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सिनेमा-जो दिल ने कहा...

ज़ायरा के फैसले पर फिल्म बिरादरी ने मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी हैं. कुछ ने उनकी इस 'व्यक्तिगत पसंद' का सम्मान किया है जबकि बहुतों को मजहब के नाम पर अपने फैसले को सही ठहराने की उनकी कोशिश पर आपत्ति है.

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aajtak.in
सुहानी सिंह नई दिल्ली, 08 July 2019
सिनेमा-जो दिल ने कहा... ज़ायरा वसीम

ज़ायरा वसीम ने पहली बार किसी हिंदी फिल्म के लिए ऑडिशन दिया तो उनके मां-बाप ने कहा था, ''होगा तो नहीं.'' लेकिन हुआ. उनकी पहली फिल्म दंगल (2016) आज तक की दूसरी सबसे बड़ी हिट हुई और 16 साल की उम्र में ज़ायरा वसीम को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. ज़ायरा ने 2017 में आमिर खान प्रोडक्शंस की फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार के प्रमोशन कार्यक्रम के दौरान इंडिया टुडे से बातचीत में यह किस्सा साझा किया था. उन्होंने बताया था कि कश्मीर में लोग उनके काम से खुश हैं और उनसे ऐक्टिंग जारी रखने को कहते हैं. लेकिन दो साल बाद, ज़ायरा का मन बदल गया है.

ज़ायरा ने इतनी जल्दी बॉलीवुड को अलविदा कहने पर अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स पर लिखा, ''इस हलके में काम करते हुए मुझे लोगों का बहुत प्यार, समर्थन और प्रशंसा हासिल हुई, लेकिन यह मुझे जहालत की ओर भी ले गया क्योंकि मैं अनजाने में ईमान (आस्था) के रास्ते से भटक गई. मैं लगातार ऐसे माहौल में काम कर रही थी जो मेरे ईमान के आड़े आ रहा था और मजहब से मेरे रिश्ते पर खतरा मंडराने लगा था.''

यह लंबा अफसाना अपने फैसले पर एक अफसोसजदा लड़की की बानगी है, जिसे कुरान की शिक्षा में अपने सारे जवाब और मकसद हासिल हो गए हैं. सोनाली बोस निर्देशित द स्काई इज पिंक (11 अक्तूबर) ज़ायरा की आगामी फिल्म है जिसमें वे एक ऐसे प्रेरक वक्ता का किरदार निभा रही हैं, जो पल्मोनरी फाइब्रोसिस से पीडि़त है और महज 19 साल की उम्र में उसकी मौत हो जाती है. ज़ायरा ने कहा है कि उन्हें इस फिल्म के प्रचार से अलग रखा जाए.

अक्सर पत्थरबाजी की वारदात के कारण सुर्खियों में रहने वाले श्रीनगर के हवाल इलाके में पली-बढ़ी ज़ायरा कभी फिल्मों की शौकीन नहीं रही. 2017 में उन्होंने बड़ी साफगोई से यह बात कबूल की थी, ''मैंने जो भी फिल्में देखी हैं वह थोड़ा-थोड़ा करके ही देखी...एक भी फिल्म शुरू से अंत तक नहीं देखी.'' अभिनय से साबका महज एक संयोग था. उन्होंने खुद को कभी कमजोर नहीं माना लेकिन यह भी कबूला कि एक तरह की 'सामाजिक बेचैनी' के साथ वे बड़ी हुईं.

2018 में एक इंस्टाग्राम पोस्ट में उन्होंने हताशा में अपने संघर्ष पर लिखा था, ''खालीपन, बेचैनी-सी महसूस कर रही हूं...'' और ''दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया है और खुदकुशी के विचार आते हैं.'' अंत में यह भी लिखा कि इस डर पर काबू पा लिया कि कैसा सलूक होगा. उसके बाद हमेशा सुर्खियों में रहने वाले उद्योग को छोडऩे का उनका फैसला हैरान करने वाला नहीं है.

कश्मीर में उनकी एक सहेली कहती हैं, ''उनके मां-बाप उनको लेकर बहुत फिक्रमंद रहते हैं.'' जनवरी, 2017 में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से मुलाकात के बाद ज़ायरा की आलोचना हुई तो यह सहेली उनके साथ खड़ी थी. तब बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी काफी अशांत थी. अपने सेवानिवृत्त बैंकर पिता ज़ाहिद के बारे में ज़ायरा कहती हैं, ''उन्हें मेरी काफी फिक्र रहती है. मेरे बारे में कोई कुछ गलत बोले, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं.'' ज़ाहिद ही आमिर खान से बात करने मुंबई पहुंचे थे और उनसे भरोसा मांगा था कि वह उनकी सोहबत में पूरी तरह महफूज रहेगी. ज़ायरा ने कहा, ''जिस पल वे आमिर खान से मिले, सब ठीक हो गया.''

