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साक्षात्कारः 'छत्तीसगढ़ मंदी से बेअसर'

छत्तीसढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं, देश में मंदी है लेकिन छत्तीसगढ़ में नहीं है तो इसकी वजह सरकार के कुछ काम हैं. राज्य की कुछ ऐसी योजनाएं हैं जिनके जरिए ग्राहकों की जेब में पैसा डालने का काम लगातार किया जा रहा है, जिससे मनी फ्लो बना हुआ है.

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aajtak.in
अंशुमान तिवारीनई दिल्ली, 10 December 2019
साक्षात्कारः 'छत्तीसगढ़ मंदी से बेअसर' भूपेश बघेल

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन को एक साल से ज्यादा वक्ता हो गया है और इस दौरान वहां हुए बदलाव को महसूस किया जा सकता है. बदलाव के नाम पर बड़ी योजनाएं शुरू नहीं हुई हैं बल्कि सरकार का फोकस ग्रामीण इलाके रहे हैं. ग्रामीण छत्तीसगढ़ में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में भूपेश बघेल सरकार की तरफ से चलाई गई योजनाओं का असर यह हुआ कि आज पूरे देश में अर्थव्यवस्था में मंदी के माहौल के बीच यह राज्य खुद को बचाए हुए है और आंकड़े बाकायदा इसकी गवाही दे रहे हैं. धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ ने चालू धान खरीद सीजन में भी किसानों को 2500 रुपए प्रति क्विंटल का भाव देने का अपना वादा निभाया जो कि अपने आप में एक कीर्तिमान है.

राज्य में रोजगार और विकास को समस्याओं के समाधान से जोड़कर राज्य सरकार ने अच्छे नतीजे हासिल किए हैं. नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना, गौठान और नालों की डीपीआर से लेकर जेम्स ऐंड ज्वेलरी पार्क बनाने तक की योजनाओं पर काम आरंभ हो चुका है. धान की बंपर पैदावार के बावजूद पराली जलाने की समस्या नहीं है तो इसके पीछे की वजह क्या हो सकती है? इंडिया टुडे के एडिटर अंशुमान तिवारी से बातचीत में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने कामकाज और कामयाबी के तमाम पहलुओं पर रोशनी डाली. पेश हैं कुछ अंश:

जनता ने अजीत जोगी का छत्तीसगढ़ देखा, रमन सिंह का छत्तीसगढ़ देखा और रमन सिंह का छत्तीसगढ़ काफी समय तक देखा. भूपेश बघेल का छत्तीसगढ़ इनसे कैसे अलग है?

देखिए, सबसे पहली बात तो यह है कि यह हमारा छत्तीसगढ़ है, भूपेश बघेल का छत्तीसगढ़ नहीं है. हम सबका है, दो करोड़ 80 लाख लोगों का छत्तीसगढ़ है. चाहे वे जंगल में रहने वाले लोग हों, ग्रामीण, शहरी, आदिवासी, किसान, मजदूर, व्यापारी या उद्योगपति हों—हम सबका छत्तीसगढ़ है. अंतर यह है कि हम सबको अवसर देना चाहते हैं. मजदूर को मजदूरी मिले, किसान को उसका दाम मिले, बेरोजगारों को रोजगार मिले, व्यवसायी को व्यवसाय करने का अवसर मिले, उद्योगपति को उद्योग लगाने का अवसर मिले. यही फर्क हमारा छत्तीसगढ़ दिखा रहा है.

एक साल में आप कहां तक पहुंचे इन लक्ष्यों को लेकर क्योंकि ये बड़े लक्ष्य हैं, लक्ष्य जितने बड़े होते हैं, अपेक्षाएं उतनी ज्यादा होती हैं. आपकी सरकार से अपेक्षाएं इसलिए ज्यादा थीं क्योंकि आपने बिल्कुल नकारात्मक माहौल में विपक्ष की वापसी का अभियान शुरू किया. जितने आपने लक्ष्य बताए अगर हम सौ में से परसेंटेंज मानना शुरू करें तो एक साल में आप कहां तक पहुंचा पाते हैं?

आकलन करना आप लोगों को काम है. हम तो काम करने वाले लोग हैं. जहां तक लक्ष्य प्राप्त करने की बात है तो सबसे पहली बात यह है कि किसानों के सर पर जो कर्ज का बोझ था और जो किसान हमेशा आर्थिक दबाव में रहा करते थे वह दबाव खत्म हो चुका है. ऋण का बोझ भी खत्म हो गया. बल्कि उनके खाते में पैसे भी आ गए, क्योंकि हमने 2,500 रुपए क्विंटल के रेट पर धान खरीदा. दूसरा, छत्तीसगढ़ में बिजली सरप्लस है तो किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं सबको सस्ती बिजली उपलब्ध कराई. आदिवासी जो तेंदूपत्ता तोड़ते थे, लघु वनोपजी करते थे, उनसे लघु वनोपज को समर्थन मूल्य में खरीदना शुरू किया.

