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सिनेमा-फंतासियों का संसार

दर्शकों को हैरत में डालने वाले बहुत-से दृश्य अब जमीन पर नहीं, कंप्यूटर पर रचे जा रहे. वीएफएक्स टेक्नोलॉजी ने फिल्म निर्माण की शैली में बुनियादी बदलाव पैदा किया. हॉलीवुड के लिए भी यहीं हो रहा काम

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नवीन कुमारनई दिल्ली, 20 March 2019
सिनेमा-फंतासियों का संसार सिनेमा टेक्नोलॉजी

गली बॉय फिल्म में रणवीर सिंह एक गाने पर नाच रहे हैं और उनके सामने सैकड़ों की भीड़ है. शूटिंग के वक्त तो इतनी भीड़ नहीं थी! वीएफएक्स ने यह चमत्कार किया. इसी तरह पद्मावत फिल्म में दीपिका पादुकोण के जौहर करने का दृश्य शूट ही नहीं किया गया था. इसी तकनीक से उसको भी परदे पर पेश किया गया. बदलती टेक्नोलॉजी ने फिल्म निर्माताओं-निर्देशकों का काम भी आसान करना शुरू कर दिया है. कृष, रा-वन, बाहुबली, बाजीराव मस्तानी, पद्मावत, जीरो और 2.0 जैसी तमाम फिल्मों में वीएफएक्स के इस्तेमाल ने दर्शकों को चमत्कृत किया है. इस तकनीक के सहारे जहां भारतीय सिनेमा का भी चेहरा बदल रहा है वहीं इसके विशेषज्ञों के हुनर का हॉलीवुड भी मुरीद हुआ है. उसे तो भारत में इसका सस्ता बाजार मिल गया है. वहां के मार्वेल स्टुडियो की हर फिल्म में इंडियन वीएफएक्स का इस्तेमाल हो रहा है, वेबसिरीज की दुनिया भी अब वीएफएक्स के हाथ में है. मुंबई से लेकर हैदराबाद, चेन्नै, बेंगलूरू, पुणे जैसे शहरों में 100 से ज्यादा वीएफएक्स कंपनियां काम कर रही हैं.

कंप्यूटर युग के आने के बाद वीएफएक्स तकनीक सिनेमा की दुनिया को अपनी तरह से बदलने में लगी हुई है. फिल्म में इस तकनीक ने एक टेक्निकल डायरेक्टर खड़ा कर दिया है. इसमें ग्राफिक्स और एनिमेशन का भी प्रयोग होता है. मुंबई के अंधेरी स्थित पिक्सल डिजिटल स्टुडियो में 50 से ज्यादा आर्टिस्ट काम करते हैं. इसी तरह मलाड स्थित एनवाय वीएफएक्सवाला स्टुडियो में 230 आर्टिस्ट हैं. पिक्सल स्टुडियो के क्रिएटिव हेड केवी संजित बताते हैं, ''गली बॉय में वीएफएक्स के लिए तीन महीने काम चला. उसमें भीड़ को ज्यादा करके दिखाया गया.'' वे मानते हैं कि शोले आज बनती तो ट्रेन सीक्वेंस के लिए वीएफएक्स ही इस्तेमाल होता. थ्री इडिएट्स में बोमन ईरानी को दोनों हाथ से लिखता हुआ और लाइफ ऑफ पाइ में शेर को नाव पर इसी के जरिए दिखाया गया. वीएफएक्स के बावजूद खतरनाक ऐक्शन अब भी स्टंटमैन ही करते हैं लेकिन रिस्क फैक्टर कम हुआ है.

रिबन फिल्म के युवा निर्देशक राजीव उपाध्याय अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, ''रिबन रियलिस्टिक फिल्म थी पर इसमें भी एक सीन में पीछे पड़ी कुर्सी को परदे पर न दिखने देने के लिए वीएफएक्स के जरिए हटा दिया.'' राजपाल यादव की अता पता लापता के एक गाने में लिल्ली घोड़ी के पूरे दल को लंदन के ब्रिज से पास करना था. एक शॉट के लिए पूरी टीम को लंदन जाकर शूट करना महंगा पड़ता. इसलिए लंदन ब्रिज का ब्रैकग्राउंड प्लेट खरीदकर क्रोमा का सेट (हरे रंग के परदे वाला सेट) लगाया गया. उसके आगे कैमरे के एंगल से सेट करके शूट किया और बाद में वीएफएक्स से ब्रिज सेट किया. वीएफएक्स दरअसल प्रति सेकंड के हिसाब से पैसा लगने से महंगा पड़ता है. एक सेकंड में 24 फ्रेम होते हैं. जितना लंबा शॉट उतना महंगा. साइंस फिक्शन वाली फिल्म वीएफएक्स के बिना नहीं बन सकती.

बाहुबली वीएफएक्स से ही बन सकती है. पहाड़, मारधाड़ वाला सीन, एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर जंप वीएफएक्स ही करा सकता है. वीएफएक्स की मदद से शाहरुख खान ने फैन में दो रोल और जीरो में बौने का रोल निभाया. पेटा के निर्देश के अनुसार असली जानवर के साथ शूटिंग मुमकनि नहीं, सो टाइगर जिंदा है में सलमान वीएफएक्स की मदद से एक भेडिय़े के साथ लड़ते हैं.

