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नीतीश को नए सिरे से जनादेश लेना चाहिए था

सियासी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पहले नेताओं की छवि चमकाने की वजह से खबरों में थे और अब खुद नेता बनने के बाद सुर्खियों में छाए रहते हैं. कभी प्रियंका गांधी पर अपने ट्वीट, कभी उद्धव ठाकरे से मुलाकात तो कभी नीतीश कुमार के बयान की वजह से. इंडिया टुडे ग्रुप की एक वेबसाइट लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने जनता दल (यू) के उपाध्यक्ष से विभिन्न मुद्दों पर लंबी बातचीत की. कुछ अंशः

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 28 February 2019
नीतीश को नए सिरे से जनादेश लेना चाहिए था प्रशांत किशोर

कई लोग आपको जद (यू) में नंबर 2 कहते हैं.

मैं इस टैग से बहुत असहज महसूस करता हूं. ये जो नीतीश का उत्तराधिकारी, पार्टी का भविष्य या नंबर 2 होने की बातें हैं, यह बस लोगों के दिमाग की उपज हैं. मुझे अभी पार्टी में दो-तीन महीने हुए हैं. मैं बिहार को थोड़ा समझता हूं पर इतना भी नहीं कि नंबर दो, नंबर तीन होने का दावा करूं.

पढ़ाई-लिखाई कहां से की?

सरकारी स्कूल में पढ़ा. फिर पटना साइंस कॉलेज आ गया. मैथ्स अच्छी थी, घर वालों की इच्छा भी थी, तो मैथ्स ले ली. हिंदू कॉलेज में स्टैटिस्टिक्स ले लिया. मगर वहां से तबीयत खराब होने की वजह से छोड़ आया. ग्रेजुएशन लखनऊ से किया. फिर हैदराबाद गया, अमेरिका गया, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी फिर सिविल सर्विस वाला कोई रूटीन नहीं फॉलो किया. हर दो साल में पढ़ाई छोड़ दी. बारहवीं के बाद तीन साल छोड़ी, फिर ग्रेजुएशन के बाद दो साल छोड़ी. मेरे पिताजी अनशन पर बैठ जाते थे. कहते थे कि वापस जाओ, पढ़ाई करो.

आप मोदी के साथ आए और फिर साथ छूट भी गया. क्या हुआ था?

अगर आपका सवाल यह है कि मैं अलग क्यों हुआ, तो उसकी वजह वह नहीं है जो आप पढ़ते हैं. चुनाव के पहले से ही उनके साथ एक सोच बनी कि भारत में सिविल सर्विसेज में लैटरल-एंट्री की बहुत जरूरत है. उसके लिए ही हम संस्था बनाना चाहते थे. ऐसी संस्था जो प्राइम मिनिस्टर ऑफिस के साथ काम करे. हमने एक्सेंचर और मैकेंजी के साथ इस पर काम किया. उनकी (मोदी की) सहमति भी थी. इस पर काफी पैसा भी लगा. लेकिन 2014 के चुनाव के बाद उनकी व्यस्तता बढ़ गई. वे थोड़ा वक्त रुकना चाहते थे. मैं बहुत इंपेशेंट आदमी हूं. फिर अक्तूबर-नवंबर में मुझे लगा कि यहां बात नहीं बन रही है. पहली बार मैं नीतीश जी से नवंबर में मिला. नीतीश कुमार से मैं पवन वर्मा जी के घर पर मिला. एक ही मीटिंग में उन्होंने कहा कि आप साथ आ जाइए.

 नरेंद्र मोदी ने रोका नहीं?

बहुत रोका. मैं नवंबर (2014) से नीतीश जी के साथ काम कर रहा था, पर बिहार आया था 2 जून 2015 को. यह जो छह महीने का समय था जिसमें उनसे (मोदी से) बातचीत चलती रही. पर उन्हें भी शायद लगा कि अगर मैं जाकर कुछ और करना चाहता हूं तो ठीक है. वे मेरा स्वभाव जानते हैं.

