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सिनेमाः साहसी सरकार

अपनी फिल्म की रिलीज के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का चुनाव कर शुजित सरकार ने बॉलीवुड में एक नई परंपरा की नींव डाली

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aajtak.in
सुहानी सिंहनई दिल्ली, 14 June 2020
सिनेमाः साहसी सरकार गुलाबो सिताबो की डिजिटल रिलीज से शुजित सरकार को बड़ा दर्शक वर्ग मिलेगा

अपनी ताजा फिल्म गुलाबो-सिताबो को लेकर शुजित सरकार ने जैसा सोचा था, वैसा हो नहीं पाया. इसे 17 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज होना था. पर अब यह 12 जून को अमेजन प्राइम वीडियो के जरिए सीधे आपके घरों तक पहुंचेगी. और सब कुछ ठीक होता तो इस वक्त वे मुंबई में फिल्म का प्रमोशन कर रहे होते. पर इस समय वे कोविड-19 और अम्फान चक्रवात की दोहरी मार झेल रहे कोलकाता के अपने घर में परिवार के साथ बैठे हैं.

बहरहाल, इस संकट का रोना रोने की जगह सरकार खुद को नई परिस्थितियों के अनुकूल ढाल रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘मुझे आगे देखना है. मैं फिल्म को रोककर रखना नहीं चाहता था. मैंने डिजिटल मीडियम का अनुभव लेने का फैसला किया. ’’

सरकार के फैसले ने सिनेमाघरों के पूरे उद्योग को भारी झटका दिया है. यह उद्योग थिएटरों के बंद होने से इसे एक नए चलन की शुरुआत के रूप में देख रहा है. हालांकि सरकार के लिए आकर्षण का कारण था अमेजन का उन्हें 200 देशों में ‘‘एक बड़ी रिलीज’’ का अवसर देना. उनकी फिल्म 15 भाषाओं में डब होने जा रही है. इंडोनेशियाई, हिब्रू और पोलिश जैसी कई भाषाओं में सब-टाइटल होंगे. वे कहते हैं, ‘‘हम सीधे दर्शकों तक पहुंच रहे हैं. इससे फिल्म की कहानी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.’’

गुलाबो सिताबो डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए खासी माकूल फिल्म है. इसकी कहानी जुही चतुर्वेदी ने लिखी है, जो पहले भी सरकार के निर्देशन वाली विकी डोनर और पीकू जैसी फिल्में लिख चुकी हैं. इस फिल्म में वास्तविक जिंदगी की झलक देखने को मिलती है. फिल्म में बुजुर्ग मकान मालिक मिर्जा (अमिताभ बच्चन) और उनके किराएदार बांके (आयुष्मान खुराना) के बीच संघर्ष चलता है.

सरकार कहते हैं, ''यह एक सीधा-सादा व्यंग्य है, जिसमें कोई बहुत भारी-भरकम किस्म का प्लॉट नहीं है.’’ लखनऊ की पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म में एक जीर्ण-शीर्ण हवेली को लेकर दो लोगों में खटपट होती रहती है. मिर्जा अपनी इस हवेली को बेचना चाहते हैं लेकिन बांके मकान खाली करने से मना कर देता है. सरकार कहते हैं, यह शहर भी फिल्म के कई चरित्रों में से एक है. वे कहते हैं, ‘‘फिल्म का कलेवर पुराने लखनऊ के रंग में रंगा हुआ है जो पुरानी दिल्ली और कोलकाता के कुछ इलाकों की भी झलक देती है.’’

सरकार बताते हैं कि फिल्म हजरतगंज और चौक के वास्तविक इलाकों में फिल्माई गई है. सत्यजीत रे के पक्के अनुयायी सरकार कार्टन होटल में ठहरे हुए थे. यह वही होटल है जिसमें रे शतरंज के खिलाड़ी फिल्म की शूटिंग के समय ठहरे थे. सरकार कहते हैं, ‘‘उनसे प्रेरणा लेना बहुत सौभाग्य की बात है.’’ राय की ही तरह सरकार के पास भी लोगों की एक टीम है जिसके साथ वे हमेशा काम करना पसंद करते हैं.

