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''मुझे तो बस दो शब्द सुनाई देते हैं, सेट! बैंग!''

अगला बड़ा मुकाबला एशियन गेम्स हैं जिनमें अब बस एक महीना रह गया है. वही अभी प्राथमिकता है. देखिए, अब वहां क्या होता है. बेहतरीन समय निकालने के लिए हम अपनी बेहतरीन कोशिश करेंगे.
''मुझे तो बस दो शब्द सुनाई देते हैं, सेट! बैंग!'' सोने की दौड़ हिमा दास टेम्पेरे में 400 मीटर की दौड़ जीतने के बाद
काजू अहमदनई दिल्ली, 25 July 2018

यह अप्रत्याशित जीत थी, पर जब पूर्वोत्तर के असम में धींग की छोटी-सी लड़की हिमा दास ने टेम्पेरे, फिनलैंड में विश्व जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप की महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में फिनिश लाइन पार की, तो समूचे हिंदुस्तान की हैरान नजरें उस पर टिक गईं.

सबको पछाड़ देने वाला दास का फॉर्म तो हैरतअंगेज था ही. यह एहसास भी उतना ही आश्चर्यजनक था कि यह किसी भी बड़ी अंतरराष्ट्रीय ट्रैक स्पर्धा में किसी भी भारतीय एथलीट की पहली—जी हां, पहली!—स्पष्ट जीत थी.

चारों तरफ जश्न और उछाह का माहौल था. लोगों की आंखें भर आईं. तिरंगे के साथ असमिया गमोचा (गमछा) भारत के गौरव के नए प्रतीक बन गए. जीत के साथ ही इंटरनेट पर शोहरत भी पीछे-पीछे चली आई—हर किस्म का देसी हल्ला होने लगा, जिसमें दास की जाति और क्षेत्रीय पहचान को लेकर होने वाला कुख्यात शोर-शराबा भी था.

हम हिंदुस्तानी भले ऐसे ही हों, पर इस युवा धाविका ने अपनी कामयाबी और अचानक मिली शोहरत को लेकर असाधारण संयम, शांत तथा समझदार आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया. काजू अहमद के साथ उनकी बातचीत के अंशः

 दौड़ जीतने के बाद आपके दिमाग में क्या चल रहा था?

दौड़ते वक्त मैं कुछ भी नहीं सोचती. मैं जिस चीज का इंतजार करती और सुनती हूं, वह 'सेट' की आवाज और गन फायरिंग की आवाज (बैंग) के अलावा और कुछ नहीं होता.

हमने अच्छी तैयारी की थी. मुझे पूरा यकीन था कि मैं पदक जरूर जीतूंगी. यहां तक कि मैंने तिरंगा झंडा और गमोचा भी मंगवा लिया था और दौड़ के बाद सर को दे दिया था. मगर रिकॉर्ड तोडऩा, इतिहास बनाना, यह तो मैंने किसी सपने में भी नहीं सोचा था.

हिंदुस्तानी एथलीट और असमिया लड़की होने के नाते मैं खुद को बेहद खुशकिस्मत समझती हूं. और मैं राष्ट्रीय झंडे के साथ-साथ गमोचा दुनिया के सामने पेश कर सकी, यह बात मुझे गर्व से भर देती है.

आपकी कहानी बहुत प्रेरणादायक है, किसान परिवार से आई गांव की एक लड़की का इतिहास रच देना, इसने हिंदुस्तान में इस बात का जज्बा पैदा किया है कि कोई भी कुछ भी कर सकता है...

यह सब सच है. मगर जहां तक मेरी पृष्ठभूमि की बात है, तो इसके कई पहलू हैं. हां, हमारा किसान परिवार है. पर मेरे पिता ग्रेजुएट भी हैं और वे आइटीआइ (इंडियन टेक्निकल इंस्टीट्यूट) में गए थे. अगर उनके पास अपने दस्तावेज और प्रमाणपत्र होते तो वे भारतीय रेलवे में इंजीनियर हो सकते थे. बदकिस्मती से उन्होंने एक आग में अपने दस्तावेज गंवा दिए और फिर नौकरी हासिल करने में उनकी दिलचस्पी ही खत्म हो गई.

