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नगालैंड के इस गांव के खेतों में पनपता संगीत

भारत-म्यांमार सीमा से सटे 5,000 की आबादी वाले नगालैंड के एक गांव फेक के लोगों में गाने की कुदरती प्रतिभा है. वे अपने सीढ़ीदार धान के खेतों से जब गुजरते हैं तो उन्हें जो चीज सबसे पसंद है वह है गीत गाना.

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सुहानी सिंहनई दिल्ली, 11 July 2018
नगालैंड के इस गांव के खेतों में पनपता संगीत नगालैंड के फेक गांव में हरेक को मिला है सुरों का वरदान

भारत-म्यांमार सीमा से सटे 5,000 की आबादी वाले नगालैंड के एक गांव फेक के लोगों में गाने की कुदरती प्रतिभा है. वे अपने सीढ़ीदार धान के खेतों से जब गुजरते हैं तो उन्हें जो चीज सबसे पसंद है वह है गीत गाना. फिल्मकार अनुष्का मीनाक्षी और ईश्वर श्रीकुमार को 2011 में यह बात तब पता चली जब वे श्रम और संगीत के बीच के संबंधों पर एक प्रोजेक्ट कर रहे थे.

यहां किसानों को उन्होंने जब पहली बार गाते हुए सुना तो, ठगे रह गए. इन फिल्मकारों ने अब तक जितना भी संगीत सुना था, यह उनमें से "सबसे जटिल और अपने आकर्षण में सबसे ज्यादा बांधकर रखने वाला संगीत था.'' पीठ पर चावल की बोरी लदी हो तो भी ये किसान उतना ही मधुर गा लेते थे. दोनों फिल्मकार इससे इतने प्रभावित हुए कि इन छह साल में वे यहां बार-बार आते रहे.

इस ग्रामीण संगीत के माधुर्य में सनी एक डॉक्युमेंट्री बनी है अप डाउन ऐंड साइडवेज जो कानों और मन दोनों में मिठास भरकर सुकून पहुंचाती है. जर्मनी, तुर्की और पुर्तगाल में पुरस्कार जीतने के बाद यह फिल्म भारत में जागरण फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनी है.

मीनाक्षी और श्रीकुमार ने फेक गांव के सरकारी हाइस्कूल में फिल्म निर्माण का वर्कशॉप चलाया जिससे उन्हें स्थानीय लोगों के साथ मेल-जोल बढ़ाने में मदद मिली. भाषा की बाधाओं को पार करने में अजा, कुकू और बीबी ने उनकी सहायता की जिन्होंने एक उद्यमी की तरह कार्य किया और स्थानीय किसानों को अपनी फिल्म में शूट किए जाने के लिए राजी किया.

काफी जद्दोजहद के बाद 83 मिनट का फुटेज मिल गया. करीब 10 मिनट लंबा एक सीन शूट किया गया है जो दर्शकों को यह बताने में सफल है कि श्रम आधारित खेती में गीत कितना स्वाभाविक, सामंजस्यपूर्ण, सहज और आकर्षक होता है.

चेन्नै के रहने वाले और पेशे से कलाकार और थिएटर के लिए लाइटिंग और साउंड डिजाइनर श्रीकुमार बताते हैं, "ये गीत खेतों पर सीखे और सिखाए जाते हैं. ये चर्च या स्कूलों के अलावा इस क्षेत्र में होने वाली सालाना प्रतियोगिताओं में सिखाए जाते हैं. वे लि, गॉस्पेल, वेस्टर्न पॉप और रॉक म्युजिक गाते हैं.''

संगीत के लिए उनका जुनून इंटरव्यू के दौरान झलकता है जिसमें युवा और बुजुर्ग दोनों ही एक समान शर्मीले मगर जोश से भरे और एक दूसरे से संगीत के मुकाबले को आतुर दिखते हैं. खेती को लेकर लोगों का लगाव, इन्हीं खेतों में अपने सुंदर जीवन के उनके सपने, ये सारे भाव उनके संगीत में उतर आते हैं.

ये सब मिलकर फेक के प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं. जैसा कि डॉक्युमेंट्री के विषयों के चयन के दौरान एक भय रहता है कि कहीं विषय फैशन से बाहर न हो जाए. फिल्मकार कहते हैं कि ली सॉन्ग इन आशंकाओं से परे हैं क्योंकि ये कभी भी फैशन से बाहर नहीं होंगे.

वे कहते हैं, "ज्यादा से ज्यादा लोग नौकरियों के लिए या पढ़ाई के लिए अब बाहर जा रहे हैं लेकिन जब खेती का मौसम चरम पर होता है सभी अपने गांव वापस आ जाते हैं, खेती में हाथ बंटाते हैं.''

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