रोनी लाहिड़ी और शील कुमार फिल्म के निर्माण में उनके पार्टनर रहे हैं, शांतनु मोइत्रा ने उनकी कई फिल्मों में संगीत दिया है जबकि कमलजीत नेगी और अविक मुखोपाध्याय उनके पसंदीदा कैमरामैन रहे हैं. जुही भी उनके सिनेमाई परिवेश का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं. हां, सरकार की यहां, पिंक और 2021 की फिल्म सरदार उधम सिंह की कहानी जरूर उनकी लिखी हुई नहीं है. इंडिया टुडे से बातचीत में जुही ने बताया था, ‘‘सोचने का मेरा एक तरीका है जो खुशकिस्मती से उनके साथ अच्छी तरह मेल खाता है.’’

सरकार एक अदद तैयारशुदा पटकथा के साथ काम करना पसंद करते हैं. इससे उन्हें फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले ही अपने दिमाग में फिल्म पूरी करने में मदद मिलती है. वे कहते हैं कि जुही उसी तरह से कहानी तैयार करती हैं. दोनों की जोड़ी शूबाइट के समय से शुरू होती है. सरकार की अब तक रिलीज न होने वाली इस फिल्म में भी अमिताभ बच्चन ने काम किया था. इस फिल्म में जुही ने संवाद लिखे थे. वे कहते हैं, ‘‘सिनेमा में हमारी पसंद और समझ बहुत मेल खाती है. अगर इस तरह का आपसी मेल न हो तो जुड़ाव बन नहीं पाता.’’

फिर भी पार्टनरशिप में सहजता होते हुए भी सरकार के लिए काम करना ‘जल्दबाजी भरा और आसान’ नहीं रहा है. वे कहते हैं, ‘‘इसके लिए कोई मैजिक फॉर्मूला नहीं है.’’ बहरहाल, गुलाबो सिताबो में दोनों ने जरूर एक फॉर्मूला बना लिया है जो जिंदगी को बहुत बारीकी से देखने और रिश्तों की पहचान करने का है. सरलता के साथ कहानी को पेश करने के उनके तरीके ने उन्हें हिंदी सिनेमा में अलग पहचान दे दी है.

फिल्म में हंसी-मजाक के ढेरों प्रसंगों के बावजूद सरकार इसे ‘कॉमेडी’ फिल्म नहीं मानते. ‘‘यह जिंदगी की जद्दोजहद के बारे में है, जिससे हम सभी का पाला पड़ता है. यह इनसानी फितरत के बारे में है जो मौजूद होते हुए भी हमें दिखाई नहीं देता. हम नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं पर हम कर रहे होते हैं.’’

एक और शख्स हैं जो सरकार के नजरिए से परिचित हैं और वे हैं अमिताभ बच्चन. वे कहते हैं, ‘‘हमारा रिश्ता ऐसा है कि हम आपस में ज्यादा बोलते नहीं. वे मेरी तरफ देखते हैं और भांपते हैं कि मैं उनके शॉट से खुश हूं या नहीं. वे कहेंगे, ‘अविक रीटेक लो. वह खुश नहीं है‘, चलो फिर से कोशिश करते हैं.’’ इसी तरह सरकार ने जब डिजिटल रिलीज के बारे में अपनी राय बनाई तो अमिताभ तुरंत राजी हो गए.

सरकार भविष्य की तरफ देखते हुए इसे ‘भारतीय मनोरंजन में एक नए दौर की सुबह’ बताते हैं. उनके दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है. इरफान की मृत्यु के सदमे से वे अब भी उबर नहीं पाए हैं. सरकार कहते हैं,‘‘ भूल पाना बहुत मुश्किल है.’’ लॉकडाउन की वजह से सरकार उनके अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच पाए थे. इसके अलावा चक्रवात के कारण हुई विनाश लीला ने उन्हें झकझोर दिया है.

वे कहते हैं, ‘‘यह ट्रेजिडी कल्पना से भी परे है. इस विनाश से जो नुक्सान हुआ है उसे दोबारा बनाने में वर्षों लग जाएंगे.’’लेकिन कुछ अच्छी बातें भी हुई हैं. वे खाना पकाने का मजा ले रहे हैं, राय की पुरानी फिल्मों को दोबारा देख रहे हैं और डाक्युमेंट्री भी देख रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैं अभी कुछ समय के लिए लॉकडाउन में रहना चाहता हूं.’’

हरा रिश्ता गुलाबो सिताबो की शूटिंग के वक्त अमिताभ और आयुष्मान के साथ शुजित

शुजित की फिल्मों की कहानी ङ्क्षजदगी को गहराई से महसूस कर कही गई होती है.

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