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रस्किन बॉन्ड- कामयाबी धीरे-धीरे ही आए तो अच्छा

19 मई को भारत के मशहूर कथाकार रस्किन बॉन्ड 85 वर्ष के हो रहे हैं. पर यह सीख उन्होंने लेखक के रूप में संघर्ष करते हुए ही पा ली थी कि अपने को बहुत गंभीरता से नहीं लेना है. इसे आप उनके पास रहते हुए निरंतर महसूस कर सकते हैं.

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शिवकेशनई दिल्ली, 07 May 2019
रस्किन बॉन्ड- कामयाबी धीरे-धीरे ही आए तो अच्छा सभी फोटो साभारः रामेश्वर गौड़

मसूरी आजकल उत्तर भारत की तपिश से राहत के लिए पहुंचे, चहकते सैलानियों से ठसाठस है. पर पिछले हफ्ते यहां असम से, मां के साथ आई एक नवयुवती अपने पसंदीदा लेखक रस्किन बॉन्ड से मिलने की जद्दोजहद में उदास और परेशान थी. दिन भर भटकने के बाद शाम को जब वह लंढोर के आइवी कॉटेज स्थित बॉन्ड के, एक धरोहर में तब्दील हो चुके छोटे-से शांत आशियाने पर पहुंची तो उसके आंसू रुकने को नहीं आ रहे थे. मां ने पैर पकड़ लिए. उनके एक उपन्यास ने इस हताश-निराश युवती का जीवन बदल दिया था. पर भावातिरेक उन्हें असहज कर देता है.

अगली शाम वे कहते हैं, ''दुनिया में मेरे जैसा आलसी आपको खोजे न मिलेगा. और सोने को तो अभी कहिए, अभी सो जाऊं.'' 19 मई को भारत के मशहूर कथाकार रस्किन बॉन्ड 85 वर्ष के हो रहे हैं. पर यह सीख उन्होंने लेखक के रूप में संघर्ष करते हुए ही पा ली थी कि अपने को बहुत गंभीरता से नहीं लेना है. इसे आप उनके पास रहते हुए निरंतर महसूस कर सकते हैं. कुर्सी पर पीछे टिककर बतियाते हुए वे सामने टेबल पर रखी किताब की ओर इशारा करते हैं. हाल ही में आया यह उनके किसी कहानी संग्रह का कन्नड़ अनुवाद है. ''कन्नड़ वाले लोग मुझे रस्किन बोंडा कहते हैं, आलू-बोंडा

वाला.'' यह कहकर वे खुद भी खिलखिलाते हैं, बाल सुलभ अंदाज में. नाम के साथ 'छेड़छाड़' के दो और वाकए वे इसी तरह से बयान करते हैं. एक में तो यहीं मसूरी में उनकी एक पाठक ने उन्हें बंस्किन रांड संबोधित किया. और उनके परिवार से जुड़ी एक पंजाबी महिला उन्हें रक्सन बुलाती थीं. इस बीच वे राजपाल ऐंड संस से रस्टी सीरीज की अपनी चार किताबों के हिंदी अनुवाद का अनावरण करते हैं.

अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने अंगूठा चूसने, एनीमा लगाने के लिए पीछा करतीं नानी से खौफ खाने और अक्सर गूचड़-गाचड़ कपड़े पहनने जैसे ब्यौरे दिलचस्प अंदाज में दिए हैं. अंग्रेज पिता और एंग्लोइंडियन मां की संतान, करीब 500 कहानियों और 6-7 उपन्यासों के रचयिता बॉन्ड को पचास के दशक में कुछ समय के लिए इंग्लैंड में रहने के दौरान महसूस हुआ कि वे एक हिंदुस्तानी के अलावा कुछ नहीं हो सकते. कसौली में जन्मे, शिमला में पढ़े और 1964 में मसूरी आकर बस जाने के बाद तो यहां की आबोहवा उनकी रगों में समा गई.