आमिर खान को ज़ायरा में ऐसे स्टार की झलक दिखी थी जिसका भविष्य उज्ज्वल है. उन्होंने 2017 में इंडिया टुडे टीवी से बातचीत में कहा था, ''मुझे लगता है कि वह आज हमारी इंडस्ट्री की सबसे बेहतरीन ऐक्टर में  एक हैं. जब मैं अपनी पहली या दूसरी फिल्मों को पलटकर देखता हूं तो मुझे लगता है कि मैं तो ऐक्टिंग में उनके आसपास भी कहीं नहीं था. यह अद्भुत है कि देश के हर हिस्से से प्रतिभाएं फिल्म इंडस्ट्री में आ रही हैं.'' 

अपनी दोनों फिल्मों में ज़ायरा ने अपनी अदाकारी से आज की लड़कियों की आकांक्षाओं, गुस्से और जोश को बहुत खूबसूरत तरीके से परदे पर उतारा था. कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा, जिनके सहायक ने ही श्रीनगर में प्रतिभा की खोज के दौरान उन्हें ढूंढ निकाला था, कहते हैं, ''वे कैमरे के सामने बेहद ईमानदार रहती हैं.'' सेंट पॉल इंटरनेशनल एकेडमी के स्कूल प्रिंसिपल ने भी उनके नाम की सिफारिश की थी. छाबड़ा कहते हैं, ''उन्होंने सच्चे दिल से काम किया. शायद इसीलिए उन्होंने इतना अच्छा प्रदर्शन किया.'' ज़ायरा को भारतीय मुख्यधारा में कश्मीरी आकांक्षाओं और सपनों को जीने वाली एक युवा के रूप में देखा जाएगा. इसकी अभिव्यक्ति के लिए फिल्मों से बेहतर माध्यम और क्या हो सकता है?

ज़ायरा, हालांकि, एक अनिच्छुक-सी सुपरस्टार थीं. महबूबा मुफ्ती के साथ मुलाकात के कारण हुए विरोधों से आहत ज़ायरा ने अपने 'खुले इकरारनामे/माफी' में लिखा था, ''मैं जो कर रही हूं उस पर मुझे बहुत फख्र नहीं है और मैं चाहती हूं कि हर कोई, विशेष रूप से नौजवान, अपने वास्तविक जीवन के रोल मॉडलों को तलाशें. हो सकता है, वे उन्हें मौजूदा दौर में भी मिल जाएं या फिर इतिहास में मिलें.''

ज़ायरा के करीबी उन्हें 'अंतर्मुखी' बताते हैं. वे अपने परिवार के बहुत करीब और बतौर कश्मीरी अपनी पहचान के प्रति सजग रही हैं. वे कभी मुंबई में बसना नहीं चाहती थीं. उनकी एक दोस्त जो उनके इस फैसले से हैरान नहीं हैं, कहती हैं, ''कश्मीर में मशहूर लोगों के लिए सामाजिक बंदिशें दोगुनी हो जाती हैं लेकिन वे सहज बनी रहीं.''

ज़ायरा के फैसले पर फिल्म बिरादरी ने मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी हैं. कुछ ने उनकी इस 'व्यक्तिगत पसंद' का सम्मान किया है जबकि बहुतों को मजहब केनाम पर अपने फैसले को सही ठहराने की उनकी कोशिश पर आपत्ति है. बाद में हटा लिए गए अपने एक ट्वीट में रवीना टंडन ने लिखा, ''जिसने अब तक सिर्फ दो फिल्में ही कीं और जिसे इंडस्ट्री से इतना कुछ मिला, उसकी कृतघ्नता कोई खास मायने नहीं रखती. बेहतर होता कि वे और शालीनता का परिचय देते हुए फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कहतीं और अपने प्रतिगामी विचारों को खुद तक रखतीं.'' दंगल के निर्देशक नितेश तिवारी ने कहा, ''यह अप्रत्याशित था, लेकिन यह उनकी जिंदगी है. हममें से किसी को भी उनके निजी फैसले पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है.''

कश्मीर में ज़ायरा के फैसले का उन लोगों ने भी स्वागत किया, जिन्होंने दो साल पहले महबूबा मुफ्ती से मिलने पर उनका ट्रोल किया था. उनके समर्थन में ऐक्टर मीर सरवर भी सामने आए, जो आशुतोष गोवारिकर की अगली फिल्म में दिखेंगे. 

बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि ज़ायरा आगे क्या करना चाहती हैं. बारहवीं की परीक्षा में उन्होंने 80 प्रतिशत से अधिक नंबर हासिल किए थे और अब वह शायद कॉलेज में दाखिला लेंगी. वे शायद अपने घर में अपनी तीन बिल्लियों के साथ खूबसूरत पहाडिय़ों के नजारे लेने में सुकून का एहसास करेंगी. ''मैं हमेशा निकलने की कोशिश करती रही, लेकिन हर बार बंद गली में पहुंच जाती. मैं न तो इसमें संतुष्ट थी और न इससे निकल पा रही थी...मैं इतने लंबे वक्त तक अपने जमीर से लड़ती रही. जब आप खुद से संघर्ष कर रहे हों तो यह बहुत लंबा और बोझिल लगने लगता है.'' ज़ायरा अब शायद खुद को आजाद महसूस कर रही होंगी.

''सफर काफी बेहद थकाऊ रहा...जिंदगी छोटी है मगर अपनी रूह से ही लडऩा पड़े तो काफी लंबी और बोझिल हो जाती है.''

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