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शख्सियतः टूटने से इनकार

संदीप सिंह, हॉकी खिलाड़ी, सिनेमा और आइसीयू की जिंदगी पर.

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सुकांत दीपकनई दिल्ली, 25 July 2018
शख्सियतः टूटने से इनकार हॉकी खिलाड़ी

हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह से बातचीत-

गोली लगने से आपको लकवा मार गया था लेकिन ठीक होकर आप फिर भारतीय हॉकी टीम के कप्तान बने. आपकी जिंदगी पर फिल्म बनाने के लिए को-प्रोड्यूसर दीपक सिंह ने जब अप्रोच किया तो आपकी प्रतिक्रिया क्या थी?

मैं तो अभिभूत था. मुझे लगा कि मेरी असल जिंदगी पर फिल्म बनी तो वह हर युवा को प्रेरित करेगी. भले उसकी खेल में दिलचस्पी न हो.

अस्पताल में भर्ती रहने के दिनों का कुछ याद है आपको?

मैं महीने भर तक बेहोश था और उस बीच वजन 50 किलो कम हो गया. जब डॉक्टरों ने कहा कि अब मैं चल-फिर या हॉकी नहीं खेल पाऊंगा तो मैंने उन्हें मेरी नजरों के सामने से हट जाने को कहा. मैं हर रात उठकर अपनी हॉकी स्टिक से प्रैक्टिस करता. मुझे पता था कि मेरी जगह हॉकी के मैदान में है, व्हीलचेयर पर नहीं.

आप शुरू से ही चाहते थे कि लीड रोल दिलजीत दोसांझ करें. हालांकि शुरू में उन्होंने बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई.

मैं नहीं चाहता था कि एक सिख का किरदार कोई उथले ढंग से कर डाले. मुझे लगा कि दिलजीत उसे अच्छे से कर पाएंगे. लेकिन उन्हें भरोसा न था कि एक हॉकी प्लेयर और उसकी ट्रेनिंग वगैरह को वे ठीक से निभा पाएंगे. पर स्क्रिप्ट सुनने के बाद वे इस मौके को गंवाना नहीं चाहते थे.

पिछले दस साल में खिलाडिय़ों की जिंदगी पर कई फिल्में बनी हैं. सूरमा उनसे अलग कैसे है?

उनमें से ज्यादातर में नाटकीय प्रभाव लाने के लिए कुछ काल्पनिकता डाली गई है. लेकिन सूरमा में खालिस और अनगढ़ यथार्थ है. शाद अली ने फिल्म मेरी जिंदगी के आसपास ही रखी है. यहां तक कि फिल्म में खिलाड़ी और कोच भी असल ही हैं.

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