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खास बातचीत-आंकड़े हमारे पक्ष में हैं

मेरा मानना है कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहिए क्योंकि जब स्थिति नाजुक हो तो आपको अपने स्थान पर मजबूती से खड़े रहना चाहिए, स्थिति बेहतर हो तो भले आप जगह छोड़ सकते हैं.''

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aajtak.in
राज चेंगप्पा/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 24 June 2019
खास बातचीत-आंकड़े हमारे पक्ष में हैं कमलनाथ

ताजा लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली. इस करारी हार ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को बैकफुट पर ला दिया. अब उन पर पार्टी के घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने और राज्य प्रशासन को सुधारने का ठोस जिम्मा है. हालांकि, कमलनाथ केंद्र में विभिन्न महकमे संभाल चुके हैं पर राज्य सरकार चलाने का यह उनका पहला अनुभव है. बलुआ पत्थर से ढकी दीवारों वाले वल्लभ भवन के पांचवें तल पर मंत्रालय के नए कार्यालय से कमलनाथ भोपाल का लगभग 360 डिग्री का नजारा देख सकते हैं. ऐसे ही वे पूरे राज्य को देखना चाहेंगे.

ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लशिंग) राज चेंगप्पा को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कमलनाथ ने लोकसभा चुनाव के नतीजों, कांग्रेस में नेतृत्व संकट, मध्य प्रदेश को लेकर उनके एजेंडे और आसन्न चुनौतियों के बारे में बात की. कुछ अंश:

लोकसभा चुनाव नतीजों से बड़ा झटका लगा होगा, कांग्रेस को मध्य प्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली. क्या यह राज्य सरकार के खिलाफ आया जनादेश माना जाए?

नहीं, चुनाव परिणाम पूरी तरह से केंद्र की सरकार के लिए थे. भोले से भोले मतदाता को भी पता था कि यह चुनाव केंद्र की सरकार के लिए था. ठीक विधानसभा चुनावों की तरह जिसमें नरेंद्र मोदी ने जोर-शोर से प्रचार किया था, लेकिन नतीजा वैसा नहीं रहा, क्योंकि जनता जानती थी कि इससे मोदी का कोई लेना-देना नहीं है. इसी तरह, वे जानते थे कि लोकसभा चुनाव मोदी से जुड़ा है और राज्य सरकार से इसका कोई ताल्लुक नहीं है.

मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी की बुरी हार के कारण इस्तीफा देकर एक नया जनादेश लेने के बारे में आपने नहीं सोचा क्या?

बिल्कुल नहीं क्योंकि मेरी सरकार ने 25 दिसंबर को शपथ ली थी और मुझे अपना काम दिखाने के लिए सिर्फ 75 दिन मिले थे. आचार संहिता लागू होने के पहले के उन 75 दिनों में हमने जो काम किए, उस गति से किसी भी राज्य में कोई काम नहीं हुआ. लिहाजा इस्तीफे का तो सवाल ही नहीं पैदा होता. हां, अगर मैं तीन या चार साल से इस पद पर होता और तब ऐसा नतीजा मिलता तो शायद मुझे ऐसा सोचने की जरूरत होती.

कांग्रेस की लगातार हार. करीब 50 सीटों पर सिमटना, यह पार्टी के विनाश के लक्षण हैं? क्या कांग्रेस बतौर राष्ट्रीय पार्टी अप्रासंगिक हो चुकी है?

जब मैं सांसद था तो उस समय संसद में भाजपा की सिर्फ दो सीटें थीं. ऐसा होता रहता है, मैं समझता हूं कि कोई भी परिणाम उतार-चढ़ाव के खेल का हिस्सा होता है. जनादेश जितना बड़ा होता है, फिसलने की गति उतनी ही तेज होती है, क्योंकि उम्मीदें बहुत ज्यादा होती हैं. जनता सोचने लगती है कि उसके साथ धोखा हुआ है. इस चुनाव में हम उन मुद्दों का भी जवाब देने में विफल रहे जिनका मोदी के प्रदर्शन या उनके वादों से कोई सरोकार नहीं था.

क्या थे वे मुद्दे?

मोदी राष्ट्रवाद का मुद्दा लेकर आए जिससे मुझे हैरानी हुई क्योंकि भाजपा में ऐसा एक भी नाम नहीं—न तो आज या अतीत में—जिसने आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका निभाई हो. फिर भी वे राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करते रहे. वे लोगों को उन बातों पर फुसलाने में सफल रहे जो मुद्दा नहीं थीं.

सुना है, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि अशोक गहलोत, पी. चिदंबरम और आपने कोई काम नहीं किया और अपने बेटों के चुनाव अभियानों पर ज्यादा ध्यान देते रहे. क्या आपने अपना 100 फीसदी दिया?