गांधी जी की 150वीं जयंती पर हम लोगों ने स्वराजी ग्राम होने की ठानी है. नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना ऐसा ही कॉन्सेप्ट है. आज पर्यावरण को लेकर सब लोग चिंतित हैं. एक हजार से अधिक नालों की हमने डीपीआर तैयार करा ली है. बहुत जल्द ही वाटर रिचार्जिंग का काम शुरू करेंगे. दो हजार गौठान बनाए जा रहे हैं. इससे खुले में घूम रहे मवेशियों की समस्या दूर होगी. गौठान के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार भी मिलेगा. गोबर से पैसे कैसे कमाए जा सकते हैं- कम्पोस्ट खाद है, वार्मिंग खाद है, गोबर से दीया बनाने का काम शुरू कराया है. गोबर से जमीन की उर्वरा शक्ति में सुधार होगा. शहरी क्षेत्र में हमने छोटे प्लाटों की रजिस्ट्री शुरू कर दी है. लीज की जमीन को फ्री होल्ड कर रहे हैं. जिन उद्योगों को 10 साल हो गया और जमीन का उपयोग नहीं कर पाते थे, उसे फ्री होल्ड कर दिया तो औद्योगिक क्षेत्र में भी माहौल बना है.

ग्राहकों की जेब में पैसा डालने का काम हो रहा है. देश में मंदी है लेकिन छत्तीसगढ़ में मंदी नहीं है तो इसकी वजह ये चौतरफा काम हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि हमने लोगों का विश्वास जीतने का काम किया है. किसान का विश्वास जीता. आदिवासियों का विश्वास जीता क्योंकि हमने उद्योग के नाम पर ली गई जमीन वापस कर दी है. मुख्यमंत्री सुपोषित योजना के तहत 37.5 प्रतिशत कुपोषित बच्चों और 41 प्रतिशत से ज्यादा एनीमिया से पीडि़त महिलाओं को सुपोषित कर रहे हैं. हाट बाजार क्लीनिक योजना शुरू करने से ओपीडी मरीजों की संख्या 10 गुना बढी. इससे विश्वास बढा और उसके कारण नक्सली गतिविधि में 40 प्रतिशत की कमी आई. यह बड़ा बदलाव है. चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, रोजगार का क्षेत्र, व्यवसाय या कृषि क्षेत्र हो—हमने सब तरफ माहौल बनाने की कोशिश की है.

हमने देखा पिछले सालों में राज्य सरकारों ने या मुख्यमंत्रियों ने एक दो बड़ी फ्लैगशिप स्कीमें बनाई हैं जो उनके पूरे रिफार्म का प्रतिनिधित्व करती हैं- जैसे रमन सिंह के दौर में एक दो बड़ी स्कीमें थीं जिनके कारण बाद में माना गया कि छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसने धान, चावल सब गरीबों तक पहुंचाया. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की मोहल्ला क्लीनिक स्कीम. एक साल पहले मुलाकात में आपने कहा था कि एक साल बाद अपने बड़े कार्यक्रमों के बारे में बताएंगे जो बुनियादी समस्याओं से जुड़े हुए हैं. आपका वह बड़ा क्रलैगशिप कार्यक्रम क्या होगा या आपको लगता है कि अभी कुछ और बड़ा लॉन्च करने की तैयारी है?

देखिए, आज धान उत्पादन हो रहा है, मक्का उत्पादन हो रहा है. हमारे बस्तर में या आदिवासी क्षेत्र में कोदो भी है, कुटकी भी है. सेलर-बायर प्रोग्राम हमने किया है. मूल्य दिलाने का काम सरगुजा में हुआ है जहां जवां फूल बोते हैं और उसे 120 रुपए में बेच रहे हैं. यह ऐसा कार्यक्रम है जो हर वर्ग के लिए है. आज एफसीआइ के पास धान रखने की जगह नहीं है, इतना अनाज है कि एक साल नहीं, दो साल की जरूरत से अधिक अनाज पड़ा हुआ है. अनाज सड़ रहा है हमने कहा बायोफ्यूल बनाएं इससे, चाहे गन्ने से या धान से. यह देश के लिए बिल्कुल अनोखा होगा. छत्तीसगढ़ के अलावा कोई प्रदेश धान के लिए 2,500 रुपए नहीं दे रहा है.

