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किरदार का सुर पकडऩा ही मेरी ऐक्टिंग का मेथड‌ः इरफान

आप अभिनेता इरफान से बतौर पत्रकार मिल रहे हों और उस दिन की अहम खबरों से वाकिफ नहीं तो पकड़े जाएंगे. तनुजा चंद्रा की फिल्म करीब-करीब सिंगल की शूटिंग पूरी करके अगले दिन लोकार्नो फिल्म फेस्टिवल में जाने की व्यस्तता में वे पांच बजे लंच पर बैठे हैं. दाएं हाथ से कौर मुंह में रखते हुए बाईं हथेली में मोबाइल स्क्रॉल करते हुए वे पूछ बैठते हैं, ''डिमॉनिटाइजेशन पर पार्लियामेंटरी कमेटी की रिपोर्ट क्या कह रही है?" खाना खत्म करके वे मुंबई के ओशिवरा में घर की टेरैस पर सीनियर एसिस्टेंट एडिटर शिवकेश से कई मुद्दों पर बात करते हैः

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aajtak.in
शिवकेश मिश्र नई दिल्ली, 04 September 2017
किरदार का सुर पकडऩा ही मेरी ऐक्टिंग का मेथड‌ः इरफान मिलिंद शेल्टे

आपको लगता है, आपकी नई फिल्म द सांग ऑफ स्कॉर्पियॉन्स (जिसका प्रीमियर 9 अगस्त को लोकार्नो फिल्म फेस्टिवल में हुआ) वर्ल्ड सिनेमा में अभूतपूर्व साबित होगी?

ये ऊपर से तो लव स्टोरी है लेकिन एक आदमी और औरत के बीच लव में न्न्या पॉलिटिक्स होती है, उसको डील करती है. इसमें लैंडस्केप एक बहुत बड़ा कैरेक्टर है. और साउंड. रेगिस्तान में आप ट्रैवल करें तो साउंड का एहसास होता है.

कौन-सी जबान में है यह फिल्म?

लैंग्वेज इसकी राजस्थानी और हिंदी है. इसमें बाहर के भी प्रोड्यूसर्स हैं तो यह बेसिकली एक यूरोपियन प्रोडक्शन है. इसे इंडियन प्रोडक्शन नहीं कह सकते.

लेकिन राजस्थानी पृष्ठभूमि वाली इस फिल्म के लिए ईरानी ऐक्ट्रेस गुलशिफ्ते फरहानी को लेने का फैसला आखिर किस तरह हुआ?

गुलशिफ्ते की कहानी ये है कि मैं और अनूप (सिंह, फिल्म के निर्देशक) अबूधाबी फेस्टिवल में थे. वहां हमने एक फिल्म देखी माइ स्वीट पेपर लैंड. उसमें वो एक हैंगड्रम बजा रही थीं. मैंने अनूप से कहा कि यार इस लड़की को हम ला सकते हैं क्या? हमें ऐसा चेहरा चाहिए था जो अपने आप में लैंडस्केप हो और जिसमें म्युजिक की सेंसिबिलिटी हो. फिल्म म्युजिशियन के ऊपर है और वो उसमें गायिका हैं. अनूप ने बात की. ईरानियन लड़की के लिए राजस्थानी बोलना, ये सब करना एक चैलेंज था. उसने चैलेंज लिया. उनका कमाल का काम रहा.

चैलेंज की जहां तक बात है तो हाल ही में आप मार्क टर्टलटॉब की पज़ल न्यूयॉर्क में शूट करके आए हैं. उसमें आपके लिए क्या चैलेंज था?

उसमें कमाल की सिंपल राइटिंग है. और उस प्रिंप्लिसिटी में इतनी चीजें छुपी हुई हैं कि आपको उसमें दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है. उस सिंप्लिसिटी में इतने शेड्स, इतने कलर्स हैं, उस तक पहुंचने में आपको वक्त लगता है. देख के कई बार लग जाता होगा कि यार इसमें तो कुछ लगा ही नहीं. उसमें ज्यादा मेहनत होती है.

पिछले दिनों बाहुबली2 के तूफान में भी आपकी हिंदी मीडियम ने टिककर मोर्चा थामा. उसके हल्ले में फिल्म उतारते डर नहीं लगा था?

