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यूपीए सरकार ने भी सर्जिकल स्ट्राइक किए लेकिन कभी ढिंढोरा नहीं पीटा...

फाल्कन विमान में दिल्ली से आगरा तक के सफर में, जहां उन्हें एक रैली संबोधित करनी थी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और सीनियर एसोसिएट एडिटर कौशिक डेका के साथ लोगों के मूड और अर्थव्यवस्था पर अपनी योजना के साथ देश और जनता से जुड़े अनेक मुद्दों पर खुलकर बातचीत की. कुछ अंशः

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aajtak.in
राज चेंगप्पा/ कौशिक डेका नई दिल्ली, 07 May 2019
यूपीए सरकार ने भी सर्जिकल स्ट्राइक किए लेकिन कभी ढिंढोरा नहीं पीटा... राहुल गांधी

प्र. क्या 2019 का चुनाव ‘न्याय’ और राष्ट्रवाद के बीच युद्ध जैसा है?

नहीं! 2019 का चुनाव तीन या चार अलग-अलग मोर्चों पर लड़ा जा रहा है. पहला, हम घोर बेरोजगारी संकट से जूझ रहे हैं; देशभर में युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है. दूसरा कृषि है; नरेंद्र मोदी की नीतियों ने कृषि को तबाह कर दिया है. तीसरा यह है कि अर्थव्यवस्था में वैसी रफ्तार नहीं दिख रही, जैसी होनी चाहिए थी; लेन-देन नहीं हो रहा है जो स्थिर आर्थिक विकास हमने यूपीए के वर्षों में देखा था, वह ठप्प हो गया है. दो अंतिम मोर्चे जो हैं उनमें से एक तो स्पष्ट है कि मोदी ने राफेल सौदे में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया है और दूसरा देश के संस्थानों- सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, योजना आयोग वगैरह पर हमले के प्रयास कर उन्हें प्रभावित करने की कोशिश है, ताकि वे मोदी की राजनीति चमकाने में मदद करें.

लेकिन भाजपा और मोदी ने चुनाव को सुरक्षा, राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति पर चर्चा की ओर मोड़ दिया है.

मोदी राष्ट्रीय सुरक्षा का इस्तेमाल देश के बड़े मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए करते हैं. युवा बेरोजगार हैं और उन्हें अपना कोई भविष्य नहीं दिखता. यह बहुत बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है. प्रधनमंत्री अपने भाषणों में बेरोजगारी पर अपने रिकॉर्ड के बारे में क्यों नहीं बोलते? क्या बड़े पैमाने पर किसानों की खुदकशी एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है? किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं. तो प्रधानमंत्री ने यह क्यों नहीं कहते कि मैंने आपको वचन दिया था कि मैं 2 करोड़ नौकरियां दूंगा, लेकिन मैं असफल रहा. मैंने वचन दिया था कि मैं हर बैंक खाते में 15 लाख रुपए डालूंगा, मैं असफल रहा. मैंने वचन दिया था कि कृषि को पूरी प्राथमिकता दी जाएगी, मैं उसमें भी असफल रहा. ये असली राष्ट्रीय मुद्दे हैं. वे इन पर क्यों नहीं बोलते हैं?

क्या भाजपा जिस सुरक्षा के मुद्दे को उठा रही है वह देश के सामने वाकई असली खतरा है?

राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि 1990 के दशक में देश में जो कार्यक्रम प्रभावी थे, वे अब असरदार नहीं रहे और मोदी ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. हमने इसे स्वीकार किया है. हमारी नीतियों ने लगभग 2012 तक काम किया. यूपीए के अंतिम दो वर्षों में हम लड़खड़ाने लगे. मोदी वही कर रहे हैं, जो हमने 2012 और 2014 के बीच करने की कोशिश की थी. उन्होंने इसमें एक सनक भरा विचार नोटबंदी जोड़ दिया! किसी भी व्यापारी से पूछें कि ‘गब्बर सिंह टैक्स’ और नोटबंदी ने उसके साथ क्या किया. बड़े व्यापारी, छोटे व्यापारी, किसी से भी पूछे लें.

किसान से पूछिए, चाहे जिससे मर्जी पूछ लीजिए. मोदी को यह विचार कहां से आया कि 500 रु. और 1,000 रु. के नोट को बंद कर देना, देश के लिए फायदेमंद होगा? तो, अर्थव्यवस्था के सामने गहरे संकट मंडरा रहे हैं. लेकिन पाकिस्तान की आतंकवाद को शह ऐसा मसला है कि हमें उससे 100 फीसदी मजबूती से लड़ने की जरूरत है. लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि प्रधानमंत्री जवाब दें कि हमारे 45 सीआरपीएफ जवान कैसे मरे? क्या प्रधानमंत्री भारतीय सैनिकों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? वे क्यों नहीं कहते कि मैं अपने सीआरपीएफ जवानों की रक्षा करने में नाकाम रहा?  