मैं एक दिन के लिए छिंदवाड़ा में था. लोग मुझे 40 साल से वोट देते रहे हैं और देश में सबसे लंबे समय तक सांसद बने रहने के नाते मुझे वहां समय बिताने की जरूरत नहीं.

लिहाजा, बेटे को चुनाव जिताने पर ध्यान देने का सवाल ही नहीं उठता. मैं राज्य में हर दिन चुनाव अभियान पर निकलता रहा और जब राहुल यहां थे, तब भी मैं उनके सभी कार्यक्रमों में उनके साथ था.

यह भी सुनने में आया कि राहुल गांधी मानते हैं कि आप जैसे नेताओं ने अपनी जनसभाओं में 'चौकीदार चोर है' नारे को सही तरीके से नहीं उठाया और कांग्रेस के अभियान को गति नहीं दी. क्या कोई खास वजह थी?

हमारे सभी अभियानों में 'चौकीदार चोर है', का नारा लगता रहा. लेकिन हकीकत यह है कि अभियान सिर्फ एक नारे पर निर्भर नहीं होता. मोदी को अपने पांच साल के कार्यकाल में अधूरे कामों या किसानों से किए अधूरे वादों पर अपनी विफलता को छिपाना था. वे रोजगार और आर्थिक विकास जैसे वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने में कामायाब रहे. उन्होंने कुछ अन्य मुद्दों को उठाया जिन्हें लोगों ने हाथोहाथ लिया.

राहुल गांधी ने संकेत दिया है कि वे कांग्रेस अध्यक्ष पद छोडऩा चाहते हैं.

मुझे लगता है कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहिए, क्योंकि जब स्थिति बिगड़ती है, तब आपको अपनी जगह पर मजबूती से रहना चाहिए और जब स्थिति बेहतर हो, तब बेशक आप जगह छोडऩे का फैसला कर सकते हैं. अभी हमारी स्थिति नाजुक है, लिहाजा, उन्हें पद छोडऩे की बात नहीं करनी चाहिए. वे कहते हैं कि यह मेरी जिम्मेदारी है; वास्तव में यह हर सदस्य की जिम्मेदारी है. चुनावी माहौल उन मुद्दों पर बनाया गया था, जिनका हम मुकाबला नहीं कर पा रहे थे. उनके (भाजपा) अभियान का मजमून हमारे मुद्दों से बिल्कुल अलग था और जनता का समर्थन उन्हें ही मिला.

अगर राहुल गांधी वाकई पद छोड़ते हैं तो क्या उनकी जगह प्रियंका गांधी लेंगी या गांधी परिवार से बाहर का कोई नेता पद पर होगा?

अब तक मैंने राहुल गांधी के बगैर कांग्रेस की कल्पना नहीं की है. देखते हैं. मैंने अभी इस बारे में नहीं सोचा है.

कांग्रेस को फिर से अपना मुकाम हासिल करने के लिए क्या करना चाहिए?

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भाजपा की चुनावी मशीनरी कांग्रेस से ज्यादा मजबूत है. उनके पास आरएसएस, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, सरस्वती शिशु मंदिर और 15-20 संगठन हैं. हमारे पास ऐसे संगठन नहीं है. हमें अपनी चुनावी मशीनरी तैयार करने के तरीके खोजने होंगे. हमारी विचारधारा या नीति गलत नहीं है, लेकिन चुनावी मशीनरी के बिना आप अपने खिलाफ प्रचारित गलत बातों का मुकाबला कैसे करेंगे?

आपने दावा किया है कि मध्य प्रदेश में आपकी सरकार को अस्थिर करने के प्रयास किए जा रहे हैं. आप सबको एकजुट रखने के लिए क्या कर रहे हैं? भाजपा की ओर से खतरा कितना बड़ा है?

भाजपा अपना मनोबल ऊंचा रखने के लिए यह गाती रहती है. लेकिन विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव के समय पहली परीक्षा सामने आई तो हम ही जीते. फिर उन्होंने कहा कि डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को जाता है. मैंने कहा, ऐसा नहीं होगा. हमने परिपाटी के विपरीत जाकर चुनाव कराया और नतीजे में डिप्टी स्पीकर के पद पर भी हमारी ही जीत हुई. इससे जाहिर होता है कि सरकार को अस्थिर करने का भाजपा का मंसूबा पूरा नहीं हो सका.

आयकर विभाग ने आपके सहयोगियों के घरों की तलाशी ली और हवाला लेनदेन के आरोप लगाए.

