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चुनावी हलचल-लोग अपनी खुद की वास्तविकताओं पर लौट आएंगे

इंडिया टुडे के कौशिक डेका के साथ खास बातचीत में लोकसभा सांसद शशि थरूर ने बताया कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मौजूदा माहौल में उनकी पार्टी किस तरह भाजपा से लड़ने की तैयारी कर रही है.

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कौ‌शिक डेकानई दिल्ली, 20 March 2019
चुनावी हलचल-लोग अपनी खुद की वास्तविकताओं पर लौट आएंगे शशि थरूर

ऑल इंडिया प्रोफेशनल कांग्रेस के प्रमुख के तौर पर शशि थरूर आगामी लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का घोषणापत्र तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. इंडिया टुडे के कौशिक डेका के साथ खास बातचीत में इस लोकसभा सांसद ने बताया कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मौजूदा माहौल में उनकी पार्टी किस तरह भाजपा से लडऩे की तैयारी कर रही है

आप मानते हैं कि पुलवामा हमले के बाद हाल की घटनाओं ने भाजपा को चुनावी बढ़त दे दी है? क्या बहस के मुद्दे राफेल, बेरोजगारी और किसानों के संकट से पुलवामा और राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर शिफ्ट हो गए हैं?

बहस का मुद्दा मीडिया तय करता है, न कि राजनीतिक पार्टियां. हालांकि सरकार साफ तौर से सुरक्षा की बहस का सहारा ले रही है जहां वह अपनी 56 इंच की छाती थपथपा सकती है और 'बलवान' बहुसंख्यक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे सकती है. लेकिन यह चाल लंबे समय तक कामयाब नहीं हो सकती क्योंकि लोग कुछ समय बाद फिर अपनी वास्तविकताओं पर लौट आएंगे और याद करेंगे कि अच्छे दिन कभी नहीं आए.

क्या यह जरूरी है कि सरकार पाकिस्तान में हवाई हमले में मारे गए लोगों के सबूत दे?

संदेश गड्मड् हो गया क्योंकि सरकार ने बड़ी संख्या में आतंकवादियों का सफाया करने का दावा करते हुए मरने वालों की संख्या 300 तक बता दी जो सच प्रतीत नहीं होती. अंतरराष्ट्रीय मीडिया का कहना था कि भारत हवाई हमले के असर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है. अगर सरकार ने शुरू में ही कहा होता कि इस हमले का मकसद पाकिस्तान को यह दिखाना था कि हम उसकी हवाई सुरक्षा को भेद सकते हैं और वह काम करके दिखा दिया है तो यह सही होती. बढ़ा-चढ़ाकर ऐसे दावे करना जिन्हें साबित नहीं किया जा सकता हो, किसी भी सरकार के लिए ठीक नहीं है और इससे यही धारणा बनती है कि यह सरकार जमीन पर काम दिखाने की जगह केवल बड़ी-बड़ी बातें करती है.

अगला चुनाव धीरे-धीरे नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी होता जा रहा है. देश के प्रोफेशनल लोगों को कैसे यकीन दिलाएंगे कि राहुल गांधी मोदी से बेहतर हैं?

राहुल गांधी एक तेजतर्रार और समर्पित जमीनी नेता हैं जो मोदी के विपरीत आम लोगों की बात सुनते हैं और उनकी समस्याओं को दूर करने की कोशिश करते हैं. हमारे यहां राष्ट्रपति चुनाव की प्रणाली नहीं है. मतदाता संसद के सदस्य का चुनाव करते हैं, न कि देश का चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर. अगर इन दोनों नेताओं पर गौर करें तो दोनों के नेतृत्व की शैली बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है—एक, सफेद घोड़े पर सवार और हाथ में तलवार उठाए हुए हीरो की तरह जो दावा करता है कि उसके पास सारे सवालों के जवाब हैं. दूसरा, पैदल चलने वाला एक विनयशील आदमी जो कहता है कि ''मैं सारे जवाब नहीं जानता पर मैं आपके सवालों को जानने के लिए आपके पास आऊंगा और समस्याओं को दूर करने के लिए अनुभवी तथा योग्य लोगों के साथ मिलकर काम करूंगा.''

प्रियंका गांधी राजनीति में आ गई हैं. वे न केवल महासचिव बनाई गई हैं बल्कि कांग्रेस कार्यकारिणी में भी शामिल कर ली गई हैं. आप प्रोफेशनल को कैसे समझाएंगे कि वे आपकी पार्टी में शामिल हों और अपना सहयोग दें, जहां खुलकर वंशवाद को बढ़ावा दिया जाता है?

प्रियंका गांधी की अपील वहां साफ दिखाई देगी जहां यह सबसे ज्यादा मायने रखती है—चुनाव प्रचार में और आम जनता के बीच.

क्या आपने देश के प्रोफेशनलों से संबंधित मुद्दों की पहचान कर ली है?

रोजगार और नौकरी की सुरक्षा का मुद्दा निश्चित रूप से सबसे ऊपर है. इसके बाद शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास का नंबर आता है. प्रोफेशनल के लिए समग्र रूप से कई मुद्दे मायने रखते हैं जिनमें राफेल घोटाला, भारत की संस्थाओं पर हमला, सभी समुदायों का धर्मनिरपेक्ष सह-अस्तित्व, राजनीतिक बहस का गिरता स्तर आदि शामिल हैं.

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