उनका कहना है कि अपने कार्यकाल में उन्होंने दो सर्जिकल स्ट्राइक किए हैं?

बहुत खूब. मनमोहन सिंहजी ने तीन सर्जिकल स्ट्राइक किए लेकिन हमने दुनिया के सामने ढिंढोरा नहीं पीटा. इसका कारण यह है कि हम सशस्त्र बलों का राजनीतिकरण नहीं करना चाहते थे, हमारे सैनिकों की बहादुरी का लाभ नहीं उठाना चाहते थे. यह उनका काम है, उन्हें सलाम करते हैं और उनका आदर करते हैं. हम उनका राजनीतिकरण करके उनका अपमान नहीं करते हैं.

उन तीन सर्जिकल स्ट्राइक का परिणाम क्या रहा?

मैं इस पर बात नहीं करना चाहता कि उसका क्या नतीजा हुआ था. लेकिन जिन लक्ष्यों को निशाना बनाने का लक्ष्य रखा गया था, वह निशाना सटीक लगा था.

भाजपा कहती है कि मुंबई में आतंकी हमले पर यूपीए सरकार जवाबी कार्रवाई की हिम्मत ही नहीं जुटा पाई.

सचाई यह है कि हमने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया था. हमने जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया. हमने वही किया, जो करना था, बस हमने उसकी राजनीति नहीं की.

वर्तमान सरकार ने कश्मीर को लेकर सख्त रवैया अपना रखा है. क्या यह कारगर है?

जम्मू-कश्मीर की मुसीबतों का देश के अन्य क्षेत्रों में राजनैतिक फायदा उठाने के अलावा वर्तमान सरकार की जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई नीति नहीं है. आतंकवाद ने तब फिर से जोर पकड़ा जब मोदी ने पीडीपी के साथ अवसरवादी गठबंधन किया. मुझे याद है कि अरुण जेटली से मैंने इस बारे में बात की थी जब वे मुझसे मिलने आए थे. मैंने पूछा था, ‘‘जेटली जी, क्या आपको एहसास है कि आप जम्मू-कश्मीर में क्या कर रहे हैं? यह आग लगाने वाला है.” जेटली जी ने मुझसे कहा, “नहीं ऐसा नहीं है. कश्मीर में शांति है, वहां कुछ भी नहीं होने जा रहा है.” सचाई यह है कि पीडीपी के साथ गठबंधन करके मोदी ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के पांव पसारने के मौके दे दिए.

आप कश्मीर समस्या से किस प्रकार निपटेंगे?

जब यूपीए सरकार सत्ता में थी, तो जम्मू-कश्मीर के लिए काफी सोच-विचार के बाद एक नीति तैयार की गई थी. इसे आकार देने में मेरी भी भूमिका थी और हमने इस पर काम करने में वर्षों लगाए थे. हमने पंचायत चुनाव कराए; हम टाटा जैसे बड़े भारतीय उद्योगपतियों को जम्मू-कश्मीर लेकर गए, ताकि क्षेत्र के युवाओं को नई दृष्टि और नौकरी मिले. हमने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से हजारों महिलाओं को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा. इन कदमों ने हमें जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ने में मदद की. जब हम 2004 में सत्ता में आए, तब कश्मीर जल रहा था.

जब हम गए, कश्मीर का माहौल शांतिपूर्ण था. मुझे याद है कि श्रीनगर के लिए रोज 50 फ्लाइट उड़ा करती थीं, जो पर्यटकों को कश्मीर लेकर जाती थीं. इसलिए कृपया हमारे रिकॉर्ड और हमारी नीति को देखें, जो न केवल आतंकवाद को कुचलने के लिए बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ जुड़ने के लिए है ताकि उन्हें पता चल सके कि हमारी एक अलग दृष्टि है और यह बहुत बेहतर है. यह भारतीय दृष्टि है. यह लाखों लोगों को गरीबी से निकाल रहा है. इस दृष्टि को अपनाओ, इसमें तुम्हारा भविष्य है.

 भाजपा का मानना है कि अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म कर देने से कश्मीर की समस्या का समाधान हो जाएगा. आपकी क्या राय है?