और फिर पीके खुद नेता बन गए.

बिल्कुल. पहले राजनीति में आने का विचार नहीं था. फिर मेरा अनुभव चार-पांच साल का यह रहा कि आप चाहे जितना एडवाइस कर लें, पर (वे) आपकी बात जीतने के बाद माने, न माने. मेरे पास एक्जांपल दोनों ही थे. मोदीजी ने टेंपररली तो उस समय बात नहीं ही मानी, नीतीश जी ने मानी, लेकिन दोनों ही स्थिति में मैं वह अचीव नहीं कर पाया, जो मैं चाहता था. तो फिर मैंने पॉलिटिक्स जॉइन की.

नीतीश ने फिर भाजपा से दोस्ती की तब?

नीतीश कुमार का फैसला राजनैतिक फैसला था. यह बिहार के नजरिए से ठीक है. मेरी समझ से उनका फैसला ठीक था, लेकिन तरीका गलत. जब वे वापस भाजपा के साथ गए तो उन्हें नए सिरे से जनादेश लेना चाहिए था.

लालू से क्या बात हुई थी?

एम्स में लालू से उनके हालचाल पर बात हुई. पॉलिटिकल बात भी हुई, इसमें कोई दो मत नहीं. रही तेजस्वी की बात, तो उनसे मेरी बात नहीं होती.

अमित शाह के बारे में क्या ख्याल है?

बहुत कर्मठ व्यक्ति हैं. मैंने उनके साथ बहुत लंबा काम नहीं किया है, लेकिन मैं समझता हूं कि टे्रडिशनल चुनाव लडऩे का जो तरीका है, उसे अमित शाह बेहतर समझते हैं. कार्यकर्ताओं की और पार्टी की संगठनात्मक चीजों की उनकी समझ और नेताओं की तुलना में बेहतर है.

पीके का मिशन यूपी क्यों फेल हुआ?

बिहार जीतने के बाद नीतीश के शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी से मेरी मुलाकात हुई. उन्होंने कहा कि आइए हमारी मदद करिए. फरवरी 2016 में फिर एक चर्चा हुई. तीन महीने यूपी की खाक छानी और एक प्लान बनाया. राहुल की किसान यात्रा उस प्लान का हिस्सा थी. 30 दिन देवरिया से लेकर दिल्ली तक. मैंने उन्हें बताया कि एक बार आप जब बस पर बैठेंगे देवरिया में, तो जब तक आप दिल्ली नहीं पहुंच जाते, आपको यूपी में ही रहना है. देवरिया की यात्रा हुई तो कांग्रेस में यह बात हो गई कि अब बड़ी हवा बन गई है और उन्होंने उसे भंजा लिया. जिन अखिलेश यादव से आज एक सीट नहीं मिल रही है, उन्हीं अखिलेश यादव ने 110 सीट दी कांग्रेस को. तो थोड़ी बहुत ग्रास रूट पर कांग्रेस की जो सुगबुगाहट शुरू हुई थी, उसको उन्होंने एलायंस करके एन्कैश कर लिया, जो बाद में डिजास्टर साबित हुआ.

उद्धव ठाकरे से क्या बात हुई?

मेरी कई दफा उनसे बात हुई है. उन मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ, वह उत्तर भारतीयों पर उनकी पार्टी को लेकर स्टैंड पर था. मैंने डेटा और चीजों को देखकर उनको समझाने की कोशिश की कि आइडियोलॉजिकली जो हो, इलेक्शन में इसका फायदा नहीं मिलेगा. उनको बात समझ में आई. उस संदर्भ में मेरी उनसे बातचीत शुरू हुई.

पीके के संगठन आइपैक वाले किसी भी पार्टी का पॉलिटिकल कैंपेन कैसे चुनते हैं?

