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अधर में राज्यविहीन रियाया

जुलाई की 30 तारीख को प्रकाशित असम का राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर 20 लाख से अधिक लोगों को वोट, संपत्तित और सरकारी लाभ जैसे बुनियादी अधिकारों से महरूम कर देगा. राज्य में विस्फोटक हालात.
अधर में राज्यविहीन रियाया व्रिकम शर्मा
कौशिक डेकाअसम, 30 July 2018

बांग्लादेश के सीमांत पर बसे असम के धुर पश्चिमी जिले ढुबरी के दक्षिण टोकरेर चोरा गांव का एक संकरा, कीचड़ भरा रास्ता रेलवे ओवरब्रिज की तरफ जाता है, जिसके दूसरे छोर पर यहां का बाजार है. पुल पर खड़े होकर भारत-बांग्लादेश सरहद की बाड़ देखी जा सकती है, जो वहां से महज एक किलोमीटर दूर है. नजदीक ही धान के खेत के सामने अपनी बांस की झोंपड़ी के पीछे डूबता हुआ सूरज निहारते मोहम्मद हाजेर अली नीचे जमीन पर बैठे हैं.

69 बरस के किसान अली बाजार ले चलने के लिए परेशान कर रहे अपने नाती-पोतों को किसी तरह अनदेखा कर रहे हैं. उनके दिमाग में तो सरहद की बाड़ हावी है. क्या 30 जुलाई के बाद उन्हें जबरन उस पार धकेल दिया जाएगा? सरहद के उस पार वे किसी को जानते नहीं हैं. वे वहां करेंगे क्या?

अली कहते हैं कि उनकी पैदाइश 1950 में हिंदुस्तान में हुई और अपने दावे के समर्थन में उनके पास दस्तावेजी सबूत भी है. तो भी, मतदाता सूची के मुताबिक, वे संदिग्ध बांग्लादेशी या डाउटफुल वोटर (डी-वोटर) हैं.

करीब 10 किलोमीटर दूर सोनाखुली जिले में 35 बरस की कबिता रॉय अपने शौहर से बेहद नाराज रहने लगी हैं. उनके शौहर 43 वर्षीय रमेश चंद्र रॉय असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर हैं. दो बच्चों की मां कबिता को बीते 15 साल से वोट डालने से रोक दिया गया है, क्योंकि वे संदिग्ध विदेशी हैं.

गुस्सा और हताशा उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है—उनके शौहर पुलिस में हैं और वे कोच राजबोगशी समुदाय की हैं जो इस इलाके के देशज लोग हैं. फिर भी उन्हें विदेशी घोषित करके जेल में डाल देने या बांग्लादेश भेज दिए जाने के डर के साये में जीना पड़ रहा है.

सुदूर पूरब में तकरीबन 400 किलोमीटर दूर मध्य असम के मोरीगांव जिले के मुस्लिम बहुल मोइराबाड़ी गांव में 50 बरस के दिहाड़ी मजदूर दुर्गा प्रसाद कानू को 7 जून को पुलिस का एक नोटिस मिला, जिसमें उनसे अपने पूरे परिवार की नागरिकता के रिकॉर्ड पेश करने को कहा गया था.

कानू का दावा है कि उनके पिता दीनानाथ कानू 1950 के दशक में उत्तर प्रदेश से आकर असम में बस गए थे. उनके पास वैध वोटर कार्ड और उत्तर प्रदेश के जमीन के रिकॉर्ड हैं, पर कानूनी पचड़े और विदेशी घोषित कर देने की आशंका ने कानू की नींद उड़ा दी है.

अली, रॉय और कानू उन 20 लाख से ज्यादा लोगों में हैं जिन्हें 30 जुलाई को असम में नागरिकता से वंचित करके राज्यविहीन घोषित कर दिए जाने की आशंका है. इसी दिन राज्य में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) प्रकाशित किया जाएगा. इस दस्तावेज में असम की भौगोलिक सीमा में रह रहे हिंदुस्तानी नागरिकों के नाम दर्ज हैं.

इस रजिस्टर के प्रकाशन के नतीजों के असर और धमक देश के दूसरे हिस्सों में भी सुनाई दे सकती है. नागरिकता से वंचित लोगों में बड़ी तादाद मुसलमानों की होने की संभावना है, इसलिए इसके इर्दगिर्द सांप्रदायिक विमर्श तैयार होने लगा है.