मसूरी के ऑक्सफोर्ड बुक डिपो पर पिछले 9-10 साल से वे हर शनिवार को जाकर एक घंटा पाठकों से मिलते हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''लोग फोटो भी खिंचाते हैं, गाल-से-गाल मिलाकर सेल्फी भी लेते हैं और गले भी मिलते हैं. मैं थक जाता हूं और आकर सो जाता हूं.'' उनकी कुर्सी के पीछे सरस्वती और भगवान जगन्नाथ के चित्र हैं. ध्यानस्थ बुद्ध की श्याम प्रतिमा भी है पर उनकी स्टडी से नीचे शांत, गहरी हरी घाटी को थोड़ी देर देखें तो खुद ही ध्यान लग जाए. पिछले हफ्ते सीनियर असिस्टेंट एडिटर शिवकेश से उन्होंने लंबी बात की. कुछ वाक्यों को छोड़कर (जिन्हें इटैलिक में कर दिया गया है) उनके जवाब अंग्रेजी में थे. आप भी पढ़ें:

हाल के वर्षों में आपके कई कहानी संग्रह और उपन्यास हिंदी में आ चुके हैं. आपकी आत्मकथा लोन फॉक्स डांसिंग का भी अनुवाद हो रहा है. पहले क्या हिंदी प्रकाशकों ने रुचि नहीं दिखाई थी या आपने दिलचस्पी नहीं ली?

साठ-सत्तर के दशक में अंग्रेजी में ही मेरी किताबें नहीं बिक रही थीं तो हिंदी प्रकाशक भला क्यों दिलचस्पी लेता? बंबई के इंडिया बुक हाउस (उन दिनों के चर्चित प्रकाशक) से छपी 3-4 रु. वाली किताबों को ही लोग नहीं खरीद रहे थे तो मेरी किताब के अनुवाद में कोई क्यों दिलचस्पी लेता? इसीलिए उन दिनों अखबारों और पत्रिकाओं में लिख रहा था कि कम-से-कम पचासेक रु. तो मिल जाएं.

तो क्या अब हिंदी के पाठकों से भी किसी तरह का संवाद होता है?

थोरा-बहुत, ज्यादा नहीं. वैसे भी मसूरी और देहरादून में बुकशॉप वाले हिंदी किताबें अक्सर रखते नहीं. इसके लिए देहरादून में पलटन बाजार के भीतर जाना पड़ेगा. पिछले साल भोपाल, इंदौर और रायपुर प्रवास में जरूर मुझे, मेरी हिंदी किताबों के युवा पाठक मिले. पर यहां किताब वालों की दिलचस्पी अंग्रेजी की किताबें बेचने में ही होती है. एक व्यापारी तो महंगी किताबें ही बेचना चाहेगा, और हिंदी की किताबें अंग्रेजी से सस्ती होती हैं.

शिमला में स्कूल के दिनों में आपको तो मोहन राकेश ने हिंदी पढ़ाया है.

हां, क्लास में मैं हिंदी में सबसे लद्धड़ था. वो मुझसे हिंदी में कुछ बोलवाते थे, जिस पर पूरी क्लास हंसती थी. एक बार उनकी (शायद पहली) पत्नी ने मुझसे शिकायत की कि मैं हिंदुस्तान में रहता हूं और मेरी हिंदी इतनी खराब है! मैं कहा, क्या करूं, आपके पतिदेव ने ही पढ़ाया है (हंसते हैं).

इसी 19 मई को आप 85 वर्ष के हो जाएंगे. अगले जन्मदिन की पूर्वसंध्या पर पीछे नजर डालते हैं तो क्या देखते हैं?

जिंदगी में आज जितना संतोष और सुकून है, पहले कभी नहीं था. आज मेरे पास एक रीडरशिप है, किताबें बिक रही हैं, रॉयल्टी के साथ कुछ आमदनी भी हो रही है. उस मायने में एक लिहाज से मैं चरम पर पहुंच गया हूं. जिस परिवार को गोद लिया, उसके भी बच्चे बड़े होकर कुछ न कुछ कर रहे हैं. टचवुड सेहत भी ठीक है. शारीरिक भी और मानसिक भी.

