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लॉकडाउन डायरीः इनसानी फितरत बहुत खतरनाक

एक पल को जरा उन लौटते प्रवासी मजदूरों को देखें. उनके बारे में भी भगवान सोच रहे होंगे कि वे अपने खेतों में, अपने घरवालों के पास रहें. इन शहरों में दूसरों की नौकरियां करके धक्के खाते क्यों जी रहे हो? लॉकडाउन डायरी में लिख रही हैं अभिनेत्री सीमा पाहवा

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aajtak.in
नवीन कुमारनई दिल्ली, 15 June 2020
लॉकडाउन डायरीः इनसानी फितरत बहुत खतरनाक सीमा पाहवा

सीमा पाहवा

हासिल हुआ सबक:

कोरोना महामारी के दौर में सब लोग एक साथ एक जैसा सोच पा रहे हैं, यह एक बड़ी बात हुई है. एक हासिल कह सकते हैं. सब एक-दूसरे की परवाह कर रहे हैं. रिश्ते समझ में आ रहे हैं, उनमें गहराई बढ़ी है. सरपट भागता वक्त जो हमारे हाथ से निकला जा रहा था, अब वह कहीं पर रुका है. हमें रुककर कुछ सोचने का मौका मिला है कि वह क्या है जिसके लिए आप भाग रहे हैं?

मैं तो पॉजिटिव ही सोचती हूं. हमारी जिंंदगियों में आए इस कोरोना पड़ाव से हमें सीखना चाहिए कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता. शायद वक्त ने ही हमें याद दिलाया है कि यह भी एक 'पॉजिटिव’ जिंदगी है.

कहीं कुछ कम है:

फिल्म इंडस्ट्री में कितने तरह के लोग एक साथ आते हैं, तब कोई पिक्चर बनती है. एक फिल्म बनने से करीब 150 लोगों के घर की रसोई चलती है. महामारी की वजह से अब कम मेंकाम चलाना पड़ेगा यानी लोगों के पास काम कम हो जाएगा. यह सचमुच अफसोसनाक है. कितने सारे लोगों की रोजी पर चोट पडऩे वाली है. बेचारे दिहाड़ी वालों के सामने बुरा दौर आने वाला है.

तो क्या क्रांति आ जाएगी? दूसरे पहलू से कुदरत पर इसका असर देखें. आसमान नीला नजर आने लगा है. परिंदे खुश दिखते हैं. सांस लीजिए तो हवा की शुद्धता का साफ पता लगता है, जिसे अपनी गाडिय़ों के धुएं से गंदा भी हमीं ने किया था. कुदरत बेचारी बार-बार याद दिलाती रहती है कि मुझ पर कृपा करो. लेकिन हम हैं कि अंधाधुंध उसे बर्बाद करने पर तुले हुए हैं. अब भी हम कोई सुधरने वाले थोड़े ही हैं!

लॉकडाउन खुलने भर की देर है, फिर वही चिल्लमचोट. वही धुआं-धक्कड़. अगर मैं कहूं कि हमने कुछ सबक सीखा है, तो यह कहना रूमानियत वाली बात होगी. कहीं न कहीं मैं झूठ बोल रही हूं. इनसान की फितरत बहुत खतरनाक है. आज घर में बैठे हुए हैं. कुछ भी कहवा लो, ‘अब इसके बाद अच्छा इनसान बनूंगी और जिम्मेदारी के साथ जिऊंगी.’ पर ऐसा कुछ नहीं होने वाला. मुझे नहीं लगता कि कोई बड़ी क्रांति आ जाएगी. हां, यह जरूर सीखा है कि बाद में भी जब हम शूटिंग और भाग-दौड़ कर रहे होंगे, तब भी हमको यह वक्त एन्जॉए करना आना चाहिए.

ऊपरवाला झकझोर रहा:

आप प्रकृति से जितना ज्यादा जुड़ते हैं, उतने ही धार्मिक होते जाते हैं. मुझे लगता है, ऊपरवाला ही है जो इन मुश्किलों में कुछ लिख रहा है. इसे उसका तमाचा कहिए या कुछ और, पर वह हर इनसान को जैसे झकझोर रहा है: कोरोना हो, बंगाल का तूफान हो और फिर मुंबई का. भगवान जैसे बार-बार याद दिला रहा है कि किन झमेलों में पड़ गए?

जिस काम के लिए आए हो वही करो न! एक पल को जरा उन लौटते प्रवासी मजदूरों को देखें. उनके बारे में भी भगवान सोच रहे होंगे कि वे अपने खेतों में, अपने घरवालों के पास रहें. इन शहरों में दूसरों की नौकरियां करके धक्के खाते क्यों जी रहे हो?

कोई लौटा दे:

इस वक्त बहुत-से लोग अतीत की चीजों को याद करके लिख रहे हैं. उन्हें महसूस हो रहा है कि पहले हम कितने सुकून में थे. हमारे पास कुछ ऐसा था जो हमने भाग-दौड़ में खो दिया है. अब फिर से उसकी खोज शुरू हुई है. मुझे लगता है, अपने गुजरे वक्त को मिस कर रहे लोग दुबारा अपनी उस जिंदगी को लाना चाहेंगे.

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