झूठी बातें—मसलन यह कि सत्तर लाख मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी—फैलाने से लेकर हिंसा की धमकियों तक अवैध आप्रवासियों के खिलाफ असम की लड़ाई को देश भर में धार्मिक टकराव में बदलने की कोशिशें होने लगी हैं. यह विस्फोटक स्थिति है, जो राज्य को 1979 और 1985 के बीच हुए असम आंदोलन के दिनों में वापस ले जा सकती है.

अवैध आप्रवासियों के खिलाफ उस आंदोलन में 855 लोग मारे गए थे. इसका भयावह नतीजा 1983 में नेल्ली नरसंहार था जिसमें मध्य असम के मोरीगांव जिले में आदिवासियों ने 2,000 से ज्यादा मुस्लिम आप्रवासियों को मौत के घाट उतार दिया था.

मियत उलेमा-ए-हिंद के मुखिया मौलाना सैयद अरशद मदनी पहले ही कह चुके हैं कि अगर 50 लाख मुसलमानों को नए बनाए गए एनआरसी से बाहर छोड़ दिया जाता है तो असम जल उठेगा. असम पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआइ) सरीखे अतिवादी धड़े निचले असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पैठ बनाने के लिए जुटे हैं.

इस पूरे विमर्श के भारत के अपने रोहिंग्या संकट में बदलने की पूरी संभावना है, जब लाखों लोगों के पास कहीं जाने की कोई जगह नहीं होगी. फिर ताज्जुब क्या कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तीन सरहदी जिलों के प्रशासन को हिदायत दे दी है कि वे एनआरसी के बाहर छोड़ दिए लोगों को राज्य में दाखिल होने से रोकने के उपाय करें.

इस बात को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि उन लोगों का क्या होगा, जिनके नाम एनआरसी से गायब होंगे. इससे गफलत और भी बढ़ गई है. आशंकाओं को शांत करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ ‌सिंेह ने कहा है कि एनआरसी से ‘गायब’ लोगों को हिरासत में नहीं रखा जाएगा. उन्हें इस साल के आखिर में जारी होने वाले अंतिम एनआरसी से पहले अपनी नागरिकता साबित करने का मौका मिलेगा.

एनआरसी तैयार कर रहे स्टेट कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला कहते हैं, ‘‘हर वह शक्चस जिसके पास दस्तावेज हैं, 1 अगस्त से 28 सितंबर के बीच, खुद को शामिल करने के लिए अर्जी दे सकता है.’’ 30 जुलाई को जारी होने वाला एनआरसी दूसरा और आखिरी मसौदा होगा. पहला मसौदा 31 दिसंबर, 2017 को प्रकाशित किया गया था और उसमें असम के 3.2 करोड़ लोगों में से 1.9 करोड़ लोगों के नाम शामिल थे.

सूत्रों के मुताबिक, केंद्र उन लोगों को लंबे वक्त का ‘बायोमीट्रिक वर्क परमिट’ देने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है जो विदेशी घोषित किए जा सकते हैं. इन लोगों को कोई राजनैतिक या जमीन के अधिकार नहीं होंगे. यह स्पष्ट नहीं है कि उन लोगों का क्या होगा जिन्होंने पहले ही असम में संपत्ति खरीद ली है.

यह बात इस पूरे मामले को और भी ज्यादा विस्फोटक बना सकती है कि बाहर छोड़ दिए गए लोगों में खासी बड़ी तादाद उन लोगों की होगी जो खेत-जमीन के मालिक हैं.

सुप्रीम कोर्ट के वकील उपमन्यु हजारिका के मुताबिक, एनआरसी से बाहर हो गए लोग अपने आप विदेशी नहीं बन जाएंगे. वे कहते हैं, ‘‘उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई शुरू करने से पहले उन्हें एक पंचाट से विदेशी घोषित करवाना होगा. अगर, फर्ज कीजिए, 20 लाख लोग बाहर हो गए हैं, तो 100 पंचाटों के सामने 20 लाख मामले होंगे.

हाइकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील के साथ निबटारा होने में बरसों लगेंगे.’’ कुछ मामलों में गुवाहाटी हाइकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे पंचाटों से विदेशी घोषित व्यक्तिकयों की मिल्कियत वाली जमीन अधिग्रहीत कर लें.

असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के लिए यह उनके सियासी करियर की सबसे बड़ी चुनौती है. सोनोवाल का सियासी सफर ऑल असम स्टुडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के साथ शुरू हुआ था, जिसने अवैध आप्रवासियों की बाढ़ के खिलाफ लड़ाई की अगुआई की थी.