जिंदगी की इस घड़ी में लोग अमूमन बैठकर अपने किए का हिसाब करते हैं. पर आपको देखकर लगता है, आपने जितने किरदार रचे, उससे ज्यादा को अभी बचाकर रखा है.

यह सच है. आपकी उम्र जितनी बढ़ती है, आपके पास पीछे देखने को उतना ही ज्यादा होता है. मैंने बहुत एडवेंचरस लाइफ तो नहीं जी, लेकिन हां, एक लेखक वाली जिंदगी मुझे जरूर मिली. और पहाड़ी पर रहने का एक फायदा यह भी है कि ऊपर से दुनिया को देखने पर उसे देखने का आपको एक नजरिया और एक समझ भी मिल जाती है. दूसरे, धीरे-धीरे मैं कुदरत के करीब होता गया हूं, यह प्रक्रिया मेरे यहां (लंढोर, मसूरी) बसने के बाद शुरू हुई. 4-5 साल दिल्ली में रहा पर वहां से भाग खड़ा हुआ. मैं हमेशा एक से दूसरी जगह भागता रहा. रस्टी (उनकी आत्मकथात्मक सीरीज का किरदार) पहले तो घर से भागा, फिर स्कूल से, फिर इंग्लैंड भाग गया, वहां से भी भाग आया, फिर भागकर पहाड़ी पर आकर चढ़ गया. अगला ठिकाना? पर्वत (हंसते हैं). खैर, अब भागमभाग रुक गई है.

आपके किरदार और उनके आसपास के डीटेल्स के साथ ही उनका रियलिज्म कमाल का होता है. आपने नाटक किए भी हैं और क्लासिक ड्रामें भी पढ़ते रहे. आपको लगता है, थिएटर का क्राफ्ट, गहरे ऑब्जर्वेशन वाले किसी लेखक को कोई किस्सा खड़ा करने में मदद करता है?

देखिए, क्राफ्ट की अहमियत अपनी जगह है. पर मुझे लगता है कि किसी वाक्य को लिखना काफी नहीं होता, उसे गढऩा होता है. शब्दों को अलग ढंग से बरतना, उन्हें ज्यादा दिलचस्प बनाना होता है. मेरे भीतर यह युवावस्था में ही घटने लगा था, जब मैं पढ़ता बहुत था. अपनी अलहदा शैली रखने वाले लेखक मुझे बहुत भाते थे. किसी लेखक का लिखा हुआ, उसकी शैली अलग से ही पहचान में आनी चाहिए. तो क्राफ्ट अहम है पर लिखना सीख लेना ही काफी नहीं. मुझसे लोग अक्सर पूछते हैं, ''लेखक जन्मजात होता है या गढ़ा जाता है?'' मेरे मामले में तो यही कहूंगा कि मैं पैदाइशी लेखक था. 5-6 की उम्र में भी मैं कुछ न कुछ लिखता रहता था. लेकिन आगे बढऩे के साथ आपको अपनी लेखनी पर काम करते रहना होता है. इसमें आप लगातार सीखते हैं. मेरी पसंदीदा किताब मोटी-तगड़ी ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ये देखिए, यही पड़ी है (सामने किताबों की टेबल की ओर इशारा करते हैं). शब्दों के अर्थ, उनकी उत्पत्ति और उनके सफर के बारे में जानने को लेकर आज भी मुझमें उतना ही रोमांच रहता है.

बेसिकली मैं एक फिक्शन राइटर हूं. लेकिन फिक्शन को मैंने आत्मकथा और निजी लेखन से जोड़ा है. निबंधों से शुरू किया था, फिर कहानियां शुरू कीं, कविताएं भी लिखीं. यानी हर विधा में लिखा. हां, नाटक नहीं लिख पाया. वजहः मराठी और बांग्ला को छोड़ दें तो हिंदुस्तान में अंग्रेजी नाटकों का मंच कहां है? अंग्रेजी भाषा का नाटककार बनने के लिए आपको न्यूयॉर्क या लंदन में रहना होगा.