अन्य लोगों के अलावा मेरे स्टाफ के कुछ सदस्यों के घरों पर दो छापे डाले गए थे. छापे में जिस व्यक्ति के पास पैसे मिले उसने कैमरे पर कहा है कि वह भाजपा का आदमी है. उसने साफगोई से कहा है. पैसे और दस्तावेज मिले. मेरे साथ जुड़े लोगों के घरों पर पड़े छापे में कुछ भी नहीं मिला. लेकिन वे (भाजपा वाले) ऐसा नहीं कह रहे. वे कह रहे हैं कि इन लोगों के घरों में छापा पड़ा और ये बरामद हुआ. पर वे यह नहीं बता रहे कि बरामदगी कहां हुई. मुझे नहीं पता कि उन पर दबाव है या नहीं. लेकिन लेनदेन के मसले पर मैं भाजपा से पूछना चाहता हूं कि अगर उन्होंने नई दिल्ली में एक हजार करोड़ रुपए का कार्यालय बनाया है, तो पैसा कहां से आया? उन्होंने बेशुमार पैसे की बदौलत लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा. कहां से आया पैसा—उनकी पत्नियों के गहने या उनकी संपत्ति बेचने से? पहले वे इसका जवाब दें.

विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान आपने कहा था कि मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है और आप पिछली सरकार की अनियमितताओं को उजागर करेंगे. आपने क्या कार्रवाई की है?

जैसा मैंने कहा कि मेरे पास सिर्फ 75 दिन थे, उस दौरान मेरा ध्यान राज्य को दलदल से बाहर निकालने पर केंद्रित रहा. अब ई-टेंडरिंग घोटाले में एफआइआर दर्ज हुई है. छह लोग गिरफ्तार हुए हैं. सबूत मिलने पर और गिरफ्तारियां होंगी. मुझे लगता है कि ई-टेंडरिंग घोटाले में करीब 20,000 करोड़ रु. खाए गए. मेरे पास आई हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, सात नहीं बल्कि करीब 400 फर्जी टेंडर जमा हुए थे.

शायद कांग्रेस के पास प्रतिद्वंद्वियों के गलत कार्यों पर वार करने में भाजपा वाली आक्रामकता नहीं?

मैं किसी को निशाना नहीं बना रहा. भाजपा की राजनीति और कांग्रेस के बीच यही तो अंतर है. उचित जांच जरूरी है जो चल रही है. हर विभाग में भ्रष्टाचार की सड़ांध भरी है. कहां से शुरू करें? भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार भरा है.

मध्य प्रदेश के लोगों के लिए रोजगार पैदा करने के वास्ते आप क्या उपाय कर रहे हैं?

दो चुनौतियां हैं—एक, युवाओं को रोजगार देना या सुनिश्चित करना कि वे अपना रोजगार करें; दूसरा, खेती. प्रदेश में 70 फीसदी लोग इस पर निर्भर हैं. गांव के किराना दुकान के मालिक, जो किसान भले न हो पर उनकी बिक्री किसानों की क्रय क्षमता पर निर्भर है. बीस साल पहले चुनौती कम पैदावार थी, अब अधिक पैदावार है. समस्या बहुतायत की है. किसानों को निवेश पर उचित मुनाफा कैसे मिले? किसान आत्महत्या के पीछे यही वजहें हैं. नई सोच की जरूरत है. पहले हमने उपज क्रांति की दिशा में कदम बढ़ाए थे, अब आप क्रांति का समय आया है.

आपकी सरकार ने कृषि ऋण की माफी पर ध्यान केंद्रित किया. लेकिन उससे आपको उम्मीदों के अनुरूप लोकसभा सीटें नहीं मिलीं?

उससे वह होना भी नहीं था. उसका मकसद चुनावों में ज्यादा सीटें लेना नहीं था. वह लोगों की परेशानी दूर करने की दिशा में पहला कदम था. आखिर एक किसान कर्ज में पैदा होता है और कर्ज का बोझ लिए ही मर जाता है.

कर्ज माफी पर प्रधानमंत्री मोदी का कहना था कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने वादा तो किया लेकिन उसे पूरा नहीं किया.

मोदी जी ने तो कुछ काम नहीं किया. मैंने तो कुछ किया है: करीब बीस लाख किसानों के कर्ज माफ किए गए हैं, बाकियों के लिए भी प्रक्रिया जल्द शुरू हो जाएगी. अगर किसी किसान के खाते में एक लाख रुपए आते हैं तो उसकी खरीद क्षमता भी बढ़ती है, जिससे आर्थिक गतिविधि में इजाफा होता है. आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा बाजार अर्थव्यवस्था के दायरे के बाहर होता है और वह जीडीपी के आंकड़ों में नजर नहीं आता.

आपको इस सबके लिए पैसा कहां से मिलेगा?