एनवाय वीएफएक्सवाला के सह-संस्थापक और क्रिएटिव हेड प्रसाद सुतार बताते हैं कि ''हॉलीवुड वाले वहां काम का ओवरलोड होने और हमारे यहां सस्ता होने के कारण यहां आ रहे हैं. हमें काम करने के साथ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी भी सीखने को मिल रही है.'' वीएफएक्स तकनीक दो दशक पहले भारत में आई थी. इस लिहाज से प्रसाद की पहली फिल्म 1999 में गुलाम थी. आमिर खान और विक्रम भट्ट की इस फिल्म में कई सीन लाइव शूट नहीं हो सकते थे सो कंप्यूटर से किए गए. वे बताते हैं, ''लागत बजट में रखने के लिए ग्राफिक्स/वीएफएक्स का इस्तेमाल होता है. विदेश के किसी दृश्य के लिए वहां का बैकग्राउंड डालकर यहीं शूट करते हैं.

यह कहानी कहने का एक माध्यम बन गया है.'' 10-15 साल पहले तक धर्मा या यशराज ग्रुप की ज्यादातर फिल्मों की शूटिंग यूरोप में होती थी. तब यहां के दर्शकों के लिए वहां की खूबसूरती नई चीज थी. अब वह सबने देख लिया. अब दर्शक को कुछ अलग चाहिए. बकौल प्रसाद, ''वीएफएक्स पीरियड फिल्म या फ्यूचरिस्टिक फिल्म में ज्यादा इस्तेमाल होता है. भारत में फ्यूचरिस्टिक फिल्में ज्यादा चलतीं नहीं, सो बनतीं नहीं. बाजीराव और बाहुबली जैसे सिनेमा में मेकर को विजुअल बड़ा, सुंदर, खतरनाक दिखाने की आजादी मिल जाती है, जिससे दर्शक को मजा आए.''

संजयलीला भंसाली की फिल्मों से जुड़े रहे प्रसाद बताते हैं कि बाजीराव मस्तानी वीएफएक्स की वजह से अलग बनी. इसने भंसाली जैसे निर्देशक को अपना विजुअल बड़ा करने और स्टोरी के हिसाब से सीन में वैसा एहसास पैदा करने का अवसर मिल गया. ''भंसाली को दृश्य पेंटिंग्स जैसा चाहिए. राजामौलि को लार्जर दैन लाइफ चीजें चाहिए.'' प्रसाद के मुताबिक आगे जाकर बड़ी या छोटी फिल्मों में फर्क नहीं रहेगा. वे कई मराठी फिल्में भी कर रहे हैं. वे बताते हैं, ''बाजीराव के आखिरी दृश्य के लिए काफी मंथन करना पड़ा था. सोचा गया कि पहले रात में शूट करेंगे. फिर तय हुआ कि दिन में शूट करके वीएफएक्स से उसमें रात करेंगे. सेना के दृश्य के लिए घोड़े मंगाए गए थे. पर 300-400 घोड़ों को दौड़ाना खतरनाक था. अंत में 30-40 घोड़ों से शूटिंग हुई.''

यानी वीएफएक्स आपकी किसी भी कल्पना को परदे पर लाकर खड़ा कर देता है. पद्मावत की शूटिंग में मुश्किल आने से ज्यादातर शूटिंग इनडोर हुई. आउटडोर का शॉट बैकग्राउंड में दिखाकर इनडोर शूटिंग में क्रोमा से किया गया. आखिर के जौहर वाले दृश्य में 100-150 महिलाएं थीं. आग बाद में वीएफएक्स से डाली गई. इस समय प्रसाद अजय देवगन की तानाजी पर काम कर रहे हैं जो पीरियड फिल्म है. इसमें बड़ी जंग नहीं बल्कि गुरिल्ला जंग है. पूरी फिल्म को डिजाइन करने में दो-ढाई साल लगे हैं. इस फिल्म का शूट आउटडोर या नाइट में नहीं है बल्कि सेट लगाकर शूटिंग पूरी होगी. तानाजी के बाद वे मणि रत्नम की पीरियड फिल्म और भंसाली की फिल्में करेंगे.

मजे की बात है कि इस तकनीक विशेष की अभी तक कोई खास ट्रेनिंग नहीं हो रही है. कला और टेक्नोलॉजी संस्थानों से ही युवा सीखकर आ रहे हैं. आने वाले दिनों में इसका महत्व और बढऩे वाला है. स्क्रिप्ट लिखते समय ही वीएफएक्स के बारे में सोचेंगे.

भविष्योन्मुखी फिल्मों में वीएफएक्स की अपार संभावना होने के बावजूद भारतीय फिल्मकार उधर नहीं जा रहे क्योंकि वैसी फिल्मों का यहां इतना एक्सपोजर नहीं है. यहां विषय के लिए इतिहास और पौराणिक ग्रंथ खंगाले जा रहे हैं. इन ग्रंथों में अपार कहानियां हैं जो पचास साल तक भी खत्म न हों. वीएफएक्स की मदद से अब वहीं से हीरो और सुपरहीरो आएंगे.

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