हमारा संयुक्त परिवार है. हम करीब 17 लोग एक ही मकान में एक साथ रहते और खाते हैं. हमारे पास करीब 60 बीघा जमीन है और हम साल भर में कई फसलें उगाते हैं. हमारे पास कई मछली तालाब है जिनमें मछलियां भी पाली जाती हैं. इस लिहाज से मैंने बड़े होते हुए कभी कोई मुश्किल नहीं झेली.

हम काफी आराम से खाते-पीते हैं. लोग जो जानते हैं, वह मैं जो हूं, उसका महज 40 फीसदी है. मैं अपनी कहानी बताऊंगी, मैं क्या हूं और मैं कहां से आई हूं. पर सही वक्त पर बताऊंगी और अपने लक्ष्य हासिल करने के बाद बताऊंगी. अभी तो काम करने का वक्त है.

आप इसके बारे में थोड़ा-सा हमें अभी बताना चाहेंगी?

(हंसती हैं) थोड़ा-सा तो आप सब जानते ही हैं. मैं कह चुकी हूं कि मैं बहुत शरारती, जिद्दी थी और थोड़ी-सी बोदमाश (बदमाश) भी. अगर मैं कोई चीज ठान लेती हूं, तो फिर वह करके ही मानती हूं, जब तक कि मुझे पता है कि इससे किसी को नुक्सान नहीं पहुंचेगा.

अपनी इस शानदार जीत के बाद सबसे पहले आपने किसको कॉल किया?

पहला कॉल मैंने असम में अपने कोच निपोन दास सर और नबोजीत मालाकार सर को किया. उसके बाद मैंने अपने माता-पिता को कॉल किया.

आपके माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें वाकई पता ही नहीं था कि क्या हो रहा है. जब मैंने उन्हें कॉल किया, वे सोने जा रहे थे. मैंने भी उन्हें नहीं बताया था कि मैं एक विश्व मुकाबले में आई थी. जब उन्होंने कहा कि वे सोने जा रहे हैं, तो मैंने कहा, ''ठीक है! जाओ, सो जाओ! मैंने दुनिया में हंगामा मचा दिया है और तुम लोग सोते रहो!'' उन्होंने पूछा हुआ क्या है? मैंने उनसे कहा कि उन्हें सुबह पता चलेगा.

अगली सुबह मेरे पिता हमारे खेत में उगी ककड़ी बेचने के लिए बाजार गए. तब उन्होंने हमारे गांव के भीतर आता हुआ टीवी चैनलों की कारों का काफिला देखा. जब टीवी चैनलों की कारें उस सड़क पर आती हैं, जो आम तौर पर हमारे घर की ही तरफ जाने वाली हैं, तब वे तो बस ऐसे हो गए, ''झोरबोनाक आजी (ओह, प्यारे!).'' आखिरकार उन्हें पता चल ही गया (हंसती हैं). मैं बहुत गौरवशाली और खुशकिस्मत महसूस करती हूं.

आप अब कई देशों का सफर कर चुकी हैं. कोई दिलचस्प बात या विचार जो अब तक आपके मन में आया हो?

एक बड़ी दिक्कत मेरे सामने खाने की आई. हर देश की अपनी खाने की संस्कृति है जो जरूरी नहीं कि मेरे मुताबिक हो. तो कभी-कभी मुझे अपने मुताबिक सही खाना खोजना पड़ता है. मगर मैं मैनेज कर लेती हूं. यह कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है. प्राग में हम जहां ट्रेनिंग ले रहे हैं, वहां एक रसोइया है. इसलिए हम जो चाहते हैं, मिल जाता है. वहां कोई दिक्कत नहीं है. मैंने यहां (टेम्पेरे में) हालांकि चावल खोज लिया. और मछली भी.

दूसरे देशों के एथलीटों के बारे में आप क्या सोचती हैं?