हमने राष्ट्रीयकृत बैंकों को उद्योगों द्वारा लिए गए ऋण को तो माफ करने के लिए कह दिया. उद्योगों के लिए हम 40 फीसदी का खामियाजा भुगतने के लिए तैयार हो गए, लेकिन किसानों के लिए हमने क्या किया? राज्य सरकार उनका कर्ज अपने सिर ले सकती है और अगर हम उसे चुकाने से मना कर देते हैं तो वह बैंकों के लिए गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में तब्दील हो जाएगा और उनकी बैंलेंस शीट को खराब करेगा. उद्योगों के लिए जो वे करते हैं उसका दस फीसदी ज्यादा तो कृषि के लिए उन्हें करना ही चाहिए. शेड्यूल्ड बैंकों ने यह किया.

क्या आप ऐसी कुछ नई योजनाओं के बारे में भी सोच रहे हैं जिनसे कर का बोझ बढ़ाए बिना ज्यादा संसाधन जुटाए जा सकें?

ऐसा योजनाएं तो कई सारी हैं लेकिन समस्या उनको लागू करने की है. मैं उन योजनाओं को खत्म कर दूंगा जो वांछित परिणाम नहीं दे पा रही हैं.

पिछले मुख्यमंत्री ने एक योजना बनाई थी जिसमें लोगों को 'पैदा होने से लेकर मरने' तक लाभ देने का प्रस्ताव था. क्या आप उसकी समीक्षा करेंगे?

हम उसको परिष्कृत कर रहे हैं. हमें यह सोचना है कि हम योजनाओं की डिलीवरी कैसे सुधारें ताकि उनके फायदे लाभार्थियों तक पहुंचने को पक्का किया जा सके? इसके लिए नौकरशाही के रवैये में भी बदलाव की जरूरत होगी. बजट में बची-खुची राशि को जल्दबाजी में खर्च कर देने की अवधारणा को खत्म किए जाने की जरूरत है.

नौकरशाही की बात करें तो यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई सारे तबादले हुए और उन तबादलों के लिए पैसों का खासा लेनदेन हुआ.

मैं खरी बात कहता हूं. तबादले हुए और जारी रहेंगे. भाजपा 15 साल तक सत्ता में थी और उसने हर स्तर पर सरकार और शासन का भगवाकरण करने की कोशिश की. उस समय कई लोग ऐसे थे जिन्हें दरकिनार कर दिया गया क्योंकि वे भाजपा के इशारे पर चलने के लिए राजी नहीं हुए. उन्हें अब वाजिब मौका मिलना ही चाहिए. भाजपा को यही पसंद नहीं आ रहा. उसके पसंदीदा अफसर जो उसकी तान पर नाचते रहते हैं, अब जान गए हैं कि अब न तो कोई तान होगी और न ही कोई नाच होगा.

 बिजली कटौती इन दिनों मध्य प्रदेश में बड़ा मुद्दा है. आपके बारे में ऐसा कहा जा रहा है कि आप ऊर्जा क्षेत्र की समस्याओं को काबू में करने में नाकाम हैं.

मीडिया में इस बात पर चर्चा नहीं हो रही कि कैसे इन सारी चीजों के पीछे भी भाजपा ही है. एक व्यक्ति को तार काटते हुए पकड़ा गया था.

आपका कहना है कि इरादतन बदमाशी की जा रही है?

हां, तोड़-फोड़ की हरकतें हो रही हैं. फिर पिछले कुछेक वर्षों में बिजली वितरण के लिए खरीदे गए उपकरण भी ऌगुणवत्ता के नहीं हैं. चुनावों के चक्कर में भाजपा ने रखरखाव का काम भी बंद कर दिया था. हम इस साल इस सबको दुरुस्त करने जा रहे हैं.

मध्य प्रदेश को उद्योग की जरूरत है. निवेश आकृष्ट करने के लिए राज्य को क्या करने की जरूरत होगी?

निवेश विश्वास से आता है, उसकी मांग नहीं की जा सकती, उसे आकृष्ट करना होता है. मैंने राज्य में मौजूदा उद्यमियों के साथ दो बार बातचीत की है और उनकी समस्याओं के बारे में जाना है. परियोजना स्थापित करने में होने वाली देरी से नुक्सान होता है. चीजों में तेजी लाने के लिए रवैये में बदलाव लाना होगा. हमारी सरकार के फोकस में दोनों चीजें हैं—मौजूदा उद्योग का विस्तार करना और नया निवेश आकृष्ट करना. निवेशकों की बड़ी संख्या को मैं जानता हूं. वे अतीत में भी मुझसे संपर्क में रहे हैं. उन्हें पता है कि मध्य प्रदेश में चीजें अब आगे बढ़ेंगी. निवेश को रोजगार से जोड़ा जाना चाहिए. सवाल उठता है कि किसी निवेश से क्या आर्थिक गतिविधि पैदा हो रही है? निवेश नीति सबके लिए एक सरीखी नहीं हो सकती. मैं कह चुका हूं कि सरकार निवेशकों से संवाद करेगी: आपके पास देने को क्या है और हम आपको क्या उपलब्ध करा सकते हैं. हम ऐसे काम करेंगे.

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