आपने अस्सी की उम्र पार करने के बाद आत्मकथा लिखी.

संस्मरण तो लिखता आया था. दो-एक साल पहले आत्मकथा आई. उसमें भी बहुत हाल के समय के ब्यौरे नहीं हैं क्योंकि फिर वही बात, मैं बातों को एक पर्सपेक्टिव, एक परिप्रेक्ष्य में रखना पसंद करता हूं. और बहुत निकट के अतीत के मुकाबले ज्यादा दूर की घटनाओं, चीजों को परिप्रेक्ष्य में रख पाना आसान होता है. सो यह आत्मकथा 50-60 तक की उम्र के ब्यौरों को समेटे है.

लेकिन इस उम्र में इतनी पैनी और गहरी याददाश्त का राज क्या है?

मुझे तो उन दिनों देखी फिल्मों की पूरी कास्ट के नाम याद हैं. खास लेखकों की सारी किताबों के नाम बड़े आराम से गिना सकता हूं. बहुत बचपन के दिनों में मिले लोगों, तब की घटनाओं का भी मैं ब्यौरा दे सकता हूं, भले ही मुझसे उनका कोई ताल्लुक न रहा हो. मेरी अच्छी याददाश्त मेरे रचनाकर्म में खासी मददगार रही है. कोई भी चीज या अपनी पांडुलिपियां इधर-उधर रखकर भूलता भी नहीं.

आपको मसूरी में रहते कई दशक हो गए. इस दौरान यहां किस तरह के बदलाव देखे हैं आपने?

यहां के लोगों के लिए जिंदगी अब भी मुश्किल है. जो थोड़ा पढ़ गए, वे फौज में चले जाते हैं और नौजवान दिल्ली, देहरादून या और किसी शहर का रास्ता पकड़ लेते हैं. पूरे पहाड़ी क्षेत्र का यही हाल है. गांवों में जाइए तो आपको बूढ़े-बुजुर्ग ही मिलेंगे. यह त्रासद स्थिति है. जहां तक मसूरी की बात है, तो देश में पिछले पचासेक साल में मिडिल क्लास तेजी से समृद्ध हुआ है. तो वे छुट्टियां बिताने मसूरी और शिमला ही नहीं, जिनके पास ठीकठाक पैसा है, वे अब इसे हेय दृष्टि से देखते हैं.

वे मलेशिया और हांगकांग जाते हैं. साइंस और टेक्नोलॉजी ने भी सफर आसान बनाया है. पर हैरत है कि देशों की सीमाएं दुरूह होती जा रही हैं. लोग सीमाओं को लेकर ज्यादा सजग हो गए हैं. हम ट्रैवल करने में तो ज्यादा सक्षम हो गए लेकिन अब उतने ही ज्यादा वीजा चाहिए. प्रथम विश्वयुद्ध से पहले कहीं कोई वीजा ही नहीं लगता था. पासपोर्ट की अवधारणा उसी वक्त आई, वरना आप कहीं भी चले जाइए.

आपकी कहानियों पर विशाल भारद्वाज (द ब्लू अंब्रेला और सात खून माफ) और उससे पहले श्याम बेनेगल (जुनून) जैसे बड़े फिल्ममेकर्स ने फिल्में बनाईं, फिर भी आप सिनेमा के लिए और स्क्रिप्ट लिखने को क्यों इंस्पायर नहीं हुए?

मेरे लिए स्क्रिप्ट लिखना बहुत बोरिंग काम है. मैंने सात खून माफ के लिए कहानी को बढ़ाकर स्क्रीनप्ले बनाया था लेकिन आखिर में उन्होंने पूरा बदल डाला. लेकिन अगर किसी अच्छे डायरेक्टर को मेरी कोई कहानी पसंद आती है और वह उस पर फिल्म बनाना चाहे तो मुझे खुशी होगी. मैं खुशी-खुशी उसे अधिकार दूंगा, जिस तरह से विशाल को और शशि कपूर को जुनून के लिए दिया था, जो कि 1857 की पृष्ठभूमि की कहानी अ फ्लाइट ऑफ पीजंस पर बनी थी. विशाल के पास मेरी एक और कहानी है. अब यह पता नहीं कि वे उस पर फिल्म कब बनाएंगे.