मेरे अपने समय के अलावा मैं किसी और चीज की परवाह नहीं करती. यह मेरी अकेली चिंता है. मैं बाकी किसी चीज पर ध्यान नहीं देती. मैं समय के पीछे दौड़ती हूं. अगर उसमें सुधार होता है, तो गोल्ड, सिल्वर वगैरह तो पीछे-पीछे आएंगे ही. मुझे किसी चीज का डर नहीं है. मेरा लक्ष्य

हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ समय देना है. लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं नर्वस क्यों नहीं महसूस करती हूं. मैं नहीं करती. मैं समय में और ईश्वर में विश्वास करती हूं. और कुछ भी मुझे परेशान नहीं करता. बस इतनी

सीधी-सी बात है.

 भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

अगला बड़ा मुकाबला एशियन गेम्स हैं जिनमें अब बस एक महीना रह गया है. वही अभी प्राथमिकता है. देखिए, अब वहां क्या होता है. बेहतरीन समय निकालने के लिए हम अपनी बेहतरीन कोशिश करेंगे (वहां से गुजर रही उडऩपरी पी.टी. उषा की तरफ हाथ हिलाती हैं).

 और एशियन गेम्स के बाद?

किसी भी एथलीट का सबसे बड़ा सपना ओलंपिक में मुकाबला करना है. हम एथलीटों के लिए वह सबसे ऊंची चोटी है. उसके आगे कुछ भी नहीं है. मैं उम्मीद करती हूं कि मुझे ओलंपिक में दौडऩे का मौका मिलेगा. क्वालिफाई करने के लिए मैं बेहतरीन समय निकालने की कोशिश करूंगी. दुनिया के खेल अखाड़े में उतरे अभी मुझे दो साल हुए हैं.

मैं यह नहीं कह रही हूं कि मैं हमेशा पदक जीतूंगी ही. पर मेरी लगातार कोशिश अपना बेहतरीन समय देने की होगी और अगर मैं वह कर सकती हूं तो मुकाबला करना (ओलंपिक में) पक्के तौर पर मुमकिन होगा. यही सपना है.

''हमने सख्त व्यवस्था बनाई है''

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''हमने यहां तक पहुंचने का वाकई नहीं सोचा था. हम एशियन गेम्स के लिए प्राग में ट्रेनिंग कर रहे थे. दुनिया के दूसरे हिस्सों में कुछ खेल चल रहे थे और मैंने अपने साथियों से कहा था कि हमें इनमें हिस्सा नहीं लेना चाहिए क्योंकि इनमें हमारी ट्रेनिंग का बहुत सारा वक्त चला जाता है. चूंकि यह मुकाबला यूरोप में था और हम उसी इलाके में थे, इसलिए मैंने सोचा, हम यहां आएंगे.''

''हिमा अब भी बहुत भोली-भाली है. वह हर चीज खेलना चाहती है. मुझे उसके साथ बहुत सख्त होना पड़ता है. यहां तक कि उसकी छुट्टियों को लेकर भी. हाल ही में हम असम में थे और मैंने हिमा से कहा कि वह एक रात के लिए अपने घर जा सकती है. बात केवल सख्त व्यवस्था को बनाए रखने की है. हम इस वक्त कोई जोखिम नहीं उठा सकते. मैंने उससे कहा, बस एक महीने की बात और है. एशियन गेम्स खत्म होने के बाद वह ज्यादा दिनों के लिए घर जा सकती है.

अपनी कमाई को लेकर भी वह अभी बहुत भोली है. उसने जो कामयाबी हासिल की है, उसके बाद वह ढेरों दौलत कमाएगी. स्पोट्र्स एचीवर को सरकार अनिवार्य तौर पर जो देती है, उसके अलावा जब हम हिंदुस्तान वापस लौटेंगे तो टाटा सरीखी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां दौड़ी चली आएंगी. उसे इन सबका कोई भान ही नहीं है.''

''वह एक साल से काफी मुश्किल ट्रेनिंग ले रही है. पहले वह 100 और 200 मीटर की रनर थी. 400 मीटर में आए उसे अभी एक ही साल हुआ है. असल में अप्रैल में 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में (जहां वह छठे नंबर पर आई थी) उसके प्रदर्शन ने मुझे यहां उसके प्रदर्शन से ज्यादा प्रभावित किया था. यहां (टेम्पेरे में) हमें गोल्ड का पक्का भरोसा था. और उसने अपना जिगरा दिखा दिया.''

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