हमें दिक्कत हुई थी बाहुबली के आगे आने में. रिलीज एक हफ्ता सरकानी पड़ी थी क्योंकि थिएटर ही नहीं थे. और वो (बाहुबली2) वीकडेज में भी 5-5, 6-6 करोड़ का बिजनेस कर रही थी. तो एक हफ्ता आगे बढ़ाया. उसके बावजूद हमको हजार थिएटर भी नहीं मिल रहे थे. लेकिन हमने फिल्म को पांच दिन पहले दिखाना शुरू कर दिया था. मुझे अब तक याद है, एक स्क्रीनिंग के बाद डिस्कशन चल रहा था कि यार ये बाहुबली तो रुक ही नहीं रही है. लेकिन कुछ जर्नलिस्ट्स का मानना था कि ये फिल्म अपने कंटेंट की वजह से बहाव को थोड़ा चेंज करेगी. कंटेंट विद एंटरटेनमेंट. सालों से मेरी कोशिश रही है मेनस्ट्रीम कमर्शियल सिनेमा को रीडिफाइन करने की. हिंदी मीडियम का बाहुबली2 के साथ आके खड़ा होना और क्रॉस कर जाना, ये अपने आप में एक निशानी है कि लोगों को कंटेंट चाहिए, एंटरटेनमेंट में फ्रेशनेस चाहिए. हिंदी फिल्मों में ऑडिएंस का फुटफॉल कम हो रहा है. लोग सब्जेक्ट से रिलेट नहीं कर रहे हैं. कहानी सुनाने का जनरल अप्रोच होता है. फुटफॉल जा रहा है हॉलीवुड की ओर, जिसने पहले भी कई देशों की इंडस्ट्रीज को अपाहिज कर दिया है. एक तरफ हम इतने संकीर्ण होते जा रहे हैं, सेंसर बोर्ड अजीब शर्तें रख दे रहा है. दूसरी तरफ अपने दरवाजे खोल दिए (हॉलीवुड की फिल्मों के लिए). कैप क्यों नहीं है? और एक बहुत बड़ा ऑडियंस शिफ्ट हो रहा है नेटफ्लिक्स की तरफ. इसके आने से रेवेन्यू बढ़ा है. उस पर फिल्में दो हफ्ते बाद आ जा रही हैं. लोग डिसाइड करते हैं कि नेटफ्लिक्स पर देख लेंगे.

आपने इधर कई विदेशी अभिनेत्रियों के साथ काम किया है. उनके साथ बेहतर तालमेल का आपका सूत्र क्या होता है?

आइ थिंक, दुनिया भर के ऐक्टर्स की एक अनकही अंडरस्टैंडिंग होती है. एक ही तरीका होता है उनका काम करने का. उसमें कुछ एडजस्ट करने की जरूरत नहीं पड़ती. किसी के फॉरेन होने से उसकी ऐक्टिंग फॉरेन नहीं हो जाती. ऐक्टिंग यूनिवर्सल है. देश की सीमाएं ऐक्टिंग की विद्या को विभाजित नहीं कर सकतीं.

पानसिंह तोमर की रिलीज के लिए आपको तीन साल इंतजार करना पड़ा था और द सांग ऑफ स्कॉर्पियॉन्स भी डेढ़ साल बाद आ रही है.

स्कॉर्पियॉन्स का पोस्ट प्रोडक्शन इतना ही लंबा प्लांड था. शूट के बाद एडिटिंग के लिए साल भर लेना, ये एक फ्रेंच तरीका है. इसमें डिले बिल्कुल भी नहीं है. आइ थिंक, पानसिंह एक ऐसी फिल्म है, जिसकी कि वैसी मेरिट होते हुए भी इतना वेट करना पड़ा. कई बार स्टुडियो को कॉन्फिडेंस नहीं होता. इसीलिए उसके बाद ही मैंने सोचा कि बतौर प्रोड्यूसर अपना एक दखल होना चाहिए.

पिछले दिनों मजहबी कट्टरता पर आपके बोलने से कुछ लोग भड़क गए थे. अब उस एपिसोड के बारे में क्या लगता है?

मुझे लगता है, बात करने का कोई प्लेटफॉर्म, कोई जगह ही नहीं है. आपकी बात को कितना तोड़-मरोड़ करके उसका एक तमाशा बन जाएगा, उसकी कोई गारंटी नहीं है. उससे आपको एहसास होता है कि इस जमाने का जो मीडिया है, वह लोगों की सोच को किस तरह से शेप कर रहा है. जर्नलिज्म की परिभाषाएं बदल गई हैं. अब तो लोग खुल के बोल रहे हैं कि हमारा अपना व्यू है, हम वो बताएंगे. मेनस्ट्रीम मीडिया प्रोपेगैंडा बनता जा रहा है, जो रियल लोग हैं, सही रिपोर्टिंग करना चाह रहे हैं, वे इंटरनेट की वजह से अपना प्लेटफॉर्म ढूंढ पा रहे हैं. डेमोक्रेसी में जब तक एक सही किस्म का क्रिटिसिज्म नहीं है, वो डेमोक्रेसी पनप नहीं सकती, वो प्रोटेक्टिव डेमोक्रेसी कभी नहीं हो सकती.