क्राइटेरिया कभी बचपना वाला होता है कि पंजाब में दिखा देंगे कि आप से बेहतर कैंपेनर हम हैं, कभी क्राइटेरिया यह है कि प्रियंका को मैं लॉन्च करूंगा और यूपी में सबसे बड़ी जीत मैं हासिल कर सकता हूं. वह यूपी का क्राइटेरिया था. नीतीश जी के साथ आकर काम करने का क्राइटेरिया यह था कि भाई मोदीजी के साथ काम किया और मोदीजी ने नीतीश जी को बुरी तरह यहां हराया था. तो हम लोगों ने कहा कि मोदी आर्मी ने मोदी वेव में जिनको हराया है, अगर उलटा कर दें तो कहेंगे कि कुछ जानते हैं. लेकिन सिर्फ इन्हीं बातों पर तो डिसीजन होता नहीं है, और कई फैक्टर्स होते हैं.

नेता बनने का फैसला?

इस फैसले में एक बेबसी भी है. पंजाब में एक घटना हुई, जिसने मेरे फैसले को बदला. पंजाब में जो संविदा वाले कर्मचारी हैं, उनको लेकर एक प्रॉमिस किया था. पंजाब में मैंने नौ नुक्ते वाले चुनाव का प्रचार किया था. उसमें एक संविदा कर्मचारियों को लेकर प्रॉमिस किया गया है. एक साल बाद मुझे पता चला कि संविदा कर्मचारी धरने पर बैठे थे और मुख्यमंत्री से नहीं मिल पा रहे थे. उन्होंने अखबार में एक विज्ञापन निकाला कि जो हमारी मुलाकात चीफ मिनिस्टर अमरिंदर सिंह से करा देगा, उसको एक लाख रुपए इनाम दिया जाएगा.

आप के विधायक और विपक्ष के नेता अमन अरोड़ा ने इस ऐड को ट्वीट किया और कहा कि देश में सबसे बड़ा फ्रॉड प्रशांत किशोर है, क्योंकि चुनाव से पहले 'हर घर कैप्टन, घर-घर कैप्टन', 'कॉफी विद कैप्टन' और चुनाव के बाद नो वेयर कैप्टन. इस आदमी को बुलाओ और इसको खड़ा करो जनता के सामने. उसी वक्त यह समझ आया कि प्रॉमिस करने वाले से ज्यादा करवाने वाले को लोग ढूंढ़ते हैं. मुझे लगा कि अब समय आ गया है कि इसको छोड़िए, क्योंकि दूसरा गलती करता है और फिर लंबे समय तक लोग आपको फ्रॉड मानते हैं. आप पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं तो कोई बड़ा गोल तो होना चाहिए लाइफ में.

वह गोल जद (यू) में देखा?

वह गोल बिहार आने को लेकर दिखा. मेरा यह कमिटमेंट है कि अगले 10 साल में बिहार को टॉप 10 में आने की जुगत लगानी चाहिए. बिहार में 14 साल में नीतीश के राज में बहुत डेवलपमेंट हुआ है लेकिन यह भी सचाई है कि बिहार विकास के ज्यादातर मानकों पर बॉटम पांच में ही है. इसलिए बिहार को यह कोशिश करनी चाहिए कि विकास के ज्यादातर मानकों में हम टॉप 10 में कैसे आएं और उस एजेंडे को पूरा करने में नीतीश जी की जो मदद मैं कर पाऊं, उसके लिए लौटकर यहां आया हूं.

किताबें जो सियासत में काम आईं.

पैरलल लाइक्रस. सुभाषचंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू पर. छोटी-सी किताब है. रुद्रांशु मुखर्जी ने लिखी है. अगर आप उसको पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि गांधी ने क्यों बोस की बजाए नेहरू को चुना. विज्डम ऑफ क्राउड भी रेकमंड करता हूं. और आखिर में माइ एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ, जिसे हर भारतीय को पढऩा चाहिए. गांधी के लिए छोटा मुंह बड़ी बात है, लेकिन अगर गांधी की कोई बात आपको अच्छी नहीं लगती है तो समझ लीजिए कि आपने गांधी को समझने की समझ डेवलप नहीं की है.

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