बारह-पंद्रह सौ में किसान धान बेचने को बाध्य हो रहे हैं. यदि हम बायोफ्यूल बनाते हैं तो उससे हम तीन-चार काम कर सकते हैं एक, किसानों को दाम मिलेगा. दूसरा, प्लांट लगेगा तो रोजगार मिलेगा. तीसरा, विदेशी करेंसी बचेगी. आज 80 प्रतिशत फ्यूल हम बाहर से मंगा रहे हैं. यदि हम विदेशी धन बचाने में थोड़ा भी कन्ट्रीब्यूशन कर सकें तो बड़ी बात है. हम बायोफ्यूल बनाएंगे. सीधे पेट्रोलियम में मिलाएंगे. 20 प्रतिशत बायोफ्यूल मिलाने की इजाजत है. छह प्रतिशत अभी तक यूज कर रहे हैं. 14 प्रतिशत का गैप है. यदि इस गैप को भरते हैं तो देखिए, किसानों को कितनी कीमत मिलेगी.

इस साल आपने धान की कीमत कम की है?

नहीं की है. भारत सरकार ने चावल लेने से मना किया और कहा, चावल लेने पर आप बोनस दे रहे हैं तो हम चावल नही खरीदेंगे. हमने कहा, ठीक है, हम समर्थन मूल्य में धान खरीदते हैं. इतने में ही आपके अहंकार की तुष्टि हो रही है, हो जाए. हमने किसानों से कहा, आपके साथ न्याय होगा और जो अंतर की रकम है, दूसरी जगह दे देंगे, नोट का रंग तो वही है. मुख्य बात है किसान की जेब में 2,500 रुपए जाना चाहिए. प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिश की, मेल भेजे, फोन लगाए, पत्र भेजे पर..

केंद्र सरकार ने रोका है कि बोनस नहीं दिया जाएगा?

बोनस दोगे तो चावल नहीं खरीदेंगे. यदि मेरे पास सरप्लस 30-32 लाख टन हो रहा है तो उस चावल को क्या सड़कों पर फेंक दें? सड़ा दें? क्या ये राष्ट्रीय क्षति नहीं है? हमने कहा आपकी जिद है कि हम बोनस देंगे तो आप चावल नहीं लेंगे तो हमने कहा ठीक है, बोनस नहीं देते, दूसरे तरीके से दे देंगे. हमने कमेटी बना दी पांच मंत्रियों की. वह अध्ययन कर नया तरीका बताएगी. बजट सत्र में उसको लॉन्च कर देंगे. अरे भाई, भारत सरकार भी सम्मान निधि दे रही है, उड़ीसा में कालिया है, तेलंगाना में रायतु है, हम भी नई योजना लॉन्च कर देंगे, जिससे किसानों को उतना पैसा मिल जाएगा.

कहने का मतलब यह है कि किसान सम्मान जैसी कोई योजना आपके एजेंडे में है?

सम्मान निधि नहीं, मैंने कहा कि वो दें तो हम भी नाम बदलकर दे देंगे. भारत सरकार के अहंकार की तुष्टि हो जाएगी और क्या होगा. दो साल तक जब आपने उस नियम को शिथिल करके छत्तीसगढ़ को बोनस दिया. तीसरे साल भी कीजिए. आप नहीं कर रहे हैं तो ठीक है. हमने किसानों से वादा किया है, हम पैसा देंगे.

आपने कहा कि छत्तीसगढ़ में मंदी नहीं है जबकि छत्तीसगढ़ भी उसी माहौल का हिस्सा है, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, प्रोडक्शन में कमी है, एग्रीकल्चर ग्रोथ स्लो है. ऐसी कौन-सी हाइलाइट है, जिससे आप दावा करते हैं कि छत्तीसगढ़ में मंदी नहीं है जबकि पूरा देश मंदी में जा रहा है?

देखिए मैंने दो-तीन योजनाएं बताई हैं, पहली ये है कि हमने 2,500 रु. क्विंटल में धान खरीदा, कर्ज माफी की, चार हजार की दर से तेंदूपत्ता खरीदा- मतलब यह है कि जो उपभोक्ता है, उसकी जेब में पैसा डाल दिया. जब किसान, मजदूर को पैसा दोगे तो वह रखता नहीं है, सीधा बाजार में जाता है. आपने (केंद्र सरकार) 1,74,000 करोड़ रुपया सीधे आरबीआइ से लाकर कॉर्पोरेट सेक्टर को दे दिया. वो पैसा बाजार में नहीं आता. आप मजदूर को, किसान को, गृहिणियों को पैसे दोगे, वह सीधे बाजार में आता है. बाजार में आते ही डिमांड बढ़ गई.

आपको लगता है कि बढ़ी हुई डिमांड क्या स्टेट के रेवेन्यू में दिखाई दे रही है? अन्य राज्य शिकायत कर रहे हैं कि डिमांड कम है? सेंट्रल जीएसटी भी गिरा है और स्टेट जीएसटी भी गिरा है. आप कैसे कह पा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में दूसरे राज्यों से ज्यादा डिमांड है?

