृजमोहन दास से पूछा कि शहर की हालत इतनी खराब क्यों है? मंदिरों के चबूतरों पर लोग खाना क्यों बना रहे हैं? सड़कों के किनारे ही पाखाना करते हजारों श्रद्धालु? लोग खुले में क्यों सो रहे हैं? धर्मशालाएं कहां गईं? इस शहर के लिए आप लोग कुछ क्यों नहीं करते? यही रामराज्य है? वीएचपी के आंदोलन के हिस्से दास के मुंह से निकला जवाब सुनिएः किसी सरकार ने अयोध्या के विकास में रुचि नहीं दिखाई. इसके विकास को मुद्दा बनाया जाना जरूरी है.’’

वीएचपी नेता भले ही सरकारों के सिर ठीकरा फोड़ कर निकल जाएं, लेकिन राम जन्मभूमि वाले इलाके के नगरपालिका पार्षद हाजी असद अहमद सहमे हुए हैं. वे महसूस करते हैं कि भारी सुरक्षा इंतजाम की वजह से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है. ‘‘किसी मेहमान के आने पर पुलिस को खबर करनी पड़ती है. घर में शादी-ब्याह हो तो काजी से पहले प्रशासन से मंजूरी लीजिए. सैकड़ों हिंदू-मुसलमानों की आजादी छिनी हुई है. अब अगर कोई नया बखेड़ा खड़ा हुआ तो मुसीबत के दोजख में बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.’’ असद के बारे में एक अन्य स्थानीय निवासी गजराज तिवारी कहते हैं, ‘‘मुझे अच्छी तरह याद है, जब बवाल हुआ था तो इस शख्स ने कैसे जान पर खेल कर लोगों की जान बचाई थी.’’

कुछ ऐसी ही उधेड़बुन से जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मालिकाना हक मामले के एक पक्षकार हाजी महबूब अहमद भी गुजर रहे हैं. कभी अयोध्या के बड़े जमींदारों में रहे महबूब भूल नहीं पाते कि जिस घर में आज वे बैठे हैं, उसे दंगों में बुरी तरह जला दिया गया था. जिंदगी का बड़ा हिस्सा मुकदमा लडऩे में गुजार चुके हाजी कहते हैं, ‘‘वह तबाही बाहर वालों ने की थी. अयोध्या वालों ने तो मुझे कभी ताना तक नहीं मारा.’’ उन्हें यकीन है कि अब बाहर वाले अयोध्या को उकसा नहीं सकते, लेकिन उनके चेहरे पर बार-बार उभरता भय मिश्रित गुस्सा इस यकीन से मेल नहीं खाता.

राजनीति की भेंट चढ़े मंदिर-मस्जिद
अयोध्या की राष्ट्रीय तस्वीर से मेल तो यहां के मंदिरों और मस्जिदों की हालत भी नहीं खाती. मंदिरों की खस्ता हालत को फलाहारी बाबा कुछ ऐसे समझते हैं, ‘‘महंत और पुजारी इन मंदिरों को निजी मिल्कियत समझते हैं. वे पहले अपनी सोच लें, तब तो उन्हें भगवान की चिंता करने की फुरसत मिलेगी.’’ शहर के बहुत-से मंदिर अगर महंतों की निजी संपत्ति हैं तो बहुत-से मंदिर इसलिए बेनूर होते जा रहे हैं कि उनका खर्चा उठाने वाले राजे-रजवाड़े और जमींदार वक्त की आंधी में कब के उड़ चुके हैं. सरकार उन तक पहुंच ही नहीं सकी. ऐसी बहुत-सी जमीन अदालती विवादों में उलझी है, जो कभी पूजा-पाठ का खर्च उठाने के लिए मंदिरों को दी गई थी. ‘‘कम से कम 11 महंतों पर अपने गुरुओं की हत्या करने के आरोप लग चुके हैं.’’

अयोध्या के इतिहास से लेकर राजनीति तक सारे पहलुओं पर कलम चला चुके बुजुर्ग पत्रकार शीतला सिंह एक लाइन में ही पते की बात कह जाते हैं. उनकी बात से साफ है कि अयोध्या का धार्मिक प्रबंधन गड़बड़ा गया है और मंदिर-मस्जिद के विवाद में फंसे महंत, प्रशासन और नेताओं के पास इसका हल खोजने का न तो हौसला है और न नीयत. कभी यहां भी दक्षिण भारत के मंदिरों की तरह एक देवस्थानम ट्रस्ट बनाने की बात चली थी, लेकिन वह न तो सिरे चढऩी थी, न चढ़ी. अयोध्या आने वाले किसी भी तीर्थयात्री को यह समझते देर नहीं लगती कि यह नगर काशी, हरिद्वार या प्रयाग जैसे दूसरे हिंदू तीर्थ स्थलों से कहीं पीछे छूट गया है.