असम के हीरो के तौर पर उनकी जय-जयकार की जाती है जिन्होंने अकेले अपने दम पर 2005 में अवैध आप्रवासी (पंचाट द्वारा निर्धारण) या आइएमडीटी कानून को सुप्रीम कोर्ट से रद्द करवाया था. इस कानून को अवैध आप्रवासियों का पता लगाने के काम में सबसे बड़ी रुकावट माना जाता था.

सोनोवाल को पता है कि एनआरसी के बाद असम में उबाल आ सकता है और उन्होंने केंद्र से पहले ही ज्यादा बल भेजने का आग्रह किया है. कोई जोखिम न उठाते हुए राज्य पुलिस बल ने पूरे सूबे में और इंटरनेट में भी चौकसी बढ़ा दी है.

एनआरसी राज्य में इस ढंग की दूसरी कवायद है और इसकी जरूरत बांग्लादेश से आप्रवासियों के बेरोकटोक आने के चौतरफा आरोपों की वजह से पैदा हुई. पहला एनआरसी 1951 में प्रकाशित हुआ था जिसमें उस साल की जनगणना में गिने गए तमाम व्यक्ति यों के ब्यौरे दर्ज किए गए थे.

इस किस्म की कानूनी कवायद की दुनिया में कहीं भी मुश्किल से ही कोई मिसाल मिले, जब एक दिन में इतनी बड़ी आबादी से उसकी नागरिकता छीन ली गई हो. बेशक असम में अवैध प्रवासियों के मुद्दे की पेचीदगियों ने इस अनोखे ‘समाधान’ की पटकथा लिखी थी—राज्य में अवैध विदेशियों की तादाद 40 लाख से 1 करोड़ तक आंकी जाती है. महज एक आंकड़े ने घुसपैठियों के खिलाफ छह साल लंबे चले असम आंदोलन को जन्म दिया था.

वह आंकड़ा यह था कि एक दशक से भी कम वक्त में असम में मतदाताओं की गिनती 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़कर 1979 में 85,37,493 पर पहुंच गई जो 1970 में 57,01,805 थी. अचानक आई यह उछाल 1971 की लड़ाई का भी नतीजा थी जिसने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से लोगों की जबरदस्त बाढ़ को जन्म दिया था और ये लोग हिंदुस्तान के तमाम हिस्सों, मुख्य रूप से असम, में आकर बस गए थे.

2005 में आइएमडीटी कानून को रद्द करते हुए प्रधान न्यायाधीश आर.सी. लाहोटी, न्यायमूर्ति जी.पी. माथुर और न्यायमूर्ति पी.के. बालसुब्रह्मण्यम की तीन जजों की पीठ ने कहा था, ‘‘बांग्लादेश से इतनी बड़ी तादाद में अवैध प्रवासियों की मौजूदगी, जो लाखों में है, दरअसल असम राज्य के ऊपर एक आक्रमण है और इसने विद्रोह की शक्ल में गंभीर आंतरिक उपद्रवों को जन्म देने में भी अच्छा-खासा योगदान दिया है.’’

एनआरसी को अपडेट करने की मौजूदा प्रक्रिया 2009 की एक जनहित याचिका का नतीजा है. उसे गुवाहाटी के एनजीओ असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्ल्यू) ने दाखिल किया था. उसमें दावा किया गया था कि 41 लाख अवैध बांग्लादेशियों ने असम की मतदाता सूची में घुसपैठ कर ली है.

एपीडब्ल्यू के मुखिया अभिजीत सरमा कहते हैं, ‘‘काजीरंगा नेशनल पार्क, वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थल सरीखे राष्ट्रीय स्थलों पर भी अवैध प्रवासियों ने अतिक्रमण कर लिया है.’’ 1951 के एनआरसी को अपडेट करने का फैसला 1985 के असम समझौते में किया गया था, पर काम 2015 में शुरू हुआ जब शीर्ष अदालत ने इसकी निगरानी शुरू की.

हां मूल निवासियों ने इस प्रक्रिया का जश्न मनाया, वहीं बांग्लाभाषी बाशिंदों के एक बड़े हिस्से को नागरिकता से वंचित घोषित कर दिए जाने का डर सताने लगा. असम समझौते के मुताबिक प्रवासियों के लिए कट-ऑफ साल 1971 तय किया गया था. संभावना है कि एनआरसी के बाद सरकार का ध्यान मूल निवासियों की जमीन के अधिकारों की हिफाजत पर होगा. 3.3 लाख करोड़ रुपये के जीडीपी के साथ असम देश के राज्यों में 17वें पायदान पर है और यहां की अर्थव्यवस्था का मुक्चय आधार कृषि है.