इन दिनों चारों ओर राष्ट्रवाद की आंधी है. बतौर एक ऐक्टर ये घटनाक्रम आपको क्या सोचने पर मजबूर करते हैं?

अब तो ऐक्टर को कहा जा रहा है कि आप ऐक्टर हैं ऐक्टर बने रहिए. अपने विचार-विमर्श की जरूरत नहीं है. उसको बताया जाता है कि आप कुछ भी ऐसा बोलेंगे जो हमें सूट नहीं करता तो हम आपका धंधा चौपट कर देंगे. थिएटर पर हमले करेंगे.

ऐसे लोगों में से किसी के साथ कभी आमने-सामने टकराए?

मैं कभी इस डिस्कशन में पड़ता नहीं हूं. कई महीने हुए, मैंने तो टीवी देखना छोड़ दिया है और मैं बहुत सुकून में हूं. एक तरह का शोर होता है उसमें. ऐसा लगता है जैसे कि आप कुछ कर रहे हों, एक्चुअली आप कुछ नहीं कर रहे. आपके दिमाग को वाश किया जा रहा है. एक बहुत ही डिस्टर्बिंग न्वाइज़ है. मेरे तो बुकशेल्फ में आप देखेंगे, एक खांचा है जो टीवी के लिए था, आज तक टीवी आया ही नहीं. टीवी देखने की बजाए आप अपने विचार खुद बनाएं, वो आपके जिंदा होने की निशानी है.

एक अभिनेता की हमेशा ये ख्वाहिश रहती है कि ''जो मैं कहूं वो जमाने की बात हो जाए्य. अब आप उस कोशिश में अक्सर कामयाब हो रहे हैं, इसे किस तरह से देखते हैं?

एक ऐक्टर की जिम्मेदारी वही है कि वो किस तरह के ख्वाब दिखवाता है. मैंने किस खूबसूरती से कौन-सा किरदार निभाया, बात उसकी नहीं है, बात ये है कि ऑडिएंस मेरा किरदार देखकर अपने अंदर क्या महसूस करती है. मेरे लिए ये जरूरी है कि मैं लोगों को खुद से उनका सामना कराऊं.

रूहानी ताकत में आपका यकीन है? आपको लगता है कि ''कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है"?

जी हां. मुझे ये भी लगता है कि हर आदमी को अपना धर्म डिस्कवर करना चाहिए.

खुद से कब-कब मुलाकात होती है?

ऐक्टर की बेसिक ट्रेनिंग ही यही होती है कि आप अपने को पढऩा शुरू कर दें. जब तक आपमें वो नजर पैदा नहीं होती कि आप अपने को, जमाने को देख पाएं तब तक ऐक्टर के पास कहने को कुछ होता ही नहीं. है भी तो एकाध फिल्म में खत्म हो जाएगा.

मेथड एक्टिंग में आपका यकीन है?

यह गलत प्रचलन है. हर ऐक्टर को अपना मेथड ढूंढना पड़ता है. कोई भी ऐसा मेथड नहीं बना है जो दो ऐक्टर पर एक साथ लागू हो. लंबे समय में जाकर आपको इसका रियाज हो पाता है. हमें इसका भुलावा था कि ड्रामा स्कूल में जाएंगे और वो हमें ड्रामा सिखा देगा. लगता था कि यार डेढ़ साल हो गए, अब तो आ जानी चाहिए ऐक्टिंग. हमारी सोच उस तरह की बना दी गई है कि आप ये करेंगे और ये मिल जाएगा. लेकिन ये विद्या तभी आती है जब इसके अंदर आप खोज करें. आपकी सोच, शरीर और आवाज आपके टूल्स होते हैं. ऐसा भी नहीं कि इस टूल को खटाक से यूज करना शुरू कर दिया. उसको इस्तेमाल करने में रियाज लगता है. मुझे हमेशा से ऐक्टर में जब तक क्राफ्ट दिखती है, उसकी परफॉर्मेंस पसंद नहीं आती. इसी तरह कहानी भी जब अपना क्राक्रट छुपा लेती है, तभी चकित करती है. मेरे लिए किसी कैरेक्टर का सुर ढूंढना बहुत जरूरी है. हर ऐक्टर की जरूरत नहीं है सुर. उसके लिए दूसरा तरीका हो सकता है. ये मेरा मेथड है, मुझे सुर चाहिए.

समाधि, परमानंद, एन्न्सटैसी, कभी इसका एहसास हुआ?

यह निजी चीज है. बताने से उसकी एनर्जी विसर्जित होती है.

 

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