बाबरी मस्जिद गिरने के बाद से किसी मस्जिद में भी एक नई ईंट लगाना मुहाल हो गया है. इस समय जिस मस्जिद को लेकर विवाद गरमा रहा है वह है विवादित स्थल से कुछ दूर कुबेर टीले के पास बनी दोराही मस्जिद. स्थानीय निवासियों के मुताबिक, यह मस्जिद 1992 के उपद्रव के समय क्षतिग्रस्त हुई थी. तब से मुस्लिम समाज इसे बनाने की मांग कर रहा है लेकिन प्रशासन कोई न कोई वजह गिनाकर निर्माण नहीं करने दे रहा.

उधर हिंदू संगठन दावा कर रहे हैं कि मुस्लिम समाज जान-बूझकर खंडहर को मस्जिद साबित करने पर लगा है. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता शाह आलम कहते हैं, ‘‘ऐसे विवादों को दबाने के लिए प्रशासन अकसर यह दलील देता है कि अयोध्या में मस्जिदों में काम कराने पर रोक है.’’ हालांकि जब उन्होंने आरटीआइ के माध्यम से राज्य सरकार से जानकारी मांगी तो ऐसी किसी रोक से इनकार किया गया. लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि धार्मिक नगरी में धर्मस्थल दुर्दशा को प्राप्त हो रहे हैं. अयोध्या में गृहस्थ परंपरा के सबसे बड़े महंत और कांग्रेस के कार्यकारी जिलाध्यक्ष गिरीशपति त्रिपाठी एक वाक्य में धर्मनगरी की विडंबना को पेश कर देते हैं, ‘‘जितना पैसा अयोध्या के विवादित स्थल की सुरक्षा में खर्च हो रहा है, उसका आधा भी धर्मस्थलों के रखरखाव पर खर्च होता तो फिजा कुछ और होती.’’
अयोध्या के मणि पर्वत इलाके में नर्तक और पीछे पीएसी की बसें
और अंत में कीर्तन
लेकिन इन विडंबनाओं से दूर है मणि पर्वत. अयोध्या के इस पवित्र स्थल पर सावन की हरियाली तीज को भगवान का झूला पड़ता है. पर्वत की तलहटी में पसरे मैदान में मेला लग जाता है. पहले मेला पूरे मैदान में लगता था. अब अयोध्या धर्म भूमि के साथ तनाव भूमि भी है, लिहाजा आधा हिस्सा पीएसी कैंप के काम आता है. बच्चे हिंडोला झूल रहे हैं तो महिलाएं शृंगार का सामान खरीद रही हैं. एक जगह बहुत-से गांव वाले घेरा बनाए बैठे हैं और बीच में भक्तिभाव में डूबा नृत्य चल रहा है. एक नर्तक पुरुष वेश मं  है तो दूसरे ने स्त्री का रूप रखा है. इकतारे की धुन और ढोलक-मजीरा की थाप पर श्सियावर राम चंद्र की जय्य का उद्घोष हो रहा है. नर्तक बहुत कुशल नहीं हैं और न ही दर्शक बहुत रसिक, फिर भी वहां मौजूद हर आदमी भक्तिरस में गोते लगा रहा है. लेकिन जरा नजर उठाकर देखें तो यह पूरा मजमा जहां चल रहा है, उसके चारों ओर पीएसी के ट्रक खड़े हैं. अयोध्या जब भी खुश होती है, उसके साथ-साथ संगीनों का मनहूस साया जरूर चलता रहता है. 84 कोसी परिक्रमा की जिद अयोध्या को एक बार फिर से विवाद के दहाने पर ले जाने को है.

फलाहारी बाबा को जो मुद्दा मुर्दा दिखाई देता है, हिंदू संगठन उस मुर्दे के मुंह में संजीवनी डालने की कोशिश कर रहे हैं. वसीम बरेलवी ने शायद ऐसे ही मौके के लिए लिखा था, मंदिर चुप है, मस्जिद चुप है, नफरत बोल रही है; और सियासत, जहर कहां तक पहुंचा, तौल रही है. ऐसे हालात में अयोध्या सिर्फ यह प्रार्थना ही कर सकती है कि उसे एक बार फिर सियासी मोहरा न बनाया जाए. मर्यादा पुरुषोत्तम के नगर में अगर रामचरित मानस में वर्णित राम राज्य स्थापति न भी हो सके तो कम से कम विश्व हिंदू परिषद का ‘‘राम’’ राज तो न आए. सावन,  कार्तिक और रामनवमी के तीन मेलों में आने वाले श्रद्धालुओं के बल पर साल भर की आजीविका जुटाने वाली अयोध्या से ज्यादा कोई नहीं जानता कि ‘‘नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं.’’ लेकिन नेताओं को अयोध्या में सियासत दिखाई देती है, पीड़ा नहीं.

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