आज ही मेरे पास आटो मोबाइल के लोग इसी कमरे में आए थे. उन्होंने भारत सरकार का रिकॉर्ड दिखाया. जनवरी से लेकर अक्तूबर तक आटोमोबाइल सेक्टर में 10 प्रतिशत गिरावट है जबकि छत्तीसगढ़ में रजिस्ट्रेशन में 25 प्रतिशत का ग्रोथ है. इसको कोई झुठला नहीं सकता.

और कोई डेटा बता सकते हैं?

आप सराफा देख लीजिए, पिछले साल से 84 प्रतिशत की ग्रोथ है. रियल स्टेट में डेढ़ गुना ज्यादा कारोबार हुआ है. पिछले जून से सितंबर तक तिमाही में 92 करोड़ की रजिस्ट्री हुई और इस साल की जून से सितंबर तक तिमाही में 152 करोड़ की हुई है. आप किसी भी सेक्टर में चल दें, ग्रोथ दिखाई देगी. मतलब ये है कि जब मंदी का दौर आ रहा है, तो आप सीधे उपभोक्ता की जेब में पैसा डाल दें. फिर वह दुकान में खरीदी करता है. दुकानदार, उद्योग से कहता है कि इतना सामान चाहिए तो उद्योग का पहिया भी चलने लगता है.

पूरे देश में स्लो डाउन हैं पूरे देश में स्टील और माइन्स में इंवेस्टमेंट नहीं हो रहा है, इस स्लोडाउन से आप अपने प्रदेश में कैसे निबट रहे हैं?  

बड़ा पहिया आपको घुमाना है तो यह छत्तीसगढ़ से नहीं हो सकता. राज्य में पिछले कई सालों से एक भी नया प्लांट नहीं लगा. दसों साल से मैं देख रहा हूं, न कोई पावर प्लांट लगा, न कोई स्टील प्लांट लगा, जो पुराने हैं वही चल रहे हैं या बंद हो गए हैं. ये तो राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होगा. आप दूसरे सेक्टरों पर ध्यान क्यों नहीं देते. आपके पास एग्रीकल्चर सेक्टर है और दूसरे सेक्टर हैं जिसमें एक्सपोर्ट बढ़ा सकते हैं. आपने सारे दरवाजे बंद रखे हैं. अंतरराष्ट्रीय समझौता कर चुके हैं आप कि चावल नहीं बेचेंगे. आप अंतरराष्ट्रीय दबाव में काम कर रहे हैं. यहां तो 70 प्रतिशत लोग आज भी कृषि पर आधारित हैं. एक निश्चित सीमा के बाद हमारी डिमांड खत्म हो जाती है. उसको दूसरी चीज में यूज कीजिए, दूसरी चीज आप कुछ कर नहीं रहे हैं.

कई राज्य सरकारें केंद्र से शिकायत कर रही हैं कि उनका जीएसटी का पैसा नहीं मिल रहा है. इसमें आप भी शामिल हैं. राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं. ऐसे में आप केंद्र और राज्य के रिश्ते का क्या दृश्य देखते हैं?

सबसे पहली बात है कि जो उत्पादक राज्य हैं उनको जीएसटी में घाटे की भरपाई करने की बात थी. अब आप देना बंद कर रहे हैं. जो राज्य खपत कर रहे हैं उनको फायदा हो रहा है. हमारे यहां सीमेंट है, स्टील है, बिजली है-हमारा तो नुक्सान ही नुक्सान है. आपने जीएसटी में भरपाई करने का वचन दिया लेकिन उसकी भरपाई नहीं कर रहे हैं. ये नीति ही गलत है. हमारे सब टैक्स लगाने का अधिकार आपने छीन लिया है. हमको पैसे भी नही देंगे, यह तो ठीक नहीं है.

महाराष्ट्र का चुनाव नतीजा आने के बाद केंद्र और राज्य के रिश्तों का अगला दौर आपको क्या दिखाई देता है?

राजनीतिक नजरिये से कहा जाए तो विपक्ष मजबूत होगा और केंद्र दबाव में होगा. सवाल यह है कि आप गलत दिशा में चल दिए हैं, अंधी सुरंग में चल दिए हैं और पीछे से सांप घुस गया है- देश की आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई है. न आप निकल पा रहे हैं और न आपको कुछ दिखाई दे रहा है. कहां ले जा रहे हैं आप. सीतारमण जी ने जो जीडीपी का आंकड़ा बताया, साढे चार प्रतिशत और स्वामी जी जो उन्हीं के पार्टी के सांसद हैं बोले, डेढ़ परसेंट है, समझ में नहीं आता. उन्हीं की पार्टी के लोग बोल रहे हैं.

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