मैं इन चीजों में नहीं जाना चाहता हूं. मैं सामान्य-सी बात कह रहा हूं कि हम राष्ट्रीय चुनाव लड़ रहे हैं, और जहां तक मैं देख सकता हूं, राष्ट्रीय चुनाव देश का भविष्य तय करते हैं. जो सबसे बड़े मुद्दे देश के सामने चुनौती बने हैं उसमें पिछले 45 वर्षों में बेरोजगारी की उच्चतम दर, अनौपचारिक क्षेत्र का पूरी तरह तहस-नहस हो जाना, छोटे और मझोले कारोबारों का सफाया, कृषि का विनाश, अर्थव्यवस्था का विनाश और हमारे सभी संस्थानों पर हमला है.

मोदी की विदेश नीति को लेकर आप क्या सोचते हैं?

मोदी की कोई विदेश नीति ही नहीं है! वे रोज सनक के आधार पर कार्य करते हुए दिखाई देते हैं. मसलन, वे अफगानिस्तान के दौरे पर जाते हैं और फिर अचानक वहां से पाकिस्तान जाने का फैसला कर लेते हैं. वे यह भी नहीं समझते कि अफगानिस्तान से पाकिस्तान के लिए उड़ान भरकर, वे अफगानिस्तान के लोगों को नकारात्मक संदेश दे रहे हैं और उनके कार्यों ने अफगान सरकार को परेशान कर दिया है. उन्हें विदेश नीति का बुनियादी ज्ञान भी नहीं है. वास्तव में उन्हें लगता है कि विदेश नीति का मतलब है दुनिया के ज्यादा से ज्यादा नेताओं के गले लग जाना!

आप भी नरेंद्र मोदी के गले लगे थे.

वे विदेशी नेता नहीं हैं.

 तो, नरेंद्र मोदी के गले लगने और दूसरे विदेशी नेताओं के गले लगने में क्या अंतर है?

मेरे गले लगने में प्यार भरा था.

आप यह कैसे कह सकते हैं कि जब वे गले लगते हैं तो उसमें प्यार नहीं होता?

मुझे ऐसा ही दिखता है इसलिए मैं कह सकता हूं. उनका गले मिलना अवसरवादी है. मैंने एक पीएम को देखा जिनसे चीजें नहीं संभल रही थीं. मैंने एक ऐसे पीएम को देखा, जो यह महसूस कर रहे थे कि देश को चलाना किसी राज्य को चलाने जैसा नहीं है और वे फंस गए थे. वे एक के बाद एक गलतियां करते जा रहे थे. और मुझ पर गुस्सा कर रहे थे, मुझ पर चिल्ला रहे थे. मुझे उन पर दया आई, उनके लिए प्यार महसूस हुआ. मैंने कहा, मैं आपको गले लगा रहा हूं. इसलिए मैंने उन्हें गले लगाया. गले लगाने में मेरा उनके लिए एक संदेश था, सुनिए, मैं आपका विरोधी हूं, लेकिन देशहित में, मैं आपकी मदद करने के लिए तैयार हूं. मैं आगे बढ़ा लेकिन उन्होंने मुझे दूर कर दिया.

उस गले मिलने के बाद उन्होंने आपकी आलोचना की. और आपने ‘चौकीदार चोर है’ कहना शुरू किया. आप कहते हैं कि आपके मन में उनके प्रति दयाभाव है. आप इन दोनों चीजों में सामंजस्य कैसे बता सकते हैं?

मैं उनके प्रति दयाभाव रखता हूं, लेकिन मैं सच बोलता हूं. मैं सचाई की अनदेखी नहीं कर सकता. सच तो यह है कि पीएम ने अनिल अंबानी को 30,000 करोड़ रुपए दिए हैं. यह बात आप भी जानते हैं, मुझे भी पता है, पूरा देश जानता है. और अनिल अंबानी ने कभी प्लेन नहीं बनाया! यह भी सच है. मुझे सच बताना है और सचाई यह है कि ‘चौकीदार चोर है’. इससे पीछे हटने का सवाल ही नहीं. इस बात को कहने का इससे बेहतर कोई तरीका नहीं है. अगर आपको लगता है ‘एक चोर, चौकीदार है’ कहना बेहतर रहेगा तो मैं ऐसा भी कह सकता हूं.

आप बार-बार कह रहे हैं कि अनिल अंबानी को 30,000 करोड़ रुपए मिले लेकिन इंडिया टुडे की रिपोर्ट कहती है कि उन्हें 800 करोड़ रुपए का ठेका मिला है.

राफेल सौदे के सही आंकड़ों को दर्शाने वाले काफी दस्तावेज मौजूद हैं. द हिंदू अखबार ने उन दस्तावेजों को छापा है जिसमें पूरा रक्षा विभाग कह रहा है कि पीएम समानांतर बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने हर एक नियम, हर एक प्रक्रिया को ताक पर रख दिया. रक्षा मंत्री ने कहा, “मुझे इस नए अनुबंध के बारे में जानकारी नहीं है.” पुराना अनुबंध अभी बंद भी नहीं हुआ है, लेकिन प्रधानमंत्री एक नया अनुबंध शुरू कर रहे हैं. इस पर जांच होगी और वे इससे बच नहीं सकते.