असम के निचले हिस्सों में बांग्लादेशी मूल के प्रवासी खेती और मजदूरी के दूसरे कामों में लगे हैं. प्राथमिक तौर पर इन भूमिहीन लोगों में खुद अपनी जमीन का मालिक होने की भूख का नतीजा अक्सर जातीय टकरावों की शक्ल में सामने आया है—मसलन, कोकराझार में 2012 की हिंसा.

असम के मूल निवासियों के भू-अधिकारों की हिफाजत के लिए पूर्व चुनाव आयुक्त एच.एस. ब्रह्मा की अध्यक्षता में बनी छह सदस्यीय समिति ने 2017 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा था कि असम के 33 में से 15 जिलों में अवैध बांग्लादेशियों का प्रभुत्व था.

वकील उपमन्यु हजारिका, जिन्हें 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असम में अवैध प्रवासियों से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए नियुक्त किया था, कहते हैं, ‘‘अवैध घुसपैठ जमीन और काम की जरूरत की वजह से होती है. इस मुद्दे से निपटने का अकेला तरीका यह है कि बांग्लादेशियों को संसाधनों में किसी भी हिस्से से वंचित कर दिया जाए.’’

मूल निवासियों की आशंकाओं को ब्रह्मा रिपोर्ट में आधिकारिक वैधता हासिल हुई, जब उसमें कहा गया कि अवैध बांग्लादेशी इस जमीन पर ‘खतरनाक हथियारों से लैस लुटेरे हमलावरों की फौज की तरह (उतरे), उन्होंने भ्रष्ट सरकारी अफसरों की मिलीभगत के साथ-साथ सांप्रदायिक सियासी नेताओं के उकसावे से रातोरात ज्यादातर पानी से घिरी जमीन पर अवैध गांव बसा लिए.’

इस बीच, जहां 25 मार्च 1971 को कट-ऑफ तारीख की तरह लेते हुए एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया पूरी होने के नजदीक है, वहीं सुप्रीम कोर्ट में एक और कानूनी जंग इंतजार कर रही है. इससे इस पूरी प्रक्रिया के बेमतलब हो जाने का खतरा पैदा सकता है.

दरअसल, कई जातीय और मूल निवासी संगठनों की सामूहिक संस्था असम सक्विमलिता महासंघ (एएसएम) के कार्यकारी अध्यक्ष मोतिउर रहमान ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट में 1971 को कट-ऑफ साल बनाने के खिलाफ एक याचिका दाखिल की थी.

एएसएम का कहना है कि 25 मार्च, 1971 को कट-ऑफ तारीख बनाने से 1951 और मार्च 1971 के बीच असम में दाखिल हुए लाखों विदेशियों को नागरिकता मिलना पक्का हो जाएगा और इससे देशज लोगों के वजूद के लिए खतरा पैदा होगा. सुप्रीम कोर्ट अगस्त के पहले हक्रते में एक संविधान पीठ का गठन और याचिका पर सुनवाई शुरू करेगी. रहमान की दलील मंजूर हो जाती है, तो एनआरसी की पूरी प्रक्रिया पटरी से उतर जाएगी.

एनआरसी का हिंदू और मुस्लिम प्रवासियों पर समान प्रभाव होगा. यह बराक नदी घाटी में इस प्रक्रिया के विरोध में देखा जा सकता है, जहां बांग्लादेशी मूल के बंगालियों का प्रभुत्व है. एनआरसी में ऐसे परिवार के सदस्यों के नामों पर रोक लगाने के फैसले ने बराक और असमिया बहुल ब्रह्मपुत्र घाटी में आशंकाएं पैदा कर दी हैं, जिन्हें विदेशी अधिकरण (एफटी) ने विदेशी घोषित कर रखा है. विदेशी अधिकरण उन मामलों में फैसला देता है, जो उसे स्थानीय विदेशी क्षेत्रीय पंजीयन कार्यालय भेजता है.

क्षेत्रीय कार्यालय खुद असम बॉर्डर पुलिस ऑर्गेनाइजेशन की सिफारिशों के आधार पर काम करता है. विदेशी अधिकरण की स्थापना 1964 में की गई थी और सीमा पुलिस की स्थापना 1962 में और ये असम आंदोलन शुरू होने से पहले से काम कर रहे हैं. विदेशी अधिकरण विदेशी अधिनियम, 1946 से संचालित हैं और असम में इनकी संख्या 2015 के 36 से बढ़कर अब 100 हो गई है. ये 1985 के बाद से अब तक 92,000 से ज्यादा लोगों को विदेशी घोषित कर चुके हैं. 