इसके अलावा भूतों वाली मेरी कुछ कहानियों को इन दिनों नेटफ्लिक्स डिजिटल फिल्म्स में लाया जा रहा है, जिन्हें आप अपने मोबाइल पर भी देख सकते हैं. पर मैं नहीं देखने वाला. इस (डिजिटल) मीडियम में मेरी रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं. हालांकि मेरी फीस देकर मेरी कहानियों को ले जाने वाले खुश हैं. टेक्नॉलोजी का मुझे अगर इस्तेमाल न करना पड़े, तो मुझे उससे कोई दिक्कत नहीं.

आपकी लव स्टोरीज ज्यादातर दुखांत वाली रही हैं. ऐसा क्यों?

बीस के आसपास की उम्र में मैंने रोमांटिक फ्लेवर वाली कई कहानियां लिखीं क्योंकि वह मेरा रोमांटिक पीरियड था. मसलन नाइट ट्रेन ऐट देवली, टाइम स्टॉप्स ऐट शामली. मेरा उन दिनों बार-बार रोमांस चल रहा था, प्रायः एकतरफा. तभी कहानियां भी दुखांत वाली थीं. पर पिछले ही हफ्ते मैंने द गार्डन ऑफ ड्रीम्स नाम से एक नई कहानी लिखी है, जिसमें सुखांत है. इसमें मैं जिसके इश्क में पड़ता हूं, वह फिर साथ ही आ जाती है. चारों ओर हंसी-खुशी. क्योंकि यह महज एक ख्वाब है. पर मैंने सोचा, चलो एक प्रेम कहानी तो सुखांत वाली लिख डालूं. हालांकि इसे भी मैंने दूर काठमांडो की पृष्ठभूमि पर लिखा है (हंसते हुए).

आपको नहीं लगता, आपने अपनी और अपने लेखक की पर्सनालिटी को अंडरप्ले किया है?

देखिए, पचास, साठ और सत्तर के दशक में मैं लिख तो बहुत रहा था पर कोई खास पहचान नहीं मिली. ऐसे में खुद को कोई खास लेखक मानने का मुझे चस्का भी नहीं लगा. यह तो पिछले 15-20 साल में मेरी रीडरशिप बढ़ी है. कुछ कहानियां स्कूल-कॉलेज पाठ्यक्रमों में शामिल होने से युवा पाठकों ने जाना है. एक दिन एक पाठक की चिट्ठी आई कि उसके पास मेरी 90 किताबें हैं, यानी करीब-करीब सारी. अच्छा हुआ कि कामयाबी बहुत जल्दी नहीं मिली. जल्दी मिल गई होती तो शायद मैं इतनी परवाह ही न करता और गंवा देता. और कभी-कभी अगर आप ज्यादा कामयाब हो जाएं तो देवताओं को जलन होने लगती है. वे घेंचा दबाकर आपको ठिकाने लगा देते हैं. तो कामयाबी धीरे-धीरे ही आए तो अच्छा.

आप धार्मिक नहीं रहे हैं पर आजकल धर्म काफी सिर चढ़कर बोल रहा है. इस माहौल पर क्या कहेंगे?

यह विश्वव्यापी घटना है. खासी बेबसी, उदासी और बिखराव वाला दौर है. ऐसे में बहुत-से लोगों का नजरिया संकीर्ण हो गया है. मैं खास धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं. आप मुझे कॉमन सेंस वाला आदमी कह सकते हैं. पर मैं किसी के भी धर्म, पूजापद्धति और आस्था के अधिकारों का पक्षधर हूं, बशर्ते मुझे वैसा करने को मजबूर न किया जाए. पर मनुष्य जीवन के जीवन के इतिहास में इस तरह के दौर आते-जाते रहते हैं. यही उसी कालचक्र का छोटा-सा हिस्सा है.