तो, क्या कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद आप राफेल सौदे की जांच शुरू कराएंगे?

बेशक! दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा अनुबंध किसी ऐसे व्यक्ति को दे दिया गया है, जिसने कभी विमान नहीं बनाया है. इसकी जांच तो होगी ही.

भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए क्या कदम उठाएंगे?

विकेंद्रीकरण भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का सबसे प्रभावी तरीका है. आज बहुत ज्यादा शक्ति बहुत कम लोगों के हाथों में केंद्रित है. हमें निर्णय प्रक्रिया को बदलना होगा और हमें व्यवहार में और अधिक पारदर्शी होना होगा. आरटीआइ को मजबूत करना इसके लिए महत्वपूर्ण है. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त और त्वरित कार्रवाई भी महत्वपूर्ण है.

क्या आप रसूखदार लोगों की जांच कराएंगे?

यह रसूखदारों के पीछे पड़ने का सवाल नहीं है. ऐसा नहीं है कि हम बदला भंजाने लगेंगे और किसी के भी पीछे हाथ धोकर पड़ जाएंगे. कानून हैं, उनका पालन किया जाना चाहिए.

लेकिन यह तभी हो सकेगा, अगर आप सत्ता में लौटें.

हम निश्चित तौर पर सत्ता में आ रहे हैं.

कांग्रेस अकेली या गठबंधन के साथ?

मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं, भविष्य नहीं बांच सकता. लेकिन मोदी चुनाव नहीं जीत रहे, भाजपा चुनाव नहीं जीत रही है. कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए सत्ता में आ रहा है.

भाजपा मतदाताओं से कह रही है उन्हें बहुमत दें. वह मजबूत बनाम मजबूर सरकार का तर्क दे रही है. उनका दावा है कि विपक्ष की गठबंधन की सरकार कमजोर होगी.

इसे समझने में आप मेरी मदद करें. क्या यह एक मजबूत सरकार है जो हमें 45 साल की सबसे ऊंची बेरोजगारी दर के दौर में लेकर आई है? क्या यह एक मजबूत सरकार है, जिसके कार्यकाल में किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं? क्या यह एक मजबूत सरकार है जिसे खुद पर भरोसा नहीं है और जो संस्थानों को कुचलने में लगी हुई है? मजबूत सरकार वह होती है जो कहती है कि हां हम आपको नौकरी देने जा रहे हैं. मजबूत सरकार वह है जो देश के लोगों के साथ जुड़ती है. मजबूत सरकार वह है, जो कहती है, ‘सुप्रीम कोर्ट, हम आपको मानते हैं, हम आप पर भरोसा करते हैं, आप जैसा उचित समझें करें. हममें इतनी हिम्मत है कि आपको स्वतंत्र बने रहने देंगे.’ तो, क्या भाजपा सरकार मजबूत है? नहीं, यह एक बेहद कमजोर सरकार है.

सहयोगियों की तलाश में भाजपा कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा तेज निकली.

मैं आप लोगों से बहुत प्यार करता हूं! आपके पास कांग्रेस के लिए अलग नियम हैं, भाजपा के लिए अलग. तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, हमने कई प्रमुख राज्यों में गठबंधन किया है. कुछ राज्यों में गठबंधन सिरे नहीं चढ़ पाया और यह भी ठीक ही हुआ.

सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में गठबंधन क्यों नहीं हुआ?

हम उत्तर प्रदेश में गठबंधन करना चाहते थे, लेकिन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को लगा कि उन्हें हमारी जरूरत नहीं है. मैंने उनकी इच्छा का सम्मान किया और कहा कि ठीक है, अकेले लड़ो लेकिन हम भी अपनी जगह हासिल करने जा रहे हैं. मैंने प्रियंका और ज्योतिरादित्य से साफ कहा है कि हमारा सबसे बड़ा एजेंडा है: यूपी में भाजपा को हराओ.

 पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से बात क्यों नहीं बनी?

ममता बनर्जी भाजपा सरकार का समर्थन करने वाली हैं या धर्मनिरपेक्ष सरकार का? क्या मायावतीजी और मुलायमजी भाजपा का समर्थन करेंगे या धर्मनिरपेक्ष सरकार का? जिस भी तरीके से आप देखें, देश में हर जगह भाजपा को धर्मनिरपेक्ष दलों से हार का सामना करना पड़ रहा है.

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