इसमें कई शर्मिंदगी भरी खामियां भी हैं. पिछले साल अक्तूबर में विदेशी अधिकरण ने भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जूनियर कमिशंड अधिकारी मोहम्मद अजमल हक को नोटिस भेजकर उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने कहा था. अधिकरण ने मार्च, 2017 में असम विधानसभा के पहले उप सभापति मौलवी अमीरुद्दीन के 11 वंशजों को नोटिस भेजा था.

एक और विवाद का मुद्दा है एनआरसी से डी-वोटरों का निष्कासन. यह 1997 से असम की मतदाता सूची में शामिल एक वर्ग है, जैसा कि हजेला कहते हैं कि उनके तथा उनके वंशजों के नाम एनआरसी के मसौदे में शामिल नहीं होंगे. उनके मुताबिक डी-वोटरों का नाम एनआरसी में शामिल करने का फैसला विदेशी अधिकरण करेगा.

डी-वोटर के ठप्पे ने कई लोगों की जान ले ली है. इसकी वजह से मई में उदलगुड़ी जिले में निचलाबाड़ी के 62 वर्षीय किसान गोपाल दास और जून में धुबरी जिले के हकाकुरा के 40 वर्षीय मजदूर अबोला रॉय ने आत्महत्या कर ली. दरअसल, वे डी-वोटर का अपना ठप्पा हटाने की कानूनी लड़ाई का खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं थे.

आलोचक डी-वोटर घोषित करने की प्रक्रिया में गड़बडिय़ों का आरोप लगाते हैं. 1997 में शाह अलोम भूयां को डी-वोटर घोषित कर दिया गया था, जो बाद में मुख्यमंत्री सोनेवाल के आवास में सुरक्षा अधिकारी नियुक्त हुए. इसी तरह तेजपुर में सेवानिवृत्त नायक सुबेदार दिलीप दत्ता को डी-वोटर बता दिया गया.

सीमा पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘‘अगर कोई व्यक्तिव कुछ चुनावों में वोट नहीं डाल पाता है, बहुत संभव है कि उसे डी-वोटर घोषित कर दिया जाए. वहीं पुलिसकर्मियों और सैनिकों को वोट डालने का मौका मुश्किल से मिल पाता है.’’

वहीं, गुवाहाटी हाइकोर्ट के एक 32 वर्षीय वकील कहते हैं, ‘‘बदरुद्दीन अजमल (ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के उभार और उनकी मुस्लिम राजनीति और भाजपा के हिंदुत्व के अतिराष्ट्रवाद के घालमेल ने माहौल को जहरीला बना दिया है. इससे स्थानीय लोगों के अस्तित्व को कथित खतरा और बढ़ गया है.’’ 2011 की जनगणना के हाल में जारी भाषा संबंधी आंकड़ों ने असमिया लोगों और बंगालियों के बीच दरारों को और उभार दिया है. इसके मुताबिक, असमी बोलने वालों की संख्या घटी है.

राज्य में अवैध घुसपैठियों के खिलाफ अभियान का रंग तब तक सांप्रदायिक नहीं था, जब तक नरेंद्र मोदी सरकार ने 2016 में नागरिक अधिनियम, 1955 में संशोधन बिल संसद में पेश नहीं कर दिया. इसमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता देने का प्रावधान है.

इसका असल मकसद बांग्लादेश से आए बंगाली हिंदुओं को संरक्षण देना है. जाहिर है, भाजपा असमिया लोगों में हिंदू बंगालियों के बढ़ते सांस्कृतिक प्रभुत्व के भय को दूर नहीं कर सकी है. संकट को महसूस करते हुए केंद्र सरकार ने इस बिल को 2019 के आम चुनावों तक ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

परिदृश्य से धर्म के बाहर हो जाने के बाद असम को अब अपनी जमीन, संसाधन और जनसांख्यिकी  को बचाने के लिए चार दशक से जारी संघर्ष के निर्णायक मुकाम तक पहुंचने का इंतजार है. अली, रॉय और कानु को कानूनी लड़ाई लडऩी होगी, जिसमें उनकी जातीयता शायद ही कुछ मदद कर पाए.

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