मसूरी में रहे उन्नीसवीं सदी के, ऑस्ट्रेलिया के संभवतः पहले उपन्यासकार, जॉन लैंग की कब्र आपने खोज निकाली थी. उनके बारे में थोड़ा और बताएं.

जॉन लैंग गजब के किरदार थे. वकील थे वे. 1840 के दशक में भारत आए. मेरठ से उन्होंने द मुफस्सिलाइट अखबार निकाला. ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ उन्होंने रानी झांसी और नाना साहेब का मुकदमा लड़ा. वे चाल्र्स डिकेंस की इंग्लैंड से निकलने वाली पत्रिका हाउसहोल्ड वड्र्स के लिए निबंध और कहानियां लिखा करते थे. उनकी चर्चित कहानी द मोहम्मडन मदर भी उसी में छपी थी. मरने के बाद यहीं वे दफनाए गए थे. 1964 में मसूरी आने पर मैंने उनकी कब्र खोज निकाली.

आप गढ़वाली लोक संगीत सीख रहे थे. कितना सीखा?

बहुट कम सीका. मेरी आवाज बहुत खराब है. अगर मैं किसी का गारी में बैटा ना और गाना शुरू कर दिया तो बाहर फेंक देगा. नईं टो एक्सीडेंट जरूर हो जाएगी. शिमला में स्कूल में भी सुंदर दिखने के कारण मेरी म्युजिक टीचर कॉयर में रखती थी लेकिन कह देती थी कि मुझे सबके साथ बस मुंह हिलाना है, खबरदार अगर मुंह खोला तो! एक दिन मैं बदला लिया और गाना शुरू कर दिया. अगले ही दिन टीचर ने मुझे कॉयर से निकाल बाहर किया. पर कुछ दिन पहले किसी ने मुझसे किसी गढ़वाली गीत की कुछ लाइनें गवाकर रिकॉर्ड कीं, मेरे क्चयाल से मरने के बाद याद करने के लिए (हंसते हुए). पर फन के लिए पुराने फिल्मी गाने गाता रहा हूंरू (गुनगुनाते हैं) मेरा लाल डपट्टा मलमल के ओजी ओ जी .

आपकी अगली किताब कौन-सी है?

मैंने 5-6 नई कहानियां लिखी हैं. डेविड डेविदार (अलेफ बुक कंपनी) 1-2 महीने में कुछ नई और कुछ पसंदीदा कहानियों का एक संकलन ला रहे हैं. फिर बचपन के कुछ संस्मरणों की किताब पेंगुइन से आने को है. कहानियां लिखना मुझे पसंद है क्योंकि कहानी 2-3 दिन में लिख लेता हूं और उपन्यास छह महीने लेता है. ठ्ठ

मैं हिंदी में सबसे लद्धड़ था. वो (मोहन राकेश) मुझसे हिंदी में कुछ बोलवाते थे, जिस पर पूरी क्लास हंसती थी. एक बार उनकी (शायद पहली) पत्नी ने शिकायत की कि हिंदुस्तान में होकर मेरी हिंदी इतनी खराब है! मैंने कहा, क्या करूं, आपके पतिदेव ने ही पढ़ाया है.

स्क्रिप्ट लिखना मेरे लिए बहुत बोरिंग काम है. सात खून माफ के लिए कहानी से स्क्रीनप्ले बनाया था पर उन्होंने पूरा बदल डाला. मेरी कुछ कहानियां इन दिनों नेटफ्लिक्स के लिए फिल्माई जा रही हैं. पर मेरी उस मीडियम में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है.

जॉन लैंग गजब के किरदार थे. उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ रानी झांसी और नाना साहेब का मुकदमा लड़ा. वे चाल्र्स डिकेंस की पत्रिका हाउसहोल्ड वड्र्स में निबंध और कहानियां लिखते थे.

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