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अफसानानिगार मंटो से आगे का अफसाना

मंटो. टोबा टेक सिंह. पागलखाना. हिंदुस्तान. पाकिस्तान. एक परेशान करती-सी तस्वीर इतने से ही उभर आती है.

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शिवकेश मिश्र / संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 22 March 2018
अफसानानिगार मंटो से आगे का अफसाना मंटो में टोबा टेक सिंह

मंटो. टोबा टेक सिंह. पागलखाना. हिंदुस्तान. पाकिस्तान. एक परेशान करती-सी तस्वीर इतने से ही उभर आती है. पंजाब के प्रतिष्ठित लेखक-नाट्य निर्देशक आतमजीत सिंह ने टोबा टेक सिंह कहानी से एक धागा लेकर पंजाबी में जो नाटक रचा है रिश्त्यां दा की रखिए नां (रिश्तों का क्या रखें नाम), वह और भी परेशान करता है.

मंटो बार-बार याद आते हैं, और एक स्तर पर (चार्ली) चैप्लिन भी. सिंह ने कुछ और किरदार जोड़े हैं, कुछ के नाम बदल गए हैं. पर इसके तंज, तेवर और मूड से जान पड़ता है, जैसे मंटो खुद पीछे से उन्हें प्रॉम्प्ट कर रहे हों. इसके संवादों पर आप ठट्ठा मारते हैं लेकिन अर्थ खुलते ही जबान तलुए से चिपक जाती है.

इस पागलखाने के पागलों में से एक, कहीं खोया-खोया-सा, नूरदीन हर वक्त एक ही डायलॉग बोलता रहता हैः ''छोले गरम करारे. मलाई वाली कुल्फी." सिपाही जब उसके पास आकर पाकिस्तान बनने की खबर देते हैं तो वह भोलेपन में पूछता है ''पाकिस्तान कुल्फियां बनाने वाली मशीन को तो नई कैंदे हैं?"

खुशी में आजादी-आजादी चिल्ला रहे पागल फौजी माखनसिंह से पूछे जाने पर कि ''आजादी की होंदी ये?" उसका बेलौस जवाब होता हैः ''ये परोफेसर साब (एक अन्य किरदार) से पूच्छो." वहीं पर पागलों के साथ किन्नरों को भी मुल्क चुनने के हुक्म पर दो किन्नर लाचारी जताते हैः ''साले हूंदे न जीजे हूंदे, असी तीजे हूंदे."

सिंह इस प्रस्तुति में लेखक/निर्देशक के अपने रोल में गजब का संतुलन साधते हैं. डेढ़ घंटे में भी इसकी गति धीमी ही लगती है पर पुरानी सुरा की तरह यह दर्शक को अपनी समेट में ले लेता है.

37 साल पहले, खालिस्तान की सुगबुगाहट के दौरान लिखे, विभाजन की मानसिकता पर करारी चोट करने वाले, इस नाटक के अभी तक महज 7-8 शो ही हुए हैं, हैरत है. दिल्ली में आठवें थिएटर ओलंपिक में पिछले हफ्ते मंचन के लिए उन्होंने कलाकारों को मोहाली से अमृतसर के पास मंटो के गांव समराला ले जाकर रिहर्सल की.

सिंह के शब्दों में, ''कलाकारों को नजदीक से मंटो का एहसास कराने के लिए." शायद तभी उसकी तपिश दर्शकों को भी महसूस हुई. परिवार के साथ देखने आए चिंतक राजमोहन गांधी ने सिंह को मैसेज भेजकर ''कला और कमिटमेंट" की ताकत दिखाने के लिए सैल्यूट किया.

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